हाल ही में हैदराबाद में दिए गए एक भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीयों से घर से काम करने, सोना खरीदने में देरी करने और गैर-ज़रूरी विदेश यात्राओं से बचने की अपील की.
कुछ लोगों ने इन सुझावों को सिर्फ प्रतीकात्मक माना, जबकि कुछ ने इन्हें अव्यावहारिक बताया, लेकिन अगर इसके पीछे के आंकड़ों को ध्यान से देखें, तो यह भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति की गंभीरता को लेकर एक रणनीतिक संदेश दिखाई देता है.
इस अपील की वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में पैदा हुआ संकट है. यह ईरान और ओमान के बीच का एक अहम समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की सप्लाई गुज़रती है.
इस बाधा की वजह से इस हफ्ते ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 107 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई, जबकि पिछले महीने यह 126 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर चली गई थी.
ब्रेंट क्रूड दुनिया में तेल की कीमत तय करने का प्रमुख मानक है. इससे पेट्रोल से लेकर प्लास्टिक तक कई चीज़ों की कीमत प्रभावित होती है. कई देशों के लिए ब्रेंट की कीमत बढ़ना सिर्फ एक बड़ी परेशानी हो सकती है, लेकिन भारत के लिए यह उसकी आर्थिक कमज़ोरी को उजागर करता है. भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है. इसमें से 40 से 50 प्रतिशत तेल ऐतिहासिक रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के रास्ते आता रहा है.
अनुमान है कि ब्रेंट की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी भारत के चालू खाता घाटे को जीडीपी के लगभग 0.3 से 0.5 प्रतिशत तक बढ़ा देती है. इससे हर साल आयात पर अरबों डॉलर का अतिरिक्त खर्च बढ़ जाता है. चालू खाता घाटा यानी किसी देश की दुनिया से होने वाली कमाई और खर्च के बीच का अंतर. यह किसी भी अर्थव्यवस्था की मजबूती का अहम संकेत माना जाता है.
कुछ ही महीनों में ब्रेंट की कीमत करीब 60 डॉलर से बढ़कर 120 डॉलर से ऊपर पहुंचने की वजह से यह घाटा तेज़ी से बढ़ रहा है.
3 अपील, 3 चीज़ें
मोदी की तीनों अपीलें सीधे भारत के आयात बिल की खास चीज़ों से जुड़ी हैं. सबसे बड़ी चिंता तेल को लेकर है. भारत हर साल कच्चे तेल और पेट्रोलियम आयात पर अरबों डॉलर खर्च करता है. यह देश के कुल आयात बिल का लगभग 22 प्रतिशत है.
घर से काम करने, कारपूल करने और पब्लिक ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल करने की अपील करके मोदी महामारी को आदर्श नहीं बता रहे हैं. असल में वह लोगों से ऐसे कदम उठाने को कह रहे हैं, जिन्हें मौद्रिक नीति जल्दी हासिल नहीं कर सकती. यानी घर-घर में पेट्रोल और डीजल की मांग थोड़ी भी कम हो जाए, तो रुपये और व्यापार घाटे पर दबाव कम किया जा सकता है.
दूसरी बड़ी चिंता सोने को लेकर है. अप्रैल में भारत का सोना आयात 24 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि पिछले साल यह 58 अरब डॉलर था. भारत अपनी ज़रूरत का करीब 85 प्रतिशत सोना आयात करता है. इसी वजह से यह दुनिया के सबसे ज्यादा सोना आयात करने वाले देशों में शामिल है.
आयातित सोने पर खर्च किया गया हर रुपया देश की अर्थव्यवस्था से बाहर चला जाता है, जिससे चालू खाता घाटे पर दबाव बढ़ता है. जब तेल आयात की वजह से चालू खाता घाटा पहले से दबाव में है, तब मोदी की अपील व्यावहारिक मानी जा रही है. उन्होंने हमेशा के लिए सोना छोड़ने को नहीं कहा, बल्कि आर्थिक स्थिति सामान्य होने तक एक साल के लिए सोना खरीदने में रुकने की बात कही है.
तीसरा बड़ा आर्थिक खर्च विदेश यात्रा है.
