Monday, 8 August, 2022
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तुसाद, पाटकर से लेकर AAP तक- ‘एक्टिविस्ट’ दिल्ली के LG वीके सक्सेना के खाते में दर्ज हैं कई जीत

दिल्ली के एलजी सक्सेना का करियर ग्राफ उनसे पहले इस पद रहे लोगों से एकदम अलग तरह का ही है, जो या तो सिविल सेवक थे या फिर डिफेंस बैकग्राउंट वाले थे.

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नई दिल्ली: विनय कुमार सक्सेना को बतौर एलजी दिल्ली के उपराज्यपाल दफ्तर में पदभार संभाले बमुश्किल 10 सप्ताह का समय ही बीता है और उन्होंने अरविंद केजरीवाल की सरकार को अब तक के सबसे बड़े यू-टर्न के लिए बाध्य करके एक और अप्रत्याशित सफलता हासिल कर ली है. उन्होंने एलजी की वीटो पावर का इस्तेमाल करके नहीं, बल्कि सीबीआई जांच की धमकी देकर दिल्ली सरकार को बहुप्रचारित नई शराब नीति के रोलबैक के लिए मजबूर किया.

उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी (आप) को अहसास करा दिया है कि उसे उनके ट्रैक रिकॉर्ड के बारे में कहीं और ज्यादा बारीकी से अध्ययन करना चाहिए था.

केजरीवाल की तरह राजनीति में आने से पहले तक सक्सेना एक पूर्णकालिक एक्टिविस्ट थे, जो किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े थे. यहां तक कि भाजपा या आरएसएस से भी नहीं. मेधा पाटकर और तीस्ता सीतलवाड़ से लेकर लंदन स्थित मैडम तुसाद संग्रहालय तक, उन्होंने तमाम कड़ी जंग लड़ीं और उसमें ज्यादातर में जीत भी हासिल की.

खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) प्रमुख के तौर पर 2017 में वह उस समय एक विवाद में घिर गए जब इस सरकारी निकाय ने अपने वार्षिक कैलेंडर और डायरियों में महात्मा गांधी की तस्वीर की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर का इस्तेमाल किया. सक्सेना ने उस समय मोदी को ‘खादी का सबसे बड़ा ब्रांड एंबेसडर’ बताते हुए इस कदम का बचाव किया.

पिछले दो वर्ष में सक्सेना मोदी सरकार की नागरिकता (संशोधन) अधिनियम जैसी नीतियों को अपने समर्थन को लेकर खास तौर पर काफी मुखर रहे हैं, और राहुल गांधी जैसे प्रधानमंत्री के राजनीतिक विरोधियों के आलोचक हैं.

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केवीआईसी अध्यक्ष के ट्विटर हैंडल से किए गए एक ट्वीट में राहुल को संसद सत्र के दौरान यूएस पोलो ब्रांड की शर्ट पहनने के लिए ‘भारत की जमीनी हकीकत’ से ‘दूर’ करार दिया गया था.

देश की एक प्रमुख सीमेंट निर्माता कंपनी में कॉर्पोरेट एक्जीक्यूटिव रहने से दिल्ली के एलजी बनने तक सक्सेना का करियर ग्राफ अपने पहले इस पद पर रहे लोगों की तुलना में एकदम अलग ही तरह का रहा है, जो या तो सिविल सेवक थे या एक डिफेंस बैकग्राउंड से आते थे.

लुटियंस दिल्ली में सक्सेना भले ही उतने ज्यादा चर्चित न हों, लेकिन गुजरात के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में खासे लोकप्रिय रहे हैं.

गुजरात के तमाम सिविल सेवक और सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि उन्हें सुर्खियों में लाने का श्रेय सबसे ज्यादा मेधा पाटकर के नेतृत्व वाले नर्मदा बचाओ आंदोलन के खिलाफ एक मजबूत काउंटर-मूवमेंट खड़ा करने को जाता है. पाटकर के आंदोलन के जवाब में यह अभियान खासकर 1990 के दशक की शुरुआत से 2000 के दशक के अंत तक चला था.

2015 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के एक साल बाद सक्सेना को केवीआईसी प्रमुख नियुक्त किया गया—जहां उन्होंने इस साल अप्रैल तक सबसे लंबे कार्यकाल के लिए पदभार संभाला, और उन्हें इस दौरान आयोग के कारोबार को बढ़ावा देने का श्रेय भी दिया जाता है.

