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Sunday, 18 October, 2026
होममत-विमतदिनेश त्रिवेदी ने वही किया, जिसकी भारत की बांग्लादेश नीति को जरूरत थी—ढाका को बैकफुट पर ला दिया

दिनेश त्रिवेदी ने वही किया, जिसकी भारत की बांग्लादेश नीति को जरूरत थी—ढाका को बैकफुट पर ला दिया

ढाका में 3 अक्टूबर को दिनेश त्रिवेदी ने जो टिप्पणी की, उसने ढाका की स्थिति ही पलट दी; उन्होंने बांग्लादेश को याद दिलाया कि उसकी अपनी सेना ने ही एक मौजूदा प्रधानमंत्री को बिना किसी तैयारी वाले भारत के पास भेज दिया था.

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भारत के बांग्लादेश में हाई कमिश्नर दिनेश त्रिवेदी ने ढाका को बैकफुट पर ला दिया है. पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण के सवाल पर उन्होंने ध्यान जुलाई 2024 के विद्रोह के दौरान और उसके बाद बांग्लादेश की सेना की भूमिका पर दिलाया है.

अगर अप्रैल 2026 में भारत के हाई कमिश्नर के तौर पर एक पूर्व केंद्रीय मंत्री की नियुक्ति को लेकर राजनयिक हलकों में कोई शक था, तो अब वह दूर हो गया है. त्रिवेदी ने साबित कर दिया है कि दिल्ली ने ढाका में सही आदमी को भेजा है.

जब उन्हें भारत के नए राजदूत के तौर पर ढाका भेजा गया, तो एक ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति पर भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों ने सवाल उठाए थे, जो करियर डिप्लोमैट नहीं बल्कि एक राजनेता थे. इससे यह संकेत मिला कि इतने अनिश्चित समय में दिल्ली और ढाका के रिश्तों को फिर से बेहतर बनाने के लिए मोदी सरकार ने एक राजनेता को चुनकर बड़ा दांव खेला था.

अब ऐसा लग रहा है कि बांग्लादेश में लोग हसीना के प्रत्यर्पण की तारीख को लेकर भारत से कम और अपनी सेना से ज्यादा सवाल पूछ रहे हैं.

हसीना के सवाल पर सही समय पर दिया गया जवाब

3 अक्टूबर को ढाका में बे ऑफ बंगाल कन्वर्सेशन 2026 के दौरान “पावर एंड प्रूडेंस” नाम के एक पैनल चर्चा कार्यक्रम के बाद हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में त्रिवेदी ने कहा कि भारत के पास “शायद ही कोई विकल्प था”, सिवाय इसके कि वह शेख हसीना को लेकर आ रहे विमान को अपने यहां उतरने की अनुमति देता. उन्होंने यह भी कहा कि हसीना को बांग्लादेश वापस भेजने से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया चल रही है.

त्रिवेदी ने कहा कि भारत ने न तो हसीना को बुलाया था और न ही वह उनके आने के लिए तैयार था. बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री अगस्त 2024 में अपनी सरकार गिरने के बाद भारत पहुंची थीं.

त्रिवेदी ने साफ किया, “हसीना जी को भारतीय वायु सेना या भारतीय सेना भारत नहीं लाई थी.” उन्होंने कहा कि उन्हें लेकर आ रहा सैन्य विमान बांग्लादेश में उन हालात के बीच भारत पहुंचा था, जिन्हें उन्होंने “दुखद हालात” बताया. उन्होंने आगे कहा कि पड़ोसी होने के नाते भारत का फर्ज था कि वह “ज़िंदगी की हकीकत को स्वीकार करे”.

हसीना का प्रत्यर्पण भारत और बांग्लादेश के बीच तनाव की एक बड़ी वजह रहा है. जुलाई 2024 के विद्रोह के बाद बांग्लादेश में दो बार सत्ता बदली है. पहली बार हसीना सरकार गिरने के बाद सत्ता बदली और मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक ऐसी अंतरिम सरकार आई, जो चुनाव के जरिए नहीं बनी थी. इसके बाद इस साल फरवरी में तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने के साथ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की चुनी हुई सरकार सत्ता में आई.

