पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने 20 अगस्त को विपक्ष के वॉकआउट के बीच ‘डिफेंस फोर्सेज़ एक्ट 2026’ और संशोधित ‘नेशनल कमांड ऑथरिटी एक्ट 2010’ को मंजूरी दे दी. सीनेट ने उसी दिन दोनों विधेयकों को भी पारित कर दिया.
भारत में जानकार लोगों का विश्लेषण है कि पाकिस्तान के चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज़ (सीडीएफ) फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने इन नए क़ानूनों के जरिए अपनी गिरफ्त और मजबूत करने की दिशा में एक और कदम उठाया है. लेकिन इस सियासत पर ज़ोर देना उस एक दूसरे बदलाव की अनदेखी करना है, जो भारत-पाकिस्तान के अगले युद्ध का स्वरूप को प्रभावित कर सकता है.
अगस्त 2025 में पाकिस्तान ने पारंपरिक युद्ध में दूर तक मार करने के लिए ‘आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड’ का गठन किया. नवंबर में, 27वें संविधान संशोधन करके अनुच्छेद 243 में परिवर्तन कर दिया गया और ज्वाइंट चीफ़्स ऑफ स्टाफ कमिटी के चेयरमैन के पद को खत्म करके सीडीएफ का पद बना दिया गया. मुनीर ने 4 दिसंबर 2025 को नए CDF का पद संभाल लिया, लेकिन चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ के चीफ भी बने रहे. इसके चार दिन बाद CDF हेडक्वार्टर की स्थापना की गई, और इसके नेता ने मई 2025 में हुई टक्कर को भावी युद्ध का एक मॉडल बताया.
जुलाई 2026 में, CDF की सिफ़ारिश पर जनरल आमेर रज़ा ‘नेशनल स्ट्रेटेजिक कमांड’ के पहले चार सितारा वाले कमांडर बने. अब नए कानून इन बदलावों को नवंबर 2025 से कानूनी समर्थन दे रहे हैं. यानी संसद ने उस हेडक्वार्टर को अब मंजूरी दी है जो आठ महीने पहले से ही काम कर रहा है.
विधेयक का आलेख
विधेयक के शब्द महत्व रखते हैं. सेना का गठन, प्रबंधन और कमांड करना CDF की जिम्मेदारियां हैं. इन भूमिकाओं के अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में प्रधानमंत्री को सलाह देना; पूरी व्यवस्था को चलाने के लिए आदेश तथा नियम जारी करना; सभी सेनाओं के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति, बरखास्तगी, और सेवा विस्तार समेत सभी मामलों के बारे में फैसले करना भी शामिल है.
लेकिन ज्वाइंट चीफ़्स ऑफ स्टाफ कमिटी के चेयरमैन ने तीनों सेनाओं के ऑपरेशन संबंधी कमांड के अधिकार कभी इस्तेमाल नहीं किया. अब नियम बनाने के जो नए अधिकार दिए गए हैं उनके तहत अब हर बार संसद से मंजूरी लिए बिना ज्वाइंट ढांचे बनाए जा सकते हैं. तीनों सेनाओं में केरियरों का अपने हिसाब से प्रबंधन संयुक्त ढांचे को वास्तविक बनाता है, क्योंकि एक हेडक्वार्टर नौसेना या वायुसेना के किसी अफसर के केरियर के बारे में फैसले करता है तो उस अफसर को समाहित कर लिया जाएगा, भले ही उसकी अपनी सेना इससे असहमत हो.
जुलाई में मैंने बताया था कि चीनी सेना ‘पीएलए’ के पश्चिमी थिएटर कमांड ने मिसाइल, साइबर, एयरोस्पेस, और सूचना व्यवस्था की क्षमताओं को उसके ज्वाइंट ऑपरेशनल ढांचे के अधीन ला दिया है. इसके विपरीत, भारतीय कमांडर को ऐसी व्यवस्था हासिल करने के लिए तीनों सेनाओं की एजेंसियों और राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ तालमेल करना होगा और उन्हें राजी करवाना होगा. अब पाकिस्तान ने हमारे पश्चिमी मोर्चे पर उसी मॉडल को अपना लिया है. इसके बाद इस क्षेत्र में अब अकेली भारतीय सेना ही है जो प्रत्यक्ष कमांड की जगह अभी भी तालमेल पर निर्भर है.
