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Wednesday, 19 August, 2026
होमदेशगायब टेंडर फाइलें और करोड़ों का लेन-देन: दिल्ली मेडिकल घोटाले की जांच में क्या सामने आया

गायब टेंडर फाइलें और करोड़ों का लेन-देन: दिल्ली मेडिकल घोटाले की जांच में क्या सामने आया

जांचकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि आरोपी डॉ. विनोद कुमार रंगा और अन्य लोगों ने हेरफेर वाले टेंडर और बढ़ा-चढ़ाकर की गई खरीद के ज़रिए दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग के साथ 750 करोड़ रुपये से ज़्यादा की धोखाधड़ी की.

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नई दिल्ली: दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग को कथित तौर पर 750 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान पहुंचाने के मामले में केंद्रीय खरीद एजेंसी (CPA) के पूर्व हेड ऑफ ऑफिस डॉ. विनोद कुमार रंगा और उनके साथियों ने कथित तौर पर टेंडरों में हेरफेर और दवाइयों और मेडिकल उपकरणों की बढ़ी हुई कीमतों के जरिए यह धोखाधड़ी की. मामले की जांच कर रहे अधिकारियों ने सोमवार को राउज एवेन्यू कोर्ट में यह जानकारी दी. जांचकर्ताओं ने रंगा की जमानत याचिका का विरोध किया.

CPA, जो स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के तहत काम करती है, दिल्ली सरकार के अस्पतालों के लिए दवाइयां, सर्जिकल सामान और मेडिकल उपकरण खरीदने की जिम्मेदार है.

कोर्ट में सामने आई इस नई जानकारी से कथित धोखाधड़ी पहले की रिपोर्टों में बताए गए आंकड़े से काफी बड़ी हो गई है.

कोर्ट ने आरोपों की प्रकृति और गंभीरता, रंगा की कथित भूमिका और जांच के मौजूदा चरण को देखते हुए उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी.

सैकड़ों खातों में भेजे गए करोड़ों रुपये

जांचकर्ता मामले में पैसों के लेन-देन का बारीकी से पता लगा रहे हैं. उन्होंने कोर्ट को बताया कि जैसे ही सरकारी खातों से पैसा निकला और दिल्ली स्वास्थ्य विभाग के खरीद घोटाले में कथित तौर पर पसंद की गई कंपनियों के खातों में पहुंचा, उसे सैकड़ों बैंक खातों के जरिए आगे भेज दिया गया. इनमें ऐसी संस्थाओं के खाते भी शामिल थे, जिनका मेडिकल सामान से कोई स्पष्ट संबंध नहीं था. कथित तौर पर करोड़ों रुपये नकद निकाले गए या दूसरे खातों में भेजे गए.

दिल्ली की एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) ने रंगा पर बड़े स्तर पर वित्तीय गड़बड़ी, टेंडरों में हेरफेर और दिल्ली सरकार के अस्पतालों के लिए मेडिकल सामान की खरीद में कीमतें बढ़ाने की कथित आपराधिक साजिश का हिस्सा होने का आरोप लगाया है.

2 जून 2026 को दर्ज FIR में आरोप लगाया गया था कि टेंडरों में कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया और सरकारी पैसा आरोपियों से जुड़ी संस्थाओं को जारी किया गया. दिप्रिंट ने पहले भी इनमें से कई आरोपों की जानकारी दी थी. रंगा को 18 जून 2026 को गिरफ्तार किया गया था और वह अभी न्यायिक हिरासत में है. उसने जुलाई के आखिर में जेल से रिहाई की मांग करते हुए जमानत याचिका दायर की थी.

राउज एवेन्यू कोर्ट की विशेष जज विद्या प्रकाश के आदेश में पैसों के उस लेन-देन का जिक्र है, जिसका जांचकर्ता अभी भी पता लगा रहे हैं. आदेश में गायब टेंडर फाइलों, गायब मोबाइल फोन और सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों से जुड़ी नई खरीद गड़बड़ियों का भी जिक्र है.

