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Friday, 14 August, 2026
होमइंडियन लिबरल्स मैटरक्या आज भी प्रासंगिक हैं गांधी? एमआर मसानी ने बताया था कि क्यों दुनिया को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है

क्या आज भी प्रासंगिक हैं गांधी? एमआर मसानी ने बताया था कि क्यों दुनिया को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है

जनवरी 1979 में एम. आर. मसानी ने लिखा था कि गांधीजी सामाजिक सुधार चाहते थे, लेकिन उनका विश्वास केवल संसद में कानून बनाकर समाज बदल देने में नहीं था. वे मानते थे कि कानून लोगों को अच्छा इंसान नहीं बना सकता. कोई भी सरकार केवल कानूनों के बल पर समाज में नैतिकता नहीं ला सकती.

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आज सुबह मौसम कुछ उदास और धुंधला था. तभी एक मित्र ने मुझसे कहा, “देखिए, आज प्रकृति भी रो रही है. गांधीजी की मृत्यु पर नहीं, बल्कि इसलिए कि आज हम सब उनके गुणों के बड़े-बड़े भाषण देंगे और कल फिर उन्हें भूल जाएंगे.” सन् 1969-70 में हमने गांधी जन्मशती वर्ष मनाया था. उसी समय “सीमान्त गांधी” कहे जाने वाले खान अब्दुल गफ्फार खान भारत आए थे. भारत में जो कुछ उन्होंने देखा, उसके बाद उन्होंने कहा, “यह देखकर मुझे बहुत दुःख हुआ कि गांधीजी को कितनी जल्दी भुला दिया गया. जिस देश और जिन लोगों की उन्होंने जीवन भर सेवा की, वही उन्हें इतनी जल्दी भूल बैठे.”

राज्य पूंजीवाद

भारत के प्रसिद्ध अध्येता और उदारवादी चिंतक प्रोफेसर ह्यू टिंकर ने भी लगभग यही बात कही थी कि “यदि गांधीजी सचमुच उतने वर्ष जीवित रहते, जितना वे कभी जीने की आशा करते थे, और 1969 के भारत को देखते, तो वे दुखी अवश्य होते, लेकिन आश्चर्यचकित नहीं. आज भारत में गांधीजी को केवल ऐसे अवसरों पर ही याद किया जाता है. हमें गर्व है कि गांधी जैसा महापुरुष हमारे बीच था, लेकिन यह भी शर्म की बात है कि हमने उनके विचारों और उनके मार्गदर्शन का बहुत कम उपयोग किया.”

फरवरी-मार्च 1977 में जनता पार्टी के चुनाव घोषणापत्र में गांधीजी के विचारों का बार-बार उल्लेख किया गया था. उस समय ऐसा लगा कि गांधीजी फिर से राष्ट्रीय जीवन के केंद्र में लौट आए हैं. लेकिन यदि हम उस घोषणापत्र के बाद की घटनाओं को देखें, तो स्वीकार करना पड़ेगा कि वह केवल एक क्षणिक उत्साह था. धीरे-धीरे जनता पार्टी ने भी गांधीजी के विचारों से मुंह मोड़ लिया और अपने वास्तविक प्रेरणास्रोत कार्ल मार्क्स की ओर लौट गई.

सच तो यह है कि हमने गांधीजी के साथ वैसा व्यवहार भी नहीं किया, जैसा उनके हत्यारे गोडसे के साथ किया. इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या आज गांधी प्रासंगिक हैं? मेरा उत्तर है—हां, गांधी आज पहले से भी अधिक प्रासंगिक हैं. केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में.

गांधी से हमें क्या सीखना चाहिए? गांधीजी की प्रासंगिकता को समझने और उनसे सीखने के दो तरीके हैं. पहला, उनके विचार, उनकी नीतियाँ और उनका जीवन-दर्शन. दूसरा, और शायद उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, वे नैतिक शिक्षाएं और आचरण के सिद्धांत जो उन्होंने हमें दिए. पहले उनके विचारों और जीवन-दर्शन की बात करें.