26 मई को उन्होंने अनिल बैजल की जगह दिल्ली एलजी के रूप में कार्यभार संभाला था.

केंद्र सरकार की तरफ से उनकी नियुक्ति ऐसे समय की गई है जब अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आप, जिसकी दिल्ली में निर्वाचित सरकार है, अपने पंख फैलाने की कोशिश कर रही है, और खासकर इस साल के शुरू में पंजाब में अपनी जीत के बाद खुद को गुजरात और हिमाचल जैसे राज्यों—जहां इस साल के अंत में चुनाव होने हैं—में भाजपा के लिए एक चुनौती के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रही है.

जबसे 63 वर्षीय सक्सेना दिल्ली के राज निवास पहुंचे हैं, अक्सर ही विभिन्न मुद्दों पर सत्तारूढ़ दल के साथ अपने टकराव को लेकर चर्चाओं में बने हुए हैं.

बहुआयामी व्यक्तित्व

सक्सेना का व्यक्तित्व बहुआयामी नजर आता है.

राज निवास की वेबसाइट पर उनका बायो इसे दर्शाने के लिए पर्याप्त है, जो कुछ इस तरह है—‘सोच के लिहाज से एक परोपकारी और कार्रवाई के मामले में एक कॉर्पोरेट वैज्ञानिक.’ बायो बताता है कि उनके पास पायलट का लाइसेंस भी है.

एक पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी ने सक्सेना के बारे में एक किस्सा साझा करते हुए उन्हें एक ‘उत्साही गांधीवादी’ करार दिया.

अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर इस पूर्व सिविल सेवक ने बताया कि सक्सेना ने जब 2008 में लंदन के मैडम तुसाद वैक्स म्यूजियम का दौरा किया, तो कथित तौर पर ये देखकर खासे नाराज हो गए कि महात्मा गांधी की प्रतिमा को ‘दूसरी मंजिल पर एक आइसक्रीम शॉप के नजदीक एक कूड़ेदान’ के पास लगाया गया था और उन्हें ‘दुनिया की अन्य प्रमुख हस्तियों के साथ जगह नहीं दी गई है.’

पूर्व आईएएस अधिकारी ने कहा, ‘उन्होंने (सक्सेना ने) संग्रहालय में गांधी की प्रतिमा की स्थिति के बारे में शिकायत करते हुए गॉर्डन ब्राउन (यूके के तत्कालीन प्रधानमंत्री) को पत्र लिखा. पत्र में उन्होंने कथित नस्लीय पूर्वाग्रह का भी जिक्र किया.’

उन्होंने बताया, ‘गांधी की प्रतिमा को तुरंत संग्रहालय के भूतल पर ‘विश्व नेताओं’ की प्रतिमाओं वाले हॉल में ले जाया गया. वह (सक्सेना) अक्सर राजनीतिक हलकों में और नौकरशाहों के साथ बैठकों के दौरान इसका श्रेय लेते हुए इस घटना के बारे में बताते हैं.’

सक्सेना ने जब दिल्ली के उपराज्यपाल के तौर पर कार्यभार संभाला, केंद्र सरकार की तरफ से दिल्ली राज निवास को भेजे गए उनके संक्षिप्त बायो में मैडम तुसाद की घटना का भी उल्लेख था—जिसकी एक प्रति दिप्रिंट ने देखी है. लेकिन अंततः इसे राज निवास की वेबसाइट पर दर्शाए गए बायो में शामिल नहीं किया गया.

नोट में घटना के बारे में कोई ब्योरा न देते हुए कहा गया है, ‘अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर, उन्होंने एक साहसिक कदम उठाते हुए महात्मा गांधी की प्रतिमा को लंदन के मैडम तुसाद वैक्स संग्रहालय में विश्व नेताओं के प्रदर्शनी हॉल में स्थानांतरित कराया था.’


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नर्मदा योद्धाओं के खिलाफ लड़ाई

सक्सेना को कई सालों से जानने का दावा करने वाले अहमदाबाद के एक वकील कहते हैं कि वे एक ‘ऐसे व्यक्ति हैं जो कुछ भी बीच में छोड़ना नहीं चाहते.’

माना जाता है कि सक्सेना ने नर्मदा बचाओ आंदोलन के खिलाफ एक काउंडर-मूवमेंट चलाकर भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारियों और पार्टी के वैचारिक अभिभावक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का ध्यान आकर्षित किया था.

सक्सेना ने 1991 में स्थापित नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज नामक एक एनजीओ के जरिये पाटकर और मुंबई की एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड़ के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी है.