कोर्ट ने कहा, “मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों, आरोपों की प्रकृति, आरोपित अपराधों की गंभीरता, आरोपी की कथित भूमिका, जांच के चरण और दोषी ठहराए जाने पर मिलने वाली सजा की गंभीरता को देखते हुए… कोर्ट की राय है कि इस समय आरोपी जमानत पाने का हकदार नहीं है.”

रंगा की जमानत का विरोध करते हुए अभियोजन पक्ष ने कहा कि जांच अभी शुरुआती चरण में है और उसकी रिहाई से वह गवाहों को प्रभावित कर सकता है, सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता है या डिजिटल रिकॉर्ड नष्ट कर सकता है.

अभियोजन के मुताबिक, जांच में टीबी मुक्त भारत अभियान और दूसरे सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों से जुड़ी खरीद में भी कथित गड़बड़ियां सामने आई हैं.

मामले में पूर्व DGHS प्रमुख डॉ. वत्सला अग्रवाल, CPA के पूर्व अधिकारी नीरज चोपड़ा और कारोबारी राजीव कुमार, जिन्हें राजीव रंगीला के नाम से भी जाना जाता है, को भी सह-आरोपी बनाया गया है. अग्रवाल को मंगलवार को मेडिकल आधार पर चार हफ्ते की अंतरिम जमानत दी गई.

सैकड़ों खाते, करोड़ों रुपये नकद

अभियोजन के मुताबिक, पैसों का लेन-देन तब शुरू हुआ जब सरकारी भुगतान उन कंपनियों के खातों में पहुंचा, जो सह-आरोपी राजीव कुमार उर्फ राजीव रंगीला से कथित तौर पर जुड़ी थीं. FIR में उसे मुख्य निजी सप्लायर और संपर्क कराने वाले व्यक्ति के रूप में नामित किया गया है.

दप्रिंट ने पहले बताया था कि जांचकर्ताओं के मुताबिक रंगीला ने कंपनियों के साथ मिलकर ऐसे टेंडर की शर्तें तैयार कीं, जिनसे पहले से तय कंपनियों को फायदा हो. इसके बाद कथित तौर पर ये शर्तें रंगा को दी जाती थीं. ACB का आरोप है कि रंगा इन शर्तों को टेंडर समितियों के सामने रखता था और अधिकारियों पर उन्हें मंजूर करने का दबाव डालता था. इसके बाद चुनी गई कंपनियां ठेके हासिल कर सकती थीं. कुछ टेंडर ऐसे समय में दिए गए और उनके भुगतान जारी किए गए, जब सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल पर वे अभी भी “सक्रिय” या प्रक्रिया में दिख रहे थे.

नए कोर्ट आदेश से पता चलता है कि इन भुगतानों के बाद कथित तौर पर क्या हुआ. अभियोजन ने कोर्ट को बताया कि जांचकर्ताओं ने CPA, पे एंड अकाउंट्स ऑफिस और बैंकों के रिकॉर्ड की जांच की और कंपनियों को किए गए भुगतानों का पता लगाया. अभियोजन के मुताबिक, कंपनियों द्वारा सामान की आपूर्ति करने के तुरंत बाद भुगतान जारी कर दिए गए. इसके बाद पैसा “तुरंत सैकड़ों दूसरे खातों में ट्रांसफर कर दिया गया”.

जांचकर्ताओं का आरोप है कि इन खाताधारकों का CPA या DGHS द्वारा खरीदे गए मेडिकल सामान से कोई स्पष्ट संबंध नहीं था. इन खातों से “करोड़ों रुपये” नकद निकाले गए या दूसरे खातों में भेजे गए. अभियोजन ने कोर्ट को बताया, “पैसों के पूरे लेन-देन और आखिर में पैसा किसे मिला, इसकी पहचान अभी की जा रही है.”

अभियोजन ने यह भी कहा कि खरीद के प्रस्तावों को सिर्फ आगे बढ़ाने तक रंगा की भूमिका सीमित नहीं थी. आरोप है कि खरीद प्रक्रिया में कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाए जाने के बाद रंगा ने उनके सरकारी भुगतान को मंजूर कराने में मदद की.