गांधीजी किसी दूर बैठे, पहले से तय आदर्श समाज (यूटोपिया) में विश्वास नहीं करते थे. उन्हें एक ईसाई भजन की ये पंक्तियां बहुत प्रिय थीं— “दूर के दृश्य मेरे लिए नहीं हैं. मेरे लिए तो एक कदम आगे बढ़ना ही पर्याप्त है.”

सन् 1929 में उन्होंने कहा था, “हम अपने अंतिम लक्ष्य को नहीं जानते. वह हमारी परिभाषाओं से नहीं, बल्कि हमारे कार्यों, चाहे वे स्वेच्छा से किए गए हों या अनजाने में से तय होगा. यदि हम वर्तमान का सही ध्यान रखें, तो भविष्य स्वयं अपना ध्यान रख लेगा.” गांधीजी के पास एक ऐसा मापदंड था, जिसके आधार पर वे हर निर्णय को परखते थे. उनका हृदय सदैव दरिद्र नारायण, अर्थात सबसे गरीब व्यक्ति, के लिए धड़कता था.

एक अद्भुत कसौटी

उन्होंने भारतवासियों को एक ऐसी कसौटी दी, जो आज भी उतनी ही उपयोगी है. उन्होंने कहा— “जब भी तुम्हें किसी निर्णय को लेकर संदेह हो, तब उस सबसे गरीब और सबसे कमजोर व्यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो. फिर सोचो कि जो कदम तुम उठाने जा रहे हो, उससे उस व्यक्ति को क्या लाभ होगा. क्या उससे उसका जीवन बेहतर होगा? क्या उससे उसके व्यक्तित्व और उसकी गरिमा में वृद्धि होगी?” इस प्रकार गांधीजी का हृदय गरीबों के साथ था. लेकिन वे इतने विवेकशील भी थे कि यह समझते थे कि गरीबों की सेवा करने के लिए गलत साधनों का सहारा नहीं लिया जा सकता. इसी कारण वे राज्य समाजवाद के विरोधी थे. उनका मानना था कि सरकार को गरीबों के लिए न्याय दिलाने का मुख्य साधन नहीं बनाया जाना चाहिए. वे कल्याणकारी समाज के पक्षधर थे, लेकिन कल्याणकारी राज्य के नहीं. कई वर्षों बाद जयप्रकाश नारायण ने भी कल्याणकारी राज्य को “धीरे-धीरे फैलने वाला पक्षाघात” कहा था. दोनों में मूल अंतर यह है कि कल्याणकारी राज्य में सरकार गरीबों की ओर से सब कुछ करने लगती है. और फिर वही होता है जो अक्सर होता आया है—सरकार का दायरा बढ़ता जाता है और समाज निर्भर होता जाता है. इसके विपरीत, कल्याणकारी समाज में लोग स्वयं प्रेम, सहयोग और भाईचारे के आधार पर ऐसा समाज बनाते हैं, जहाँ एक-दूसरे की सहायता स्वेच्छा से की जाती है. गांधीजी इसी दूसरे मार्ग के समर्थक थे.

हाल ही में “गांधी टुडे” नामक एक पुस्तक प्रकाशित हुई है. उसमें गांधीजी का यह कथन उद्धृत किया गया है— “यदि राज्य हिंसा के बल पर पूंजीवाद का दमन करेगा, तो वह स्वयं हिंसा के उसी जाल में फँस जाएगा. राज्य संगठित और केंद्रित हिंसा का रूप है. उसका अस्तित्व ही हिंसा पर आधारित है, इसलिए वह उससे कभी मुक्त नहीं हो सकता. इसी कारण मैं ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को अधिक उचित मानता हूँ.” एक अन्य स्थान पर गांधीजी कहते हैं— “मैं व्यक्तिगत रूप से सत्ता का सरकार के हाथों में केंद्रीकरण नहीं, बल्कि समाज में ट्रस्टीशिप की भावना का विस्तार अधिक पसंद करूँगा.”

