मैं उस दल की ओर से बोल रहा हूं जो प्रतिस्पर्धा में विश्वास रखता है. यही अर्थशास्त्र की उदारवादी परंपरा का मूल सिद्धांत है. हमारा मानना है कि प्रतिस्पर्धा पर लगाया गया कोई भी प्रतिबंध सामान्यतः अनुचित है, यद्यपि कुछ विशेष परिस्थितियों में सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए राज्य ऐसे प्रतिबंधों को स्वीकार कर सकता है. हमारा विश्वास है कि प्रतिस्पर्धा अपने आप में एक ऐसी शक्ति है जो उपभोक्ताओं के शोषण सहित अनेक आर्थिक बुराइयों और दुरुपयोगों पर अंकुश लगाती है. इसलिए हम व्यापार पर लगाए जाने वाले सभी अनावश्यक प्रतिबंधों और हर प्रकार के एकाधिकार का दृढ़ता से विरोध करते हैं.
हम इस बात के भी विरोधी हैं कि शक्ति कुछ हाथों में सिमट जाए—चाहे वह आर्थिक शक्ति हो या आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का संयुक्त केंद्रीकरण. इस मामले में हमारा दृष्टिकोण किसी समझदार लोकतांत्रिक समाजवादी के दृष्टिकोण से बहुत अलग नहीं है.
हम मानते हैं कि अर्थव्यवस्था में क्या पैदा होगा और कितना पैदा होगा, इसका अंतिम निर्णय उपभोक्ता को करना चाहिए. बाज़ार में उपभोक्ता की पसंद ही सबसे महत्वपूर्ण मत है. यदि कोई ईमानदार और वास्तविक एकाधिकार-विरोधी कानून लाया जाता है, तो हम उसका समर्थन करने के लिए तैयार हैं. इसी सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ हम एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार विधेयक का मूल्यांकन करते हैं.
लेकिन यह विधेयक हमें गहरी निराशा देता है, क्योंकि वास्तविकता यह है कि यह एकाधिकार-विरोधी विधेयक है ही नहीं. जब इसे पहली बार संसद में प्रस्तुत किया गया था, तब भी इसकी स्थिति संतोषजनक नहीं थी. यह न तो दास गुप्ता आयोग की रिपोर्ट के साथ प्रस्तुत प्रारूप के अनुरूप था और न ही पहले के एकाधिकार आयोग की सिफारिशों के अनुरूप. संयुक्त समिति से लौटने के बाद तो इसकी स्थिति और भी खराब हो गई है. यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है.
मैं इस विधेयक की कुछ विशेषताओं की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ ताकि स्पष्ट हो सके कि मैं इसे एक खराब विधेयक क्यों मानता हूं.
सबसे पहली बात यह है कि यह विधेयक एकाधिकार को रोकने के लिए कुछ भी नहीं करता. एकाधिकार का अर्थ है किसी वस्तु या सेवा के उत्पादन या आपूर्ति पर पूर्ण नियंत्रण. यदि इसी कसौटी को अपनाया जाए, तो भारत में सरकारी उपक्रमों के अतिरिक्त कोई वास्तविक एकाधिकार दिखाई नहीं देता. उदाहरण के लिए भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) एक पूर्ण एकाधिकार है, क्योंकि यदि कोई उससे प्रतिस्पर्धा करने का प्रयास करे तो उसे दंडित किया जा सकता है. इंडियन एयरलाइंस एक और उदाहरण है, एयर इंडिया दूसरा. भारतीय रेल भी एकाधिकार है. तार सेवाएं, टेलीफोन सेवाएं और ऑल इंडिया रेडियो—ये सभी पूर्ण सरकारी एकाधिकार हैं. इसके अतिरिक्त STC, MMTC और FCI जैसी संस्थाएं भी आंशिक एकाधिकार का स्वरूप रखती हैं.
विडंबना यह है कि ये सभी सरकारी एकाधिकार, जो वास्तव में भारत में मौजूद एकमात्र एकाधिकार हैं, इस विधेयक के दायरे से बाहर रखे गए हैं. इसलिए इस विधेयक की पहली और सबसे बड़ी खामी यह है कि यह उन एकाधिकारों से नहीं निपटता जो वास्तव में मौजूद हैं; बल्कि उन काल्पनिक एकाधिकारों से लड़ने का दिखावा करता है जिनका अस्तित्व ही नहीं है.
सरकारी एकाधिकार सबसे खतरनाक होते हैं, क्योंकि वे किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होते. निजी एकाधिकारों पर सरकार की शक्ति अंकुश लगा सकती है. एक निजी निगम और सरकार के बीच शक्ति का संतुलन बना रहता है, लेकिन जब सरकार स्वयं व्यापारी भी हो और नियामक भी, जब कारखाने का मालिक और पुलिस वाला एक ही हो, तब नागरिक के पास अपील करने का कोई रास्ता नहीं बचता.
