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Sunday, 17 May, 2026
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ब्रांड विवादों से लेकर विरासत की लड़ाइयों तक: मध्यस्थता में क्यों बढ़ रही है रिटायर्ड जजों की भूमिका

संजय कपूर विरासत के झगड़े में सुप्रीम कोर्ट का पूर्व CJI चंद्रचूड़ को नियुक्त करना दिखाता है कि कैसे रिटायर्ड जज, जो लंबे समय से आर्बिट्रेशन में दबदबा रखते थे, अब मीडिएशन को भी आकार दे रहे हैं.

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नई दिल्ली: इस महीने जब सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को दिवंगत उद्योगपति संजय कपूर की मां रानी कपूर और उनकी पत्नी प्रिया सचदेव कपूर के बीच पारिवारिक विवाद में मध्यस्थ नियुक्त किया, तो इस फैसले ने सिर्फ विरासत की लड़ाई ही नहीं, बल्कि उससे कहीं ज्यादा चीजों पर ध्यान खींचा.

यह विवाद सोना ग्रुप और रानी कपूर फैमिली ट्रस्ट से जुड़ी 30,000 करोड़ रुपये की विरासत को लेकर है. जैसे-जैसे अदालत में उत्तराधिकार की यह कड़वी लड़ाई तेज हुई, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और उज्जल भुइयां की बेंच ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेज दिया. अदालत ने कहा कि गोपनीयता, निजी बातचीत और आपसी सहमति से समाधान जरूरी है ताकि यह विवाद सार्वजनिक “मनोरंजन” न बन जाए.

कम से कम पिछले दो दशकों से रिटायर जजों के लिए आर्बिट्रेशन यानी पंचाट सबसे पसंदीदा रास्ता रहा है. खास तौर पर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के रिटायर जजों को बड़े मामलों में अक्सर आर्बिट्रेटर बनाया जाता रहा है.

लेकिन कपूर परिवार के विवाद का यह मामला भारत की अल्टरनेटिव डिस्प्यूट रिजोल्यूशन यानी एडीआर प्रणाली में एक नया ट्रेंड दिखाता है. अयोध्या विवाद और करोड़ों की विरासत के झगड़ों से लेकर ट्रेडमार्क विवाद और मंदिर की परंपराओं को लेकर लड़ाइयों तक, अदालतें अब लगातार रिटायर जजों को मध्यस्थ बना रही हैं.

आर्बिट्रेशन और मेडिएशन दोनों एडीआर सिस्टम का हिस्सा हैं, लेकिन दोनों अलग हैं.

आर्बिट्रेशन में पक्षकार फैसला लेने का अधिकार आर्बिट्रेटर को दे देते हैं. आर्बिट्रेशन का फैसला सीधे लागू होता है और उसे सीमित कानूनी चुनौती ही दी जा सकती है.

मेडिएशन में पक्षकार एक निष्पक्ष तीसरे व्यक्ति यानी मध्यस्थ की मदद से आपसी सहमति से समाधान निकालने की कोशिश करते हैं. मध्यस्थ के पास कोई फैसला थोपने का अधिकार नहीं होता. मेडिएशन से निकला समझौता दोनों पक्षों की सहमति से प्रभावी होता है. अदालत से जुड़े ऐसे मेडिएशन मामलों में मध्यस्थ की फीस भी दोनों पक्षों की सहमति से तय होती है.

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस हेमा कोहली ने द प्रिंट से कहा, “मेडिएशन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें पक्षकार अपनी इच्छा से शामिल होते हैं. मध्यस्थ की भूमिका सिर्फ इतनी होती है कि वह दोनों पक्षों को विवाद समझने और ऐसा समाधान निकालने में मदद करे जिसमें सभी का फायदा हो. यह जज की भूमिका से पूरी तरह अलग काम है.”

साथ ही दिप्रिंट से बात करने वाले जजों ने कहा कि देशभर में ज्यादातर मेडिएशन का काम अभी भी प्रशिक्षित वकील और संस्थागत मेडिएशन सेंटर ही संभाल रहे हैं, न कि रिटायर जज.

