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Sunday, 23 August, 2026
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जनगणना 2027 में मांगी जा रही ऐसी जानकारी क्यों, क्या सरकार इसे NPR अपडेट करने में इस्तेमाल करेगी?

अगर NRC जनगणना के दौरान जुटाई गई जानकारी के आधार पर बनाया गया, तो इससे बेवजह कानूनी परेशानियां पैदा हो सकती हैं.

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सरकार ने जनगणना 2027 के दूसरे चरण के दौरान हर व्यक्ति से पूछे जाने वाले सवालों की जानकारी जारी कर दी है. इनमें से कई सवाल पहले कभी ऐसी जनगणना का हिस्सा नहीं रहे हैं. माता-पिता, पति/पत्नी और स्थायी पते की जानकारी. नागरिकता को लेकर एक सवाल, जो 1961 की जनगणना के बाद नहीं पूछा गया था, अब फिर से शामिल किया गया है.

जनगणना को संयुक्त राष्ट्र इस तरह परिभाषित करता है, “जनगणना किसी देश या देश के किसी साफ तौर पर तय किए गए हिस्से में, किसी तय समय पर, सभी लोगों से जुड़ा जनसांख्यिकीय, आर्थिक और सामाजिक डेटा सबसे छोटे भौगोलिक स्तर पर जुटाने, तैयार करने, उसका विश्लेषण करने, उसे साझा करने और उसका मूल्यांकन करने की पूरी प्रक्रिया है.”

इस परिभाषा से साफ है कि जनगणना को आबादी से जुड़े आंकड़े जुटाने की एक प्रक्रिया माना जाता है.

अब 2011 में नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) के लिए डेटा जुटाते समय हर व्यक्ति से पूछे गए सवालों को देखिए.

1. नाम

2. एनपीआर में दर्ज किए जाने वाले व्यक्ति का नाम

3. परिवार के मुखिया से संबंध

4. लिंग

5. जन्म की तारीख

6. वैवाहिक स्थिति

7. शैक्षणिक योग्यता

8. पेशा/काम

9. पिता, माता और पति/पत्नी के नाम

10. जन्म स्थान

11. घोषित नागरिकता

12. वर्तमान सामान्य निवास का पता

13. वर्तमान पते पर रहने की अवधि

14. स्थायी निवास का पता

इनमें से नंबर 2 और 12 को छोड़कर बाकी सभी सवाल 2027 की जनगणना में शामिल किए गए सवालों में मौजूद हैं. नाम, परिवार के मुखिया से संबंध, लिंग, जन्म की तारीख, वैवाहिक स्थिति, शैक्षणिक योग्यता, पेशा, जन्म स्थान और वर्तमान पते पर रहने की अवधि से जुड़े सवाल पिछली जनगणनाओं में भी पूछे गए थे और इनका इस्तेमाल अलग-अलग आंकड़ों की टेबल बनाने के लिए किया गया था. पति/पत्नी का नाम, माता-पिता की जानकारी और स्थायी पता जैसे सवाल जनगणना में कभी नहीं पूछे गए हैं और इनका किसी तरह के आंकड़े तैयार करने में कोई उपयोग नहीं है.

सरकार लोगों से उनके मोबाइल नंबर, आधार नंबर, वोटर आईडी नंबर और पासपोर्ट की जानकारी भी मांग रही है. नाम, पते और इन नंबरों का किसी सांख्यिकीय काम में बहुत कम इस्तेमाल है, जब तक कि इन्हीं नामों पर आंकड़े तैयार नहीं किए जा रहे हों. जैसे यह पता लगाना कि कितने लोगों का कोई खास नाम या सरनेम है. भारत में ऐसा इस्तेमाल होने की कल्पना किसी भी तरह नहीं की जा सकती. दूसरी ओर, यह जानकारी ऐसा आबादी डेटाबेस बनाने में काम आ सकती है, जिसमें किसी व्यक्ति के मोबाइल नंबर, आधार बायोमेट्रिक्स, वोटर रजिस्ट्रेशन और पासपोर्ट की जानकारी को आपस में जोड़ा जा सके.

ऐसा लगता है कि सरकार जुटाए गए डेटा का इस्तेमाल 2011 में तैयार किए गए एनपीआर को अपडेट करने या इसे नए सिरे से तैयार करने के लिए करने की योजना बना रही है.