दोनों देशों ने बदलाव किए हैं, लेकिन मुख्य फर्क इस बात से पड़ता है कि ये बदलाव किस स्तर पर किए गए हैं. भारत ने रुद्र ऑल-आर्म्स ब्र्गेडोन, बाज ड्रोन बटालियनों, भैरव लाइट कमांडो बटालियनों, शक्तिबाण आर्टिलरी रेजिमेंटों, और XVII माउंटेन स्ट्राइक कोर के अंदर पहले एकीकृत बैटल ग्रुप्स का गठन किया है. ये सब आगे की दिशा में प्रशंसनीय कदम हैं लेकिन ये सब कोर लेवल पर या उससे नीचे के लेवल पर उठाए गए हैं. इस बीच, पाकिस्तान एक साल से अपने संविधान में संशोधन कर रहा है, कमांड के एक लेवल को खत्म करके कमांड के अधिकार के साथ ज्वाइंट हेडक्वार्टर्स बनाए हैं, रॉकेट फोर्स बनाया है और इन सभी बदलावों को समर्थन देने वाले कानून बनाए हैं.
मुख्य फर्क गुंजाइश और इजाजत के मामले में है. ‘रुद्र’ के लिए चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ से मंजूरी लेनी पड़ी, लेकिन थिएटरीकरण के लिए अंतिम मंजूरी का इंतिजार हो रहा है. कोई भी देश सेना में सुधार के कदम सिविल-मिलिटरी सहमति से ही उठा सकता है. भारत में जो सुधार बाकी हैं उनके लिए इसी सहयोग की जरूरत है. सामरिक एकीकरण और अभियान संबंधी एकीकरण अलग-अलग स्तरों पर होते हैं, और एक का काम दूसरे से नहीं चल सकता.
क्रमिक कार्रवाई
भारतीय वायुसेना (IAF) सिद्धांत चरणबद्धता का पालन करती है. पहले हवाई क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करो, फिर रोक लगाओ, और अंततः जमीनी लड़ाई को समर्थन दो. यह क्रम समझदारी भरा है क्योंकि हवाई क्षेत्र पर नियंत्रण दूसरे सभी ऑपरेशन्स को सुरक्षा देता है, इसलिए यह नियंत्रण खोना काफी जोखिम भरा है. लेकिन इस नियंत्रण के लाभ स्पष्ट होने में समय लगता है. अब जो तेज-और-छोटी लड़ाई का चलन चला है उसमें यह नियंत्रण बेहद निर्णायक हो गया है.
एक अभियान के कमांडर को हवाई क्षेत्र में बढ़त को एक अलग लक्ष्य के रूप में लेने की जरूरत नहीं है. बल्कि वे पाकिस्तानी वायुसेना (PAF) का इस तरह इस्तेमाल कर सकते हैं कि उससे तात्कालिक छोटे अभियान में मदद मिले. अगर मुख्य लक्ष्य भारतीय राजनीतिक दबाव के क्षेत्रों को मिसाइलों के जरिए खतरा पहुंचाना है, तो PAF का पहला काम होगा : रॉकेट फोर्स को निर्देश देना, लंबी दूरी तक मार करने के रास्ते को खोलना, अपने हवाई अड्डों को सुरक्षा देना, और थल सेना की मदद करना. इससे मकसद बदल जाएगा: IAF हवाई क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करना चाहती है, जबकि पीएएफ एक विशेष अभियान को आगे बढ़ाना चाहती है. भारत हवाई क्षेत्र पर नियंत्रण बना सकता है लेकिन उसे यह भी पता लग सकता है कि लड़ाई का असली फैसला तो कहीं और हो गया.
एक ज्वाइंट कमांडर एक के बाद एक कार्रवाई करने की योजना बना सकता है, जबकि उसी दौरान दूसरी सेनाएं अपने अभियान चला रही हों. समानांतर अभियान तभी कारगर होते हैं जब समय पर्याप्त हो. छोटे, सौ घंटे वाले युद्ध में सेना की हरेक शाखा पहले अपने सिद्धांत के पालन पर ज़ोर देती है, और इनमें से किसी के उपक्रम तब तक पूरे नहीं भी हो सकते हैं जब युद्ध को खत्म करने का राजनीतिक फैसला ले लिया जाता है.
पिछले साल 12 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत अपनी शर्तों के मुताबिक निर्णायक जवाब देगा, परमाणु हथियारों के बूते ब्लैकमेल से डरेगा नहीं, आतंकवादियों और उनका समर्थन करने वाले देश में फर्क नहीं करेगा. उन्होंने यह भी कहा था कि ‘टेरर और ट्रेड’ साथ-साथ नहीं चल सकते और पानी तथा खून एक साथ नहीं बह सकते. इसका अर्थ यह है कि उनमें हमलों से बाज आने की दहशत पैदा करने की जगह अब उन्हें दंडित किया जाएगा. लेकिन दंडित करने के लिए दहशत पैदा करने से भिन्न तैयारी चाहिए.