मेडिएशन एक्ट

2023 में मेडिएशन एक्ट लागू होने के बाद मेडिएशन की प्रक्रिया तेज हुई है. इस कानून का मकसद मेडिएशन को मुख्यधारा का विवाद समाधान तरीका बनाना है और इसमें “संस्थागत मेडिएशन” को साफ तौर पर बढ़ावा दिया गया है.

यह बदलाव आर्बिट्रेशन के मिले-जुले अनुभवों के बाद भी आया है, जिसने सरकार को सतर्क किया.

2024 में वित्त मंत्रालय ने घरेलू सरकारी खरीद से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट्स में आर्बिट्रेशन और मेडिएशन के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे. इसमें केंद्र सरकार ने कहा था कि आर्बिट्रेशन कई मामलों में उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा.

मेमोरेंडम में कहा गया, “जहां सरकार या सरकारी संस्था या एजेंसी, जैसे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी, पक्षकार होती है, वहां आर्बिट्रेशन का अनुभव कई मामलों में उम्मीदों के मुताबिक संतोषजनक नहीं रहा.”

2024 के दिशा-निर्देशों के मुताबिक “सामान्य नियम” के तौर पर आर्बिट्रेशन क्लॉज सिर्फ 10 करोड़ रुपये से कम मूल्य वाले विवादों तक सीमित होना चाहिए. इसमें साफ किया गया कि यह राशि विवाद की कीमत को दर्शाती है, न कि पूरे कॉन्ट्रैक्ट की कीमत को, जो इससे कहीं ज्यादा हो सकती है.

मेडिएशन एक्ट 2023, मेडिएशन काउंसिल ऑफ इंडिया के जरिए संस्थागत मेडिएशन को बढ़ावा देता है. यह पारंपरिक अदालत द्वारा भेजे गए मेडिएशन से काफी अलग है.

कानून की धारा 32 के तहत सात सदस्यीय परिषद का प्रस्ताव है. इसमें एक चेयरपर्सन, मेडिएशन या एडीआर कानून के विशेषज्ञ एक सदस्य, रिसर्च या मेडिएशन और एडीआर कानून पढ़ाने का अनुभव रखने वाला एक सदस्य, तीन पदेन सदस्य यानी वित्त मंत्रालय, कानून और न्याय मंत्रालय और उपभोक्ता मामलों के विभाग के प्रतिनिधि, और एक मान्यता प्राप्त व्यापार और उद्योग संस्था का प्रतिनिधि शामिल होगा.

अब तक परिषद में सिर्फ एक मान्यता प्राप्त व्यापार और उद्योग संस्था और व्यय विभाग के एक-एक प्रतिनिधि को नामित किया गया है. कानून मंत्रालय ने मार्च 2026 में संसद में एक सवाल के जवाब में बताया था कि चेयरपर्सन और बाकी सदस्यों की नियुक्ति अभी नहीं हुई है.

अयोध्या से पारिवारिक झगड़ों तक

हालांकि यह कानून मेडिएशन के लिए एक औपचारिक संस्थागत ढांचा बनाने की बात करता है, लेकिन भारतीय अदालतें लगातार देश के सबसे संवेदनशील राजनीतिक और कारोबारी विवादों में रिटायर जजों को मध्यस्थ बना रही हैं. कुछ बड़े मामलों में मेडिएशन के नतीजे मिले-जुले रहे हैं. कुछ मामलों का समाधान हो गया, जबकि कुछ अब भी लंबित हैं.

सबसे संवेदनशील मामलों में से एक अयोध्या विवाद था. मार्च 2019 में पांच जजों की संविधान पीठ ने इस मामले को मेडिएशन के लिए भेजा और रिटायर सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस एफ.एम.आई. कलीफुल्ला को मध्यस्थों के पैनल का चेयरपर्सन नियुक्त किया. बाकी दो सदस्य आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पांचू थे.

आखिर में इस मामले का समाधान अदालत के फैसले से हुआ.