गुजरात के कई सिविल सेवकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दिप्रिंट को बताया कि पाटकर और विभिन्न नदी परियोजनाओं का विरोध करने वाले उनके सहयोगी न केवल 2001 और 2014 के बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार के घोर विरोधी थे, बल्कि केशुभाई पटेल और चिमनभाई पटेल सहित उनके पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों के खिलाफ भी मुखर थे.

माना जाता है कि सक्सेना की कानूनी लड़ाई—भले ही उनमें से अधिकांश अभी भी लंबित हैं—ने सरदार सरोवर बांध परियोजना की राह में तमाम बाधाओं को दूर करने में कथित तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

वकील ने कहा, ‘जब पाटकर की बात आती है, तो सक्सेना कभी हार न मानने वाले की स्थिति में आ जाते हैं.’

केवीआईसी अध्यक्ष बनने के बाद भी आयोग की वेबसाइट पर सक्सेना के बायो में पाटकर के आंदोलन का उल्लेख था और इसे एक ‘दुष्टतापूर्ण साजिश’ करार दिया गया था जिस सक्सेना ने ‘उजागर’ कर दिया था.

वकील ने बताया, ‘अप्रैल 2021 में पाटकर पश्चिम बंगाल की एक यात्रा पर थीं, और मुख्य तौर पर कृषि कानूनों को लेकर उस समय अपने चरम पर रहे आंदोलन के संबंध किसानों के साथ बातचीत कर रही थीं. तभी सक्सेना, जो उस समय खादी आयोग के अध्यक्ष थे, भी उनके पीछे वहां पहुंच गए और जिन क्षेत्रों में पाटकर ने दौरा किया, वहीं उनके खिलाफ अपने जवाबी आंदोलन में स्थानीय लोगों के साथ समानांतर संवाद सत्र आयोजित किए.

सक्सेना के एनजीओ ने कथित तौर पर अभिनेता आमिर खान से 2006 में नर्मदा बांध से प्रभावित लोगों के पुनर्वास पर पाटकर के समर्थन में जारी बयानों के लिए माफी मांगने को कहा था, और अभिनेत्री शबाना आजमी को 2008 में दो बार पत्र लिखकर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस की एक रिपोर्ट का समर्थन करने पर निराशा जताई थी जो परियोजना के लिए महत्वपूर्ण थी.

सक्सेना बतौर एक्टिविस्ट अपनी सक्रियता की वजह से गुजरात में चिमनभाई पटेल-नीत सरकार से लेकर भाजपा के अन्य मुख्यमंत्रियों तक की गुड बुक में शामिल रहे हैं, क्योंकि उनके अभियान 1990 और 2000 के दशक में भाजपा सरकारों के ‘विकास समर्थक’ रुख के पक्ष में थे.

अहमदाबाद में रहने वाले 82 वर्षीय पत्रकार से नागरिक अधिकार कार्यकर्ता बने प्रकाश एन. शाह कहते हैं, ‘मुझे नहीं याद कि मैंने उन्हें कभी भी ग्राउंड पर देखा हो. लेकिन फिर भी सुर्खियों में रहते थे, और अक्सर गुजरात के सामाजिक हलकों में उन पर चर्चा होती थी. इसकी वजह होते थे उनकी तरफ से एक के बाद एक दायर किए जाने वाले मुकदमे या फिर गुजरात के अखबारों में अक्सर छपने वाले उनके एनजीओ के विज्ञापन, जो कई बार मानहानिकारक माने जाते थे और अमूमन राज्य सरकार के आलोचकों पर निशाना साधने वाले होते थे.

कानपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक

उत्तर प्रदेश में जन्मे और पले-बढ़े सक्सेना ने 1981 में कानपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक की उपाधि हासिल की थी. अडानी पोर्ट्स और जे.के. सीमेंट की तरफ से विकसित किए जा रहे प्रस्तावित धोलेरा बंदरगाह परियोजना के महाप्रबंधक के रूप में 1995 में गुजरात जाने होने से पहले उन्होंने राजस्थान में एक निजी कंपनी के साथ एक सहायक अधिकारी के रूप में अपना करियर शुरू किया था.

बाद में उन्हें परियोजना के सीईओ और फिर निदेशक के पद पर पदोन्नत किया गया.

सक्सेना कथित तौर पर गुजरात को अपना ‘दूसरा गृह राज्य’ कहते हैं.

