नई दिल्ली: नौ मामलों में बरी होना, एक मामले में आरोपों से मुक्त किया जाना और करीब एक दशक से चल रही आपराधिक कार्यवाही. असम सरकार ने सामाजिक और भूमि अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता प्रणब डोले को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लेने के फैसले को सही ठहराने के लिए इन बातों का सहारा लिया था. लेकिन गुवाहाटी हाई कोर्ट ने पाया कि सरकार ने पुराने आपराधिक मामलों पर भरोसा किया, पहले की सुनवाई में आए अहम फैसलों की जानकारी नहीं दी और विदेश यात्राओं तथा वित्तीय लेन-देन का जिक्र किया, लेकिन उन्हें कथित तौर पर देश या राज्य के लिए खतरा पैदा करने वाली गतिविधियों से जोड़ने के लिए पर्याप्त आधार नहीं दिया.
जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस सुस्मिता पी. खौंड की डिवीजन बेंच ने शुक्रवार को कहा कि अधिकारियों ने सामान्य आपराधिक कानून के तहत उपलब्ध उपायों को अपनाने के बजाय निवारक हिरासत का सहारा लेकर प्रभावी रूप से एक “शॉर्टकट” अपनाया.
हाई कोर्ट ने 30 जुलाई के हिरासत आदेश को रद्द करते हुए कहा कि निवारक हिरासत का सहारा लेने से पहले हिरासत में लेने वाले अधिकारी ने इस बात पर “विचार नहीं किया” कि क्या डोले की कथित गतिविधियों से निपटने के लिए सामान्य कानून पर्याप्त नहीं थे.
अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारी ने उन आपराधिक मामलों की स्थिति का पता नहीं लगाया, जिनका हवाला दिया गया था. इस तरह उसने “आंखें मूंद लीं”.
डोले की हिरासत की तत्काल वजह असम के काजीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व के आसपास जमीन, आजीविका और विकास से जुड़े मुद्दों पर उनके विरोध प्रदर्शनों में शामिल होना था.
अक्टूबर 2023 में उन्होंने काजीरंगा के दायरे में कई गांवों को शामिल करने के प्रस्ताव के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था. स्थानीय लोग विस्थापन का विरोध कर रहे थे और उनकी मांग थी कि अगर उन्हें कहीं और बसाया जाता है, तो कानून के मुताबिक मुआवजा और पुनर्वास दिया जाए.
जून 2026 में एक प्रस्तावित लग्जरी हयात होटल और एक अलग टी ट्राइब्स म्यूजियम के निर्माण को लेकर विवाद और बढ़ गया. असम टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन को आवंटित जमीन पर होटल परियोजना विकसित की जा रही थी. इसका विरोध उन आदिवासी किसान परिवारों ने किया, जिनका दावा था कि इस जमीन पर उनके अधिकार हैं.
राज्य सरकार के मुताबिक, डोले काजीरंगा भूमि सुरक्षा समिति के आयोजन सचिव थे और इन परियोजनाओं का विरोध करने वालों में शामिल थे.
28 जून को हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस के साथ टकराव हुआ. राज्य सरकार का आरोप था कि प्रदर्शनकारी जबरन परियोजना स्थल में घुस गए, सर्वे के लिए लगाए गए निशान हटा दिए और पुलिसकर्मियों के साथ भिड़ गए. इस घटना के बाद दर्ज आपराधिक मामले की जांच निवारक हिरासत का आदेश जारी होने के समय भी चल रही थी.
लेकिन डोले को हिरासत में लेने के लिए राज्य सरकार ने काजीरंगा की घटना से कहीं ज्यादा पुरानी बातों का हवाला दिया. सरकार की रिपोर्ट में 2017 तक के मामलों का जिक्र था. इसमें डोले के खिलाफ दर्ज 13 आपराधिक मामलों के साथ-साथ प्रदर्शनों में उनकी भागीदारी से जुड़ी पुलिस और खुफिया रिपोर्ट भी शामिल थीं.
असम सरकार ने काजीरंगा में हुए आंदोलनों, पुराने आपराधिक मामलों और दूसरे विरोध प्रदर्शनों से जुड़े इस पूरे रिकॉर्ड के आधार पर 30 जुलाई को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा 3(2) के तहत डोले को निवारक हिरासत में लिया था. सरकार का कहना था कि उनकी गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा थीं.