एक दूसरे मामले में 2022 में सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना, जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस हेमा कोहली शामिल थे, ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस आर.वी. रवेंद्रन को मध्यस्थ नियुक्त किया. यह मामला पूर्व आईपीएल प्रमुख ललित मोदी, उनकी मां बीना मोदी, बहन चारू और भाई समीर के बीच पारिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़ा था.

गॉडफ्रे फिलिप्स इंडिया को प्रमोट करने वाले मोदी परिवार का यह विवाद करीब 11,000 करोड़ रुपये की संपत्ति से जुड़ा है.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के दो पूर्व जजों विक्रमजीत सेन और कुरियन जोसेफ की मध्यस्थता में भी समझौते की कोशिश हुई थी, लेकिन 2019 में परिवार के मुखिया के.के. मोदी की मौत के बाद संपत्ति बांटने को लेकर ट्रस्टियों के बीच विवाद नहीं सुलझ सका.

यह मामला अब भी लंबित है.

एक और बड़े विवाद में दिसंबर 2023 में दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज नागेश्वर राव को मध्यस्थ नियुक्त किया. यह मामला क्रिकेट हेलमेट बनाने वाली कंपनी कोहली स्पोर्ट्स और आशी स्पोर्ट्स के बीच था. कोहली स्पोर्ट्स ने आरोप लगाया था कि उसकी रजिस्टर्ड डिजाइन की नकल की गई.

फिर जनवरी 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज ए.के. सीकरी को ऑन4ऑफ ट्रेडिंग और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी एनपीसीआई के बीच विवाद में मध्यस्थ नियुक्त किया. मामला क्रेडिट कार्ड के जरिए यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई भुगतान को जोड़ने वाली पेटेंट तकनीक के कथित गैर-अधिकृत इस्तेमाल से जुड़ा था.

ऑन4ऑफ ट्रेडिंग ने एनपीसीआई और अन्य पक्षों को तकनीक के इस्तेमाल से रोकने और हर्जाना देने की मांग की थी.

हालांकि बाद की अदालत की कार्यवाही से पता चला कि विवाद अब भी जारी है और मेडिएशन से हल नहीं हुआ. अदालत ने कहा कि जस्टिस सीकरी की मेडिएशन रिपोर्ट में लिखा था कि “मेडिएशन की प्रक्रिया शुरू ही नहीं हो सकी.”

एक और चर्चित मामले में जनवरी 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज आर.वी. रवेंद्रन को अभिषेक लोढ़ा और अभिनंदन लोढ़ा के बीच पारिवारिक समझौते से जुड़े विवाद में एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया. दोनों प्रॉपर्टी कारोबारी और दक्षिण मुंबई के विधायक एम.पी. लोढ़ा के बेटे हैं.

लीडिंग मैक्रोटेक डेवलपर्स यानी पहले के लोढ़ा ग्रुप के अभिषेक लोढ़ा ने अपने छोटे भाई अभिनंदन लोढ़ा की कंपनी हाउस ऑफ अभिनंदन लोढ़ा के खिलाफ ट्रेडमार्क उल्लंघन का केस दायर किया था. उन्होंने आरोप लगाया था कि ‘लोढ़ा’ ब्रांड नाम का गैर-अधिकृत इस्तेमाल किया गया.

सार्वजनिक रिपोर्टों के मुताबिक, लोढ़ा भाइयों के बीच समझौता हो गया. इसके तहत मैक्रोटेक डेवलपर्स को ‘लोढ़ा’ और ‘लोढ़ा ग्रुप’ ट्रेडमार्क का विशेष अधिकार मिला, जबकि अभिनंदन लोढ़ा को ‘हाउस ऑफ अभिनंदन लोढ़ा’ यानी एचओएबीएल ब्रांड का विशेष अधिकार मिला.

हाल ही में सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ को यूरो प्रतिक इस्पात और जियोमिन इंडस्ट्रीज के बीच कारोबारी विवाद में मध्यस्थ नियुक्त किया. मामला 1.7 लाख मीट्रिक टन लौह अयस्क के परिवहन और बिक्री समझौते से जुड़ा था.

