नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें केंद्र सरकार को भारत में पोर्नोग्राफिक कंटेंट (अश्लील सामग्री) देखने पर रोक लगाने के लिए राष्ट्रीय नीति और कानूनी ढांचा बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी.
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि याचिका में उठाया गया मुद्दा “बेहद महत्वपूर्ण” है, लेकिन यह ऐसा कानूनी सवाल नहीं है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट को फैसला देना चाहिए.
कोर्ट ने कहा कि यह नीति से जुड़ा मामला है, जिसमें तकनीकी विशेषज्ञता और विशेषज्ञों की राय की जरूरत है. खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) इस पर फैसला लेने का सही मंच है.
याचिका का निपटारा करते हुए कोर्ट ने कहा, “हमने याचिकाकर्ता के वकील की दलीलें सुनीं. इसमें कोई संदेह नहीं कि उठाया गया मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण है. लेकिन यह ऐसा कानूनी प्रश्न नहीं है, जिस पर इस अदालत को विचार करना चाहिए. यह नीति से जुड़ा विषय है, जिसमें तकनीकी प्रगति और विशेषज्ञों की राय की जरूरत है. ऐसे मामलों पर फैसला विशेषज्ञों, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है.”
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को संबंधित सरकारी अधिकारियों के सामने अपनी मांग रखने की छूट भी दी.
यह जनहित याचिका बीएल जैन ने दायर की थी. उनकी ओर से अधिवक्ता वरुण ठाकुर ने पैरवी की.
याचिका में केंद्र सरकार से देशभर में पोर्नोग्राफिक सामग्री देखने पर रोक लगाने के लिए राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग की गई थी. खास तौर पर नाबालिगों द्वारा ऐसे कंटेंट तक पहुंच रोकने पर जोर दिया गया था.
याचिकाकर्ता का कहना था कि इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से पोर्नोग्राफिक सामग्री आसानी से उपलब्ध हो गई है, जिससे इसकी लत बढ़ रही है.
याचिका में यह भी दावा किया गया कि ऐसे कंटेंट की बढ़ती खपत यौन अपराधों में बढ़ोतरी की एक वजह बन रही है.
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम अश्लील और पोर्नोग्राफिक सामग्री के प्रकाशन, प्रसारण और वितरण को अपराध मानता है, लेकिन पोर्न देखना अपने आप में दंडनीय नहीं है. उनके अनुसार, कानून में यही कमी है और इसे दूर करने के लिए केंद्र सरकार को नया कानूनी ढांचा तैयार करना चाहिए.