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Thursday, 6 August, 2026
होममत-विमतBJP का अच्छा दौर शायद खत्म होने लगा है, लेकिन मोदी इंदिरा गांधी नहीं हैं

BJP का अच्छा दौर शायद खत्म होने लगा है, लेकिन मोदी इंदिरा गांधी नहीं हैं

नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता ने BJP को लगातार तीन लोकसभा चुनाव जिताए, लेकिन जब एक ही नेता हर सफलता का श्रेय लेता है, तो हर नाकामी का दोष भी उसी पर आ सकता है.

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कभी-कभी आपकी सबसे बड़ी ताकत ही आपकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है. इस सरकार के साथ भी कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही इस सरकार के अस्तित्व की सबसे बड़ी वजह हैं. कई सर्वे बता चुके हैं कि मोदी, उनकी सरकार से भी ज्यादा लोकप्रिय हैं. बीजेपी ने लगातार तीन लोकसभा चुनाव उनके करिश्मे की बदौलत जीते हैं. पूरी कैबिनेट उनके नाम पर चलती है. अगर कल सभी मंत्रियों को हटा दिया जाए और उनकी जगह नए मंत्री बना दिए जाएं, तो शायद किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा. (शायद सिर्फ हटाए गए मंत्रियों को छोड़कर.)

प्रधानमंत्री के भाषण भी उनकी इसी व्यक्तिगत नेतृत्व शैली को दिखाते हैं. कई ताकतवर नेताओं की तरह वह कई बार अपने बारे में तीसरे व्यक्ति में बात करते हैं. उनकी भाषा भी यही बताती है कि उनकी भूमिका सबसे ऊपर है. इसलिए हमेशा ‘मोदी की गारंटी’ कहा जाता है, पूरी सरकार की गारंटी नहीं.

उनके सहयोगियों की भाषा भी इसी तरह की होती है. शायद ही कोई भाषण या घोषणा ऐसी होती हो, जिसमें पहले उनकी तारीफ न की जाए. हर काम हमेशा “हमारे प्रिय प्रधानमंत्री के नेतृत्व में” होने की बात कही जाती है. यहां तक कि जब किसी मंत्री को उसके काम का श्रेय मिलना चाहिए, तब भी वह खुद श्रेय लेने से बचता है और सारी उपलब्धियों का श्रेय प्रधानमंत्री के नेतृत्व और उनकी सोच को दे देता है.

मोदी के आलोचक इस तारीफ और व्यक्तिपूजा का मज़ाक उड़ाते हैं, लेकिन वे भी इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उनकी लोकप्रियता वोट दिलाती है. जिन लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी ने BJP का नेतृत्व किया, उनमें पार्टी का वोट शेयर लगभग 31 प्रतिशत से 36 प्रतिशत के बीच रहा. पिछले लोकसभा चुनाव में BJP को 36 प्रतिशत वोट मिले, जो 2004 के मुकाबले करीब 10 प्रतिशत ज्यादा हैं. 2004 आखिरी लोकसभा चुनाव था, जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी ने BJP का नेतृत्व किया था.

BJP के विरोधी अक्सर मोदी की तुलना किम इल-सुंग और उत्तर कोरिया से करते हैं, लेकिन इसके लिए आज के समय के भी कई दूसरे उदाहरण मौजूद हैं. आज अमेरिका में हालात चाहे जैसे भी हों, द इकोनॉमिस्ट के ट्रैकर के मुताबिक 36 प्रतिशत अमेरिकी मतदाता अब भी डॉनल्ड ट्रंप का समर्थन करते हैं. राष्ट्रपति ट्रंप की तरह प्रधानमंत्री मोदी के भी ऐसे समर्थकों का एक मजबूत आधार है, जो हर अच्छे-बुरे समय में उनके साथ खड़ा रहता है. भारत की संसदीय व्यवस्था में 36 प्रतिशत वोट कई बार सरकार बनाने के लिए काफी होते हैं, लेकिन हमेशा पूर्ण बहुमत दिलाने के लिए नहीं. इसका अनुभव मोदी को पिछले लोकसभा चुनाव में भी हुआ.

यह 36 प्रतिशत का स्थायी वोट बैंक प्रधानमंत्री की BJP को सबसे बड़ी देन है. उनके बिना पार्टी शायद यहां तक कभी नहीं पहुंच पाती. मोदी खुद भी यह बात जानते हैं. उन्होंने एक बार मजाक में कहा था कि राजनीति के शुरुआती दिनों में BJP किसी चुनाव में सिर्फ इस बात का जश्न मनाती थी कि उसका उम्मीदवार अपनी जमानत जब्त होने से बच गया.