जब अप्रैल 2025 में मोदी और यूनुस की मुलाकात थाईलैंड में बिम्सटेक शिखर सम्मेलन के दौरान हुई, तो खबरों के मुताबिक यूनुस ने हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की थी. डॉयचे वेले ने रिपोर्ट किया, “भारत ने हसीना को सामूहिक हत्या के आरोपों का सामना करने के लिए प्रत्यर्पित करने की बांग्लादेश की मांगों को नहीं माना है, जिससे दोनों देशों के रिश्ते खराब हुए हैं.”

बांग्लादेश ने 21 नवंबर 2025 को औपचारिक रूप से हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की थी. यह मांग तब की गई, जब बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने हसीना को “मानवता के खिलाफ अपराधों” के लिए मौत की सजा सुनाई थी.

फरवरी में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की बड़ी जीत के बाद, पार्टी के वरिष्ठ नेता सलाहुद्दीन अहमद ने कहा था कि पार्टी हसीना को कानूनी प्रक्रिया के तहत वापस लाने के लिए चल रही राजनयिक कोशिशों का पूरा समर्थन करती है.

अहमद ने कहा, “हम हमेशा कानून के मुताबिक उनके प्रत्यर्पण की मांग करते हैं. यह दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों के बीच का मामला है. हमने भारत सरकार से भी कहा है कि कृपया उन्हें वापस भेजें, ताकि बांग्लादेश में उन पर मुकदमा चल सके.”

5 अगस्त 2026 को नई दिल्ली से शेख हसीना की वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद भारत और बांग्लादेश के बीच तनाव काफी बढ़ गया. बांग्लादेश छोड़ने के दो साल बाद यह उनकी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस थी.

बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने एक कड़े बयान में भारत की आलोचना की. उसने कहा कि भारत ने हसीना को अपने देश से मीडिया को संबोधित करने की अनुमति देकर ऐसा किया है, जो बांग्लादेश की संप्रभुता का अपमान है. मंत्रालय ने इसे “बांग्लादेश की संप्रभुता का अपमान” और 2024 के विद्रोह में मारे गए लोगों का अपमान बताया. बांग्लादेश ने दोनों देशों के बीच 2013 की प्रत्यर्पण संधि के तहत हसीना को वापस भेजने की मांग भी दोहराई.

3 अक्टूबर को ढाका में त्रिवेदी की टिप्पणियों ने बांग्लादेश को याद दिलाया कि उसकी अपनी सेना ने ही एक मौजूदा प्रधानमंत्री को भारत भेजा था, जबकि भारत इसके लिए तैयार नहीं था. इससे सवाल का रुख बदल गया और बांग्लादेश को एक बिल्कुल अलग सवाल का सामना करना पड़ा. जुलाई 2024 के विद्रोह के दौरान और उसके बाद बांग्लादेश की सेना की भूमिका क्या थी?

क्या बांग्लादेश को सेना चला रही है?

जून 2025 में मेरी किताब इंशाअल्लाह बांग्लादेश: द स्टोरी ऑफ एन अनफिनिश्ड रिवोल्यूशन के लिए दिए गए एक इंटरव्यू में शेख हसीना सरकार के गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल ने कहा था कि जुलाई 2024 के विद्रोह के दौरान बांग्लादेश के सेना प्रमुख वकार-उज-जमान ने हसीना के साथ धोखा किया था. उनके मुताबिक, इसी वजह से 5 अगस्त 2024 को हसीना की सरकार गिर गई थी.