जस्टिस चंद्रचूड़ की मेडिएशन रिपोर्ट में कहा गया कि पूरी कोशिशों के बावजूद दोनों पक्ष सहमति तक नहीं पहुंच सके. सुप्रीम कोर्ट ने 10 अप्रैल को इसे रिकॉर्ड पर लिया.

ये अकेले ऐसे मामले नहीं हैं.

नवंबर 2025 में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज नागेश्वर राव को जॉन डिस्टिलरीज और एलाइड ब्लेंडर्स के बीच बड़े ट्रेडमार्क विवाद में मध्यस्थ नियुक्त किया. जॉन डिस्टिलरीज ‘ओरिजिनल चॉइस’ बनाती है, जबकि एलाइड ब्लेंडर्स ‘ऑफिसर्स चॉइस’ बनाती है.

इस साल फरवरी में अदालत ने रिकॉर्ड में कहा कि “समझौता लगभग हो चुका है.” अप्रैल में मेडिएशन जारी रहने के कारण समय तीन महीने बढ़ा दिया गया.

दिसंबर 2025 में जस्टिस पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज कुरियन जोसेफ को एक ऐसे मामले में मध्यस्थ नियुक्त किया जिसमें पति और पत्नी दोनों शादी खत्म करना चाहते थे. पति मस्कट में कंप्यूटर इंजीनियर है और पत्नी डॉक्टर है. इससे ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है.

इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल थे, ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज संजय किशन कौल को तमिलनाडु के कांचीपुरम स्थित श्री देवराजस्वामी मंदिर में पूजा-पद्धति को लेकर दो श्रीवैष्णव संप्रदायों के बीच 120 साल पुराने विवाद को सुलझाने के लिए मुख्य मध्यस्थ नियुक्त किया.

फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल थे, ने पत्रकार बेनजीर हीना की याचिका पर पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज कुरियन जोसेफ को मध्यस्थ नियुक्त किया. बेनजीर हीना ने अपने पति द्वारा दिए गए तलाक-ए-हसन की वैधता को चुनौती दी थी.

फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट की एक और बेंच, जिसमें जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन शामिल थे, ने आईमैक्स कॉरपोरेशन और ई-सिटी ग्रुप के बीच विदेशी आर्बिट्रेशन फैसलों को लागू करने से जुड़े विवाद में समझौते की संभावना तलाशने के लिए पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज अभय एस. ओका को मध्यस्थ नियुक्त किया.

अप्रैल 2026 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज अभय एस. ओका को केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी, उनके बेटे निखिल, जनता दल (सेक्युलर) नेता सुरेश बाबू और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी एम. चंद्रशेखर के बीच विवाद सुलझाने के लिए मध्यस्थ नियुक्त किया. यह विवाद तब शुरू हुआ जब अवैध खनन मामलों की जांच कर रही लोकायुक्त एसआईटी के प्रमुख चंद्रशेखर ने मंत्री और अन्य लोगों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान धमकाने और दबाव बनाने का आरोप लगाया. इसके बाद एफआईआर दर्ज की गई थी.

पूर्व जजों ने क्या कहा

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कहा कि हाई-प्रोफाइल विवादों में पूर्व जजों को मध्यस्थ बनाने का फैसला अक्सर विवाद की प्रकृति, उसमें जुड़े बड़े हितों और उस व्यक्ति पर पक्षों के भरोसे की वजह से होता है, जिसे मध्यस्थ चुना जाता है.

दिवंगत कारोबारी संजय कपूर की वसीयत से जुड़े विवाद में पूर्व चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ को मध्यस्थ बनाए जाने का जिक्र करते हुए जस्टिस गुप्ता ने कहा कि कुछ विवाद, खासकर जिनमें बहुत बड़े हित जुड़े हों, उनमें बेहद विश्वसनीय और प्रतिष्ठित लोगों की जरूरत होती है.

