भ्रष्टाचार नाम का यह कई सिरों वाला राक्षस पूरे देश में फैल चुका है. सार्वजनिक जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो जिस पर भ्रष्टाचार की काली छाया न पड़ी हो. पिछले कुछ वर्षों में भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया है कि अब लोग इसे सामान्य बात मानने लगे हैं. लोग अब इसे शर्म या निंदा की चीज़ नहीं समझते. वे इसे सरकारी कामकाज का एक अलग न होने वाला हिस्सा मानने लगे हैं.
बेईमान अधिकारी जनता से बहुत बड़ी रकम हड़प रहे हैं. गैर-कानूनी रिश्वत लेने की कला को उन्होंने बहुत चालाकी से एक हुनर बना दिया है. सरकारी काम में जान-बूझकर देरी करना इतना आम हो गया है कि जो भी व्यक्ति अपना अधिकार मांगना चाहता है या किसी समस्या का समाधान चाहता है, उसे ऊंचे पदों पर बैठे लोगों की जेब गर्म करनी पड़ती है. कानूनों और सरकारी आदेशों में तय की गई अनगिनत औपचारिकताएं काम में देरी की पूरी गुंजाइश देती हैं, और इसी वजह से रिश्वत मांगने के मौके पैदा होते हैं. चाहे व्यापारी हों या कारखानदार—भ्रष्टाचार का बोझ आखिर में जनता पर ही डाल दिया जाता है. बड़े अधिकारी अपने अधीन कर्मचारियों के भ्रष्टाचार को इसलिए नज़रअंदाज़ कर देते हैं क्योंकि वे खुद भी नहीं चाहते कि उनकी संपत्ति या खर्च की जांच हो. यह सबको दिखता है कि कई अधिकारी अपनी तनख्वाह और सुविधाओं से कहीं ज़्यादा शानो-शौकत से रहते हैं.
अगर भ्रष्टाचार की इस बुराई को कम करना है, या पूरी तरह मिटाना है, तो सबसे ज़रूरी है कि जो सबसे ऊंचा प्रशासनिक समूह मंत्रियों को नियंत्रित करता है, वह खुद पूरी तरह भ्रष्टाचार से मुक्त हो. दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है. उड़ीसा, केरल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, आंध्र और दूसरे राज्यों में सत्ताधारी दल के सदस्यों ने अपने ही मंत्रियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं. मंत्रियों के विवादित कामों की न्यायिक जांच की मांग ज़ोर-शोर से उठ रही है. पंजाब में तो कांग्रेस के एक वरिष्ठ विधायक ने हाल ही में सौ पन्नों की चार्जशीट तैयार की है, जिसमें रिश्वत, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और गलत प्रशासन के गंभीर आरोप लगाए गए हैं.
अगर मंत्री निजी फायदा उठाने या अपनी राजनीतिक ताकत मजबूत करने के लिए भ्रष्टाचार करते हैं, तो वे लोकतंत्र के लिए कब्र खोदने का काम करते हैं. किसी भी देश में लोकतंत्र को खत्म करने का सबसे आसान तरीका है उसे भ्रष्टाचार के गंदे पानी से सींचना. जब कोई राजनीतिक दल बहुत लंबे समय तक सत्ता में बना रहता है, तो उसका भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद में स्वार्थ जुड़ जाता है. सत्ता का स्वाद चखने के बाद वह हर हालत में अपना प्रभुत्व बनाए रखना चाहता है, यहाँ तक कि जनता के पैसों से मतदाताओं को प्रभावित करने तक की कोशिश करता है.
हमारे देश में भ्रष्टाचार को जितनी बढ़ावा एक अत्यधिक नियंत्रित अर्थव्यवस्था ने दिया है, उतना किसी और चीज़ ने नहीं. अव्यवहारिक कर-व्यवस्था और महंगाई के साथ ऐसी व्यवस्था ने सरकारी अधिकारियों को बहुत ज़्यादा ताकत दे दी है. उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, आवश्यक वस्तु अधिनियम, विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, कंपनी अधिनियम, बैंकिंग कंपनी अधिनियम, निर्यात-आयात नियंत्रण अधिनियम और ऐसे ही सैकड़ों कानूनों और उनके नीचे बने हजारों नियमों के कारण सरकारी कर्मचारियों को इतनी शक्ति मिल गई है कि कई बार वे उसका इस्तेमाल अपने निजी लाभ के लिए करते हैं.
ऐसी सख्त नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था ने एक परजीवी और भ्रष्ट वर्ग पैदा कर दिया है—ऐसे लोग जो पैसे लेकर अपने ग्राहकों के लिए अधिकारियों से काम निकलवाते हैं या उनके खिलाफ कार्रवाई रुकवाते हैं. इसका एक तय “रेट” भी होता है. यह व्यवस्था न सिर्फ उत्पादन और आर्थिक विकास को रोकती है, बल्कि बहुत बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार भी पैदा करती है.
सरकार का अपनी योजनाओं के लिए महंगाई बढ़ाने वाले तरीकों पर निर्भर रहना भी भ्रष्टाचार को बढ़ाता है. इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां मुद्रा का मूल्य गिरने से लोगों का चरित्र और नैतिकता भी गिर गई. जब लोगों की मेहनत की कमाई की कीमत घटती है और आर्थिक अस्थिरता बढ़ती है, तो समाज की नैतिकता कमजोर पड़ती है और लोग गलत रास्ते अपनाने लगते हैं. महंगाई भ्रष्टाचार का सबसे आम बहाना बन जाती है. जब रुपये की कीमत गिरती है और चीज़ों के दाम लगातार बढ़ते हैं, तो सरकारी कर्मचारी कहते हैं कि अपनी घटती आय को पूरा करने के लिए उन्हें रिश्वत लेनी पड़ती है. ऐसी अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि लोगों की अंतरात्मा कमजोर पड़ जाती है और वे भ्रष्टाचार को जीवन का सामान्य तरीका मानने लगते हैं.
