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Monday, 19 October, 2026
होममत-विमत7.8% GDP ग्रोथ आलोचकों के लिए बड़ा झटका, यह भारत की अंदरूनी आर्थिक ताकत दिखाती है

7.8% GDP ग्रोथ आलोचकों के लिए बड़ा झटका, यह भारत की अंदरूनी आर्थिक ताकत दिखाती है

महंगाई से ज्यादा तेज़ी से उत्पादन और आर्थिक मूल्य बढ़ा, इससे साबित होता है कि देश की आर्थिक रफ्तार मजबूत बुनियाद पर टिकी है.

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हाल ही में हमने भगवान कृष्ण के जन्म का त्योहार मनाया. ऐसे में श्रीमद्भागवत का यह श्लोक याद आता है:

manāṁsy āsan prasannāni sādhūnām asura-druhām,

jāyamāne ’jane tasmin nedur dundubhayaḥ samam

“जब अजन्मे भगवान का धरती पर जन्म हुआ, तब सभी संत लोगों के मन गहरी शांति और खुशी से भर गए. वहीं बुरे लोगों की वजह से पैदा हुई चिंता धीरे-धीरे खत्म होने लगी और स्वर्ग में भाग्य के ब्रह्मांडीय नगाड़े अपने आप बज उठे.”

राजनीतिक नेतृत्व आता-जाता रहता है, लेकिन जब 1.3 अरब लोगों वाले देश के लिए बनाई गई कोई सोच जमीन पर काम में बदलती है, तो पूरे देश की उम्मीदों को पूरा करने और उन्हें लागू करने के लिए हर तरह की बयानबाजी और राजनीतिक ड्रामे से ऊपर उठकर मजबूत इरादे की जरूरत होती है. हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने एक बार फिर अपनी ताकत और किए गए वादों को पूरा करने की क्षमता साबित की है.

आज हम बहुत बड़ी संभावनाओं के एक नए दौर के सामने खड़े हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत की GDP 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है.

7.8 प्रतिशत को समझना

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने 31 अगस्त को आंकड़े जारी किए. इसमें बताया गया कि अप्रैल से जून 2026 की तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी 7.8 प्रतिशत बढ़ी. पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 6.8 प्रतिशत था.

2022-203 को आधार वर्ष मानते हुए, वास्तविक GDP 81.36 लाख करोड़ रुपये रही, जो पिछले साल 75.46 लाख करोड़ रुपये थी. अगर मौजूदा कीमतों के हिसाब से देखें, तो नॉमिनल GDP में 10.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह 88.27 लाख करोड़ रुपये हो गई, जबकि पिछले साल यह 80 लाख करोड़ रुपये थी. वास्तविक ग्रॉस वैल्यू भी बढ़कर 73.82 लाख करोड़ रुपये हो गई, यानी इसमें 8.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. वहीं, नॉमिनल GVA 11.5 प्रतिशत बढ़कर 80.53 लाख करोड़ रुपये हो गया.

अर्थशास्त्री जिन मुश्किल शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें आसान तरीके से समझा जा सकता है. हमें वास्तविक GDP, नॉमिनल GDP और GVA के बीच अंतर समझना होगा. वास्तविक GDP आर्थिक विकास को मापने का सबसे उपयोगी तरीका है, क्योंकि इसमें बढ़ती कीमतों का असर हटा दिया जाता है. इसलिए जब वास्तविक GDP 75.46 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 81.36 लाख करोड़ रुपये हुई, तो इसका मतलब है कि भारत ने एक साल पहले की तुलना में वास्तव में ज्यादा सामान और सेवाएं तैयार कीं. यह बढ़ोतरी सिर्फ महंगाई की वजह से नहीं हुई. इससे हमें 7.8 प्रतिशत की वास्तविक GDP ग्रोथ का आंकड़ा मिलता है. दूसरी ओर, नॉमिनल GDP अर्थव्यवस्था को उस समय की मौजूदा कीमतों के आधार पर मापती है. इसमें उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ लागत बढ़ने का असर भी शामिल होता है. इसलिए नॉमिनल GDP तेजी से 10.3 प्रतिशत बढ़ी और 88.27 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई.

