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Saturday, 30 May, 2026
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TMC का पतन BJP को सूट नहीं करता, क्योंकि बंगाल में लेफ्ट फिर से मौका तलाश रहा है

फाल्टा उपचुनाव के नतीजों ने वामपंथ को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है. BJP उम्मीदवार देबांग्शु पांडा के बाद, CPM समर्थित उम्मीदवार शंभू नाथ कुर्मी दूसरे स्थान पर रहे. TMC चौथे स्थान पर रही.

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मई 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजे उन लोगों के लिए बड़ा झटका हैं जो गुप्त ‘मोदी-दीदी सेटिंग’ वाली थ्योरी पर भरोसा करते थे.

इस थ्योरी को मानने वालों का कहना था कि बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में सिर्फ दिखावे की लड़ाई लड़ी और वह कभी भी ममता बनर्जी की अगुआई वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार को हटाने को लेकर गंभीर नहीं थी. यह बातें सिर्फ मोहल्ले की चाय की दुकानों पर ही नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति पर लिखे बड़े लेखों में भी कही जाती थीं.

लेकिन बीजेपी ने टीएमसी को 207-80 के बड़े अंतर से हराकर इस “सेटिंग” वाली थ्योरी को गलत साबित कर दिया. हालांकि दिलचस्प बात यह है कि इतनी बड़ी हार के बाद भी बीजेपी शायद नहीं चाहती कि टीएमसी पूरी तरह टूट जाए, जबकि उसके कई चुने हुए नेता बीजेपी में शामिल होना चाहते हैं.

अगर टीएमसी पूरी तरह बिखर जाती है, तो इससे वामपंथी दलों की वापसी हो सकती है. इसका मतलब होगा उस विचारधारा का फिर से मुख्यधारा में आना, जिसके खिलाफ बीजेपी और संघ परिवार दशकों से लगातार लड़ते रहे हैं.

क्या टूटना तय है?

एक समय बेहद मजबूत मानी जाने वाली टीएमसी अब बीजेपी से विधानसभा चुनाव हारने के बाद अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है. बीजेपी सांसद सौमित्र खान ने प्रेस से कहा कि टीएमसी के करीब 50 विधायक और 20 सांसद नाराज हैं और अगर केंद्रीय नेतृत्व मंजूरी दे दे, तो वे बीजेपी में शामिल होने के लिए तैयार हैं.

खान ने कहा कि अगर बीजेपी नेतृत्व इन नेताओं को पार्टी में शामिल कर लेता है, तो टीएमसी एक राजनीतिक ताकत के रूप में खत्म हो जाएगी.

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में कहा गया कि पश्चिम बंगाल की अलग-अलग नगरपालिकाओं के करीब 100 टीएमसी पार्षदों ने पिछले कुछ दिनों में इस्तीफा दे दिया है. इस राजनीतिक हलचल ने बीजेपी के लिए उन नगर निकायों में अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका खोल दिया है, जो अब तक ज्यादातर टीएमसी के नियंत्रण में थे.

इस समय टीएमसी नेताओं के बीच यह होड़ लगी है कि बीजेपी में सबसे पहले कौन शामिल होगा.

राजनीतिक मामलों के टिप्पणीकार और कलकत्ता हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील जॉयदीप सेन ने द प्रिंट से कहा. “टीएमसी कभी एक सही राजनीतिक पार्टी नहीं बन पाई क्योंकि उसकी अपनी कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है. ममता बनर्जी ने कांग्रेस का विरोध किया और अलग होकर टीएमसी बनाई. फिर उन्होंने खुद को और अपनी नई पार्टी को हर उस चीज के खिलाफ बताया जो वामपंथी थी. सत्ता में आने के बाद उनकी पार्टी धीरे-धीरे खुद को बीजेपी विरोधी पार्टी के रूप में पेश करने लगी.”

सेन के मुताबिक जो पार्टी खुद किसी चीज के पक्ष में न हो और हर चीज का विरोध करती हो, उसका कभी न कभी टूटना तय है.

जब इतने सारे पार्टी कार्यकर्ता छोड़ने को तैयार हों और दूसरे कोर्ट केस और गिरफ्तारी का सामना कर रहे हों, तो ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह किसी तरह पार्टी को एकजुट बनाए रखें. और विपक्ष की जगह वामपंथियों को न लेने दें.

वामपंथियों की वापसी?

पहली नजर में देखें तो वामपंथी दल टीएमसी के लिए कोई बड़ा चुनौती नहीं दिखते क्योंकि इस साल के चुनाव में टीएमसी ने 80 सीटें जीतीं.

विधानसभा चुनावों में वाम मोर्चा गठबंधन को कुल सिर्फ दो सीटें मिलीं. इनमें एक सीट कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम ने जीती और एक सीट ऑल इंडिया सेक्युलर फ्रंट ने जीती. यह उस स्थिति के बाद आया जब वाम मोर्चा ने लगातार 2019 लोकसभा चुनाव, 2021 विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीती थी.