NSA के तहत हिरासत का आदेश 30 जुलाई को जारी होने से पहले ही 12 जुलाई को डोले को गिरफ्तार कर लिया गया था.
‘कानून की नजर में दुर्भावना’
डोले के खिलाफ जिन 13 आपराधिक मामलों का हवाला दिया गया था, उनमें से नौ में हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक उन्हें बरी कर दिया गया था और एक मामले में आरोपों से मुक्त कर दिया गया था. बाकी तीन मामलों में से एक पर हाई कोर्ट ने रोक लगा दी थी, एक की जांच चल रही थी और एक मामला सबूतों के चरण में था. इसके बावजूद, हिरासत के आधार में उन्हें नौ मामलों में बरी किए जाने और एक मामले में आरोपों से मुक्त किए जाने की जानकारी नहीं दी गई.
हाई कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों की स्थिति के बारे में “पूरी और विस्तृत जानकारी” नहीं देने से हिरासत का आदेश “कानून की नजर में दुर्भावना” के आधार पर अमान्य हो गया.
इसी संदर्भ में बेंच ने कहा कि पुराने मामलों, जिनमें बरी होने या आरोपों से मुक्त किए जाने वाले मामले भी शामिल थे, पर भरोसा करने से यह निष्कर्ष निकला कि अधिकारियों ने तय कानूनी प्रक्रिया का पालन करने और उन आदेशों को चुनौती देने के बजाय “याचिकाकर्ता को हिरासत में लेने का शॉर्टकट अपनाया”.
हाई कोर्ट ने यह भी पाया कि डोले के खिलाफ लगाए गए आरोप “अस्पष्ट थे और उनमें जरूरी तथ्यात्मक जानकारी नहीं थी”. इस वजह से उन्हें अपने खिलाफ लगे खास आरोपों को समझने के लिए पर्याप्त जानकारी नहीं मिली.
‘सीधा संबंध’ क्या था?
हाई कोर्ट ने डोले की 2017 से 2026 के बीच की 14 विदेश यात्राओं और उनके खातों में आए विदेशी पैसों के आधार पर उन्हें हिरासत में लेने की कोशिश की भी अलग से जांच की.
अदालत को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जो इन यात्राओं को भारत विरोधी गतिविधियों, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे या उनके विरोध प्रदर्शनों से जोड़ता हो. हाई कोर्ट ने कहा कि “बार-बार विदेश यात्रा करना अपने आप में” निवारक हिरासत का आधार नहीं हो सकता. अदालत ने यह भी पाया कि विदेश से आए पैसों और उनकी गिरफ्तारी से पहले हुए विरोध प्रदर्शनों के बीच कोई “सीधा संबंध” नहीं था.
एक और खामी डोले की ओर से हिरासत को चुनौती देने वाली दूसरी और विस्तृत याचिका से जुड़ी थी. कानूनी मदद मिलने के बाद उन्होंने यह याचिका दी थी. हाई कोर्ट ने पाया कि इसे उन अधिकारियों के पास नहीं भेजा गया, जिन्हें इस पर विचार करना था. अदालत ने कहा कि यह चूक “निवारक हिरासत जारी रखने के लिए घातक” थी.
आखिरकार, बेंच ने चार ऐसी खामियों की पहचान की, जो NSA के तहत जारी आदेश को रद्द करने के लिए पर्याप्त थीं. इनमें पुराने आपराधिक मामलों पर भरोसा करना, जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराना, दूसरी याचिका पर विचार नहीं करना और विदेश यात्राओं तथा विदेशी पैसों पर भरोसा करना शामिल था, जिनका कथित खतरे से कोई करीबी संबंध नहीं था.
फैसले में निवारक हिरासत की असाधारण शक्ति की सीमाओं को रेखांकित किया गया. इसमें कहा गया कि निवारक हिरासत सामान्य कानूनी प्रक्रिया की जगह नहीं ले सकती. इसके लिए अधिकारियों को सोच-समझकर फैसला लेना होगा और जिन आधारों पर हिरासत मांगी जा रही है, उनका उस मकसद से सीधा संबंध होना चाहिए.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: दलितों की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान से भारतीय वामपंथ को अब भी परेशानी क्यों है?