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Friday, 19 June, 2026
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डिजिटल शिक्षा तक असमान पहुंच से सामाजिक विभाजन और भी गहरा सकता है: शिक्षाविद

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नयी दिल्ली, सात जून (भाषा) शिक्षाविद शिशिर जयपुरिया ने कहा कि जब तक उच्च गुणवत्ता वाली डिजिटल शिक्षा किफायती और सभी के लिए सुलभ नहीं होगी, तब तक प्रौद्योगिकी सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम करने के बजाय उन्हें और बढ़ाने का जोखिम पैदा करेगी।

उन्होंने आगाह किया कि तेजी से बदलते शैक्षिक परिदृश्य में ग्रामीण और निम्न-आय वर्ग के विद्यार्थियों को अब भी संरचनात्मक चुनौतियों और नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

‘सेठ आनंदराम जयपुरिया ग्रुप ऑफ एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस’ के अध्यक्ष जयपुरिया ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा कि डिजिटल शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित कक्षाओं और ऑनलाइन शिक्षा मंचों को बढ़ावा देने से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच का दायरा बढ़ा है, लेकिन किफायती, भाषा और शिक्षकों की उपलब्धता में महत्वपूर्ण कमियां बनी हुई हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘जब तक उच्च गुणवत्ता वाली डिजिटल शिक्षा सस्ती और सार्वभौमिक रूप से सुलभ नहीं हो जाती, तब तक प्रौद्योगिकी मौजूदा सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम करने के बजाय उन्हें और बढ़ा सकती है।’’

जयपुरिया ने बताया कि छोटे शहरों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के छात्रों के पास अक्सर डिजिटल उपकरणों, सतत इंटरनेट कनेक्शन और गुणवत्तापूर्ण ऑनलाइन कोचिंग संसाधनों तक पहुंच की कमी होती है, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए तेजी से आवश्यक होते जा रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों के लिए एक और बड़ी चुनौती योग्य शिक्षकों की लगातार बनी हुई कमी है। बड़ी संख्या में स्कूल अब भी केवल एक या दो शिक्षकों के भरोसे संचालित हो रहे हैं, जहां उन्हें कई कक्षाओं और विषयों को पढ़ाना पड़ता है।’’

उन्होंने वंचित और पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षकों की भर्ती, प्रशिक्षण और उन्हें सेवा में बनाए रखने के लिए अधिक ठोस प्रयास किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि इंटरनेट कनेक्टिविटी अब अधिकांश गांवों तक पहुंच चुकी है और दीक्षा तथा स्वयम् जैसे मंचों के माध्यम से शैक्षणिक सामग्री तक पहुंच का दायरा बढ़ा है। ऐसे में यदि तकनीक को समावेशी तरीके से लागू किया जाए, तो यह शिक्षा में मौजूद सीखने की खाइयों को पाटने की बड़ी क्षमता रखती है। हालांकि, किफायती शिक्षा और भाषा संबंधी बाधाएं अब भी प्रमुख चिंताएं बनी हुई हैं।

जयपुरिया ने कहा, ‘‘किफायती और भाषा संबंधी चुनौतियां भारत में शैक्षिक समानता के लिए गौण नहीं बल्कि केंद्रीय महत्व रखती हैं।’’ उन्होंने कहा कि हालांकि भारत में मोबाइल डेटा की दरें विश्व में सबसे सस्ती हैं, फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट का उपयोग शहरी केंद्रों की तुलना में काफी कम है।

उन्होंने भारतीय भाषाओं के अधिक एकीकरण की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि डिजिटल पठन-पाठन व्यवस्था में अंग्रेजी का प्रभुत्व अक्सर छात्रों के एक बड़े वर्ग के लिए इसकी पहुंच को सीमित कर देता है।

उन्होंने कहा कि एआई आधारित अनुवाद और इस क्षेत्र में हो रही प्रगति इस चुनौती को दूर करने में मददगार साबित हो सकती है।

भाषा आशीष नरेश

नरेश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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