उन्होंने इस बात को खारिज किया कि भारत में मध्यस्थता जरूरत से ज्यादा रिटायर्ड जजों पर निर्भर होती जा रही है. उनके मुताबिक देशभर में ज्यादातर मध्यस्थता का काम प्रशिक्षित वकील और संस्थागत मध्यस्थता केंद्र संभालते हैं, न कि पूर्व जज.

जस्टिस गुप्ता ने यह भी कहा कि दिल्ली के मामलों को पूरे देश का रुझान मानना सही नहीं होगा.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “साफ बात कहूं तो दिल्ली को लगता है कि वही मध्यस्थ है, वही ट्रेंड सेट करती है. दिल्ली ही भारत नहीं है. अगर एक-दो मामलों में जजों को मध्यस्थ बना दिया गया, तो इसका मतलब यह नहीं कि पूरे भारत में यही स्थिति है. पूरे देश में मध्यस्थता का काम वकील करते हैं.”

उनके मुताबिक यह धारणा इसलिए बनती है क्योंकि मीडिया में सिर्फ कुछ चर्चित या हाई-प्रोफाइल विवादों की खबरें आती हैं.

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस ए.एस. ओका ने भी इस धारणा को खारिज किया कि रिटायर्ड जज भारत की मध्यस्थता व्यवस्था पर हावी हो रहे हैं. उन्होंने कहा कि देश में मध्यस्थता की रीढ़ आज भी वकील ही हैं.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “परंपरागत रूप से देखें तो मध्यस्थता को जितनी भी थोड़ी सफलता मिली है, उसमें वकीलों का बड़ा योगदान रहा है, जो अतिरिक्त मेहनत करके यह काम कर रहे हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “वकीलों की भूमिका को बिना प्रभावित किए, कुछ चुनिंदा मामलों में ज्यादा जजों को मध्यस्थ के तौर पर काम करना चाहिए.” हालांकि उनका मानना है कि ज्यादा जज मध्यस्थता की बजाय आर्बिट्रेशन में रुचि रखते हैं.

जस्टिस ओका, जिन्होंने रिटायरमेंट के बाद आर्बिट्रेशन का काम न करने का फैसला लिया है, ने यह भी कहा कि मध्यस्थ के रूप में नियुक्त किए जाने वाले जजों की संख्या, मध्यस्थ बनाए जाने वाले वकीलों की तुलना में बहुत कम है.

उन्होंने कहा कि कई बार जज अदालत में सुनवाई के दौरान भी अनौपचारिक रूप से समझौता कराने का काम करते हैं. उन्होंने कहा, “कई मामलों में मध्यस्थ नियुक्त करने की बजाय हम खुली अदालत में ही मध्यस्थता कर लेते हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “हाई कोर्ट में आप देखेंगे कि फैमिली कोर्ट की अपीलों में जज आमतौर पर पक्षों को अपने चैंबर में बुलाते हैं. वे समझौते की कोशिश करते हैं. जजों को इसका अनुभव होता है.”

हालांकि जस्टिस ओका ने माना कि रिटायरमेंट के बाद जब कोई जज औपचारिक रूप से मध्यस्थ बनता है तो स्थिति बदल जाती है. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “जज की कुर्सी पर बैठकर समझौते का सुझाव देना और रिटायर्ड जज के रूप में सुझाव देना, दोनों का असर अलग होता है. लेकिन फिर भी जज मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए अच्छी तरह सक्षम होते हैं.”

साथ ही जस्टिस ओका ने जोर दिया कि मध्यस्थ की नियुक्ति सामान्य रूप से संस्थागत व्यवस्था के जरिए होनी चाहिए, न कि सीधे न्यायिक नामांकन से.

जस्टिस गीता मित्तल, जो जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस और दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व कार्यवाहक चीफ जस्टिस रह चुकी हैं, ने दिप्रिंट से कहा कि पूर्व जज “बहुत अच्छे मध्यस्थ” साबित हो सकते हैं, क्योंकि उनके पास कानूनी जानकारी, अनुभव, निष्पक्षता, धैर्य, सुनने की क्षमता और जनता का भरोसा होता है.

