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Saturday, 19 September, 2026
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जाति जनगणना कौन चाहता है—पीएम मोदी, राहुल, अखिलेश? हर कोई और कोई नहीं

मनमोहन सिंह सरकार के दौरान हुई सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना में भी जाति का सवाल खुला रखा गया था, ड्रॉप-डाउन मेन्यू नहीं दिया गया था. इस कवायद में जाति, उप-जाति और गोत्र के 46.7 लाख नाम सामने आए थे, जिससे उनका वर्गीकरण करना लगभग असंभव हो गया था.

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यह कॉकरोच जनता पार्टी का दौर है. इस नई-नई पार्टी को हर अच्छी या बुरी चीज़ का क्रेडिट दिया जा रहा है—Gen Z, Gen Alpha और यहां तक कि एक साल की उम्र वाले Beta को भी राजनीति के केंद्र में लाने से लेकर मोदी सरकार की कमजोरियां सामने लाने तक. कंगना रनौत का सांस्कृतिक मानवविज्ञानी के रूप में नया रूप. ‘अर्बन नक्सल’ को नया नाम मिलना और भी बहुत कुछ.

लेकिन कॉकरोचों को जिस चीज़ का क्रेडिट नहीं दिया गया है, वह यह है कि उन्होंने हर तरह के नेताओं के मन में उनकी राजनीति को लेकर शक पैदा कर दिया है. इतना ज्यादा कि वे उस चीज़ को लेकर भी असमंजस में दिख रहे हैं, जिसे वे कभी सोशल इंजीनियरिंग का रामबाण या भगवान राम का तीर मानते थे—यानी जाति जनगणना.

शुक्रवार को भारत के रजिस्ट्रार जनरल (RGI) ने जनगणना 2027 के लिए 40 सवालों को अधिसूचित किया, जिसमें एक सवाल जाति पर भी है. सरकार ने आखिरकार अप्रैल 2025 में जाति को जनगणना में गिनने के अपने फैसले को लागू कर दिया, जिससे इस पर सवाल उठाने वालों की आवाज़ बंद हो गई. हैरानी की बात यह है कि सरकार या भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में से किसी ने भी जोर-शोर से यह दुनिया को नहीं बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध हैं.

RGI द्वारा सवालों को अधिसूचित करने से दो दिन पहले, शिक्षाविद से नेता बने योगेंद्र यादव ने द इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक लेख में सरकार की कड़ी आलोचना की थी. लेख का शीर्षक था, “Caste Census is dead. Don’t expect a formal announcement or funeral.”

यादव की आपत्ति उन रिपोर्टों को लेकर थी, जिनमें कहा गया था कि जाति का सवाल खुला रखा जाएगा—Schedule Caste/Schedule Tribe/Caste—न कि जातियों की सूची वाले ड्रॉप-डाउन मेन्यू के रूप में. वह चाहते थे कि जनगणना करने वाला पहले व्यक्ति से उसकी जाति की श्रेणी—एससी/एसटी/ओबीसी/जनरल पूछे और फिर उस श्रेणी में मौजूद जातियों की सूची में से जाति का नाम चुनने को कहे.

उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति पहले अपनी श्रेणी ओबीसी बता सकता है और फिर ड्रॉप-डाउन मेन्यू में अपनी पहचान यादव या अहीर या ग्वाला के रूप में चुन सकता है.

मनमोहन सिंह सरकार के दौरान हुई सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) में भी जाति का सवाल खुला रखा गया था, ड्रॉप-डाउन मेन्यू नहीं दिया गया था. इसका नतीजा यह हुआ कि इस कवायद में जाति, उप-जाति और गोत्र के 46.7 लाख नाम सामने आए, जिससे उनका वर्गीकरण करना लगभग असंभव हो गया.

इसलिए SECC का डेटा कभी प्रकाशित नहीं किया गया. अब मौजूदा जाति जनगणना में भी SECC की तरह सवाल को खुला रखा गया है, इसलिए यादव ने इसकी अंतिम विदाई की भविष्यवाणी कर दी.

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि SECC के मुकाबले अब डिजिटल जनगणना और एआई टूल्स बड़ी मात्रा में मिलने वाले डेटा से जातियों का वर्गीकरण करना संभव बना देंगे. ऐसा बिल्कुल हो सकता है, लेकिन अभी तक सरकार या बीजेपी की ओर से किसी ने भी आलोचना करने वालों को जवाब देने और स्थिति साफ करने की कोशिश नहीं की है.

