नई दिल्ली: चीन भारत के लोकतांत्रिक सिस्टम को लेकर उसे एक “आइडियोलॉजिकल थ्रेट” यानी वैचारिक खतरा मानता है. यह टिप्पणी पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले ने पिछले महीने मुंबई में दिप्रिंट ऑफ़ दि कफ़ कार्यक्रम में की थी, जिससे चीनी रणनीतिक समुदाय में हलचल मच गई है.
इन टिप्पणियों के बाद सिर्फ सोशल मीडिया पर ही नहीं बल्कि चीन के अंदर बातचीत में भी प्रतिक्रिया देखने को मिली, जहां आलोचकों ने या तो बीजिंग के राजनीतिक विकल्पों का समर्थन किया या भारत की दुनिया में स्थिति को कम करके दिखाया.
पूर्व विदेश मंत्रालय में सचिव (ईस्ट) रह चुके जयदीप मजूमदार ने दिप्रिंट को बताया, “यह समझना मुश्किल नहीं है कि चीनी विद्वान दशकों से भारतीय लोकतंत्र को वैचारिक रूप से क्यों कमतर बताते रहे हैं. और आज जब अधिकांश मापदंडों पर व्यापक राष्ट्रीय शक्ति में चीन ने बढ़त बना ली है, तो उनके भीतर एक और अधिक मजबूत संतोष की भावना है.”
उन्होंने आगे कहा, “लेकिन भारत की ताकत यह है कि हम अपनी अविश्वसनीय विविधता के बीच और हर वर्ग के लोगों के अधिकारों और अवसरों से समझौता किए बिना यह सब हासिल कर पाए हैं. और यह एक ऐसा मॉडल है जिसकी वैचारिक सफलता से चीन डरता है.”
गोखले की टिप्पणी के बाद चीन से आने वाली बातचीत में यह जोर दिया गया है कि या तो चीनी मॉडल ज्यादा प्रभावी है या भारत चीन के बड़े रणनीतिक दृष्टिकोण में ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है.
एक टिप्पणीकार ने भारत की उस रुचि की तुलना की जिसमें वह सीमा पर “एक किलोमीटर सड़क बनाने” या चीन के साथ व्यापार घाटे की बात करता है, जबकि बीजिंग “यूरेशियन प्लेट को स्थिर रखने” जैसी बड़ी चिंताओं में लगा है. एक अन्य ऑनलाइन टिप्पणीकार ने भारत के कुछ हिस्सों में मौजूद “जीरो-सम दृष्टिकोण” की आलोचना की, जो चीन को एक खतरा मानता है और इस विचार के समर्थन में तर्क ढूंढता है.
फुदान यूनिवर्सिटी के साउथ एशिया विश्लेषक झोउ चेन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा, “जब एक देश [भारत] अपनी निराशा उस साझेदार पर निकालता है जो मदद कर रहा है [चीन], और उस पर चुप रहता है जो दबाव डाल रहा है [अमेरिका], तो यह हित नहीं बल्कि मनोविज्ञान है.”
गोखले की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए झोउ चेन ने कहा, “आइडियोलॉजिकल थ्रेट का दावा यह गलत समझता है कि बीजिंग वास्तव में कैसे सोचता है. किसी विचारधारा को तभी खतरा माना जाता है जब वह स्पष्ट रूप से काम कर रही हो. चीन की भारत को लेकर गणना विकास दर, सप्लाई चेन और वॉशिंगटन के साथ जुड़ाव पर आधारित है, न कि मतदान प्रणाली पर.”
ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में चाइना स्टडीज की प्रोफेसर और सेंटर फॉर नॉर्थईस्ट एशियन स्टडीज की संस्थापक निदेशक श्रीपर्णा पाठक ने ThePrint को बताया कि चीनी हलकों में भारत को लेकर यह बातचीत “असुरक्षा” से पैदा होती है.
उन्होंने कहा, “यह चिंता नई नहीं है. यह लंबे समय से मौजूद है. हाल के समय में उन्होंने एक वाइट पेपर जारी किया जिसमें चीन को ‘एक ऐसा लोकतंत्र जो काम करता है’ कहा गया, जो भारत पर एक अप्रत्यक्ष टिप्पणी थी. वे बार-बार यह मुद्दा उठाते हैं, जो उनकी अपनी गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर असुरक्षा दिखाता है.”
पाठक ने कहा कि भारत की आर्थिक वृद्धि और राजनीतिक व्यवस्था को चीनी रणनीतिक समुदाय में ज्यादा समर्थन नहीं मिलता. उन्होंने कहा कि कई दशकों की आर्थिक वृद्धि के बावजूद आज चीनी अर्थव्यवस्था धीमी हो रही है, जबकि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है, हालांकि उसकी राजनीति जटिल है. चीन के लिए सवाल यह है कि “उन्हें आखिर इससे क्या मिला?”
भारत के खिलाफ यह लगातार प्रतिक्रिया सिर्फ लोकतंत्र तक सीमित नहीं है. हाल ही में भारत में NEET पेपर लीक को लेकर विवाद के बीच भारत में चीन के दूतावास ने वहां गाओकाओ परीक्षा के सफल संचालन को दिखाया.
दूतावास ने कहा कि गाओकाओ परीक्षा, जो JEE और NEET के बराबर मानी जाती है, सुचारू रूप से आयोजित हुई और इसमें 13 मिलियन छात्र शामिल हुए.
इस बयान का हवाला देते हुए पाठक ने कहा कि “उन्हें यह दिखाने की जरूरत है कि उनका ऑटोरिटेरियन मॉडल भारतीय लोकतंत्र से बेहतर है. वरना वे ऐसा क्यों कहते?”
