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Thursday, 24 September, 2026
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DUSU चुनाव के नतीजे क्या पूरे भारत के युवाओं की सोच दिखाते हैं?

बीजेपी के नेता अच्छी तरह जानते हैं कि DUSU के नतीजों का मतलब यह ज़रूरी नहीं है कि जुलाई में CJP के विरोध-प्रदर्शनों से पहले जैसी स्थिति फिर से लौट आई है या सब कुछ पहले जैसा हो गया है.

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ऐसा अक्सर नहीं होता कि अमित शाह जैसे चुनाव जीतने वाले नेता किसी विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के नतीजों का जश्न मनाएं. वह इससे कहीं ज्यादा बड़े और कई चुनाव लड़कर जीत चुके हैं. फिर भी, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) छात्र संघ में चार केंद्रीय पदों में से तीन पर जीत हासिल की, तो शाह सामान्य से ज्यादा उत्साहित और आक्रामक नज़र आए.

केंद्रीय गृह मंत्री ने एक्स पर कहा, “दिल्ली विश्वविद्यालय केवल एक यूनिवर्सिटी नहीं, यहां देश के हर कोने से विद्यार्थी पढ़ने आते हैं. यहां का जनादेश पूरे भारत के युवाओं के मन का प्रतिबिंब होता है. आज @ABVPVoice को मिली शानदार जीत उन राष्ट्र विरोधी ताकतों के लिए स्पष्ट संदेश है, जो युवा शक्ति को राष्ट्रविरोधी एजेंडे की प्रयोगशाला बनाना चाहते हैं. देश का युवा आज राष्ट्र प्रथम की विचारधारा के साथ मजबूती से खड़ा है और यही इस जनादेश का सबसे बड़ा संदेश है.”

उनके बयान के अंदाज़ से राहत और अपनी बात सही साबित होने का भाव दिख रहा था. छोटे-छोटे कॉकरोचों ने ताकतवर बीजेपी के अजेय होने की छवि में छेद कर दिया था. सत्तारूढ़ पार्टी अचानक कमजोर और अनिश्चित नज़र आने लगी थी. यहां तक कि बांकीपुर में विधानसभा उपचुनाव में हार को भी बीजेपी के मुख्य समर्थक आधार, जिसमें ऊंची जातियां और बेहतर भविष्य की चाह रखने वाले युवा शामिल हैं, की एक तरह की बगावत के रूप में देखा जा रहा था. हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (पौड़ी कैंपस) के चुनाव में एबीवीपी के खराब प्रदर्शन पर विपक्षी दलों ने तंज कसा था और इसे BJP के लिए एक और बुरे संकेत के रूप में देखा था.

कांग्रेस महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल ने एक्स पर कहा, “गढ़वाल विश्वविद्यालय चुनाव में एनएसयूआई की शानदार जीत बीजेपी की पूरी हार है…यह भारत के उन युवाओं और छात्रों का संदेश है, जो बीजेपी को सज़ा देने के मौके का इंतज़ार कर रहे थे…आने वाले डूसू चुनाव में भी बीजेपी का यही हाल होगा…”

शनिवार को डूसू चुनाव के नतीजे आने के बाद केसी मौन हो गए. ऐसा लगा कि इससे राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को लेकर बना माहौल कमजोर पड़ गया.

डूसू चुनाव के नतीजों पर बीजेपी का जश्न मनाना स्वाभाविक था, क्योंकि इन छोटे-छोटे ‘कॉकरोचों’ ने छात्रों और युवाओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था. स्थिति इतनी आगे बढ़ गई थी कि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) जैसी पार्टियां भी, जो परिसीमन के मुद्दे पर बीजेपी के साथ सहयोग करने की ओर झुकती दिख रही थीं, अचानक पीछे हट गईं. अब शाह को उम्मीद हो सकती है कि वे उनके साथ मिलकर काम करने को लेकर अपनी झिझक छोड़ दें. यही वजह है कि संसद का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने के पांच हफ्ते बाद भी अब तक समाप्त नहीं हुआ है.

DUSU चुनाव के नतीजों का संक्षिप्त इतिहास

बीजेपी के जोर-शोर से जश्न मनाने के बावजूद, डूसू के नतीजे कई पहलुओं वाले हैं. बीजेपी के नेता अच्छी तरह जानते हैं कि इन जीतों का मतलब यह ज़रूरी नहीं है कि पहले जैसी स्थिति वापस आ गई है या जुलाई में सीजेपी के विरोध-प्रदर्शनों से पहले जो स्थिति थी, वह फिर लौट आई है. यह सिर्फ एक विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव है. आइए पीछे जाकर देखें कि क्या डूसू चुनाव जनता के मूड को दिखाते हैं. 1970 के दशक में ऐसा हुआ था. आपातकाल से पहले के चार साल तक एबीवीपी ने डूसू अध्यक्ष का पद जीता था: 1971 में भगवान सिंह, 1972 में राम खन्ना, 1973 में आलोक कुमार और 1974 में अरुण जेटली. आपातकाल के बाद हुए पहले चुनाव में भी एबीवीपी ने सभी चार केंद्रीय पद जीत लिए थे. विजय गोयल अध्यक्ष, सुनील मित्तल उपाध्यक्ष, रजत शर्मा सचिव और टी जोग्गुलम्बा संयुक्त सचिव बने थे. 1980 में जनता का मूड बदल गया, जब इंदिरा गांधी सत्ता में वापस आईं, लेकिन इसका असर डूसू चुनावों में नहीं दिखा. एबीवीपी ने 1980 में अध्यक्ष का पद (विजय जॉली), 1981 में (सुधांशु मित्तल) और 1982 में (योगेश शर्मा) जीता.