दंड स्पष्ट और एकतरफा होना चाहिए, क्योंकि दूसरा पक्ष अगर तुरंत जवाब देता है तो यह अदलाबदली हो जाएगी, जुर्माना नहीं होगा. तेज तर्रार, ज्यादा एकीकृत दुश्मन अपनी कार्रवाइयों और मामले के बारे में सोच के जरिए इस रुख को चुनौती देगा. दंड का तकाजा होगा कि हर उकसावे पर दंड को दोहराया जाए. और सिस्टम हर जवाब को इन घटनाओं से सबक लेने के अभ्यास के रूप में ले. यानी, भारत को अपनी यह क्षमता बनाए रखनी होगी कि वह अपनी कार्रवाइयों को रोकने का फैसला खुद कर सके.
दोनों पक्षों ने जिन साधनों को चुना है, उनमें भी एक विरोधाभास है. भारत ने उस युद्ध के बाद अपने सिद्धांत की घोषणा की जिस युद्ध में दूर से इस्तेमाल किए जाने वाले वेपन्स, मिसाइलों और ड्रोन्स ने प्रमुख भूमिका निभाई. पाकिस्तान ने रॉकेट फोर्स का गठन किया और इसका प्रयोग करने वाले कमांड ढांचे का निर्माण किया, तो भारत के सबसे प्रकट सुधारों का ज़ोर थलसेना पर केंद्रित रहा.
जवाबी रणनीति की धार कुंद की गई
जनरल अनिल चौहान ने अपनी किताब ‘Ready, Relevant and Resurgent II‘ के अध्याय 13 में ‘कोल्ड स्टार्ट’ (औचक हमले) तथा ‘प्रोएक्टिव ऑपरेशन’ (बढ़-चढ़कर हमले) के सिद्धांत की जगह ‘डायनामिक रेस्पोंस स्ट्रेटेजी’ को अपनाने की व्याख्या की है. उन्होंने इसे राजनीतिक नेतृत्व के लिए क्रमिक प्रोएक्टिव कार्रवाई के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है, जो पूर्ण युद्ध से नीचे के स्तर की हो सकती है. इस बदलाव का संकेत जनरल एमएम नरवणे ने 2020 में दे दिया था. वह वादा तीन मान्यताओं पर आधारित है, और इन तीनों को पाकिस्तान में हो रहा पुनर्गठन प्रभावित करता है.
पहली मान्यता यह है कि पूरी सीढ़ी भारत के कब्जे में है, लेकिन हकीकत यह है कि उसके कब्जे में पहला पायदान ही है. क्रमिक कार्रवाई तब कारगार होती है जब दुश्मन उसी अनुपात में जवाब दे रहा हो और जरूरी नहीं कि जवाब समान स्तर का हो. किसी आतंकी ढांचे पर हमले का जवाब हवाई हमले, सेना की कार्रवाई केखिलाफ लंबी दूरी से हमले, समुद्री क्षेत्र में और इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक क्षेत्र तथा ऐसे कई क्षेत्रों में दबाव बनाने के रूप में दिया जा सकता है. पहले, भारत द्वारा कार्रवाई की जाने के बाद जवाब देने के लिए सेनाओं के हेडक्वार्टर्स से तालमेल बिठाना पड़ता था जिसमें देरी के कारण पाकिस्तानी सेना लड़ाई तेज करने में पिछड़ जाती थी. कमांड के अधिकार के साथ बना ज्वाइंट हेडक्वार्टर्स अब तुरंत एकीकृत जवाब दे सकता है, क्योंकि एक ही कुर्सी दूर तक पारंपरिक हमले का फैसला करेगी और रणनीतिक दिशा भी तय करेगी.
दूसरा परिणाम यह है कि क्रमिक जवाब तभी कारगर होते हैं जब उनकी पहले से तैयारी की गई हो और अधिकृत किया गया हो. संकट के बीच तैयारी को प्रस्ताव ही माना जा सकता है. यह पाकिस्तान की उपलब्धि से ज्यादा भारत की कमजोरी है, लेकिन अब इसके लिए गुंजाइश कम है. इसकी वजह यह है कि अब पाकिस्तान पहली कार्रवाई का जितनी तेजी से जवाब देगा उससे पहले ही भारत को जवाब देने की तैयारी करनी होगी.