खैर, योगेंद्र यादव विपक्ष के सबसे प्रमुख बुद्धिजीवी चेहरों में से एक हैं. फिर उनके ‘संकेत’ के बाद भी विपक्ष सक्रिय क्यों नहीं हुआ?

कांग्रेस की प्रतिक्रिया लगभग औपचारिक ही रही. कांग्रेस के संचार विभाग के प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने मई 2025 में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की ओर से पीएम को लिखे गए पत्र को पोस्ट किया. इस पत्र में कांग्रेस अध्यक्ष ने जाति सर्वे के लिए तेलंगाना मॉडल के प्रश्नपत्र की सिफारिश की थी.

रमेश ने लिखा, “उनका सबसे पहला और बुनियादी सुझाव पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया है. खरगे जी की मांग के अनुसार राजनीतिक दलों के साथ भी कोई चर्चा नहीं हुई है.” बस इतना ही.

कांग्रेस आगे बढ़ गई. राहुल गांधी ने भी इस अधिसूचना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, जो जाति जनगणना के एक और मजबूत समर्थक हैं, उन्होंने जैसे इसे देखा ही नहीं.

तो फिर ऐसा क्यों है कि सत्तारूढ़ और विपक्षी दोनों पार्टियां अब जाति जनगणना को लेकर उत्साहित नहीं दिख रही हैं?

चुपचाप पीछे हटना

वे ऐसे प्रतिक्रिया दे रहे हैं जैसे बादलों से घिरे राजनीतिक माहौल में गेंद के स्विंग होने के बीच कोई बल्लेबाज आगे बढ़कर शॉट खेलने के लिए खुद को तैयार कर चुका हो, लेकिन ऐसा क्यों है, इस पर आने से पहले, जैसा कि अमित शाह कहते हैं, ‘आप क्रोनोलॉजी समझिए.’

2014 में ओबीसी समुदायों के नरेंद्र मोदी के पीछे एकजुट होने और इसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में गैर-प्रमुख और वंचित ओबीसी समुदायों के बीजेपी की ओर जाने के बाद, पार्टी ने इस वोट बैंक को मजबूत करने के बारे में सोचा.

अक्टूबर 2017 में, मोदी सरकार ने ओबीसी के उप-वर्गीकरण के लिए रोहिणी आयोग बनाया, ताकि आरक्षण के लाभों का बराबर बंटवारा हो सके.

आयोग को दिसंबर तक अपनी रिपोर्ट देने की जिम्मेदारी दी गई थी. तीन महीने छह साल में बदल गए. आयोग को बार-बार एक के बाद एक विस्तार देने के लिए जो कारण बताए गए, उन्हें देखिए.

मार्च 2018 में, कैबिनेट ने 12 हफ्तों का दूसरा और “अंतिम विस्तार” मंजूर किया क्योंकि आयोग ने दाखिलों और नौकरियों से जुड़ा डेटा “मांगा” था और उसके “वैज्ञानिक विश्लेषण” के लिए समय चाहिए था.

जून 2018 में, कैबिनेट ने 31 जुलाई 2018 तक तीसरा और “अंतिम विस्तार” मंजूर किया, ताकि आयोग को राज्य सरकारों और अन्य संबंधित पक्षों से मिले डेटा को “विस्तार से देखने” का मौका मिल सके.

आयोग को संबंधित पक्षों से चर्चा करने के नाम पर कई और विस्तार दिए गए. 31 जुलाई 2020 तक दिए गए आठवें विस्तार में आयोग के काम की शर्तों में यह भी जोड़ा गया: “ओबीसी की केंद्रीय सूची में शामिल अलग-अलग नामों का अध्ययन करना और उनमें दोहराव, अस्पष्टता, असंगतियां और वर्तनी या लिखने से जुड़ी गलतियों को ठीक करने की सिफारिश करना.”

इसके बाद कोविड आगे के विस्तार का कारण बन गया.

सरकार रोहिणी आयोग को 14 बार विस्तार देती रही. आखिरकार उसने अगस्त 2023 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंप दी. उसके बाद से इस रिपोर्ट के बारे में कुछ सुनने को नहीं मिला है.

जैसे-जैसे बीजेपी चुनाव जीतती रही, उसे साफ तौर पर समझ आ गया कि पैंडोरा बॉक्स खोलना बड़ी गलती होगी. इस बीच, लगातार चुनावी हार के बाद कांग्रेस बेचैन हो रही थी.