2021 की जनगणना की तैयारियों के दौरान भी, जो आखिरकार नहीं हो सकी, जनगणना के दौरान एनपीआर के लिए जानकारी जुटाने को लेकर चर्चा हुई थी. कुछ राज्य सरकारों ने इस योजना पर आपत्ति जताई थी. जनगणना अधिनियम के अनुसार, जनगणना कराने के लिए कर्मचारियों , जिनमें गिनती करने वाले कर्मचारी, सुपरवाइजर, चार्ज अधिकारी और जिला जनगणना अधिकारी शामिल हैं, की नियुक्ति राज्य सरकारें करती हैं. हालांकि, सिटीजनशिप एक्ट या सेंसस एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत राज्य सरकारों को एनपीआर तैयार करने या उसे अपडेट करने के लिए जानकारी जुटाने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति करना जरूरी हो. इसलिए राज्यों को यह अधिकार है कि वे जनगणना के लिए नियुक्त कर्मचारियों का इस्तेमाल एनपीआर से जुड़े कामों के लिए करने से इनकार कर सकें.

क्या जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत जुटाए गए डेटा को एनपीआर तैयार करने/अपडेट करने के लिए सरकार के किसी दूसरे संगठन के साथ साझा किया जा सकता है?

कानूनी परेशानियों की संभावना

आधिकारिक आंकड़ों से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के मौलिक सिद्धांतों को भारत ने अपनाया है. सिद्धांत 6 में कहा गया है, “सांख्यिकीय आंकड़े तैयार करने के लिए सांख्यिकी एजेंसियों द्वारा जुटाए गए व्यक्तिगत डेटा, चाहे वे किसी व्यक्ति या कानूनी संस्था से जुड़े हों, पूरी तरह गोपनीय रखे जाने चाहिए और उनका इस्तेमाल सिर्फ सांख्यिकीय उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए.”

इसलिए, अगर हम संयुक्त राष्ट्र की जनगणना की परिभाषा को मानते हैं और ऊपर बताए गए गोपनीयता के सिद्धांत को ध्यान में रखते हैं, तो किसी व्यक्ति की जानकारी साझा करना स्वीकार्य नहीं हो सकता. जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के तहत नियुक्त भारत के रजिस्ट्रार जनरल, नागरिक पंजीकरण के पदेन रजिस्ट्रार जनरल भी हैं, जो एनपीआर की जिम्मेदारी संभालते हैं. उन्हें जनगणना आयुक्त भी नियुक्त किया गया है. हालांकि, इसका यह मतलब अपने आप नहीं है कि इन दोनों सरकारी संस्थाओं के बीच डेटा साझा किया जा सकता है.

सेंसस एक्ट की धारा 11 (1)(b) के तहत, अगर कोई जनगणना अधिकारी केंद्र सरकार या राज्य सरकार की पहले से मंजूरी के बिना ऐसी कोई जानकारी साझा करता है, जो उसे जनगणना के फॉर्म के जरिए या जनगणना के उद्देश्य से मिली है, तो उसे सज़ा दी जा सकती है. अगर ‘केंद्र या राज्य सरकार की पहले से मंजूरी के बिना’ इस वाक्य का मतलब यह माना जाता है कि केंद्र सरकार जनगणना के फॉर्म से मिली जानकारी को साझा करने की अनुमति दे सकती है, तो भले ही कानूनी तौर पर यह सही हो, लेकिन यह आधिकारिक आंकड़ों से जुड़े सभी नैतिक विचारों और मौलिक सिद्धांतों के खिलाफ होगा.

जनगणना अधिनियम की धारा 15 साफ तौर पर कहती है कि जनगणना के रिकॉर्ड को किसी भी अदालत में सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. वहीं, एनपीआर में दर्ज जानकारी को सबूत के तौर पर इस्तेमाल करने की जरूरत पड़ सकती है. ज्यादा सही तरीके से कहें तो राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) कानून के तहत तैयार की जाने वाली एक सूची है और इसका इस्तेमाल नागरिकता प्रमाणपत्र जारी करने के लिए किया जा सकता है. इसलिए अगर एनआरसी ऐसी जानकारी के आधार पर तैयार किया जाता है, जो जनगणना के दौरान ली गई हो और जिसे अदालत में सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता, तो इससे बेवजह कानूनी परेशानियां पैदा हो सकती हैं.

लेखक इंडियन स्टैटिस्टिकल सर्विस से नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइज़ेशन के डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद से रिटायर हुए हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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