ऐसी स्थिति में उपभोक्ता पूरी तरह सरकारी उपक्रमों की दया पर निर्भर हो जाता है. उस संस्थान का कर्मचारी भी किसी स्वतंत्र पक्ष से न्याय की अपेक्षा नहीं कर सकता. यही कारण है कि मैं इस विधेयक में निहित सोच को सबसे प्रतिक्रियावादी प्रकार का औद्योगिक सामंतवाद कहता हूं. यह विधेयक भारत की जनता के साथ एक छल है, क्योंकि यह एकाधिकार के विरुद्ध लड़ने का दावा करता है जबकि वास्तव में ऐसा कुछ नहीं करता.
विधेयक की दूसरी बड़ी समस्या यह है कि जिस आयोग की स्थापना की जा रही है, उसे केवल एक सलाहकार संस्था बनाकर छोड़ दिया गया है. वास्तविक अधिकार मंत्री के हाथों में केंद्रित कर दिए गए हैं. यदि एकाधिकार-विरोधी कानून को ईमानदारी से लागू करना है, तो शक्ति स्वतंत्र आयोग के पास होनी चाहिए, न कि राजनीतिक पदाधिकारियों के पास. इस दृष्टि से भी यह विधेयक निराशाजनक है.
तीसरी समस्या यह है कि यह विधेयक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के बजाय उसे सीमित करता है. किसी भी वास्तविक एकाधिकार-विरोधी कानून का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करना होना चाहिए, लेकिन यह विधेयक ठीक उसका उलटा करता है.
एक ओर यह सरकारी उद्यमों को विशेष संरक्षण देकर निजी और सरकारी क्षेत्र के बीच प्रतिस्पर्धा को समाप्त करता है. दूसरी ओर, निजी क्षेत्र के भीतर भी सरकार को ऐसी शक्तियां देता है जिनके माध्यम से वह लाइसेंस, परमिट और तथाकथित एकाधिकार-विरोधी प्रावधानों का उपयोग करके वास्तविक प्रतिस्पर्धा को बाधित कर सकती है.
पूरा विधेयक एक मूलभूत भ्रम पर आधारित है—आकार और एकाधिकार को एक ही चीज़ मान लेने का भ्रम. जबकि आकार और एकाधिकार का कोई आवश्यक संबंध नहीं है. कोई छोटा-सा उद्यम भी किसी विशेष उत्पाद के बाज़ार पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर सकता है और इस अर्थ में एकाधिकारवादी हो सकता है. दूसरी ओर, बहुत बड़ी-बड़ी कंपनियां भी एक-दूसरे के साथ तीव्र प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं और उनमें से कोई भी एकाधिकार नहीं होती.
अमेरिका की बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियां इसका उदाहरण हैं. वे एक-दूसरे से लगातार संघर्ष करती हैं, फिर भी उनमें से कोई भी अकेले बाज़ार पर कब्ज़ा नहीं रखती. आकार और एकाधिकार के बीच इस बुनियादी अंतर को इस विधेयक ने पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया है.
यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि यह विधेयक वास्तव में एकाधिकार से लड़ने के लिए नहीं है, तो फिर इसे लाया ही क्यों गया?
मुझे लगता है कि इसका उत्तर उस बात में छिपा है जिसे प्रसिद्ध यूगोस्लाव विचारक मिलोवान जिलास ने अपनी पुस्तक द न्यू क्लास में लिखा था. जिस प्रकार रूस और यूगोस्लाविया में एक नया विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग उभरा था, उसी प्रकार भारत में भी एक नया वर्ग उभर आया है. यह वर्ग अपनी राजनीतिक शक्ति का उपयोग अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए करता है और किसानों, मजदूरों तथा मध्यम वर्ग की मेहनत से पैदा हुई संपत्ति से लाभ उठाता है.
भारत एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है, इसलिए यह नया वर्ग भी मिश्रित स्वरूप का है. इसके तीन चेहरे हैं—राजनीतिक नेतृत्व, नौकरशाही और उससे जुड़े व्यावसायिक हित. ये तीनों मिलकर ऐसी व्यवस्था बनाते हैं जिसमें आम नागरिक की मेहनत की कमाई का शोषण होता है.
यदि आज भारत में कोई वास्तविक निहित स्वार्थ मौजूद है, तो वह यही गठजोड़ है—राजनीतिक सत्ता, भ्रष्ट नौकरशाही और वे व्यवसायिक हित जो उससे लाभ उठाते हैं. यही वे शक्तियां हैं जो मिलकर इस देश की जनता के परिश्रम का फल अपने हाथों में समेट लेती हैं.
यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ्रीडम फर्स्ट” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “राज्य का एकाधिकार या निजी एकाधिकार?” था और इसका प्रकाशन मूलरुप से जनवरी 1970 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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