लेकिन अमेरिका और उत्तर कोरिया से भी ज्यादा करीब एक और तुलना है, जिसकी चर्चा बहुत कम लोग कर रहे हैं.

इंदिरा गांधी.

लोकप्रियता और विरोध की समानता

इतने लोकप्रिय होने के बावजूद भी मोदी कभी इंदिरा गांधी जितने लोकप्रिय नहीं रहे. 1971 में, जब इंदिरा गांधी को कांग्रेस से निकाल दिया गया था और उनके पास अपना कोई संगठन नहीं बचा था, तब उनकी नई बनाई गई कांग्रेस पार्टी को 43 प्रतिशत वोट मिले थे. 1980 में, जब सभी लोग मान चुके थे कि उनका राजनीतिक करियर खत्म हो गया है और फिर उन्होंने वापसी की, तब भी उन्हें 43 प्रतिशत वोट मिले और 1984 के लोकसभा चुनाव में, जो उनकी हत्या के बाद हुआ, कांग्रेस को 48 प्रतिशत वोट मिले.

यही वह लोकप्रियता का स्तर है, जिसके सामने बीजेपी के 36 प्रतिशत वोटों को समझा जा सकता है, लेकिन इन बड़ी जीतों के बावजूद एक समय ऐसा भी आया, जब इंदिरा गांधी इतनी अलोकप्रिय हो गईं कि वही कांग्रेस पार्टी, जिसे उन्होंने बनाया था, उनके लिए बोझ महसूस करने लगी.

1974 में उनके खिलाफ चल रहे जन आंदोलन इतने बड़े हो गए कि उनका नाम ही भ्रष्ट और बदनाम व्यवस्था का प्रतीक बन गया. 1975 तक हालात ऐसे हो गए कि उनके सत्ता में बने रहने पर ही सवाल उठने लगे. अगर उन्होंने आपातकाल नहीं लगाया होता और 1976 में होने वाले चुनाव को आगे नहीं बढ़ाया होता, तो शायद वह चुनाव हार जातीं.

हालांकि, चुनाव टालने से भी उनकी स्थिति नहीं सुधरी. 1977 के चुनाव में वह सिर्फ सत्ता ही नहीं हारीं, बल्कि अपनी लोकसभा सीट भी हार गईं. यही वह समानता है, जिस पर मोदी को ध्यान देना चाहिए.

हाल के जंतर-मंतर प्रदर्शन की तुलना नेपाल और श्रीलंका की घटनाओं से की गई है, लेकिन यह तुलना पूरी तरह सही नहीं है. जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण थे और वे पूरी व्यवस्था बदलना नहीं चाहते थे. 1974-75 के भारत के छात्र आंदोलन इससे ज्यादा सही तुलना माने जा सकते हैं. 1970 के दशक में छात्र आंदोलन जिस वजह से भड़के थे, उनमें से कई बातें पूरी तरह इंदिरा गांधी की गलती नहीं थीं. 1973 में तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई थी और रिकॉर्ड महंगाई ने दुनिया भर को हिला दिया था, लेकिन क्योंकि इंदिरा गांधी ने देश को ऐसे चलाया, जैसे वही सबसे बड़ी नेता हों, इसलिए प्रदर्शनकारियों का सबसे बड़ा निशाना भी वही बनीं. आंदोलन का संदेश साफ था—जब हर अच्छी बात का श्रेय आप लेना चाहती हैं, तो अब हर खराब चीज की जिम्मेदारी भी आपको ही लेनी होगी.

जब आप सबसे बड़े नेता बन जाते हैं, तो सबसे बड़े निशाने पर भी आप ही होते हैं.

मैं इस बात को ज़रूरत से ज्यादा नहीं बढ़ाना चाहता, क्योंकि अभी तक मोदी को वैसी अलोकप्रियता का सामना नहीं करना पड़ा है, जैसा इंदिरा गांधी को 1970 के दशक के बीच में करना पड़ा था. लेकिन दोनों हालात में कुछ समानताएं जरूर दिखाई देती हैं. मोदी ने जो अजेय (जिसे हराना मुश्किल हो) नेता की छवि बनाई थी, उसे प्रदर्शनकारियों के बेखौफ रवैये और उनके द्वारा मोदी का मजाक उड़ाने के तरीके से झटका लगा है.

BJP की हाल की दो उपचुनाव हार को बहुत बड़ा मुद्दा नहीं बनाना चाहिए, लेकिन कम से कम बिहार में मिली हार जितनी अप्रत्याशित थी, उतनी ही पहले कभी नहीं देखी गई थी. हिंदी पट्टी में भाजपा को बेहद मजबूत माना जाता है. फिर भी बिहार की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली सीटों में से एक पर उसे ऐसे उम्मीदवार से हार मिली, जिसने खुलकर कहा था कि उसका मकसद बीजेपी को सबक सिखाना है.