इस प्रकार गांधीजी समाजवाद, राष्ट्रीयकरण और उससे जुड़ी समूची व्यवस्था के समर्थक नहीं थे. उन्होंने अनेक अवसरों पर स्पष्ट कहा कि निजी संपत्ति और निजी स्वामित्व को समाप्त करके सारी शक्ति सरकार को सौंप देना सामाजिक न्याय का मार्ग नहीं हो सकता. उनका विश्वास था कि ऐसा करने से ऐसी तानाशाही पैदा होगी, जो अब तक देखी गई किसी भी तानाशाही से अधिक भयानक होगी. उनके अनुसार सामाजिक न्याय का सही मार्ग यह था कि किसी कारखाने में काम करने वाले मजदूर, प्रबंधक और पर्यवेक्षक सभी मिलकर उस उद्योग और उसकी मशीनों के स्वामी हों. लेकिन यह स्वामित्व निजी लाभ कमाने के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के प्रति एक न्यासी (ट्रस्टी) की भावना से होना चाहिए.

गांधीजी ने एक बार कहा था— “राज्य की शक्ति बढ़ने से मुझे सबसे अधिक भय लगता है. देखने में तो ऐसा लगता है कि इससे शोषण कम होगा, लेकिन वास्तव में इससे मनुष्य का सबसे बड़ा नुकसान होता है, क्योंकि यह उसके व्यक्तित्व को नष्ट कर देता है. और व्यक्तित्व ही हर प्रकार की प्रगति का मूल है.”

गांधीजी व्यक्ति की आत्मनिर्भरता में विश्वास करते थे. उनका मानना था कि समाज तभी आगे बढ़ सकता है, जब व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा होना सीखे और अपनी जिम्मेदारियाँ स्वयं निभाए. यही बात अमेरिका के महान राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने भी कही थी. उनका कहना था— “लोग अपने लिए जो काम स्वयं बेहतर ढंग से कर सकते हैं, उन्हें उनके लिए करने का प्रयास मत करो.”

यह वही विचार था जिसे गांधीजी जीवन भर दोहराते रहे.

इसी कारण गांधीजी सीमित सरकार के पक्षधर थे. वे ऐसी सरकार नहीं चाहते थे जो जीवन के हर क्षेत्र में हस्तक्षेप करे और हर काम अपने हाथ में ले ले. उनके अनुसार सरकार की भूमिका सीमित होनी चाहिए. उसका काम कानून और व्यवस्था बनाए रखना, देश की बाहरी आक्रमणों से रक्षा करना और ऐसी आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराना है जिनके सहारे आर्थिक जीवन आगे बढ़ सके. इसके अतिरिक्त समाज और व्यक्ति को अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं खोजने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए.

गांधीजी बार-बार कहते थे, “सबसे अच्छी सरकार वही है, जो सबसे कम शासन करती है.”

लेकिन आज स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत हो गई है. राज्य ने उन क्षेत्रों में भी अपना अधिकार बढ़ा लिया है, जो वास्तव में व्यक्ति की अंतरात्मा, उसकी स्वतंत्रता और उसके निजी जीवन के हिस्से हैं.

गांधीजी की सबसे बड़ी देन केवल उनके राजनीतिक विचार नहीं थे. उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण वे सिद्धांत थे जो उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति के आचरण के लिए दिए. उनमें सबसे महत्वपूर्ण था—साधन और साध्य का संबंध. अक्सर यह कहा जाता है कि यदि उद्देश्य अच्छा हो तो उसे प्राप्त करने के लिए कोई भी तरीका अपनाया जा सकता है. अर्थात यदि लक्ष्य महान हो तो झूठ, छल, हत्या, विश्वासघात या किसी भी प्रकार के अन्याय को उचित ठहराया जा सकता है. गांधीजी ने इस सोच की मूल भूल को समझा था. उनका कहना था कि गलत साधनों से प्राप्त किया गया अच्छा उद्देश्य भी अंततः दूषित हो जाता है. साधन और साध्य को अलग-अलग नहीं किया जा सकता. जिस बीज को हम बोते हैं, उसी के अनुसार फल मिलता है. इसलिए चाहे लक्ष्य कितना भी क्रांतिकारी या महान क्यों न हो, उसे प्राप्त करने के लिए कोई छोटा रास्ता नहीं हो सकता.