हालांकि, ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) थोड़ा अलग आंकड़ा है. इसमें भारत के कारोबार और आर्थिक क्षेत्रों द्वारा वास्तव में बनाई गई वैल्यू को देखा जाता है. उदाहरण के लिए, जब कोई फैक्ट्री कच्चे माल को तैयार सामान में बदलती है, तो इस प्रक्रिया में जो अतिरिक्त वैल्यू बनती है, उसे देखा जाता है. इसलिए वास्तविक GVA यह बताता है कि कीमतों के असर को हटाने के बाद अर्थव्यवस्था ने वास्तव में कितनी ज्यादा वैल्यू बनाई. यह 8.2 प्रतिशत बढ़कर 73.82 लाख करोड़ रुपये हो गया. वहीं, नॉमिनल GVA 11.5 प्रतिशत बढ़कर 80.53 लाख करोड़ रुपये हो गया, क्योंकि इसमें ज्यादा कीमतों का असर भी शामिल है.

सीधे शब्दों में कहें तो सबसे जरूरी बात यह है कि भारत की ग्रोथ वास्तविक है. देश ज्यादा सामान बना रहा है और ज्यादा आर्थिक वैल्यू पैदा कर रहा है. ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं है कि कीमतें बढ़ने से GDP बढ़ गई है.

रुकावटों का क्या?

इन आंकड़ों का खुद अपनी कहानी बताना काफी अच्छी बात है, खासकर मौजूदा भू-राजनीतिक माहौल को देखते हुए. दो ऐसे युद्ध, जिनसे हमारा सीधा कोई लेना-देना नहीं है—अमेरिका-ईरान युद्ध और रूस-यूक्रेन युद्ध, ने ऊर्जा बाजार में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव पैदा किया है.

फिर भी, सप्लाई चेन में रुकावटों और ग्लोबल ट्रेड में बढ़ती अनिश्चितता के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रही है. इसमें अमेरिका के टैरिफ का असर भी शामिल है. राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अक्सर भारत पर टैरिफ लगाने की धमकी देते हैं और इन धमकियों का भारतीय बाजार पर पड़ने वाला संभावित असर भी एक चिंता है.

लेकिन भारत की ग्रोथ को एक और चीज़ से मदद मिली है: उसके अपने लोगों की बड़ी संख्या. भारत का घरेलू बाज़ार बहुत बड़ा है. हमने देखा कि निजी खपत 7.1 प्रतिशत बढ़ी, जबकि निवेश में 11.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. इन चीजों ने विदेशों से आने वाली कुछ अनिश्चितताओं के असर को कम करने में मदद की. दूसरी ओर, मैन्युफैक्चरिंग 9.2 प्रतिशत बढ़ी और सर्विसेज करीब 10 प्रतिशत बढ़ीं. इससे पता चलता है कि ग्रोथ पूरी तरह एक्सपोर्ट पर निर्भर नहीं थी.

इसी समय, भारत की अपनी ग्रोथ उम्मीद से ज्यादा मजबूत साबित हुई. तिमाही में वास्तविक आधार पर इसमें करीब 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. इसमें एक्सपोर्ट के बाज़ारों और प्रोडक्ट्स में विविधता लाने से मदद मिली. आसान भाषा में कहें तो भारत दुनिया में आए झटकों से पूरी तरह बचा नहीं था, लेकिन वह इन झटकों को सहने में सफल रहा.

मजबूत घरेलू मांग, सरकार का पूंजीगत खर्च, निजी निवेश में सुधार और भारतीय उपभोक्ता बाज़ार का बहुत बड़ा आकार—इन सभी ने उस समय सहारा दिया, जब बाहरी परिस्थितियां मुश्किल हो गई थीं. शायद 7.8 प्रतिशत के आंकड़े की सबसे अच्छी बात यही है. यह साफ तौर पर साबित करता है कि भारत की ग्रोथ अब अपनी अंदरूनी आर्थिक ताकत से ज्यादा चल रही है, न कि पूरी तरह अच्छे वैश्विक माहौल पर निर्भर है.

आलोचक क्या कहते हैं

पूर्व वित्त मंत्रालय के नौकरशाह सुभाष चंद्र गर्ग का मानना है कि ग्रोथ ज्यादा इसलिए दिख रही है क्योंकि सरकार ने आधार वर्ष बदल दिया है, जिस पर तुलना की जाती थी. वित्त मंत्रालय के एक दूसरे अधिकारी गर्ग ने इस दलील का जवाब दिया, लेकिन उनके जवाब को उतनी चर्चा नहीं मिली.

