नई दिल्ली: कर्नाटक हाई कोर्ट ने बुधवार को कहा कि घर पर अपने परिवार के सदस्यों की देखभाल और उनके लिए काम करने वाली हर महिला को ‘होममेकर’ माना जा सकता है, चाहे उसकी एजुकेशनल क्वालिफिकेशन कुछ भी हो. कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘होममेकर’ शब्द जेंडर-न्यूट्रल है. कोर्ट ने कहा, “होममेकर पुरुष या महिला, कोई भी हो सकता है”.
जस्टिस चिल्लाकुर सुमलता की बेंच ने कहा, “कामकाजी महिला या किसी पेशे में काम करने वाली महिला को भी होममेकर माना जा सकता है, अगर वह घर पर परिवार के सदस्यों की देखभाल करती है और उनके भले का ध्यान रखती है.”
खास बात यह है कि बेंच ने साफ किया कि किसी महिला को होममेकर मानने के लिए यह दिखाना या साबित करना ज़रूरी नहीं है कि “वह अनपढ़ है, या 24×7 घर पर रहती है, या सिर्फ घर का काम करती है और कुछ नहीं.”
कोर्ट ने कहा, “हर वह व्यक्ति जो लगातार मेहनत करता है, बिना किसी शर्त के प्यार करता है, कई बार अपने आराम का त्याग करता है और आखिर में एक खुशहाल और स्थिर परिवार का सहारा बन जाता है, वह होममेकर है. ये बातें सिर्फ उदाहरण हैं, पूरी सूची नहीं.”
हाई कोर्ट ने कहा कि इस परिभाषा में काम करने वाला व्यक्ति, परिवार चलाने वाला व्यक्ति या मजदूरी करने वाला व्यक्ति भी शामिल हो सकता है.
कानूनी लड़ाई: KSRTC बनाम पंपापाल
यह व्याख्या कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) और पंपापाल नाम की एक महिला की ओर से दायर एक-दूसरे के खिलाफ अपीलों पर सुनवाई के दौरान सामने आई.
यह मामला अक्टूबर 2013 में हुए एक सड़क हादसे से शुरू हुआ था. उस समय शिकायतकर्ता की उम्र 25 साल थी. उनके पास बायोटेक्नोलॉजी में मास्टर डिग्री थी और वह अगस्त 2012 से मार्च 2013 तक एक कॉलेज में गेस्ट लेक्चरर के तौर पर काम कर चुकी थीं. उन्हें हर महीने 35,000 रुपये सैलरी मिलती थी. हादसे के कारण उन्हें हमेशा के लिए शारीरिक दिव्यांगता हो गई.
मुख्य विवाद यह था कि क्या उन्हें भविष्य की कमाई के नुकसान का मुआवजा मिलना चाहिए. KSRTC ने तर्क दिया कि वह बहुत पढ़ी-लिखी थीं और हादसे के समय नौकरी नहीं कर रही थीं. इसलिए उन्हें होममेकर नहीं माना जा सकता और इस मद में उसे कोई मुआवजा नहीं मिलना चाहिए.
मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT), जहां शुरुआत में मुआवजे का दावा किया गया था, उसने भविष्य की कमाई के नुकसान के लिए कोई रकम देने से इनकार कर दिया था. हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने शिकायत करने वाली महिला की शैक्षणिक योग्यता और उनकी कमाई करने की क्षमता को ध्यान में रखे बिना यह माना कि वह भविष्य की कमाई के नुकसान के लिए किसी मुआवजे की हकदार नहीं थी.
2018 में हाई कोर्ट का रुख करते हुए महिला ने कहा कि अगर यह मान भी लिया जाए कि हादसे के दिन वह गेस्ट लेक्चरर के तौर पर काम नहीं कर रही थी, तो स्थायी दिव्यांगता को देखते हुए अब वह होममेकर थी और इस भूमिका के लिए उन्हें मुआवजा मिलना चाहिए.
कानूनी हक या कॉन्ट्रैक्ट के तहत मिलने वाला लाभ?
होममेकर की परिभाषा के अलावा, इस मामले में यह भी सवाल था कि क्या दुर्घटना के मुआवजे से मेडिकल इंश्योरेंस से मिले पैसे को घटाया जाना चाहिए.
KSRTC ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता के मेडिकल बिलों का भुगतान पहले ही ICICI Lombard General Insurance Company Limited ने कर दिया था. इसलिए उसी रकम को दोबारा मुआवजे में देना अनुचित “डबल बेनिफिट” होगा.
जस्टिस सुमलता ने 4 अगस्त को “डबल बेनिफिट” वाले इस तर्क को खारिज कर दिया. उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट के तहत मिलने वाले अधिकार और कानून से मिलने वाले अधिकार के बीच अंतर बताया.
सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा, “Mediclaim/medical insurance के तहत मिली रकम को संबंधित ट्रिब्यूनल द्वारा तय किए गए मुआवजे से नहीं घटाया जा सकता…ये दोनों अलग-अलग आधार पर हैं—एक कानूनी है, जबकि दूसरा कॉन्ट्रैक्ट के तहत है.”
कोर्ट ने कहा कि इंश्योरेंस से मिला पैसा पहले से प्रीमियम के तौर पर दी गई रकम का “नतीजा” है. इसलिए इससे महिला को मोटर व्हीकल्स एक्ट के तहत मिलने वाले कानूनी मुआवजे का दावा करने से नहीं रोका जा सकता.
अपने अंतिम फैसले में हाई कोर्ट ने महिला की शैक्षणिक योग्यता के बावजूद उनके घर के काम और परिवार की देखभाल को होममेकर की सेवा माना और उनकी अनुमानित आय 8,000 रुपये प्रति माह तय की. हादसे के समय उनकी उम्र 25 साल थी, इसलिए 18 का मल्टीप्लायर लगाया गया. पूरे शरीर की 10 प्रतिशत दिव्यांगता को ध्यान में रखते हुए बेंच ने आर्थिक नुकसान के लिए 1,72,800 रुपये और ठीक होने के दौरान सेवाओं के नुकसान के लिए अतिरिक्त 24,000 रुपये दिए.
इस तरह हाई कोर्ट ने कुल मुआवजे में 1,96,800 रुपये की बढ़ोतरी की, साथ में 6 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देने का आदेश दिया. कोर्ट ने KSRTC की अपील खारिज कर दी और निगम को आठ हफ्तों के भीतर यह रकम जमा करने का आदेश दिया.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: शिकायत में देरी से लेकर आरोपी से संपर्क तक: यौन हमले के बाद सर्वाइवर को कैसे देखता है कानून?