मुश्किल समय आगे, लेकिन कम मत आंकिए

ज्यादातर हालात में नरेंद्र मोदी हमेशा वापसी करना जानते रहे हैं, लेकिन पिछले एक हफ्ते में वह कुछ अलग और असहज नज़र आए हैं. मुझे नहीं लगता कि छात्र आंदोलन के दबाव में आखिरकार एक मंत्री को हटाना उन्हें अच्छा लगा होगा. नई पीढ़ी से जुड़ने की उनकी कोशिशें भी इस बार कुछ अटपटी लगीं.

उनका सेल्फी वीडियो लोगों को पसंद नहीं आया. इसी तरह उनका यह बड़ा बयान भी लोगों को खास नहीं भाया कि जो छात्रों ने उनका अपमान किया है, उन्हें वह माफ कर देंगे. इसके अलावा, बीजेपी की यह रणनीति कि युवाओं और बच्चों पर दबाव डालकर उनसे वीडियो में माफी मंगवाई जाए, इससे लोगों के बीच यह धारणा और मजबूत हुई कि सम्राट अपनी छवि और अहंकार को छात्रों की समस्याओं से ज्यादा अहम मानता है.

प्रधानमंत्री भारत के सबसे चतुर नेताओं में से एक हैं, इसलिए पूरी संभावना है कि आने वाले महीनों में वह कोई बेहतर रणनीति निकाल लेंगे. लेकिन एक रास्ता यह भी हो सकता है कि वह थोड़ा कम सामने आएं और खुद को नई पीढ़ी के लिए इतना आसान निशाना न बनने दें, जिसकी भाषा और सोच से वह पूरी तरह सहज नहीं दिखते.

मुझे नहीं पता कि चुनावी राजनीति में वह कितनी मुश्किल में हैं, लेकिन अनुभव बताता है कि बीजेपी उपचुनावों में कमजोर पड़ सकती है, जबकि पूरे विधानसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन आमतौर पर बेहतर रहता है.

आलोचक कहेंगे कि इसकी वजह चुनाव आयोग का सरकार के प्रति नरम रवैया है. लेकिन यह भी हो सकता है कि बड़े चुनाव अलग-अलग मुद्दों पर लड़े जाते हों. जो भी हो, पिछले एक हफ्ते की घटनाएं आने वाले महीनों में मुश्किल समय का संकेत दे सकती हैं. एथेनॉल का मुद्दा भी बड़ा बन सकता है. मुझे नहीं लगता कि नितिन गडकरी की कुर्बानी देने पर मोदी को ज्यादा दुख होगा, लेकिन शायद वह यह समझते हैं कि प्रदर्शनकारी उन्हें भी नहीं छोड़ेंगे.

इसके बाद कैबिनेट फेरबदल भी होना है. इससे उन्हें अपनी कैबिनेट में बड़े बदलाव करने का मौका मिलेगा, लेकिन हर फेरबदल की तरह इससे पार्टी के अंदर नाराज़गी भी बढ़ेगी. जिन मंत्रियों को हटाया जाएगा, वे अक्सर असंतुष्ट हो जाते हैं और जिन्हें उम्मीद के मुताबिक पद नहीं मिलता, वे भी नाराज़ रहते हैं.

मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री की रणनीति अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का इंतज़ार करने की होगी. बीजेपी को उम्मीद है कि वह हमेशा की तरह यह चुनाव जीत जाएगी. शायद उन्हें भरोसा है कि इस जीत के बाद उनके आलोचक शांत हो जाएंगे.

यह रणनीति काम कर सकती है. लेकिन इसके साथ-साथ उन्हें पूरे भारत के उन नाराज युवाओं को भी संतुष्ट करना होगा, जिन्हें नौकरी नहीं मिल रही है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का इस्तेमाल जितना बढ़ेगा, ऐसे युवाओं की संख्या भी बढ़ेगी, लेकिन ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है कि यह सरकार अर्थव्यवस्था को संभालना जानती है, या बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करना जानती है.

हो सकता है कि अच्छे दिन अब खत्म होने लगे हों, लेकिन नरेंद्र मोदी को कम आंकना हमेशा गलती साबित हो सकता है. वह अपनी ताकत का इस्तेमाल करके इंदिरा गांधी जैसी स्थिति में जाने से बच सकते हैं.

वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविज़न पत्रकार और टॉक शो होस्ट हैं. वे @virsanghvi पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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