जब मंगलवार को उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने नई दिल्ली में किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना के समझौते पर हस्ताक्षर किए, तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस बात का श्रेय लेना सही समझा कि उनके मुताबिक नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह 10वां अंतरराज्यीय जल विवाद सुलझा है.
किशाऊ बांध टोंस नदी पर बनाया जाना है, जो यमुना की एक सहायक नदी है. यह परियोजना लागत बांटने को लेकर आठ साल से ज्यादा समय से अटकी हुई थी. अमित शाह की सूची में लखवाड़, रेणुकाजी, केन-बेतवा और शाहपुर कंडी भी शामिल थे, जहां पंजाब और जम्मू-कश्मीर ने 2018 में रावी नदी के पानी को लेकर अपना विवाद सुलझाया था. उन्होंने कहा कि 2018 से 2026 के बीच का समय उन वर्षों के रूप में याद किया जाएगा, जब कश्मीर से उत्तर प्रदेश तक लगभग हर जल विवाद को खत्म कर दिया गया.
लगभग हर विवाद.
गिनती में 10, लेकिन एक का जिक्र कभी नहीं
मैं यहां सतलुज-यमुना लिंक नहर या रावी-ब्यास के पानी की बात नहीं कर रहा हूं, जो अभी भी अनसुलझे हैं और जिनके बारे में मैं पहले कहीं और लिख चुका हूं. मैं उस विवाद की बात कर रहा हूं जो किसी की गिनती में दिखाई ही नहीं देता, क्योंकि उसे कभी विवाद बनने ही नहीं दिया गया: यमुना बेसिन में पंजाब की स्थिति.
यह मामला चुपचाप पीछे पड़ा हुआ है. चंडीगढ़ इसे कभी-कभी बहस के दौरान जवाब के तौर पर सामने लाता है. मुख्यमंत्री भगवंत मान ने 2023 में उत्तरी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में कहा था कि यमुना के पानी के लिए पंजाब के अनुरोध को इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि राज्य का कोई भी हिस्सा यमुना बेसिन में नहीं आता. उन्होंने इसके बजाय यमुना-सतलुज लिंक का प्रस्ताव दिया था. लेकिन पंजाब की किसी भी राजनीतिक पार्टी ने बेसिन में राज्य की जगह को अपना प्रमुख मुद्दा नहीं बनाया है और जहां तक सार्वजनिक रिकॉर्ड से पता चलता है, नदी के पानी से जुड़े मामलों में पंजाब की कानूनी दलील में बेसिन में उसका अधिकार होने के बजाय पानी की उपलब्धता पर बात की गई है. समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद से उनमें से किसी ने भी किशाऊ को लेकर सार्वजनिक रूप से एक शब्द नहीं कहा है.
किशाऊ ने इस अनदेखी को नजरअंदाज करना मुश्किल बना दिया है. अमित शाह ने खुद बताया कि 12 मई 1994 को बेसिन राज्यों के बीच हुए समझौते में हर जल भंडारण परियोजना के लिए अलग समझौते का प्रावधान था और किशाऊ की लागत भी 1994 के फॉर्मूले के हिसाब से बांटी जाएगी. किशाऊ उस व्यवस्था का हिस्सा है, जिसमें पंजाब को शुरुआत से ही बाहर रखा गया था. पंजाब ने 1994 में इस पर साइन नहीं किए थे, आवंटन की व्यवस्था देखने वाले अपर यमुना रिवर बोर्ड में उसकी कोई सीट नहीं है और इस हफ्ते हुए समझौते में भी वह न तो पक्ष था और न ही उससे सलाह ली गई.
तीन हिस्सों में बांटा गया, फिर भुला दिया गया
इसकी वजह पंजाब पुनर्गठन अधिनियम में है, जो 1 नवंबर 1966 को लागू हुआ और जिसके तहत पंजाब को तीन हिस्सों में बांटा गया. हरियाणा को अलग राज्य बनाया गया, पहाड़ी इलाके हिमाचल प्रदेश में चले गए और चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश बन गया. अविभाजित पंजाब की पूर्वी सीमा यमुना के साथ चलती थी, जो अंबाला जिले की जगाधरी तहसील से शुरू होकर आगे की ओर जाती थी. आज यहां यमुनानगर है. यह पूरा इलाका हरियाणा को दे दिया गया.
संसद ने अविभाजित पंजाब के भाखड़ा और ब्यास परियोजनाओं में अधिकारों को उत्तराधिकारी राज्यों के बीच बांटने का ध्यान रखा. मार्च 1976 में केंद्र की अधिसूचना में हरियाणा को रावी-ब्यास के 3.5 मिलियन एकड़-फीट पानी का हिस्सा दिया गया, जबकि पुनर्गठित हरियाणा का इनमें से किसी भी नदी से कोई सीधा नदी किनारे का संबंध नहीं रहा है. लेकिन अविभाजित पंजाब के यमुना से जुड़े हिस्से को किसी ने नहीं बांटा. बाद में इस चुप्पी को इस तरह समझा गया कि वह अधिकार खत्म हो गया.
राजस्व विभाग का कोई अधिकारी इस नतीजे को गलत तरीके से किया गया बंटवारा मानेगा. जब एक साझा खेवट का बंटवारा होता है, तो परिवार की साझा जमीन के हर खसरा नंबर के सामने हर हिस्सेदार का नाम दर्ज किया जाता है. कोई पटवारी एक भाई का नाम नहर से सिंचित खेतों के सामने दर्ज करके उसे नदी के किनारे वाली जमीन से चुपचाप बाहर नहीं कर देता. लेकिन 1966 में ठीक ऐसा ही दर्ज किया गया. हरियाणा और हिमाचल प्रदेश, दोनों को पंजाब से जमीन मिली थी और दोनों यमुना की व्यवस्था में शामिल हैं. पंजाब, जो मूल राज्य था, उस व्यवस्था से बाहर है और उससे कहा जाता है कि अब नदी उसकी सीमा को छूती ही नहीं है.