वरिष्ठ अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने बिल्कुल अलग और विरोधी रुख अपनाया. उन्होंने सवाल उठाया कि GDP ग्रोथ के इतने मजबूत आंकड़े ज्यादा नौकरियां पैदा करने, घरेलू निवेश बढ़ाने या विदेशी पोर्टफोलियो निवेश बढ़ने के रूप में क्यों नहीं दिख रहे हैं. इस विवाद को आसान तरीके से एक जैसी इकाइयों का इस्तेमाल करके खत्म किया जा सकता था, जैसे मीटर की तुलना मीटर से या किलोमीटर की तुलना किलोमीटर से की जाए, लेकिन इसे लगातार बढ़ने दिया गया, क्योंकि यह सिर्फ आंकड़ों या सांख्यिकी की बात नहीं है. पूरी बहस बेवजह की बहस बन गई है, क्योंकि चिंता अर्थव्यवस्था या GDP को लेकर नहीं है, बल्कि विपक्ष द्वारा एक राजनीतिक कहानी बनाने को लेकर है, जिसमें वह एक असफल अर्थव्यवस्था दिखाना चाहता है.

भारतीय अर्थव्यवस्था असफल अर्थव्यवस्था बिल्कुल नहीं है. यह चुनौतियों के बावजूद सिर्फ बची नहीं हुई है, बल्कि तेजी से आगे भी बढ़ रही है.

हालांकि, रोम एक दिन में नहीं बना था.

और यह मान लेना कि सरकार सकारात्मक आर्थिक तस्वीर दिखाने के लिए आंकड़ों में हेराफेरी कर रही है, बिल्कुल बेतुकी बात है. ये आंकड़े समय-समय पर सार्वजनिक किए जाते हैं और दुनिया भर के हर तरह के सख्त नज़र रखने वाले लोग इन पर नजर रखते हैं. यह डेटा किसी भी तरह के प्रभाव से स्वतंत्र है.

जेपी मॉर्गन के चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट साजिद चिनॉय ने इंडिया टुडे से कहा: “लेकिन सवाल यह था कि क्या भारत इस रिकवरी को मध्य पूर्व की घटनाओं के असर से बचा सकता था, और यहीं सरकार बहुत ज्यादा श्रेय की हकदार है.”

चिनॉय ने कहा कि भारत की “साइक्लिकल ग्रोथ रिकवरी” पिछले छह महीनों में साफ दिखाई दी है. इसकी वजह शायद राजकोषीय प्रोत्साहन, पिछले फरवरी में प्रत्यक्ष करों में कटौती और ब्याज दरों में कमी हो सकती है.

भारत के लिए विश्व बैंक में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा ने भी सरकार के रुख का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि नई GDP ने “डेटा को साफ करने और तरीके में काफी सुधार करने” के कारण अनुमानों की विश्वसनीयता बढ़ाई है.

मुझे निश्चित रूप से विश्व बैंक की एक रिपोर्ट याद आती है, जिसमें डेटा को संभालने के पहले के तरीके पर सवाल उठाया गया था. अब वही संस्था इसकी तारीफ कर रही है, जबकि दूसरे आलोचक अब भी ऐसी बात पर जोर दे रहे हैं, जो सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध जानकारी की पारदर्शिता और जवाबदेही पर आधारित है.

दो दिन पहले मोदी 13 साल बाद डीयू के SRCC गए. शिक्षक दिवस पर भाषण देते हुए प्रधानमंत्री ने वही प्रतिबद्धता दोहराई, जो उन्होंने 2013 में भी जताई थी. यह तेज गति, बड़े स्तर और कौशल के जरिए अच्छे शासन का संदेश है. GDP के आंकड़े भी इसी कड़ी की ओर इशारा करते हैं, जो प्रतिबद्धता को काम से जोड़ती है.

मुझे एक पुराना गाना याद आता है, “कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना, इन बेकार की बातों में कहीं बीत न जाए रैना.”

इसका मतलब यह है कि आलोचक जो कहना चाहते हैं, कहने दें. आपका ध्यान काम, प्रदर्शन और उसे सही तरीके से पूरा करने पर होना चाहिए; इसी तरह काम करते रहें और इसके बारे में लोगों को बताते भी रहें.

मीनाक्षी लेखी बीजेपी की नेता और वकील हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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