तीसरी मान्यता यह है कि कार्रवाई करने का विकल्प खुला है लेकिन कुछ विकल्प इसलिए बेकार हो सकते हैं क्योंकि भारत की कार्रवाई का अपेक्षित असर होने से पहले ही दूसरा पक्ष जवाबी कार्रवाई कर सकता है. जवाब देने के समय में कटौती करना ही निशाने की साझा तस्वीर, समर्पित रॉकेट फोर्स और एकल रिलीज़ ऑथरिटी का मकसद है, जिंका निर्माण पाकिस्तान ने किया है. उपरोक्त सीढ़ी का जवाब बनाने की जगह उसके बीच के पायदान गायब कर दिए गए हैं.
एक चौथा प्रमुख मुद्दा भी है. ऑपरेशन सिंदूर को मुकाम नहीं बल्कि एक विराम माना गया और माना गया कि भारत को फिर शुरुआत करने का अधिकार होगा. भारत इसे लचीलापन मानता है लेकिन पाकिस्तान शायद इसे एक चेतावनी मानता है कि कोई भी विराम अगले चरण से पहले का विराम हो सकता है. जब हमला, विराम और फिर शुरू करने का अधिकार एक पक्ष के हाथ में होगा तब जवाबी कार्रवाई निरंतर जारी अभियान का रूप ले सकती है. इसका अर्थ यह हुआ कि विराम हो या युद्ध हो, हर समय अभियान की मुद्रा में रहना होगा. शायद इसलिए भी पाकिस्तान ने संकट का सामना करने की व्यवस्था के बदले स्थायी हेडक्वार्टर्स बनाने का फैसला किया.
एकीकृत बैटल ग्रुप्स (IBG) का विचार शायद सेना के जुटने में आने वाली समस्या के समाधान के लिए उभरा. पहली बार यह समस्या ‘ऑपरेशन पराक्रम’ के दौरान उभरी, जब हमले के लिए सेना को जुटाने में करीब तीन सप्ताह लग गए थे. जुटान में तेजी युद्ध क्षमता के निर्माण की मुश्किलों को दूर नहीं करती, क्योंकि यूनिटों को सक्रिय करना, इकट्ठा करना, और एअर डिफेंस को तैयार करना पड़ता है. हर कदम ऐसे संकेत दे सकता है जिन्हें पहचाना जा सकता है और जिन पर हमला किया जा सकता है. इसलिए असली सवाल यह नहीं है कोई यूनिट कितनी तेजी से मोर्चे पर पहुंच सकती है बल्कि यह है कि क्या भारत अपनी युद्ध क्षमता इतनी तेजी से तैयार कर सकता है कि पाकिस्तान उसे पहचान कर निशाना न बना सके और छिन्न-भिन्न न कर सके? पाकिस्तान के पास अब समर्पित पारंपरिक रॉकेट फोर्स है जिसका गठन अगस्त 2025 में किया गया, जो भारत के अंदर दूर तक मार कर सकता है.
दो खामियां
भारत की दो मुख्य खामियां हैं— केवल संस्थागत नहीं बल्कि ऑपरेशन संबंधी भी. पहली खामी सिविल- मिलिटरी निर्णय प्रक्रिया में है, जिसका संबंध इस बात से है कि जवाबी कार्रवाई किन स्थितियों में करना है इसका फैसला कौन करेगा और उसके लिए मंजूरी कौन देगा. संकट में मामला दर मामला निर्णय करने की भारतीय शैली जायज है, लेकिन छोटे युद्ध के मामले में यह महंगी साबित हो सकती है. समय से पहले अधिकारों का फैसला राजनीतिक नेताओं को ज्यादा नियंत्रण दे सकता है, क्योंकि शांति काल में वे फैसला कर सकते हैं कि वे किन कार्रवाइयों की मंजूरी देने को तैयार हो सकते हैं.
दूसरी खामी सेनाओं के बीच की है— भारत में एक कमांडर को संसाधनों के लिए 17 सिंगल-सर्विस कमांड्स और कई असैनिक एजेंसियों तथा मंत्रालयों से मंजूरी हासिल करनी पड़ती है जबकि पाकिस्तानी केंपेन कमांडर संसाधनों को सीधे आवंटित कर सकता है. सेंसर से शूटर तक की कड़ी में जहां-तहां गड्ढे होंगे जिन्हें पाटने में राजनीतिक नेतृत्व को कई घंटे, सेनाओं को कई मिनट और टेक्नोलॉजी को कई सेकंड लग सकते हैं. ये देरियां सेना के जुटान को प्रभावित करती हैं.
