Saturday, 25 June, 2022
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2 अप्रैल का स्वयंभू भारत बंद : ऐतिहासिक और दर्दनाक

जिन दलित आंदोलनकारियों को 2 अप्रैल के भारत बंद की हिंसा में सामंती-संघी विचारधारा के समर्थकों के हाथों मार दिया गया उन मामलों में गिरफ्तारियां बाकी हैं.

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कोई एक नेता, पार्टी या कोई एक संगठन के आह्वान पर नहीं, लेकिन स्वयंभू तरीके से पिछले साल जिस प्रकार एट्रोसिटीज़ के कानून को खत्म करने की संघ-भाजपा की कोशिश के खिलाफ 2 अप्रैल को भारत बंद हुआ वह दलित-आदिवासी आंदोलन के इतिहास में यादगार रहेगा. यदि यह आंदोलन नहीं होता तो दलित-आदिवासी समुदायों को थोड़ी बहुत सुरक्षा प्रदान करनेवाला एट्रोसिटीज़ का कानून भी शायद खत्म हो चुका होता या खत्म होने की कगार पर होता.

इसीलिए आज के दिन सब से पहले दलित-आदिवासी कार्यकर्ताओं को नमन करते हैं जो इस आंदोलन के दौरान शहीद हुए. इन शहीदों को सलामी और श्रद्धांजलि देने के साथ-साथ इस बात के लिए भी प्रतिबद्ध होने की आवश्यकता है कि उन्हें न्याय मिले. जिन दलित आंदोलनकारियों को 2 अप्रैल के भारत बंद की हिंसा में सामंती-संघी  विचारधारा के समर्थकों के हाथों मार दिया गया उन मामलों में आज भी गिरफ्तारियां बाकी हैं और उनके परिवार न्याय की आस लगाकर बैठे हैं.

दूसरी तरह, उत्तरप्रदेश, बिहार, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश वगैरह राज्यों में इस दिन भारत बंद के दौरान अनगिनत दलित-आदिवासी कार्यकर्ताओं के ऊपर फर्ज़ी मुकदमें दर्ज हुए, उन में से आज भी कुछ लोगों की जमानत नहीं हुई. यानि, इन साथियों को छुड़वाना, सारे मुकदमें वापस लेने की लिए सभी दलों की सरकारों पर दबाव बनाना और हमारे जिन भाईयों को मार दिया गया उन्हें न्याय दिलाना यही आज के दिन का संकल्प होना चाहिए और यही हमारा संकल्प होंगा. इस मामले में कोई सामाधान नहीं चलेगा.

पिछले साल मध्यप्रदेश में (साथी सुधीर कोडे और दूसरे साथियों के साथ) और राजस्थान में (धर्मेंद्र जाटव और दूसरे साथियों के साथ) जाकर इन परिवारों से हमने मुलाकात की तब जो सुना वह किसी आतंक के कम नहीं था.


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अभी भी याद है कि मध्यप्रदेश में जिन दलित आंदोलनकारियों को गोलियां दाग कर संघी समर्थकों ने मार दिया उनके परिवार के लोगों का बारबार यही कहना था कि उनकी भी जान खतरे में हैं. उनका आरोप है कि उनके लड़कों को जिन्होंने मार दिया था उनकी गिरफ्तारी जानबूझकर शिवराज सरकार ने नहीं की थी. बल्कि उन्हें छूट दे रखी थी कि वह खुलेआम घूमते रहे और पीड़ित परिवारों को डराते रहे ताकि वह मामले में समाधान कर ले. इन पीड़ित परिवारों को सुरक्षा तक प्रदान नहीं कि गई थी. वे उस खौफ में जी रहे थे कि कहीं उन्हें भी न मार दिया जाए.

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राजस्थान में खैरतल, नीम का थाना, हिंडौन सीटी – इन जगहों पर जाकर जब पीड़ितों से भेट की तब देखा कि वसुंधरा राजे की पुलिस ने यहां कानून और संविधान की पूरी तरह से अनदेखी की थी. खैरतल में एक दलित बहन ने कहा कि जब पुलिस ने हमारे मोहल्लो में रेड की तब दोपहर का वक़्त था, घर मे कोई नहीं था, मर्द लोग नौकरियों पर गए थे, लेकिन पुलिसवाले न जानें कौन से जनम का बैर निकाल रहे थे कि हमारी छाती पर खड़े होकर अपने बूट से गर्दन ऐसे दबाया मानो खून ही करना चाहते हों. मारते-मारते वह पूछ रहे थे -‘साली तुझ को आरक्षण चाहिये?’