यह भी आरोप लगाया गया कि जब ड्रॉइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (DDO) मौजूद नहीं था, तब रंगा ने उसकी जगह बिलों पर हस्ताक्षर किए और सवालों के घेरे में आए टेंडरों से जुड़े बिलों को खुद पे एंड अकाउंट्स ऑफिस ले जाकर प्रक्रिया पूरी कराई.

पहले की जांच में ACB ने आरोप लगाया था कि इस व्यवस्था से निजी कंपनियों को बढ़ी हुई कीमतों के जरिए बड़ा फायदा हुआ. उदाहरण के लिए, एक पोर्टेबल X-ray मशीन जिसे निर्माता ने दूसरे सरकारी विभागों को करीब 10 लाख रुपये में बेचा था, उसे CPA ने 33 लाख रुपये प्रति मशीन की कीमत पर खरीदा. ACB का आरोप है कि ऐसी 448 मशीनों का ऑर्डर दिया गया और मशीनों के लिए 148 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया, जबकि ACB के मुताबिक इनकी कीमत 45 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं थी.

फाइलें गायब, मोबाइल फोन भी गायब

कोर्ट के सामने एक अहम मुद्दा उन टेंडर फाइलों का गायब होना था, जिन्हें खुद रंगा ने अपने पास रखने का आदेश दिया था. जांचकर्ताओं को 11 नवंबर 2025 का रंगा का एक आदेश मिला, जिसमें टेंडर से जुड़ी फाइलों और संबंधित बोलियों को उसकी निगरानी में रखने का निर्देश दिया गया था.

इसका कारण “गोपनीयता सुनिश्चित करना, सामग्री के अनधिकृत इस्तेमाल या खुलासे को रोकना और फाइलों की आवाजाही का रिकॉर्ड रखना” बताया गया था. आदेश में आगे कहा गया था कि “टेंडर से जुड़ी फाइल और संबंधित बोलियां CPA के हेड ऑफ ऑफिस की सुरक्षित निगरानी में रखी जाएंगी.”

अभियोजन द्वारा पेश किए गए कर्मचारियों के बयानों के मुताबिक, इस आदेश का पालन किया गया और फाइलें रंगा के पास ही रहीं. बाद में ये फाइलें नहीं मिलीं. अभियोजन का आरोप है कि खरीद का भुगतान होने के बाद इन फाइलों को हटा दिया गया या नष्ट कर दिया गया, ताकि रंगा और उसके कथित साथियों को बचाया जा सके.

कोर्ट ने अभियोजन के इस आरोप को दर्ज किया कि रंगा ने “जानबूझकर उन फाइलों को नष्ट किया”, जिससे महत्वपूर्ण सबूत गायब हो गए. इन फाइलों में उन संस्थाओं की जानकारी थी, जिन्होंने खरीद की मांग की थी, प्रक्रिया शुरू करने वाले अधिकारियों की जानकारी और शर्तें तैयार करने तथा बोलियों का मूल्यांकन करने वाली समितियों के सदस्यों की जानकारी थी. जांचकर्ता अब तक इन फाइलों को बरामद नहीं कर पाए हैं.

अभियोजन ने रंगा के मोबाइल फोन को लेकर भी सवाल उठाए. उसका कहना था कि फोन में मामले से जुड़ा डिजिटल सबूत हो सकता है.

ACB की FIR में दर्ज है कि जब जांच के दौरान विजिलेंस निदेशालय की टीम CPA ऑफिस पहुंची, तो रंगा कथित तौर पर अचानक वहां से चला गया. वहां मौजूद अधिकारियों ने टीम को बताया कि संबंधित फाइलें रंगा के पास हैं और उसकी गैरमौजूदगी में उन्हें पेश नहीं किया जा सकता. जांचकर्ताओं ने कथित तौर पर उससे संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उसका फोन बंद था या उस तक संपर्क नहीं हो पा रहा था.

अभियोजन ने कोर्ट को बताया कि रंगा ने संबंधित अवधि में इस्तेमाल किए गए मोबाइल फोन को “नष्ट या छिपा दिया”. उसने इस आरोप का इस्तेमाल यह कहने के लिए किया कि रंगा को रिहा करने से वह डिजिटल सबूतों में दखल दे सकता है.