दो उत्तराधिकारी, दो सीटें
इस तरह की व्यवस्था सिर्फ पंजाब में ही नहीं होनी चाहिए. जब 2000 में उत्तर प्रदेश से उत्तरांचल को अलग किया गया, तो केंद्र ने 2001 में अपर यमुना रिवर बोर्ड के गठन में बदलाव करके नए राज्य, जिसे अब उत्तराखंड कहा जाता है, को इसमें शामिल किया. जब 2014 में आंध्र प्रदेश का बंटवारा हुआ, तो संसद ने कृष्णा और गोदावरी रिवर मैनेजमेंट बोर्ड बनाए और आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना दोनों को उनमें जगह दी. केंद्र की स्थापित व्यवस्था यही रही है कि जब किसी राज्य का बंटवारा होता है, तो नदियों से जुड़े अधिकार और उनकी देखरेख करने वाले बोर्डों में सीटें दोनों उत्तराधिकारी राज्यों को मिलती हैं. केवल पंजाब के पुनर्गठन को इसके उलट तरीके से देखा गया है.
क्यूसेक कोई मुद्रा नहीं है
यह मामला क्यूसेक और मिलियन एकड़-फीट का नहीं है. यह न्याय और इस बात से जुड़ा है कि जब राज्यों का बंटवारा या तीन हिस्सों में विभाजन होता है, तो नदी के पानी से जुड़े अधिकारों का बंटवारा किस तरह और कितनी समानता से किया जाता है. पंजाब यमुना के पानी का सिर्फ हिस्सा नहीं चाहता, वह यमुना की व्यवस्था में एक जगह चाहता है.
यमुना-सतलुज लिंक को भी शाब्दिक तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए. यमुना से सतलुज तक कोई नहर खोदने की जरूरत नहीं है. अगर कभी पंजाब के यमुना के हिस्से की गणना की जाती है, तो इसे कागज पर तय किया जा सकता है: भाखड़ा मेन लाइन के जरिए हरियाणा को मिलने वाले पानी में से पंजाब का हिस्सा घटा दिया जाए और हरियाणा को उतनी ही मात्रा यमुना से लेने दी जाए, जिस पर उसका पहले से अधिकार है. यह सिर्फ कागज पर हिसाब बदलना है, बुलडोजर चलाना नहीं.
पंजाब को इस बात से कोई आपत्ति नहीं है कि किशाऊ से दिल्ली या राजस्थान को पीने का पानी मिलेगा और शाहपुर कंडी में उसने दिखाया भी है कि जब उसे पक्ष के रूप में शामिल किया जाता है, तो वह समझौता करता है. मंगलवार को किशाऊ बांध समझौते पर हस्ताक्षर के दौरान अमित शाह ने माना कि जब पहली बार यमुना के पानी का बंटवारा किया गया था, तब पर्यावरण के लिए जरूरी पानी की मात्रा की गणना नहीं की गई थी, जिससे नदी के लिए कुछ भी नहीं बचा. इस बात का मतलब है कि 1994 के पानी के बंटवारे की दोबारा समीक्षा करनी होगी. जब ऐसा होगा, तो पंजाब को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए.
मैंने एक आम नागरिक के तौर पर केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल को पत्र लिखकर किशाऊ को केंद्रीय मंत्रिमंडल के सामने रखने से पहले तीन चीजें करने की मांग की है: कैबिनेट नोट में पंजाब को बाहर रखने और इसके आधार को दर्ज किया जाए. पंजाब को अपर यमुना रिवर बोर्ड का पूर्ण सदस्य बनाया जाए. और जब भी 1994 के पानी के बंटवारे की समीक्षा हो, तब पंजाब की बात सुनी जाए. हालांकि, औपचारिक दावा सिर्फ राज्य सरकार ही कर सकती है और चंडीगढ़ को ऐसा दावा करना चाहिए.
केंद्र का जवाब दोनों तरफ असर डालेगा. अगर उत्तराधिकारी राज्यों को उन नदी बेसिनों में अपना अधिकार बनाए रखने दिया जाता है, जिन्हें वे पहले साझा करते थे, तो पंजाब को अपर यमुना रिवर बोर्ड में जगह मिलनी चाहिए. अगर सिर्फ मौजूदा भौगोलिक स्थिति ही फैसला करती है, तो रावी-ब्यास व्यवस्था पर हरियाणा की मौजूदा या भविष्य की मांगों का भी कोई आधार नहीं रहेगा. इसमें उन पश्चिमी नदियों के पानी की मांग भी शामिल है, जिन्हें अब रावी-ब्यास व्यवस्था में लाए जाने की उम्मीद है, क्योंकि सिंधु जल संधि को फिलहाल रोक दिया गया है. यह नियम दोनों उत्तराधिकारी राज्यों पर लागू होना चाहिए.
अमित शाह ने 10 विवादों की गिनती की है. 11वां विवाद सूची में शामिल होने के लिए 60 साल से इंतजार कर रहा है और किशाऊ का कैबिनेट नोट उसे सूची में शामिल करने की जगह है.
केबीएस सिद्धू एक पूर्व IAS अधिकारी हैं जो पंजाब के स्पेशल चीफ सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए. वे @kbssidhu1961 पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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