सितंबर 2008 में एबीवीपी की नूपुर शर्मा डूसू की अध्यक्ष बनीं. इसके कुछ महीने बाद बीजेपी लोकसभा चुनाव हार गई. 2012 में एनएसयूआई ने डूसू चुनाव में बड़ी जीत हासिल की और चार केंद्रीय पदों में से तीन जीत लिए, जबकि चौथे पद पर दोनों उम्मीदवारों को बराबर वोट मिले. 2014 के लोकसभा चुनाव में उसकी मुख्य पार्टी कांग्रेस के साथ क्या हुआ, यह हम जानते हैं. हालांकि, 2013 में एबीवीपी ने तीन पद जीते थे और एनएसयूआई ने एक. 2017 में, जब प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता सबसे ज्यादा थी, एनएसयूआई ने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद जीत लिए थे.

यह छोटा सा इतिहास हमें बताता है कि डूसू चुनाव पूरे देश के छात्रों के मूड को दिखा सकते हैं या नहीं भी दिखा सकते हैं. अगर बीजेपी के नेताओं को लगता है कि ये चुनाव जनता की भावना को दिखाते हैं, तो उन्हें चिंता करनी चाहिए. एबीवीपी के उम्मीदवारों की जीत का अंतर पिछले साल के मुकाबले काफी कम हुआ है. इसे उसके मजबूत गढ़ में उसके समर्थन आधार में धीरे-धीरे कमी के रूप में देखा जा सकता है.

पिछले साल एबीवीपी ने अध्यक्ष का पद 16,196 वोटों के अंतर से जीता था. इस साल यह अंतर घटकर 2,053 वोट रह गया. 2025 में एबीवीपी उपाध्यक्ष के चुनाव में 9,000 से कम वोटों के अंतर से हार गई थी. 2026 में वह बागी एनएसयूआई उम्मीदवार से 13,705 वोटों से हार गई. आधिकारिक एनएसयूआई उम्मीदवार को मिले करीब 4,300 वोट भी जोड़ दें, तो उपाध्यक्ष पद पर एबीवीपी की हार का अंतर और बड़ा हो जाता है. 2025 में एबीवीपी ने सचिव का पद 7,600 से ज्यादा वोटों के अंतर से जीता था. इस साल यह अंतर थोड़ा घटकर 6,781 वोट रह गया. आरएसएस की छात्र शाखा ने पिछले साल संयुक्त सचिव का पद 4,400 से ज्यादा वोटों के अंतर से जीता था. इस साल यह अंतर घटकर 837 वोट रह गया. एबीवीपी की जीत के अंतर में कमी और उसकी हार के अंतर में बढ़ोतरी उन बीजेपी नेताओं के लिए चिंता की वजह होनी चाहिए, जो इन नतीजों को देश के मूड का पैमाना मानते हैं.

कुल वोटों की संख्या के हिसाब से भी 2025 के चुनाव के मुकाबले एबीवीपी के वोट शेयर में हर जगह कमी आई. उसके अध्यक्ष पद के उम्मीदवार को 2026 में 24,576 वोट मिले, जबकि 2025 में 28,821 वोट मिले थे. यानी 4,245 वोटों की कमी. उपाध्यक्ष पद के उम्मीदवार को पिछले साल के मुकाबले 3,632 वोट कम मिले, जबकि संयुक्त सचिव पद के उम्मीदवार को 5,210 वोट कम मिले.

यह सब कहने के बाद भी, जीत तो जीत होती है.

कन्हैया कुमार की खुद को आगे दिखाने की कोशिश

बीजेपी के पास जश्न मनाने की दो और वजहें हैं. पहली, विपक्ष अब भी बंटा हुआ है. अगर डूसू चुनाव में विपक्ष एकजुट होता, तो एबीवीपी बुरी तरह हार जाती, लेकिन यह सिर्फ एक सैद्धांतिक बात है. विपक्षी खेमे में हितों और महत्वाकांक्षाओं का आपसी टकराव लंबे समय तक एकता बनने से रोकता है. दूसरी और ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस संगठन के तौर पर अभी भी इतनी कमजोर और बंटी हुई है कि बढ़ते सरकार-विरोधी माहौल का फायदा नहीं उठा सकती.