गांधीजी को केवल अहिंसा का उपदेशक मान लेना भी सही नहीं है. वे साहस को सबसे बड़ा गुण मानते थे और कायरता से उन्हें घोर घृणा थी. उनका विश्वास था कि अन्याय का प्रतिरोध अवश्य होना चाहिए, लेकिन वह प्रतिरोध अहिंसक हो. इसका अर्थ यह नहीं था कि अन्याय के सामने चुपचाप समर्पण कर दिया जाए. जब उनसे पूछा गया कि यदि केवल दो ही विकल्प हों—हिंसक प्रतिरोध या कायरतापूर्ण समर्पण—तो वे किसे चुनेंगे, तब उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे हिंसक प्रतिरोध को अधिक उचित मानेंगे. यदि कोई व्यक्ति अहिंसा का साहस नहीं जुटा सकता, तो कम-से-कम वह हथियार उठाकर अन्याय का सामना करे, लेकिन भय के कारण भागे नहीं. यह उस व्यक्ति का उत्तर था जिसने अपना पूरा जीवन अहिंसा के आदर्श के लिए समर्पित कर दिया था. इससे स्पष्ट है कि गांधीजी के लिए अहिंसा से भी पहले साहस का स्थान था. वे भय को मनुष्य के चरित्र की सबसे बड़ी कमजोरी मानते थे और चाहते थे कि हर व्यक्ति अपने हृदय से डर को निकाल फेंके.

सत्याग्रह का अर्थ

गांधीजी एक महान सामाजिक क्रांतिकारी थे. उनका विश्वास था कि यदि कोई कानून अन्यायपूर्ण, अनैतिक या दमनकारी हो, तो उसका विरोध करना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार ही नहीं, बल्कि उसका कर्तव्य भी है. उनका मानना था कि एक अकेला व्यक्ति भी किसी गलत कानून के विरुद्ध खड़ा हो सकता है. लेकिन इसके साथ वे एक शर्त भी जोड़ते थे. उनका कहना था कि जिस व्यक्ति में अन्याय का विरोध करने का साहस है, उसमें अपने विश्वास की कीमत चुकाने का साहस भी होना चाहिए. यदि वह किसी अन्यायपूर्ण कानून की अवज्ञा करता है, तो उसे उसके परिणामों का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए. विरोध का अर्थ जिम्मेदारी से बचना नहीं है, बल्कि अपने विश्वास पर अडिग रहते हुए उसके परिणामों को स्वीकार करना है.

गांधीजी सामाजिक सुधार चाहते थे, लेकिन उनका विश्वास केवल संसद में कानून बनाकर समाज बदल देने में नहीं था. वे मानते थे कि कानून लोगों को अच्छा इंसान नहीं बना सकता. कोई भी सरकार केवल कानूनों के बल पर समाज में नैतिकता नहीं ला सकती. समाज तब बदलता है जब लोगों के भीतर सही और गलत की समझ विकसित होती है, जब उनमें अपने विवेक के अनुसार खड़े होने का साहस पैदा होता है. इसलिए गांधीजी के लिए परिवर्तन का सबसे बड़ा साधन कानून नहीं, बल्कि व्यक्ति का चरित्र था.