2015 में मोदी के पहली बार प्रधानमंत्री के तौर पर पद ग्रहण करने के एक साल बाद ही सक्सेना को केवीआईसी का अध्यक्ष बनाया गया था.

सक्सेना के कार्यकाल के दौरान ही केवीआईसी ने 2021-22 में 1.15 लाख करोड़ रुपये का कारोबार कर इतिहास रच दिया. यह भारत में अब तक केवीआईसी और किसी भी एफएमसीजी कंपनी का सबसे अधिक कारोबार है. संगठन की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, 2012-2013 के वित्तीय वर्ष के दौरान इसका कारोबार केवल 1,000 करोड़ रुपये था.

सक्सेना के साथ काम कर चुके केवीआईसी के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, उनका कार्यकाल आयोग के लिए नई इबारत लिखने वाला रहा जिसने खादी के बारे में धारणा को बदल दिया, और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया. अधिकारी ने कहा, ‘खादी आयोग में उनके काम ने उन्हें पीएम मोदी के और करीब ला दिया.’

पिछले कुछ वर्षों में, सक्सेना कई महत्वपूर्ण समितियों का भी हिस्सा रहे हैं, जो कुछ सिविल सेवकों के मुताबिक, उनके बढ़ते प्रभाव का संकेत हैं.

उदाहरण के तौर पर 2021 में सक्सेना को स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मनाने के लिए राष्ट्रीय समिति में बतौर सदस्य शामिल किया गया, और उच्चाधिकार प्राप्त पद्म पुरस्कार चयन समिति का सदस्य भी नामित किया गया. 2016 और 2022 के बीच सक्सेना को हर वर्ष ‘लोक प्रशासन में उत्कृष्टता के लिए प्रधानमंत्री पुरस्कार’ के मूल्यांकन के लिए ‘अधिकार प्राप्त समिति’ के सदस्य के रूप में शामिल किया जाता रहा है.


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केजरीवाल के लिए मुसीबत

सक्सेना ने जब दिल्ली के उपराज्यपाल के तौर पर कार्यभार संभाला, तभी स्पष्ट तौर पर कह दिया था, ‘मैं दिल्ली के लोगों को बताना चाहता हूं कि मैं उनके स्थानीय अभिभावक के रूप में काम करूंगा… मैं राज निवास की तुलना में सड़कों पर अधिक दिखाई दूंगा.’

सक्सेना वाकई सड़कों पर नजर आ रहे हैं. हर दूसरे दिन, उन्हें वृक्षारोपण अभियान, लैंडफिल की समीक्षा, सामुदायिक कार्यक्रमों में भाग लेने, जल उपचार संयंत्रों का निरीक्षण करने, सड़क परियोजनाओं की समीक्षा आदि के मौकों पर देखा जा सकता है.

कार्यभार संभालने के बाद से, उन्होंने यमुना की सफाई, दिल्ली में भूजल की कमी दूर करने और राष्ट्रीय राजधानी में हर साल सर्दियों में गंभीर वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सार्वजनिक अभियान शुरू किए हैं. इनमें से अधिकांश ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें बदलाव के लिए दिल्ली की आप सरकार 2015 में सत्ता में आने के बाद से संघर्ष कर रही है.

आप जहां सक्सेना पर निर्वाचित सरकार के अधिकार क्षेत्र में ‘दखल’ देने का आरोप लगाती रही है, वहीं सक्सेना ने स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें बैकफुट पर खेलना कतई पसंद नहीं है.

कार्यभार संभालने के कुछ ही हफ्ते बाद उन्होंने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को आप सरकार की तरफ से सात अस्थायी कोविड-19 अस्पतालों की स्थापना के लिए निविदाओं के अनुदान में अनियमितताओं के आरोपों की जांच करने की मंजूरी दे दी.

गत 22 जुलाई को सक्सेना ने दिल्ली की आबकारी नीति की सीबीआई जांच की सिफारिश की है.

27 जुलाई को उन्होंने दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष राम निवास गोयल को लिखा कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) अधिनियम का ‘संवैधानिक अनुपालन’ किया जाए—ये कानून पिछले साल संसद ने पारित किया था और इसमें राजधानी के कामकाज को लेकर केंद्र सरकार की तरफ से नियुक्त अधिकारी यानी एलजी को अत्यधिक शक्तियां प्रदान की गई हैं. यह सक्सेना के पूर्ववर्ती अनिल बैजल की तुलना में रणनीति के लिहाज से एक बदलाव को दिखाता है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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