उन्होंने कहा कि सवाल यह नहीं है कि पूर्व जज मध्यस्थ बनें या नहीं, बल्कि यह है कि मध्यस्थता की प्रक्रिया अपनी अलग पहचान कैसे बनाए रखे.

जस्टिस मित्तल ने कहा, “मध्यस्थता एक अलग प्रक्रिया है. जज को फैसला देने की ट्रेनिंग मिलती है, जबकि मध्यस्थ को पक्षों के बीच बातचीत आसान बनाने की ट्रेनिंग मिलती है. जब पूर्व जज यह भूमिका निभाते हैं, तो उन्हें संरचित ओरिएंटेशन और ट्रेनिंग दी जानी चाहिए ताकि प्रक्रिया सहयोगी, स्वैच्छिक और पक्ष-केंद्रित बनी रहे.”

उन्होंने कहा कि इन खूबियों के बावजूद यह जरूरी है कि अदालत से जुड़ी मध्यस्थता सिर्फ कुछ सीमित लोगों तक न रह जाए.

उन्होंने कहा कि भारत में मध्यस्थता बढ़ने के साथ जरूरी है कि प्रशिक्षित और विविध मध्यस्थों का बड़ा समूह तैयार किया जाए, जिसमें सिर्फ पूर्व जज ही नहीं बल्कि दूसरे लोग भी शामिल हों. उनके मुताबिक इससे मध्यस्थता ज्यादा सुलभ, कम खर्चीली, लचीली और पक्षों की जरूरतों के मुताबिक बनी रहेगी.

जस्टिस मित्तल ने यह भी कहा कि मध्यस्थता में पक्षों का भरोसा सबसे अहम होता है. चूंकि मध्यस्थता की सफलता काफी हद तक भरोसे पर निर्भर करती है, इसलिए पक्षों को सामान्य रूप से मध्यस्थ चुनने में अहम भूमिका मिलनी चाहिए, जबकि अदालत विवाद की प्रकृति और जटिलता के हिसाब से उपयुक्त नाम सुझा सकती है.

‘ट्रेनिंग और योग्यता जरूरी’

सीनियर एडवोकेट और सीनियर मध्यस्थ श्रीराम पंचू ने दिप्रिंट से कहा कि मध्यस्थता में सबसे महत्वपूर्ण चीज पक्षों की स्वायत्तता होती है. यानी मध्यस्थता के नतीजे पर फैसला करने का अधिकार पक्षों के पास रहता है. उन्होंने कहा, “इसका मतलब यह भी है कि मध्यस्थ कौन होगा, इसका पहला अधिकार पक्षों के पास होना चाहिए.”

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अदालतें और दूसरी संस्थाएं मध्यस्थों की सूची रखें, जिसमें उनकी प्रोफाइल, योग्यता, अनुभव और फीस की जानकारी हो. इससे पक्षों को चुनाव करने में मदद मिलेगी.

पंचू ने कहा कि जटिल और बड़े आर्थिक मामलों की मध्यस्थता करने के लिए “ट्रेनिंग, योग्यता और अनुभव होना जरूरी है.” इसमें वरिष्ठ मध्यस्थ के साथ काम करना और सह-मध्यस्थ के रूप में अनुभव लेना भी शामिल है.

उन्होंने कहा, “दुनियाभर में यही सामान्य प्रक्रिया है. विवाद में फंसे पक्षों के प्रति हमारी यही जिम्मेदारी है.”

पंचू के मुताबिक जजों को अच्छा मध्यस्थ बनने के लिए “पुरानी सोच को छोड़ने और बिल्कुल अलग नजरिया और तरीका अपनाने की जरूरत होती है, जो उनकी न्यायिक सेवा के दौरान अपनाए गए तरीके से पूरी तरह अलग होता है.”

उन्होंने कहा, “मैंने जजों को अच्छा मध्यस्थ बनते देखा है. लेकिन मैंने इसके उलट उदाहरण भी काफी देखे हैं, जो मुझे गंभीर चिंता में डालते हैं.”