डूसू चुनाव में देखिए क्या हुआ. गांधी के कन्हैया कुमार के प्रति लगातार समर्थन से उत्साहित, पूर्व कॉमरेड और एनएसयूआई प्रभारी कन्हैया कुमार ने डूसू चुनाव में हरियाणा से कांग्रेस सांसद दीपेंद्र हुड्डा को कमजोर करने और उन्हें नीचा दिखाने को अपना मकसद बना लिया. हुड्डा, दीपांशु शोकीन और विशेष यादव को बढ़ावा दे रहे थे. कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, हुड्डा ने 2025 के डूसू चुनाव में एनएसयूआई के उम्मीदवारों के तौर पर इन दोनों के नाम सुझाए थे, लेकिन उन्हें बताया गया था कि उन्हें 2026 में मैदान में उतारा जाएगा.

यह बात सही है कि डीटीसी बस कंडक्टर के बेटे शोकीन इस साल एनएसयूआई के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने को लेकर शुरुआत में हिचक रहे थे क्योंकि एबीवीपी का उम्मीदवार ज्यादा संसाधनों वाला था. हालांकि, हुड्डा के दखल के बाद वह तैयार हो गए. अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि कन्हैया कुमार को शोकीन को अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाने पर अंतिम फैसला लेकर वापस आना था, लेकिन वह कभी वापस नहीं आए. बाद में एनएसयूआई प्रभारी ने उन्हें बताया कि शोकीन को उपाध्यक्ष पद के उम्मीदवार के तौर पर और यादव को संयुक्त सचिव पद के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ना चाहिए. कहानी में एक और बड़ा मोड़ आना बाकी था.

एनएसयूआई उम्मीदवारों के तौर पर नामांकन पत्र दाखिल करने से कुछ समय पहले शोकीन और विशेष से नाम वापस लेने को कहा गया. इसके बाद दोनों ने बगावत कर दी. शोकीन चुनाव जीत गए, जबकि यादव बहुत कम अंतर से हार गए. नतीजे दिखाते हैं कि अगर कन्हैया कुमार ने खुद को आगे दिखाने की कोशिश नहीं की होती, तो कांग्रेस डूसू के चार में से दो पद जीत जाती और कहानी कुछ और होती. और कन्हैया ने एनएसयूआई के उपाध्यक्ष पद के उम्मीदवार के तौर पर किसे चुना? वह कांग्रेस नेता मनीष चतरथ के बेटे वीर चतरथ थे. पूर्व कॉमरेड ने वंशवाद वाली पार्टी में राजनीति के नियम काफी जल्दी सीख लिए हैं.

राहुल गांधी के लिए सबक

डूसू के नतीजों में गांधी के लिए एक बड़ा संदेश है. इन दिनों वह काफी खुश नज़र आ रहे हैं. इसके पीछे वजह भी है, क्योंकि उनके ‘छात्रों की गूंज’ अभियान को अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है. जैसे प्रधानमंत्री मोदी को 2014 में लगा था कि लोगों को “पार्टी के नाम के बजाय एक भरोसेमंद नाम” चाहिए, वैसे ही गांधी को भी लगता दिख रहा है कि छात्रों और युवाओं को बड़ी संख्या में वोट डालने के लिए मतदान केंद्रों तक लाने का काम कांग्रेस की संगठनात्मक क्षमता नहीं, बल्कि उनका नाम करेगा.

यूपीए सरकार के समय पत्रकारों के साथ एक बातचीत में एक आमंत्रित व्यक्ति ने गांधी से पूछा था कि जब कांग्रेस के पास राज्यों में बड़े नेता या जमीनी स्तर पर संगठन मौजूद नहीं है, तो वह अपना संदेश पूरे देश तक कैसे पहुंचाएगी.

गांधी ने जवाब दिया, “क्या नेहरू जी को इसकी ज़रूरत थी? एक व्यक्ति भी संदेश पहुंचाने के लिए काफी है…सिर्फ इसलिए कि मैंने आज़ादी के आंदोलन के दौरान नेहरू जी की तरह जेल नहीं काटी!”

इतने साल बाद भी, ऐसा लगता है कि उनकी सोच नहीं बदली है. कांग्रेस के नेता अभी भी ‘ब्रांड राहुल’ बनाने में अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं, जबकि पार्टी का संगठन बुरी हालत में है. मुख्य विपक्षी पार्टी यह बात भूल रही है कि मोदी के राष्ट्रीय स्तर पर आने और एक ब्रांड बनने से पहले आरएसएस और बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ बढ़ती नाराजगी को लोगों तक पहुंचाने और उसका राजनीतिक फायदा उठाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. 2029 में गांधी, 2014 में मोदी की तरह ‘भरोसेमंद नाम’ नहीं बन सकते, अगर उनके लिए काम करने वाली मजबूत और व्यवस्थित पार्टी मशीनरी नहीं होगी. डूसू चुनाव के नतीजे इसी बात की ओर इशारा करते हैं.

डीके सिंह दिप्रिंट में पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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