हमारे बीच से भ्रष्टाचार मिटाने का सबसे अच्छा तरीका है उन विचारधाराओं से प्रेरित नीतियों और योजनाओं को खत्म करना जो भ्रष्टाचार के लिए जगह और मौका देती हैं. इंसान जैसा है, वैसा ही रहेगा—अगर सरकारी नीतियां भ्रष्टाचार को जन्म देंगी, तो उसे पकड़ने और खत्म करने वाली व्यवस्था भी खुद भ्रष्ट हो जाएगी. चरित्र के बिना शक्ति एक बहुत बड़ी बुराई है. ऐसे कानून जो इंसान के अच्छे गुणों के बजाय उसकी कमजोरियों को बढ़ावा दें, उन्हें कानून की किताब में जगह नहीं मिलनी चाहिए. जो लोग अपनी स्वतंत्रता से प्रेम करते हैं और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सतर्क रहते हैं, वे नौकरशाही के भ्रष्ट और लालची लोगों के शिकार नहीं बनेंगे.
एक मजबूत विपक्ष और जागरूक, अच्छी जानकारी रखने वाली जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा सहारा है. लोकतंत्र में जनता को उन सभी मामलों की जानकारी पाने का अधिकार है जो उन्हें प्रभावित करते हैं. अगर सरकार जरूरी मामलों में गोपनीयता अपनाती है, तो वह भ्रष्टाचार और अधिकारियों की मनमानी के लिए रास्ता खोल देती है. मंत्री, जो प्रशासन के सबसे ऊंचे अधिकारी होते हैं, उन्हें बिना डर और बिना पक्षपात के काम करना चाहिए. उन्हें दोहरा मापदंड नहीं अपनाना चाहिए—एक अपने लिए और दूसरा जनता के लिए. ईमानदारी और निष्पक्षता के मामलों में जनता अपने नेताओं के व्यवहार को ही अपनाती है.
अगर भारत के राष्ट्रपति पर संविधान के तहत महाभियोग चल सकता है, तो फिर मंत्रियों को ऐसा विशेष संरक्षण क्यों मिले कि उनके कामों की सार्वजनिक जांच ही न हो सके? अगर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जितना उपदेश जनता को देते हैं उसका दसवां हिस्सा भी अपने मंत्रियों को दें, तो शायद प्रशासन का स्तर बेहतर हो सकता है.
1952 का आयोग-ए-जाँच अधिनियम केंद्र और राज्य सरकारों को यह अधिकार देता है कि वे सार्वजनिक महत्व के किसी निश्चित मामले की जाँच के लिए आयोग नियुक्त कर सकें. अगर लोकसभा या किसी राज्य की विधानसभा इस संबंध में प्रस्ताव पास करे, तो सरकार के लिए ऐसा आयोग बनाना अनिवार्य हो जाता है. मौजूदा स्थिति में इस कानून का और ज़्यादा इस्तेमाल होना चाहिए. क्योंकि अक्सर शिकायत मिलती है कि सत्ता में बैठे लोग जांच दबा देते हैं या राजनीतिक कारणों से दोषियों को बचा लेते हैं, इसलिए इस कानून में बदलाव होना चाहिए ताकि राष्ट्रपति, जो दलों से ऊपर होते हैं, अपने विवेक से आयोग के सदस्यों की नियुक्ति कर सकें. राष्ट्रपति को यह अधिकार भी होना चाहिए कि वे केंद्र और राज्यों में ईमानदार और सम्मानित नागरिकों की निगरानी समितियाँ बनाएँ. मंत्रियों और बड़े अधिकारियों को अपने पद संभालते समय और उसके बाद हर साल अपनी संपत्ति का विवरण इन समितियों को देना चाहिए. अगर समिति को पहली नज़र में जाँच की जरूरत लगे, तो वह राष्ट्रपति को कार्रवाई की सिफारिश करे. ऐसी समितियों का होना ही सत्ता में बैठे लोगों की गलत प्रवृत्तियों पर रोक लगाने का काम करेगा.
मंत्रियों के लिए एक सार्वजनिक आचार-संहिता होनी चाहिए. उसके उल्लंघन के मामलों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए. निष्पक्ष जांच के बाद दोषी पाए जाने वालों से इस्तीफा मांगा जाना चाहिए. प्रशासनिक सेवाओं में ईमानदारी और कार्यकुशलता बनाए रखने के लिए उन विधायकों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए जो सरकारी कर्मचारियों पर पीछे के रास्ते से दबाव डालते हैं. भ्रष्टाचार का मतलब सिर्फ रिश्वत लेना, मांगना या देना नहीं होना चाहिए. “भ्रष्ट आचरण” की परिभाषा इतनी व्यापक होनी चाहिए कि उसके हर रूप को उसमें शामिल किया जा सके. जो राजनेता भ्रष्टाचार के दोषी पाए जाएं, उनसे कुछ वर्षों के लिए उनके राजनीतिक अधिकार छीन लिए जाने चाहिए. अगर सरकार सच में भ्रष्टाचार खत्म करना चाहती है, तो उसके पास ऐसा करने के लिए पहले से ही पर्याप्त साधन मौजूद हैं. आखिरकार यह जनता पर निर्भर करता है कि वह ऐसी सरकार चुने जो भ्रष्टाचार के दाग से मुक्त हो.
यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ़्रीडम फ़र्स्ट” किताब से लिया गया है जिसका शीर्षक “भ्रष्टाचार: कारण और इलाज” था जो अगस्त 1963 में प्रकाशित हुई थी. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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