पंचू ने कहा कि मध्यस्थों को यह भी सोचना चाहिए कि क्या बड़े आर्थिक मामलों में अदालतों द्वारा लगातार रिटायर्ड जजों को मध्यस्थ बनाए जाने का मतलब यह है कि मौजूदा मध्यस्थों की क्षमता और गुणवत्ता पर भरोसे की कमी है.

जस्टिस हीमा कोहली ने दिप्रिंट से कहा कि मध्यस्थता के लिए ट्रेनिंग जरूरी है, चाहे वह जज ही क्यों न हों.

जस्टिस कोहली, जो दिल्ली हाई कोर्ट मध्यस्थता और सुलह समिति की पूर्व चेयरपर्सन भी रह चुकी हैं, ने कहा कि मध्यस्थों को प्रक्रिया के अनुशासन और ढांचे को समझना जरूरी है. इसमें निष्पक्षता बनाए रखने और उस सीमा को समझना भी शामिल है, जिसके आगे मध्यस्थ को दखल नहीं देना चाहिए.

उन्होंने कहा, “जज के रूप में किसी के पास विवाद की बारीकियों को समझने की कानूनी क्षमता होती है, लेकिन मध्यस्थता में मानवीय पहलू भी शामिल होता है. सिर्फ इसलिए कि कोई जज के रूप में फैसले देता रहा है, इसका मतलब यह नहीं कि वह जरूरी तौर पर अच्छा मध्यस्थ भी बन जाएगा.”

अपना अनुभव याद करते हुए जस्टिस कोहली ने कहा कि जब वह सुप्रीम कोर्ट की जज थीं, तब उन्होंने सिंगापुर इंटरनेशनल मेडिएशन सेंटर में ट्रेनिंग ली थी और विशेषज्ञ मध्यस्थ का प्रमाणपत्र हासिल किया था ताकि खुद को और बेहतर बना सकें.

उससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट की जज रहते हुए उन्होंने वकीलों को मध्यस्थता की ट्रेनिंग देने वाली कई कार्यशालाओं में हिस्सा लिया था.

उन्होंने कहा, “ऐसे अनुभव और ट्रेनिंग से यह समझ आती है कि व्यवहार में मध्यस्थता कैसे काम करती है. अगर कोई जज, जिसने मध्यस्थता की ट्रेनिंग ली हो, रिटायरमेंट के बाद किसी विवाद में मध्यस्थ बनने का अनुरोध स्वीकार करता है, तो उसके पास मौजूद कौशल पक्षों के विवाद को जल्दी सुलझाने में मदद करते हैं.”

जस्टिस कोहली ने कहा कि जिन जजों ने मध्यस्थता की ट्रेनिंग नहीं ली है, वे हमेशा प्रभावी मध्यस्थ साबित नहीं हो सकते, क्योंकि मध्यस्थता के लिए अलग तरह की क्षमताओं की जरूरत होती है.

उन्होंने कहा, “फैसला देने में विवाद का निपटारा करना होता है, जबकि मध्यस्थता में ऐसी क्षमता चाहिए जो पक्षों को उनकी ताकत और कमजोरियां समझाए और उन्हें प्रस्ताव और जवाबी प्रस्ताव के जरिए समाधान तक पहुंचाए.”

उन्होंने आगे कहा, “मध्यस्थ का काम जज की तरह अधिकार का इस्तेमाल करके ऐसा समाधान थोपना नहीं है जिसे पक्ष स्वीकार करना न चाहें.”

मध्यस्थता में फीस या मानदेय के सवाल पर उन्होंने कहा कि बहुत कुछ विवाद की प्रकृति पर निर्भर करता है. उदाहरण के लिए पति-पत्नी के निजी वैवाहिक विवाद में, जहां मध्यस्थ को पता हो कि पक्ष आर्थिक दबाव में हैं, वहां उन्हें कुछ रियायत दी जानी चाहिए. उन्होंने कहा, “अगर मेरी मदद से विवाद आपसी सहमति से सुलझ सकते हैं, तो मैं मामूली फीस लेकर भी मध्यस्थता को बढ़ावा देना पसंद करूंगी.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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