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Thursday, 24 September, 2026
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गोवा में गणपति की एक समस्या है—हाथी ओमकार बार-बार वापस आ जाता है

इस कहानी से जुड़े सभी लोग इस युवा हाथी के लिए अच्छे नतीजे की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन आप इसे चाहे जिस तरह देखें, ओमकार एक चुनौती है.

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गोवा में पिछले हफ्ते गणेशोत्सव शुरू हुआ. परिवार नदियों, छोटी नदियों और तालाबों के किनारे इकट्ठा हुए, ताकि कुछ दिन पहले घर लाए गए भगवान गणेश की मूर्तियों का विसर्जन कर उन्हें विदा कर सकें, लेकिन विसर्जन के एक दिन बाद देवता ज़मीन पर लौट आए और तांबोक्सेम के पास हाईवे पर पहुंच गए—हाथी ओमकार के रूप में.

मोपा के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से लगे छोटे से गांव से गुज़रने वाले नेशनल हाईवे 66 पर यातायात पूरी तरह थम गया. वन विभाग के कर्मचारियों ने केले और दूसरे फलों का लालच देकर हाथी को वापस झाड़ियों में जाने के लिए मजबूर किया. ट्रक वहीं खड़े रहे और बाइक सवार ऊंचे डिवाइडर पर चढ़कर अपने फोन के कैमरे ऊपर किए हुए थे. सभी 10 साल के इस हाथी ओमकार की एक झलक पाने की कोशिश कर रहे थे, जो अपने लिए घर की तलाश में है.

पिछले कुछ महीनों में ओमकार स्थानीय गोवा चैनलों के लिए एक रूटीन न्यूज़ बन गया है. 2025 से, जब महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले में हाथी अपने झुंड से अलग हो गया था, तब से वह कई बार दोनों राज्यों के बीच आ-जा चुका है. अकेला और अभी पूरी तरह बड़ा नहीं हुआ नर हाथी तेरेखोल नदी के किनारे चलना पसंद करता है. यह नदी महाराष्ट्र-गोवा सीमा के साथ बहती है और इस वजह से आसपास के छोटे गांवों में डर फैल जाता है.

पिछले साल सिंधुदुर्ग के मोर्ले गांव में 65 साल के काजू किसान लक्ष्मण यशवंत गावस को ओमकार ने हवा में उछाल दिया और फिर उनकी छाती को पैरों से कुचल दिया. गावस सुबह-सुबह अपने बागान से काजू लेने गए थे. उनकी मौके पर ही मौत हो गई. इस मौत के बाद गांव वालों और वन विभाग व पुलिस के बीच आठ घंटे तक तनाव बना रहा. मोर्ले के लोगों ने अधिकारियों को गावस का शव पोस्टमार्टम के लिए ले जाने की अनुमति नहीं दी, जब तक उन्हें यह भरोसा नहीं दिया गया कि ओमकार को पकड़ लिया जाएगा.

महाराष्ट्र के दक्षिणी तटीय जिलों और गोवा के सबसे उत्तरी पेरनेम तालुका के किसान, जहां ओमकार काजू और सुपारी के बागानों को भी नुकसान पहुंचा चुका है, स्वाभाविक रूप से खुश नहीं हैं. एक किसान ने द हेराल्ड को बताया, “हम ज़मीन पर खेती करते हैं, कर्ज लेते हैं और 8 से 10 साल तक पेड़ों की देखभाल करते हैं…सिर्फ इसलिए कि हाथी ओमकार आए और एक ही रात में सब कुछ बर्बाद कर दे. हम क्या खाएंगे? मुआवजा आखिर कब तक चलेगा? सालों की हमारी मेहनत का मुआवजा कौन देगा?”

लेकिन जिन लोगों की ज़िंदगी और रोजी-रोटी को ओमकार से खतरा नहीं है और जो मुख्य रूप से इंस्टाग्राम के जरिए उसकी गतिविधियों की लगातार आ रही खबरों को देखते रहे हैं, उनके लिए ओमकार की हरकतें थोड़ी खुशी लेकर आती हैं. वे उसे देखकर खुश होते हैं और उसके वीडियो के नीचे “गणपति बप्पा मोरया!” लिखते हैं और पूरी तरह बिना सोचे-समझे सड़क के बीच उसके साथ सेल्फी लेने के लिए रुक जाते हैं.

ओमकार गोवा क्यों लौटता है

इस कहानी से जुड़े सभी लोग इस युवा हाथी के लिए अच्छे नतीजे की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन आप इसे चाहे जिस तरह देखें, ओमकार एक चुनौती है, खासकर ऐसे राज्य में जहां हाथियों की अपनी कोई स्थानीय आबादी नहीं है. नवंबर 2025 में ही बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसे पकड़ने और कुछ समय के लिए वंतारा ले जाने का आदेश दिया था, लेकिन पिछले 10 महीनों में ऐसा करना काफी मुश्किल साबित हुआ है.

नॉर्थ गोवा डिवीजन के डिप्टी कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स जिस के वर्के ने मुझे विभाग के सामने आ रही चुनौतियों के बारे में विस्तार से बताया. वर्के के विभाग को सबसे पहले महाराष्ट्र से ड्रोन सेंसर के डेटा के जरिए हाथी के बारे में जानकारी मिली थी. वर्के मानते हैं कि उस समय उन्हें “इस जानवर के बारे में, उसके व्यवहार, उसके चलने-फिरने के तरीके और इंसानों के प्रति उसके रवैये के बारे में कोई जानकारी नहीं थी”. इसके बावजूद उन्होंने 24 घंटे चलने वाली बचाव टीमों को तैनात किया. ये टीमें 50-50 लोगों के दो बैच में थीं.