युवा कार्यकर्ताओं को छत्रावासों में घुसकर बेरहमी से पीटा गया. किसी का हाथ टूटा तो किसी का पैर. किसी की नौकरी चली गई तो किसी को फर्ज़ी मामलों में महीनों तक जेल में रहना पड़ा. जातिवादी मानसिकता से लैस पुलिस ने मानो ठान ही लिया था कि दलित आंदोलन को रौंद दिया जाए. 14 अप्रैल या 6 दिसंबर के दिन छोटे मोटे कार्यक्रम और मोर्चे के लिए जो आदिवासी और दलित ब्यूरोक्रेट्स चंदा देते थे उनके खिलाफ एक सोची समझी साजिश के तहत मुकदमे दर्ज हुए. राजस्थान में अलग अलग पुलिस थानों में उन दलित-आदिवासी कार्यकर्ताओं की सूची तैयार की गई जो आंदोलनों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हों, ताकि पता चले कि किसे हिरासत में लिया जाये. कुल मिलाकर दलित और आदिवासी समुदाय के मोरल को तोड़ देने की , उनके आत्म-सम्मान को नेस्तनाबूद करने की मानो कोई साजिश रची गई हो.


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मीडिया के एक हिस्से ने पूरा दिन यही दिखाया कि केवल दलितों ने हिंसा की. लेकिन बाद में पता चला कि ज़्यादातर हिंसा में भाजपा के कार्यकर्ता थे या संघ परिवार के लोग. मध्यप्रदेश में एक शख्स हाथ में बंदूक लेकर दलित समाज के आंदोलनकारी टोले पर गोलियां बरसा रहा था वह वीडीयो मीडिया में पूरा दिन दिखाया गया लेकिन किसी ने उसकी गिरफ्तारी पर ज़ोर नहीं लगाया. हमारी जानकारी के मुताबिक शायद आज तक उसकी गिरफ्तारी नहीं हुई है.

हम हिंसा का कतई समर्थन नहीं करते लेकिन मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आज जिस प्रकार से दलित-आदिवासी समुदायो पर हमलें बढ़े हैं तो यह कहना पड़ेगा की आनेवाले दिनों में हम इसी प्रकार भारत बंद को आवाज़ देने के लिए मजबूर हैं. यह लिख रहा हूं तब इस बात की दिल में दहशत है कि यही 2019 में दुबारा भाजपा की सरकार बनी तो जिस कानून की रखवाली के लिए इन आंदोलनकारी साथियों ने बलिदान दिए, जाने गंवाई वह एट्रोसिटीज़ का कानून और हमारा संविधान बचेगा की नहीं?

(जिग्नेश मेवाणी गुजरात से विधायक हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

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3 टिप्पणी

  1. 2 अप्रैल 2018 सँविधान बचाने की लड़ाई में बहुजन समाज के 13 वीर योद्धाओं को अश्रुपूरित भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, और संकल्प लेता हूं आपकी यह कुर्बानी व्यर्थ नही जायेगी, एट्रोसिटी एक्ट सुरक्षित रखा जाएगा। युवा आपके बलिदान से प्रेरणा ले रहा है
    #2अप्रैल_बहुजनसँघर्ष

    संजय अजगल्ले
    जांजगीर लोक सभा
    छत्तीसगढ़

  2. आजादी की लड़ाई में शहीद हुए एक RSS कार्यकर्ता का नाम बता दो

    आज से बीजेपी के खिलाफ लिखना बंद कर देंगे
    सौदा मंजूर है भक्तों तो बताओ? 🧐

    #RSS_देश_की_दुश्मन

    (संजय अजगल्ले)

  3. अबे अच्छे पत्रकार तूने इसमें पूरी इक तरफा बात की है तू खुद जातिवादी पत्रकार की तरह बात कि हे पूरे मामले में

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