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Saturday, 5 September, 2026
होममत-विमतक्या नारीवादी कभी रिटायर होते हैं? आखिरी सांस तक पिछली सदी की जंग लड़ती रहीं ग्लोरिया स्टाइनम

क्या नारीवादी कभी रिटायर होते हैं? आखिरी सांस तक पिछली सदी की जंग लड़ती रहीं ग्लोरिया स्टाइनम

विरोधी सरकारें या अदालतें हमारे अधिकार तो किसी भी समय छीन सकती हैं, लेकिन संघर्ष का वह ‘राजनीतिक व्याकरण’ जिसे महिलाओं ने सीख लिया है, उसे कोई नहीं छीन सकता. यही ग्लोरिया स्टाइनम की सच्ची विरासत है.

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ग्लोरिया स्टाइनम अंत तक सक्रिय, मुखर और पूरे जोश में थीं. इसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया: क्या नारीवादी कभी सेवानिवृत्त होती हैं? 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, लेकिन वे लगातार आवाज़ उठाती रहीं. क्या ऐसा इसलिए था क्योंकि वे इस संघर्ष से अलग नहीं होना चाहती थीं, या इसलिए कि वे नारीवाद को एक ऐसी लड़ाई के रूप में देखती थीं जिसे कभी जीता नहीं जा सकता?

हम उन्हें अक्सर नारीवादी क्रांति की दूसरी लहर (सेकंड-वेव फेमिनिस्ट रेवोल्यूशन), Ms. (मिज़) पत्रिका और प्रजनन अधिकारों (रिप्रोडक्टिव राइट्स) से जोड़कर देखना पसंद करते हैं. इनमें से कुछ लड़ाइयां आज भी लड़ी जा रही हैं. क्या इसका मतलब यह है कि दूसरी लहर स्थायी बदलाव लाने में विफल रही? क्या हम नारीवादी संघर्ष की दूसरी लहर को पूरी तरह और मुकम्मल तौर पर जीते बिना ही चौथी लहर में प्रवेश कर गए हैं?

कहा जाता है कि ग्लोरिया स्टाइनम का सबसे महत्वपूर्ण योगदान महिलाओं को संघर्ष के लिए आवाज़ और शब्दावली देना था. उन्होंने हमें वे उपकरण दिए जो हर लड़ाई, हर लहर में बेहद महत्वपूर्ण हैं. यही कारण है कि दूसरी लहर द्वारा जीते गए अधिकार, इस लड़ाई के व्याकरण (ग्रामर) की तुलना में कम महत्वपूर्ण हैं. विरोधी सरकारों और अदालतों द्वारा अधिकारों को किसी भी समय छीना जा सकता है. लेकिन संघर्ष का वह राजनीतिक व्याकरण, जिसके सहारे महिलाएँ लड़ना सीख चुकी हैं, उसे कोई नहीं छीन सकता.

यही ग्लोरिया स्टाइनम की सच्ची विरासत है.

एक नारीवादी की ‘फैक्ट्री सेटिंग’

ग्लोरिया स्टाइनम मैदान छोड़ने में विश्वास नहीं रखती थीं. वे 2017 में ट्रंप-विरोधी ‘वुमेन्स मार्च’ में पूरी ताकत से गरजीं, जहां उन्होंने आंदोलन के निर्माण और गहन लोकतंत्र के बारे में बात की. जब 2022 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने रो बनाम वेड (Roe v Wade) के फैसले को उलट दिया, तो उन्होंने कहा था कि शारीरिक स्वायत्तता (बॉडीली ऑटोनॉमी) के बिना कोई लोकतंत्र नहीं हो सकता.

उस समय मैंने सोचा था कि उन्हें कैसा लगा होगा. आखिरकार, वे वापस पिछली सदी की उन्हीं लड़ाइयों को लड़ रही थीं. उन स्वतंत्रताओं के लिए फिर से संघर्ष करना बेहद निराशाजनक है जिन्हें हमने नारीवादी आंदोलन की दूसरी लहर के बाद से अपने अधिकार के रूप में सहज मान लिया था.

स्टाइनम ने 2016 में कहा था, “हम जानते हैं कि लैंगिक भेदभाव (सेक्सिज़्म) अपरिहार्य नहीं है.” उन्होंने हमें याद दिलाया था कि प्रजनन संबंधी स्वतंत्रताओं को “पलटा” जा सकता है. यह बात हमें हमेशा सतर्क रहने के लिए मजबूर करती है और इसीलिए एक नारीवादी की ‘फैक्ट्री सेटिंग’ हमेशा ‘संघर्ष मोड’ में होती है.

2019 में अटॉर्नी ग्लोरिया ऑलरेड के साथ बातचीत में उन्होंने घोषणा की थी कि “डॉनल्ड ट्रंप ने हमें ‘वोक’ बना दिया है.” उनकी राजनीति और राष्ट्रपति कार्यकाल ने युवा महिलाओं के बीच सक्रियता और जागरूकता को बढ़ावा दिया था.