इन टीमों ने मोपा में डेरा डाला, जहां उन्होंने घबराए हुए ओमकार को एयरपोर्ट की चारदीवारी के बहुत करीब देखा. इलाके में नेटवर्क की कम सुविधा के कारण गांव वालों को सतर्क करना और स्कूलों की सुरक्षा करना भी एक समस्या थी. वर्के ने मुझे बताया, “हाथियों के लिए अनजान इलाके में होने के बावजूद हम दूसरे दिन ही हाथी को वापस महाराष्ट्र भेज सकते थे, लेकिन महाराष्ट्र के गांव वालों ने कुछ ही समय में हाथी को वापस गोवा भेज दिया.” ऐसा बार-बार हुआ है. नवंबर में सिंधुदुर्ग के स्थानीय लोगों को बहुत डरे हुए ओमकार को वहां से भगाने के लिए पटाखे फोड़ते हुए देखा गया था.

इसके बाद से गोवा की टीम ने कोशिश की है कि हाथी को सीमा के पार वापस ले जाने से पहले उसे पर्याप्त आराम दिया जाए. ओमकार ने बचाव दल के कुछ कर्मचारियों पर भरोसा करना शुरू कर दिया है. ये कर्मचारी उसे केले और गन्ना खिलाते हैं. कुछ दिन पहले हाथी पतरादेवी की एक संकरी गांव की सड़क पर आ गया था. यह ग्रामीण घरों के एक समूह के ठीक बाहर है. वहां बचाव दल के कर्मचारी उसे फल देकर धीरे-धीरे आगे ले जाने की कोशिश करते हुए दिखाई दिए.

वर्के को अपनी टीम की अब तक की कोशिशों पर सावधानी से गर्व है. उन्होंने कहा, “20 साल बाद एक जंगली हाथी गोवा में आया है. विभाग के किसी भी कर्मचारी ने पहले ऐसी स्थिति का सामना नहीं किया है और न ही उन्हें इसका कोई अनुभव है. लेकिन हमने हाथी पर प्रभावी तरीके से नज़र रखी और किसी भी अप्रिय घटना को होने से रोका.”

कमरे में मौजूद हाथी

अपनी आवाजाही को लेकर इतनी चर्चा के बावजूद, ओमकार का व्यवहार पूरी तरह नॉर्मल है. हाथियों के विशेषज्ञ डॉ. एन लक्ष्मीनारायणन ने मुझे बताया कि हाथी, गौर और सांभर जैसे बड़े स्तनधारी जानवरों में 10-12 साल की उम्र के युवा नर आमतौर पर अपने झुंड से “अलग होने” लगते हैं. इससे पहले तक युवा नर अपने उस झुंड के साथ रहते हैं, जिसमें उनका जन्म हुआ होता है. करीब एक दशक तक चलने वाले इस अलग होने के दौर में ये जानवर अपना इलाका बढ़ाते हैं और रहने के लिए एक बड़े इलाके की तलाश करते हैं. इससे उनके व्यवहार में कई तरह के बदलाव आते हैं. डॉ. डॉ. एन लक्ष्मीनारायणन ने कहा, “समस्या जानवर नहीं, उसकी उम्र है. आमतौर पर व्यवहार में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं—खासकर ज्यादा आबादी वाले इलाकों में यह आम बात है.”

उनके मुताबिक, ओमकार कोई असामान्य मामला नहीं है. देशभर में कई युवा नर हाथी इसी तरह का व्यवहार कर रहे हैं. मध्य कर्नाटक में हाथी आम हैं, लेकिन हाइड्रोइलेक्ट्रिक बांध जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं ने हाथियों के झुंडों को अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया है. इनमें से कुछ झुंड उत्तर की ओर गोवा और महाराष्ट्र की तरफ चले गए हैं, लेकिन उत्तर में पश्चिमी घाट संकरे हो जाते हैं, जंगल कम हो जाते हैं और हाथियों को पसंद आने वाले पर्णपाती जंगलों की जगह सदाबहार इलाके आने लगते हैं. इंसानों की ज्यादा आबादी भी उनकी परेशानी बढ़ाती है.

इनमें से कोई भी स्थिति ओमकार के लिए अच्छी नहीं है. फिलहाल इस जानवर को इंतज़ार करना होगा कि उसका मूल राज्य उसे वापस अपनाएगा या नहीं. हाथियों के साथ परेशानी यह है कि उन्हें राजनीतिक सीमाओं और भूगोल की कोई समझ नहीं होती. उन्हें नहीं पता होता कि एक राज्य कहां खत्म होता है और दूसरा कहां शुरू होता है. तेरेखोल नदी के दोनों किनारों के कई गांवों ने उसे यह समझाने की कोशिश की है, लेकिन उसने अभी तक यह बात नहीं सीखी है. यही वह समस्या है, जो सामने होते हुए भी किसी राज्य के लिए हल नहीं हो पाई है.

यह लेख Goa Life सीरीज़ का हिस्सा है, जिसमें गोवा की संस्कृति के नए और पुराने दोनों पहलुओं को समझाया जाता है.

करनजीत कौर पत्रकार हैं, Arré की पूर्व संपादक हैं और TWO Design में पार्टनर हैं. उनका एक्स हैंडल @Kaju_Katri है. व्यक्त किए गए विचार निजी है.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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