2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी ने पूरी ताकत लगाने का फैसला किया और SECC के कच्चे डेटा को जारी करने की मांग की. कांग्रेस ने कर्नाटक में BJP को हरा दिया. इससे उत्साहित गांधी ने अपना रुख और मजबूत किया. उन्होंने जाति जनगणना और 50 फीसदी आरक्षण की सीमा हटाने को कांग्रेस का मुख्य चुनावी मुद्दा बना दिया.

यह उस साल मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनावों में काम नहीं आया, हालांकि, कांग्रेस तेलंगाना में जीत गई.

राजनीतिक समुद्र का मंथन

2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिली हार से ऐसा लगा कि राहुल गांधी का यह विश्वास फिर मजबूत हो गया है कि जाति जनगणना का मुद्दा चुनाव में असर डाल सकता है. तब तक INDIA ब्लॉक के ज्यादातर साथी सामाजिक न्याय के मुद्दे के साथ खड़े हो चुके थे.

हालांकि, इसके बाद हुए विधानसभा चुनावों ने विपक्ष के जाति जनगणना वाले मुद्दे की चुनावी लोकप्रियता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया. इसलिए अप्रैल 2025 में मोदी सरकार की ओर से जनगणना 2027 में जाति की गिनती कराने की घोषणा एक बड़े आश्चर्य के तौर पर सामने आई. संभव है कि इसके पीछे बिहार में बीजेपी की चुनावी गणना रही हो, लेकिन ओबीसी के उप-वर्गीकरण पर रोहिणी आयोग की रिपोर्ट को लेकर इतने लंबे समय तक फैसला टालने वाली पार्टी के लिए अचानक जाति जनगणना कराने का फैसला क्यों लिया गया, यह अब भी एक पहेली बना हुआ है.

अप्रैल 2025 के फैसले के बाद से काफी समय बीत चुका है. सामाजिक न्याय के नाम पर ओबीसी की राजनीति से कांग्रेस या INDIA ब्लॉक को ज्यादा फायदा नहीं हुआ है. कांग्रेस हाल ही में केरल विधानसभा चुनाव में जीती है, लेकिन वहां जाति जनगणना कोई मुद्दा नहीं था. तेलंगाना में उसकी सरकार ने जाति सर्वे कराया, लेकिन इससे लोगों की ज़िंदगी में कोई बड़ा बदलाव नहीं आ सकता. कर्नाटक में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार इस तरह के डेटा को सार्वजनिक नहीं करने के लिए बहाने ढूंढ रही है. वहीं, समाजवादी पार्टी जैसे INDIA ब्लॉक के साथी ओबीसी से आगे बढ़कर अपना समर्थन आधार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.

ऐसे में हैरानी नहीं है कि राहुल गांधी ने हाल के दिनों में जाति जनगणना के बारे में ज्यादा बोलना बंद कर दिया है. उनके भाषणों में यहां-वहां इसका जिक्र जरूर हो सकता है, लेकिन अब यह उनकी राजनीति का मुख्य मुद्दा नहीं लगता.

हाल के जेन ज़ी प्रदर्शनों और मध्यम वर्ग में दिखाई दे रही नाराज़गी ने विपक्ष को जितनी उम्मीद दी है, उतनी ही सत्तारूढ़ बीजेपी को चिंता में डाला है. गांधी छात्रों और युवाओं से बड़े स्तर पर संपर्क कर रहे हैं. ऊंची जातियों में भी बेचैनी के संकेत दिख रहे हैं. हाल ही में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जिस तरह उन्होंने बीजेपी का साथ छोड़ा, उससे यह साफ हुआ. इन सभी कारणों ने सत्तारूढ़ और विपक्षी दोनों पार्टियों को अपनी सामाजिक इंजीनियरिंग की रणनीतियों पर फिर से सोचने के लिए पर्याप्त वजह दी है.

आज जाति जनगणना राजनीतिक समुद्र में मंथन शुरू करने जैसी है. पार्टियां इस मंथन से अमर होने का अमृत या चुनाव में अजेय होने का अमृत पाने की उम्मीद कर सकती हैं, लेकिन क्या उन्हें पता है कि हलाहल यानी जहर मिलने पर वे क्या करेंगी? यहां कोई भगवान शिव नहीं हैं जो इसे पीकर उन्हें बचा सकें. यही समझाता है कि जाति जनगणना के SECC जैसे नतीजे जिससे पूरी कवायद बेअसर हो सकती है किसी भी पार्टी को ज्यादा परेशान करती नहीं दिख रही. देश के लिए यह अच्छा ही होगा.

डीके सिंह दिप्रिंट में पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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