कथित गड़बड़ियों से भरे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और प्रदर्शनकारियों पर की जा रही सख्त पुलिस कार्रवाई से ध्यान भटकाने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक बार फिर यह आरोप लगाया है कि सही मतदाता सूची की मांग करने वाले विपक्षी दल “घुसपैठिए” “infiltrators” का समर्थन कर रहे हैं. यह अजीब दावा सामान्य तौर पर जवाब देने लायक भी नहीं होता, लेकिन गोदी मीडिया और सोशल मीडिया ने कई लोगों के लिए एक ऐसी अलग ही दुनिया बना दी है, इसलिए इस पर जवाब देना जरूरी हो जाता है.
सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है: एक “सर्वशक्तिशाली” गृह मंत्री, जिसे इतिहास की सबसे ज्यादा दखल देने वाली और सख्त छंटाई की प्रक्रिया का साथ मिला है, वह हमें एक सीधी सी बात बताने में असमर्थ क्यों है—SIR में कितने अवैध प्रवासी मिले?
ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार के पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के 27 मई 2026 के SIR फैसले में चुनाव आयोग (ECI) को साफ निर्देश दिया गया था कि हर संदिग्ध गैर-नागरिक को “सक्षम प्राधिकरण” के पास भेजा जाए (पैरा 178, 186(g)). इस प्राधिकरण को ऐसे मामलों पर “उचित समय सीमा” के अंदर फैसला करना था और किसी भी स्थिति में संबंधित राज्य में अगला चुनाव होने से पहले फैसला करना था. आयोग को बिहार के मामलों को भेजने के लिए चार हफ्ते का समय दिया गया था. इसका मकसद, जैसा कि अदालत ने कहा, यह सुनिश्चित करना था कि मतदाताओं के चुनावी अधिकार “लंबे समय तक अनिश्चितता की स्थिति में” न रहें.
नतीजा क्या रहा? कुछ नहीं. करीब पांच महीने बाद भी ECI ने यह आंकड़ा जारी नहीं किया है कि कितने मामलों को सक्षम प्राधिकरण के पास भेजा गया. गृह मंत्रालय ने भी यह नहीं बताया है कि वह सक्षम प्राधिकरण कौन है. हमें यह इसलिए पता है क्योंकि RTI कार्यकर्ता वेंकटेश नायक ने 10 अगस्त 2026 को ECI और गृह मंत्रालय में दो RTI आवेदन दायर किए थे. उन्होंने पूछा था (1) कितने मामले सक्षम प्राधिकरण के पास भेजे गए हैं और (2) वह प्राधिकरण कौन है. ECI ने जवाब दिया कि उसके पास इनमें से कोई जानकारी नहीं है. गृह मंत्रालय ने आवेदन कानून मंत्रालय को भेज दिया, कानून मंत्रालय ने इसे ECI को भेज दिया और ECI ने सक्षम प्राधिकरण के सवाल को वापस गृह मंत्रालय के पास भेज दिया. किसी को कुछ भी पता नहीं है.
हाल ही में, गृह मंत्रालय की बड़े नाम वाली “जनसांख्यिकीय बदलावों पर उच्च स्तरीय समिति” ने SIR में “गैर-नागरिक” के रूप में हटाए गए बिहार के मतदाताओं का आंकड़ा ECI से मांगा. बिहार की मतदाता सूची 30 सितंबर 2025 को अंतिम रूप से जारी हो चुकी थी, यानी एक साल से ज्यादा समय पहले, लेकिन समिति को ECI की ओर से सिर्फ चुप्पी मिली.
एक वजह 16 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्टर्स कलेक्टिव की एक जांच के बाद सामने आई. जांच में पाया गया कि ERONET, यानी वह सॉफ्टवेयर जिसका इस्तेमाल पश्चिम बंगाल में SIR की सुनवाई के दौरान अधिकारियों ने किया, उसमें किसी मतदाता को गैर-नागरिक के रूप में दर्ज करने का कोई विकल्प ही नहीं है. हां, आपने सही पढ़ा.
ऐसा लगता है कि “घुसपैठियों” का शाह से बेहतर कोई और साथी नहीं है. या फिर बात यह है कि शाह की गैर-नागरिकों की पहचान करने में कोई असली दिलचस्पी नहीं है, उनकी दिलचस्पी सिर्फ “घुसपैठिए” शब्द का इस्तेमाल करके मुस्लिम विरोधी भावना के जरिए वोट बटोरने में है.