इसी संदर्भ में उन्होंने सत्याग्रह की अवधारणा को सामने रखा. सत्याग्रह का अर्थ केवल धरना देना, प्रदर्शन करना या जेल जाना नहीं था. गांधीजी के लिए सत्याग्रह का वास्तविक अर्थ था—सत्य के प्रति अटूट निष्ठा और अन्याय के सामने बिना डरे खड़े होने का साहस.

गांधीजी की एक और महत्वपूर्ण शिक्षा थी, जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं. वे कहा करते थे—”बुराइयों में से छोटी बुराई मत चुनो, हर बुराई का विरोध करो.” इसका अर्थ है—यदि आपके सामने दो बुराइयां हों, तो यह मत सोचिए कि उनमें से कौन-सी कम बुरी है. दोनों को अस्वीकार कीजिए.

आज भी कई लोग कहते हैं, “श्रीमती इंदिरा गांधी की तुलना में जनता पार्टी कम बुरी है. इसलिए जनता पार्टी की आलोचना मत कीजिए, नहीं तो इंदिरा गांधी फिर लौट आएंगी.” गांधीजी इस तर्क को कभी स्वीकार नहीं करते. वे तुरंत कहते कि आप एक बुराई को दूसरी बुराई के डर से बचा रहे हैं. ऐसा करके आप छोटी बुराई को भी और अधिक शक्तिशाली बना रहे हैं तथा बड़ी बुराई को भी लाभ पहुँचा रहे हैं. इसलिए किसी भी बुराई का समर्थन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि दूसरी उससे अधिक बड़ी है. बुराई, बुराई ही होती है और उसका विरोध हर परिस्थिति में होना चाहिए.

अंत में गांधीजी के व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण गुण था—लचीलापन.

वे अक्सर कहा करते थे, “एकरूपता पर अड़े रहना गधे का गुण है.” इसका अर्थ यह नहीं था कि सिद्धांतों से समझौता कर लिया जाए, बल्कि यह कि यदि नई परिस्थितियों में यह समझ में आए कि पहले कही गई कोई बात या अपनाया गया कोई तरीका गलत था, तो उसे स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए. गांधीजी को अपनी भूल स्वीकार करने में कभी झिझक नहीं हुई. उनका मानना था कि हर व्यक्ति से गलतियाँ होती हैं. अंतर केवल इतना है कि कुछ लोग उन्हें स्वीकार कर लेते हैं, जबकि कुछ लोग जीवन भर उन्हें छिपाने की कोशिश करते रहते हैं.

उन्होंने स्वयं लिखा है कि “मैंने कभी एकरूपता को अपना आदर्श नहीं बनाया. जो व्यक्ति मेरी बातों को ध्यान से देखेगा, वह पाएगा कि मेरे विचारों में धीरे-धीरे और स्वाभाविक रूप से परिवर्तन होता रहा है. मैं एक सत्य से दूसरे सत्य की ओर बढ़ता गया हूं.”

हममें से हर व्यक्ति राजनीतिक नेता नहीं बन सकता. हर कोई मंत्री, सांसद या किसी राजनीतिक दल का प्रमुख भी नहीं बन सकता. लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि गांधीजी की शिक्षाएं केवल नेताओं के लिए थीं. उनके विचार सामान्य से सामान्य व्यक्ति के जीवन में भी उतने ही उपयोगी हैं. हममें से सबसे साधारण और सबसे विनम्र व्यक्ति भी उनके बताए मार्ग से कुछ न कुछ सीख सकता है और अपने जीवन में उसे अपना सकता है.

इसी कारण आज गांधीजी की शिक्षाएं पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं. केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए. समय बदल गया है, परिस्थितियां बदल गई हैं, लेकिन सत्य, साहस, नैतिकता, व्यक्तिगत जिम्मेदारी और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की आवश्यकता आज भी उतनी ही है, जितनी गांधीजी के समय थी. यही उनकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता है.

यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ्रीडम फर्स्ट” किताब से लिया गया है जिसका शीर्षक “गांधी की प्रासंगिकता” था और इसका प्रकाशन मूलरुप से जनवरी 1979 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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