कमाल ने कहा था कि जनरल वकार ने सेना से कहा था कि वह प्रदर्शनकारियों को हसीना के सरकारी आवास में घुसने से न रोके. सेना प्रमुख हसीना के दूर के रिश्तेदार हैं और उन्हें खुद हसीना ने नियुक्त किया था. वही सेना प्रमुख थे, जिन्होंने गुस्साए प्रदर्शनकारियों से हसीना को बचाने के लिए उन्हें सैन्य हेलीकॉप्टर से भारत भेजा था.

कमाल ने इंटरव्यू में मुझे बताया था कि वकार ने दोनों तरफ खेल खेला था. एक तरफ, उन्होंने हसीना को भारत भेजकर खुद को उनका रक्षक दिखाया. दूसरी तरफ, उन्होंने सड़कों पर गुस्साई भीड़ को हसीना की सरकार गिराने की पूरी छूट दे दी.

बांग्लादेश की वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता तानिया आमिर ने कहा है कि देश में कानून-व्यवस्था अब भी पुलिस के बजाय सेना संभाल रही है. पुलिस बांग्लादेश के गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद के अधीन आती है.

आमिर ने कहा, “जुलाई 2024 की उथल-पुथल भरी घटनाओं को दो साल से ज्यादा समय हो चुका है. सेना अब तक बैरक में वापस क्यों नहीं जा रही है? नागरिक सरकार को समझना चाहिए कि सेना कभी भी उसके साथ धोखा कर सकती है.”

आमिर ने कहा कि जुलाई 2024 के विद्रोह के दौरान आग के हवाले किए गए 400 पुलिस थानों की कोई जांच नहीं हुई है. जुलाई और अगस्त 2024 में छात्रों के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान 44 पुलिसकर्मी मारे गए थे.

आमिर ने कहा, “जब तक बांग्लादेश में पुलिस बल की पूरी प्रतिष्ठा बहाल नहीं होती, तब तक कोई भी नागरिक सरकार कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं संभाल पाएगी.”

कमाल ने मुझे बताया था कि उन्होंने जनरल वकार को जानकारी दी थी कि आईएसआई से जुड़े शूटर जुलाई की क्रांति के दौरान पुलिसकर्मियों को मार रहे थे और पुलिस को अपनी रक्षा के लिए जवाबी गोलीबारी करनी पड़ रही थी.

कमाल ने कहा, “जनरल ने मुझसे कहा था कि उनके लोग हालात संभाल लेंगे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.”

सेना प्रमुख की पकड़ कमजोर हो रही है

जुलाई 2024 के बाद से बांग्लादेश की राजनीति में सेना की भूमिका को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है. इसी बीच खबरें सामने आई हैं कि इस साल 8 सितंबर को जारी किए गए प्रतिबंधित पोस्टिंग आदेशों ने ढाका में तैनात सेना की कई इकाइयों के कमांड ढांचे को बदल दिया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, जनरल वकार-उज-जमान का सेना पर कामकाज से जुड़ा प्रभाव धीरे-धीरे कम हो रहा है. वहीं, बांग्लादेश सरकार के रक्षा सलाहकार ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) एकेएम शमसुल इस्लाम ने सेना की उन इकाइयों में तबादले और नियुक्तियां कराने में बड़ी भूमिका निभाई है, जिन्हें किसी भी सेना प्रमुख के अधिकार के लिए अहम माना जाता है.

जब शेख हसीना बांग्लादेश छोड़कर गई थीं, तब जनरल वकार-उज-जमान ही सेना प्रमुख थे. आज भी वही सेना प्रमुख हैं, जबकि हसीना की दिसंबर में बांग्लादेश लौटने की बताई गई तारीख करीब आ रही है.

दिनेश त्रिवेदी ने ढाका को यह याद दिलाकर अच्छा काम किया है कि हसीना के देश छोड़ने और वापस लौटने से जुड़े असली सवालों के जवाब बाहर नहीं, बल्कि बांग्लादेश के भीतर तलाशे जाने चाहिए.

दीप हलदर दिप्रिंट में एक लेखक और कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @deepscribble है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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