SIR ने शाह की खोखली बातों को उजागर किया
इस दोहरे रवैये की तुलना रिकॉर्ड से कीजिए. 2005 से 2013 के बीच UPA सरकार ने बिना सांप्रदायिक भावनाएं भड़काए 82,255 अवैध प्रवासियों को बांग्लादेश भेजा. गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, मई 2026 में रिपोर्ट किए गए आंकड़ों के अनुसार, मोदी सरकार ने 2014 से 2024 के बीच इसका बहुत छोटा हिस्सा, सिर्फ 3,568 लोगों को ही वापस भेजा. (ये आंकड़े कांग्रेस के पहले के दावों की भी बड़े पैमाने पर पुष्टि करते हैं.) “(डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट) पता लगाओ, हटाओ, वापस भेजो” का नारा लगाने वालों ने भारतीय नागरिकों को बड़े पैमाने पर उनके वोट के अधिकार से वंचित करने और राजनीतिक दिखावे के अलावा बहुत कम किया है.
SIR खुद दिखाता है कि शाह की “घुसपैठिए” वाली बात कितनी खोखली है. बिहार में SIR के दौरान करीब 68.5 लाख नाम हटाए गए. इनमें से ज्यादातर नाम इसलिए हटे क्योंकि मतदाता मर चुके थे, मौजूद नहीं थे, दूसरी जगह चले गए थे या एक से ज्यादा जगहों पर पंजीकृत थे. पत्रकारों की एक टीम ने ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन सॉफ्टवेयर की मदद से बिहार की मतदाता सूची की जांच की और पाया कि सिर्फ करीब 9,500 नाम पांचवीं श्रेणी, “अयोग्य”, के तहत दर्ज थे. इनमें से 85 फीसदी से ज्यादा नाम नेपाल की सीमा से लगे चार जिलों में थे.
पत्रकारों ने इनमें से करीब 100 मतदाताओं का पता लगाया. इनमें से कम से कम 70 विदेशी नागरिक नहीं थे. जिन विदेशियों का उन्होंने पता लगाया, वे करीब 30 नेपाली महिलाएं थीं, जो स्थानीय पुरुषों से शादी करने के बाद बिहार आकर बस गई थीं. इसलिए अधिक से अधिक 0.013 फीसदी “अयोग्य” घोषित मतदाताओं में से ही कुछ विदेशी थे. इनमें से कई को भारत में रहने और काम करने का अधिकार है और वे “घुसपैठिए” नहीं हैं.
पश्चिम बंगाल में भी, जहां बीजेपी ने अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर लगातार अभियान चलाया, मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी को दिए RTI जवाब के मुताबिक, जिन अपीलों पर ट्रिब्यूनल ने फैसला दिया, उनमें से 10 में से 9 मामलों में मतदाताओं के नाम फिर से सूची में जोड़ दिए गए. यह आंकड़ा 7 अगस्त तक का है. अब तक सामने आए किसी भी ट्रिब्यूनल के फैसले में किसी विदेशी नागरिक को नहीं पाया गया है.
4 सितंबर को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में बांग्लादेशी होने के शक में हिरासत में लिए गए मुर्शिदाबाद के 23 मजदूरों में से 19 को दो हफ्ते बाद रिहा कर दिया गया. अधिकारियों ने उनके मतदाता सूची में दर्ज नाम और रहने के रिकॉर्ड की जांच की थी. बाकी चार, जिनके नाम SIR के दौरान काट दिए गए थे, अभी भी हिरासत में हैं क्योंकि उनकी अपील पर फैसला होना बाकी है.
‘घुसपैठिए’ वोट चोरी को छिपाने का तरीका है
इसलिए यह साफ दिखाई देता है—बड़े पैमाने पर हो रही वोट चोरी को छिपाने के लिए घुसपैठियों की बात का इस्तेमाल किया जा रहा है. बीजेपी को उम्मीद है कि “घुसपैठिए” का लाल झंडा लहराकर वह कुछ मतदाताओं का ध्यान वोट के अधिकार से वंचित किए जाने और मतदाता सूची में हेरफेर से हटा सकती है.
फिर भी, वोटों में केंद्रीकृत गड़बड़ी के सबूत लगातार बढ़ रहे हैं: दो चुनाव आयुक्तों ने दस महीने में 14 बार आपत्ति जताई. इनमें से एक ने फॉर्म 6 में बदलाव को “अनधिकृत और गैरकानूनी” बताया. आयुक्तों ने ECINet पर मतदाता सूची के डेटाबेस को केंद्रीकृत करने पर भी सवाल उठाए. उत्तर प्रदेश में ECI के सॉफ्टवेयर ने चुनाव अधिकारियों के नाम पर 85,854 नाम हटाने के फॉर्म तैयार कर दिए, जिनमें हटाने का कोई कारण दर्ज नहीं था.
और शाह चाहे जितना ध्यान भटकाने की कोशिश करें, एकजुट विपक्ष वोट चोरी का विरोध करता रहेगा और पूछता रहेगा: SIR में कितने घुसपैठिए मिले?
अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य हैं. उनका एक्स हैंडल @dubeyamitabh है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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