लेकिन 24 मई को फाल्टा उपचुनाव के नतीजे ने वामपंथियों को फिर से चर्चा में ला दिया. बीजेपी उम्मीदवार देबांशु पांडा, जिन्होंने एक लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत दर्ज की, उनके बाद सीपीएम समर्थित उम्मीदवार शंभु नाथ कुरमी दूसरे स्थान पर रहे. उन्हें 40,645 वोट मिले. टीएमसी चौथे स्थान पर रही.

एक जी न्यूज रिपोर्ट में कहा गया. “इन आंकड़ों से कई विश्लेषकों का मानना है कि एंटी-टीएमसी वोटरों का एक हिस्सा इस बार वामपंथियों की तरफ गया है.”

कई सालों तक पश्चिम बंगाल की राजनीति बीजेपी बनाम टीएमसी की सीधी लड़ाई में बदल गई थी, जबकि वामपंथी दल लगातार वोट शेयर और सीटें खोते रहे थे. इसी वजह से फाल्टा के नतीजों ने सभी पार्टियों का ध्यान खींचा है.

वेस्ट बंगाल पर नजर रखने वाले और यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स, यूके के ब्रिटिश एकेडमी इंटरनेशनल फेलो अयान गुहा के मुताबिक यह सिर्फ फाल्टा नहीं है, बल्कि विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार भी सीपीएम के लिए एक नया मौका बना सकती है, हालांकि यह थोड़ा विरोधाभासी स्थिति है.

गुहा ने दिप्रिंट से कहा, “पश्चिम बंगाल में 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, इसलिए वहां पहले से ही बीजेपी विरोधी वोटों के लिए एक तैयार स्पेस मौजूद है. इसलिए संरचनात्मक रूप से राज्य में एक बड़ा विपक्षी स्पेस है जो लगभग 40 प्रतिशत के आसपास घूमता रहता है.”

उन्होंने कहा कि जब टीएमसी कमजोर हो रही है और जनता की नाराजगी और छवि संकट का सामना कर रही है, तो विपक्षी स्पेस सीपीएम या सीपीएम-कांग्रेस गठबंधन की तरफ जा सकता है.

उन्होंने कहा. “वैचारिक नजरिए से देखें तो दक्षिणपंथी राजनीति का मुकाबला अक्सर वामपंथी राजनीति से होता है. टीएमसी ने वामपंथी राजनीति को पूरी तरह काम नहीं करने दिया, बल्कि उसके राजनीतिक भाषा, नारों और आंदोलन की शैली को अपने अंदर शामिल कर लिया. साथ ही उसने पहचान आधारित राजनीति को बढ़ावा दिया, जिसे पारंपरिक वामपंथी दल जैसे सीपीएम स्वीकार नहीं कर पाए.”

यह बीजेपी सरकार के लिए आदर्श स्थिति नहीं होगी.

पिछले साल डेली पायनियर में एक कॉलम में लेखक और आरएसएस विचारक रतन शारदा ने लिखा था कि कम्युनिस्टों ने शासन, विज्ञान और तकनीक में भारतीय प्रतिभा के लगभग सभी तत्वों को खत्म किया, जबकि आरएसएस ने उन्हें लगातार उजागर किया, भले ही उसे रूढ़िवादी और पिछड़ा कहा गया हो.

उन्होंने लिखा. “जहां कम्युनिस्टों ने नेहरू के साथ मिलकर हिंदुओं और उनकी आस्थाओं की आलोचना अपमानजनक तरीके से की, वहीं आरएसएस भारतीय सभ्यता के उच्च मूल्यों को मजबूती से बनाए रखता रहा. दोनों संगठनों के सौ साल और मौजूदा स्थिति को देखते हुए भारत के लोगों ने भारत की सच्चाई को समझ लिया है.”

और इन्हीं वैचारिक मतभेदों की वजह से बीजेपी-आरएसएस कभी नहीं चाहेंगे कि वामपंथी फिर से किसी भी तरह की राजनीतिक ताकत के केंद्र में लौटें.

मेरी किताब बंगाल 2021: एन इलेक्शन डायरी के एक इंटरव्यू में बंगाल में काम कर रहे एक वरिष्ठ आरएसएस पदाधिकारी ने कहा था कि तत्काल राजनीतिक प्रतिद्वंदी भले ममता बनर्जी हों, लेकिन असली “दुश्मन” हमेशा वामपंथी ही रहेंगे.

उन्होंने कहा. “टीएमसी का शासन, चाहे उसमें कितनी भी समस्याएं हों, राज्य की संरचना को नुकसान नहीं पहुंचाएगा. लेकिन वामपंथी पूरे देश को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखते हैं.”

दीप हल्दर एक लेखक हैं और दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. वे @deepscribble पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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