वे वास्तव में पीढ़ियों को जोड़ने वाली (इंटर-जेनरेशनल) नारीवादी थीं. पुरानी पीढ़ी की कई नारीवादियों के विपरीत, उन्होंने युवा महिलाओं से कभी उस संघर्ष के लिए आभार की उम्मीद नहीं की जो उनकी पीढ़ी ने लड़ा था. उन्होंने लगातार खुद को नया रूप दिया और इस एकजुटता को बनाए रखा.

उन्होंने #MeToo (मीटू) आंदोलन का भी पूरे दिल से समर्थन किया, एक ऐसा आंदोलन जो आज विवादित और थका हुआ सा नजर आता है. यह कई पुरानी पीढ़ी की भारतीय नारीवादियों से बहुत अलग रुख था, जो स्पष्ट रूप से #MeToo से असहज थीं क्योंकि खुलासे और आरोप कानूनी प्रणाली के दायरे से बाहर किए जा रहे थे.

ग्लोरिया स्टाइनम की सेवानिवृत्ति योजना

महिलाओं के लिए पुरानी लड़ाइयां किसी न किसी रूप में दोबारा सामने आती रहती हैं. हर बार जब यह अहसास होता है कि “हम इतनी दूर आ गए हैं”, तभी एक कड़ा विरोध (पुशबैक) मिलता है; हर मोड़ पर एक रूढ़िवादी रुख सामने आ जाता है. चाहे वह शारीरिक संप्रभुता (बॉडी सॉवरेन्टी) के सवाल हों, यौन उत्पीड़न का मामला हो, या पुरुष और महिलाओं के लिए हॉस्टल के समय जैसी बुनियादी बात हो, या यहां तक कि महिलाएं क्या पहनती हैं और क्या नहीं. जब तक महिलाओं की सुरक्षा को महिलाओं की रक्षा के बराबर समझा जाता रहेगा, तब तक नारीवादी संघर्ष समाप्त नहीं हो सकता.

भारत में, मैंने लोगों को यह कहते सुना है कि हर पीढ़ी को अपनी नागरिक स्वतंत्रताओं के महत्व को समझने और लापरवाह न होने के लिए अपने हिस्से के आपातकाल (इमरजेंसी) से गुजरना पड़ता है. इसे देखने का यह एक तरीका है. लेकिन मुझे यकीन नहीं है कि इसका मतलब यह होना चाहिए कि हम बार-बार पहिये का आविष्कार करते रहें. अगर हम हर पीढ़ी में उन्हीं अधिकारों के लिए लड़ते रहेंगे, तो हम वास्तव में अपनी स्वतंत्रताओं का विस्तार कैसे करेंगे?

शायद ग्लोरिया स्टाइनम भी ज़ीनो का प्रसिद्ध द्विभाजन विरोधाभास (डाइकोटमी पैराडॉक्स) के बारे में जानती थीं. यह गणित की खरगोश वाली एक पहेली और क्लासिक विचार प्रयोग है. हम इसे नारीवाद पर भी लागू कर सकते हैं. यह कुछ इस तरह है:

एक खरगोश दीवार से एक मीटर की दूरी पर खड़ा है. उसका लक्ष्य दीवार तक पहुंचना है. वह दीवार की ओर आधी दूरी तक छलांग लगाता है, और फिर अपनी अगली छलांग में बची हुई दूरी की आधी दूरी तय करता है, और फिर उसके बाद बची दूरी की आधी, और इसी तरह यह क्रम चलता रहता है. क्या खरगोश कभी दीवार तक पहुंच पाएगा? यह पूछने जैसा है: क्या महिलाएं कभी अपने नारीवादी आदर्श समाज (नारीवादी यूटोपिया) तक पहुँच पाएँगी? नहीं. यही निरंतर संघर्ष का अर्थ है, और नारीवादी इसे बहुत अच्छी तरह से जानती हैं.

एक थकी हुई नारीवादी की आह से भारी कुछ भी नहीं होता. हां, ग्लोरिया स्टाइनम निश्चित रूप से एक ही लड़ाई बार-बार लड़ते हुए थक गई होंगी. यही कारण था कि वे फ्लोरिडा के किसी बीच हाउस में सेवानिवृत्त नहीं हो सकीं. नारीवादी कभी सेवानिवृत्त नहीं होते.

रमा लक्ष्मी, एक म्यूज़ियोलॉजिस्ट और ओरल हिस्टोरियन हैं और दिप्रिंट की ओपिनियन और ग्राउंड रिपोर्ट्स एडिटर हैं. स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन और मिसौरी हिस्ट्री म्यूज़ियम के साथ काम करने के बाद, उन्होंने भोपाल गैस त्रासदी की याद में ‘रिमेम्बर भोपाल म्यूज़ियम’ बनाया. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ मिसौरी, सेंट लुइस से म्यूज़ियम स्टडीज़ और अफ्रीकन अमेरिकन सिविल राइट्स मूवमेंट में अपना ग्रेजुएट प्रोग्राम किया. उनका एक्स हैंडल @RamaNewDelhi है. यह लेखिका के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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