भारत को लेकर तिरस्कार भरा नजरिया
चीनी रणनीतिक और सोशल मीडिया समुदायों में भारत को लेकर चल रही बहस में एक तरह का तिरस्कार यानी कोंडिसेंडिंग रवैया दिखाई देता है, ऐसा पूर्व भारतीय राजदूत चीन में रह चुके अशोक के. कांथा ने बताया है.
उन्होंने कहा, “यह चीनी सोच में गहराई से बैठा हुआ है कि वे हमसे कहीं आगे हैं. ट्रैक-2 बातचीत में वे मल्टीपोलर एशिया के विचार को खारिज करते हैं और कहते हैं कि एशिया में केवल एक निवासी प्रमुख शक्ति है, और वह चीन है. उनका दिखावटी रुख यह है कि भारत चीन के लिए खतरा नहीं है, लेकिन अंदरूनी तौर पर वे भारत को एक सहायक खतरे के रूप में देखते हैं. प्रतिद्वंद्विता की प्रकृति थोड़ी जटिल है.”
उन्होंने आगे कहा, “वे भारत को अधिकतर अमेरिका के साथ अपनी प्रतिद्वंद्विता के नजरिए से देखते हैं और भारत की स्वतंत्र भूमिका पर सवाल उठाते हैं. हाल के समय में चीन और अमेरिका के संबंधों में कुछ बदलाव के बावजूद, चीन का यह आकलन नहीं बदला है कि अमेरिका के नेतृत्व वाला पश्चिम चीन को रोकने और दबाने की कोशिश कर रहा है. वे भारत को अमेरिका की इस परियोजना में शामिल मानते हैं. वे मानते हैं कि हम किसी तरह चीन को घेरने और उसका मुकाबला करने की कोशिश कर रहे हैं.”
दो सभ्यतागत शक्तियां अब तक अपने राष्ट्रीय पुनर्जागरण के पुनरुत्थान को संभालने के लिए एक “संगत” मॉडल नहीं खोज पाई हैं, ऐसा पूर्व राजदूत ने कहा, और जोड़ा कि इसका दोनों देशों के रिश्तों पर बड़ा प्रभाव पड़ता है.
तीन दशकों का मोडस विवेंडी यानी संबंधों का संतुलन 2020 की गर्मियों में गलवान झड़पों के बाद टूट गया. दोनों देशों ने सीमा मुद्दे को संभालने का एक प्रभावी तरीका पाया था, लेकिन यह मुद्दा छह साल पहले हुई गर्मियों की झड़पों के बाद फिर सामने आ गया.
भारत और चीन ने मोडस विवेंडी को फिर से परिभाषित करने की कोशिश की है, लेकिन अभी तक इस पर कोई स्पष्ट सहमति नहीं बनी है.
पूर्व विदेश सचिव जयदीप मजूमदार ने कहा, “दोनों देशों में ऑनलाइन जिंगोइज्म यानी आक्रामक राष्ट्रवाद, हमारे द्विपक्षीय संबंधों के लिए अच्छा नहीं है. किसी भी प्रगति के लिए हमें इसे कम करना होगा ताकि मोडस विवेंडी की दिशा में आगे बढ़ा जा सके. कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे अब भी बचे हैं जिनके लिए शांत और निष्पक्ष समाधान की जरूरत है. मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि राज्य नीति के तौर पर हम चीन के साथ शत्रुतापूर्ण संबंध नहीं चाहते. लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि चीन की ओर से भी यही भावना है या नहीं.”
दोनों पक्षों ने अक्टूबर 2024 में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर टकराव वाले स्थानों से पीछे हटने पर सहमति बनाई. इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से दो बार मुलाकात की, पहली बार 2024 में रूस के कज़ान शहर में BRICS शिखर सम्मेलन के मौके पर, और दूसरी बार पिछले साल SCO शिखर सम्मेलन के दौरान तियानजिन में.
इसके बावजूद, दोनों पक्ष अभी तक LAC पर तनाव कम करने के लिए किसी समझौते पर नहीं पहुंच पाए हैं. कैलाश मानसरोवर यात्रा और भारत-चीन के बीच सीधी उड़ानों जैसे जन-स्तरीय संपर्क भी रिश्तों में “रीसेट” नहीं माने जा सकते, क्योंकि संरचनात्मक समस्याएं अब भी बनी हुई हैं, ऐसा कांथा ने समझाया.
उन्होंने कहा, “दोनों देशों का समानांतर पुनरुत्थान हो रहा है, दो सभ्यतागत राज्य. राष्ट्रीय पुनर्जागरण की ये दो परियोजनाएं एक-दूसरे के साथ तालमेल में नहीं हैं. चीनी भारत को बराबरी का दर्जा देने के लिए तैयार नहीं हैं. वे अपने चाइना ड्रीम को इस तरह देखते हैं कि 21वीं सदी के मध्य तक देश की ऐतिहासिक प्रमुख शक्ति की स्थिति बहाल हो. यह कथा ‘सेंचुरी ऑफ नेशनल ह्यूमिलिएशन’ के कारण बाधित हुए ऐतिहासिक क्रम को वापस लाने की है. इस चीन-नेतृत्व वाले पदानुक्रम में भारत को एक छोटे शक्ति के रूप में फिट होना होगा.” पूर्व भारत के चीन में राजदूत ने कहा, “भारत श्रेष्ठता नहीं चाहता, लेकिन वह किसी अधीन भूमिका को भी स्वीकार नहीं करेगा.”
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