इस विश्लेषण की दो सीमाएं हैं. पाकिस्तान ने नया कमांड ढांचा तैयार किया है लेकिन उसने अभी यह नहीं साबित किया है कि उसका रॉकेट फोर्स, निगरानी तंत्र, सर्विस एसेट्स एकीकृत सिस्टम के रूप में वाकई काम कर रहे हैं या नहीं. रॉकेट फोर्स मौजूद होने और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन्स चलाने में सक्षम होने में फर्क होता है. एक बड़ा हेडक्वार्टर भी अड़चन बन सकता है. और उसकी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पहचान उसे बड़ा निशाना बनाती है. इस व्यवस्था के साथ कीमत जुड़ी है, भारत इससे बच गया है क्योंकि यह व्यवस्था की सत्ता एक व्यक्ति में केंद्रित है, और कोई नहीं जानता कि मुनीर के बाद क्या होगा.
इसलिए, पाकिस्तान ने जो तेज सुधार किए हैं उन पर तुलना के लिए विचार किया जा सकता है, उन्हें मॉडल मान कर अपनाना जरूरी नहीं है. मई 2025 में, आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों के बीच तुलना को लेकर जो घोषणा की गई उसने भविष्य के हर संघर्ष का स्तर ऊपर उठा दिया, और हर एक को शुरू से ही देश बनाम देश का मामला बना दिया. पिछले 15 महीने से पाकिस्तान ऊंचे स्तर के युद्ध के लिए व्यवस्था बनाने में जुटा रहा है, जरूरी नहीं कि इरादा यही हो लेकिन वास्तविक तैयारी तो उसकी ही है.
सबक कार्य से संबंध रखता है, कार्यालय से नहीं. भारत के पास पहले से ही चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ मौजूद है लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि उसे और उसके मातहत थिएटर कमांडरों को ऑपरेशन के मामले में अधिकार हासिल हैं या नहीं, या उन्हें सिर्फ तालमेल बिठाने की ज़िम्मेदारी दी गई है. पाकिस्तान ने इस मसले का हल अपनी सबसे बड़ी सेना के प्रमुख को यह काम सौंप कर किया है, और इसे संविधान का हिस्सा बना दिया है, इसने सेना को वह जुड़ाव दिया है जिसे वह हमेशा अपना मानेगी.
भारत के जमीनी मोर्चे दो हैं और समुद्री मोर्चे पर थिएटर वाली व्यवस्था है. भारत को ऐसी एकीकृत ऑथरिटी चाहिए जो सेना की किसी एक शाखा से संबद्ध न हो और राजनीतिक नेतृत्व के प्रति जवाबदेह हो. यह एक अलग डिजाइन है, लेकिन ऑपरेशन संबंधी उसी ज़रूरत को पूरा करती है. लेकिन भारत को चार प्रमुख सवालों के जवाब खोजने होंगे, जिनमें वह देर करता रहा है. ये सवाल हैं—अभियान के मामले में दूर तक मार करने की पारंपरिक व्यवस्था का नियंत्रण किसके हाथ में है? क्या यह हमला रॉकेट फोर्स के जरिए किया जाए या ज्वाइंट कमांड के जरिए, जिसके लिए नयी सेना बनाने का झमेला नहीं करना पड़ेगा? शांतिकाल में किन जवाबी विकल्पों की तैयारी की जाती है और मंजूरी दी जाती है? पश्चिमी मोर्चे पर जॉइंट ऑपरेशन कौन चलाता है, जबकि थिएटराइजेशन का काम बाकी है? तीन दिनों में जिस लड़ाई का फैसला हो सकता है उसमें पहले 12 घंटों में कौन लड़ेगा?
इन चार में से तीन सवालों के जवाब राजनीतिक नेताओं से मिलेंगे, और यही मुख्य मसला है. भारत में जिन सुधारों को पूरा नहीं किया गया है, उनके लिए नागरिक और सैन्य नेतृत्वों का सहयोग चाहिए. छोटी लड़ाइयों में जो फैसले लड़ाई के दौरान किए जाते थे, उन्हें अब समय से पहले करना जरूरी है. जाने-पहचाने उकसावे का एक निश्चित जवाब देने का वादा करने वाला सिद्धांत उस उकसावे के बाद उस जवाब की तैयारी करने पर निर्भर नहीं रह सकता. ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की ओर से दिए जाने वाले राजनीतिक जवाब को ज्यादा पूर्वानुमान योग्य बना दिया है, लेकिन अब तेजी से सैन्य जवाब देने पर ज़ोर दिया जाना चाहिए.
ब्रिगेडियर अनिल रमन (रिटायर्ड) तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में रिसर्च फेलो हैं. विचार निजी हैं.
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