जब भारतीय लोग घूमने के लिए विदेश जाते हैं, तो वे डॉलर, यूरो और दिरहम जैसी विदेशी मुद्रा खर्च करते हैं. कुल मिलाकर इससे भी चालू खाते पर दबाव बढ़ता है. मोदी की अपील सीमित समय के लिए और खास उद्देश्य के साथ है. इसे जीवनशैली की आलोचना नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था को सहारा देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
PM मोदी की अपील से भारतीयों को क्या समझना चाहिए?
पहली बात, इसे घबराने वाली स्थिति नहीं समझना चाहिए.
भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा सुरक्षा कवच है. इसमें डॉलर, सोना और दूसरी संपत्तियां शामिल हैं, जिन्हें भारतीय रिजर्व बैंक रुपये को संभालने और आयात के भुगतान के लिए रखता है. विदेशों में रहने वाले भारतीयों से आने वाला पैसा भी इस सुरक्षा को मजबूत करता है. साथ ही सरकार ने पहले ही होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम करने के लिए दूसरे रास्तों से तेल खरीद बढ़ाई है.
यानी संस्थागत व्यवस्था अभी मजबूत है.
दूसरी बात, प्रधानमंत्री का संदेश आने वाली आर्थिक नीतियों की शुरुआती चेतावनी माना जा सकता है. आगे चलकर सरकार आयात शुल्क में बदलाव, ईंधन की कीमतों में संशोधन और घरेलू विकल्पों को बढ़ावा देने जैसे कड़े कदम उठा सकती है.
तीसरी बात, लोगों को अपनी निजी आर्थिक स्थिति का आकलन करना चाहिए. 2026 की शुरुआत में देश में सोने की कीमत 1,50,000 रुपये प्रति 10 ग्राम से ऊपर पहुंच गई थी. ऐसे में नई खरीद के लिए यह शायद सही समय नहीं माना जा रहा. सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड और गोल्ड ETF ऐसे विकल्प हैं, जिनमें बिना फिजिकल गोल्ड आयात किए सोने जैसी सुरक्षा मिल सकती है और विदेशी मुद्रा पर असर भी कम पड़ता है.
शेयर बाज़ार में निवेश करने वालों के लिए पिछले एक साल में रुपये का डॉलर के मुकाबले करीब 84 से 95 तक गिरना भी एक संकेत है. आईटी सेवाएं या फार्मा जैसी कंपनियां, जो विदेशी मुद्रा में कमाई करती हैं, रुपये के कमजोर होने पर फायदा उठाती हैं, क्योंकि उनकी डॉलर में कमाई भारत में ज्यादा रुपये में बदल जाती है.
हालांकि, इसका एक दूसरा पक्ष भी है.
भारत के लाखों परिवारों के लिए सोना कोई लग्जरी नहीं, बल्कि बचत, ज़रूरत के समय गिरवी रखने का साधन और सुरक्षा का जरिया है.
लोगों से सोना न खरीदने को कहना, एक तरह से उन्हें कमजोर होते रुपये के जोखिम के साथ रहने को कहना है, जबकि कोई साफ वैकल्पिक सुरक्षित निवेश विकल्प अभी व्यापक रूप से मौजूद नहीं है. सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड कुछ मदद जरूर करते हैं, लेकिन अभी उनका इस्तेमाल सीमित है. इसी तरह घर से काम करने का विकल्प भी भारत के ज्यादातर कामगारों के पास नहीं है.
इसलिए मोदी की अपील, चाहे कितनी भी अच्छी मंशा से की गई हो, अलग-अलग आय वर्ग के लोगों पर अलग असर डालती है.
अर्थशास्त्री सिर्फ यह नहीं देखते कि नीति कुल मिलाकर सही है या नहीं, बल्कि यह भी देखते हैं कि इसकी कीमत आखिर किसे चुकानी पड़ेगी. आखिर में, मोदी की यह अपील कोई आदेश नहीं, बल्कि लोगों को अपनी अर्थव्यवस्था को समझने और उसी हिसाब से व्यवहार करने का निमंत्रण है.
आंकड़े बताते हैं कि यह कोई गलत सलाह नहीं है.
बिदिशा भट्टाचार्य चिंतन रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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