X-ray की फाइलें

अभियोजन ने कोर्ट को FIR दर्ज होने के बाद मिली शिकायतों के बारे में भी बताया. इनमें से एक शिकायत रेड माम्बा फ़ोर्स प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ी थी. इस कंपनी को दिल्ली में टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत मोबाइल डिजिटल चेस्ट X-ray स्क्रीनिंग के लिए रेडियोग्राफर उपलब्ध कराने का काम दिया गया था.

अभियोजन का आरोप है कि कंपनी को काम का फिजिकल ऑर्डर दे दिया गया, जबकि GeM पर उसकी बोली अभी भी “pending” दिखाई जा रही थी. रंगा ने कथित तौर पर दिल्ली सरकार के अस्पतालों और चेस्ट क्लीनिकों को ईमेल भेजकर कंपनी के रेडियोग्राफरों को काम शुरू करने की अनुमति देने को कहा था.

अभियोजन के मुताबिक, CPA में इस बोली से जुड़ी फाइलें भी गायब थीं. GeM के जरिए जारी एक अन्य सैनिटेशन सर्विस टेंडर से जुड़ी फाइलें भी नहीं मिलीं. अभियोजन ने कहा कि फाइलें कैसे गायब हुईं, इसकी जांच अभी जारी है.

‘भाई’ के फोन, अधिकारियों का तबादला

अभियोजन ने सह-आरोपी CPA अधिकारी नीरज चोपड़ा के बयान का भी हवाला दिया. आरोप है कि रंगा CPA अधिकारियों पर सवालों के घेरे में आई खरीद की फाइलों को मंजूर करने का दबाव डालता था. चोपड़ा ने कथित तौर पर “भाई” के निर्देशों या फोन कॉल का जिक्र किया. अभियोजन के मुताबिक, “भाई” का मतलब राजीव कुमार उर्फ राजीव रंगीला से था. वह कारोबारी और मुख्य निजी सप्लायर था, जिसका कथित तौर पर फायदा पाने वाली कंपनियों से संबंध था और जिसका नाम ACB की FIR में है.

जिन अधिकारियों ने इस प्रक्रिया का विरोध किया, उन्हें कथित तौर पर उनके पदों से हटा दिया गया. जांच के दौरान जिन दो महत्वपूर्ण गवाहों के बयान दर्ज किए गए, उन्होंने कथित तौर पर खरीद प्रक्रिया और रंगा की भूमिका को लेकर अभियोजन के दावे की पुष्टि की.

अभियोजन ने कहा कि जांचकर्ता अभी भी बैंक रिकॉर्ड, डिजिटल सबूत और पैसों के पूरे नेटवर्क की जांच कर रहे हैं.

अभियोजन ने दलील दी, “आवेदक/आरोपी के संबंध में जांच अभी पूरी नहीं हुई है और अगर उसे जमानत पर रिहा किया जाता है, तो वह गवाहों को प्रभावित कर सकता है, सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता है और डिजिटल रिकॉर्ड नष्ट कर सकता है, जैसा कि उसने गिरफ्तारी से पहले किया है.”

रंगा की ओर से वकील विजय बिश्नोई ने जमानत याचिका में दलील दी कि खरीद पर उसका कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं था और मंजूरी से पहले फाइलें कई प्रशासनिक, वित्तीय और तकनीकी जांच से गुजरती थीं. उसने कहा कि वह अगस्त 2025 में ही हेड ऑफ ऑफिस बना था और फाइलें रखने की जिम्मेदारी उसकी नहीं थी. उसके मुताबिक, जून 2026 में फाइलें पहले ही किसी दूसरे अधिकारी को सौंप दी गई थीं.

बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि रंगा को जून 2026 में अनुशासनात्मक कार्रवाई लंबित रहने तक निलंबित कर दिया गया था और उसका पहले कोई अनुशासनात्मक रिकॉर्ड नहीं था. बिश्नोई ने दलील दी कि इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, बैंक रिकॉर्ड और पैसों के लेन-देन की जांच ACB रंगा को हिरासत में रखे बिना भी पूरी कर सकती है.

कोर्ट ने आरोपों की प्रकृति और गंभीरता, रंगा की कथित भूमिका और जांच के मौजूदा चरण को देखते हुए जमानत याचिका खारिज कर दी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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