नयी दिल्ली, दो नवंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के एक आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए के सीकरी से जुड़े मामलों की जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था।
न्यायमूर्ति सीकरी से जुड़े इन मामलों में उन्होंने फैसला सुरक्षित रखने के बाद दो महीने के भीतर निर्णय नहीं सुनाया था।
न्यायमूर्ति सीकरी जुलाई 1999 में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त किए गए थे। सितंबर 2012 में उन्हें पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था।
न्यायमूर्ति अमित महाजन ने 29 अक्टूबर को सुनाए गए फैसले में कहा कि समय पर निर्णय सुनाना निश्चित रूप से जनहित का विषय है, लेकिन सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत केवल उसी जानकारी तक पहुंच उपलब्ध कराई जा सकती है, जो संबंधित लोक प्राधिकरण के पास मौजूद है।
न्यायाधीश ने कहा कि लोक प्राधिकरण जानकारी जुटाने और उसका संकलन करने के लिए बाध्य नहीं है। उन्होंने कहा कि जनहित से जुड़ी चिंताएं ऐसी जानकारी तैयार करने के लिए बाध्य नहीं कर सकतीं, जिसका रिकॉर्ड पहले से उपलब्ध नहीं है।
वर्ष 2009 में पूर्व न्यायिक अधिकारी पी डी गुप्ता ने आरटीआई आवेदन दाखिल कर दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति सीकरी द्वारा अकेले या खंडपीठ में सुने गए उन सभी मामलों का पूरा ब्योरा मांगा था, जिनमें दलीलें पूरी होने के दो महीने से अधिक समय बाद फैसला सुनाया गया था।
लोक सूचना अधिकारी (पीआईओ) ने सीआईसी के मई 2011 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें गुप्ता को आरटीआई आवेदन दाखिल करने की तारीख से पहले के केवल दो वर्षों की अवधि की मांगी गई जानकारी देने का निर्देश दिया गया था। पीआईओ ने दलील दी थी कि उच्च न्यायालय के अधिकारियों के पास इस तरह का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि उच्चतम न्यायालय द्वारा अदालतों में फैसले सुनाने की समय-सीमा के संबंध में दिशा-निर्देश तय किए जाने के बाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल ने 2003 में सभी कोर्ट मास्टर को निर्देश दिया था कि वे उन मामलों की मासिक सूची सीलबंद लिफाफे में तैयार करें, जिनमें संबंधित पीठों ने फैसला सुरक्षित रखा है।
अदालत ने कहा कि कार्यालय आदेश के तहत कोर्ट मास्टर को केवल मासिक सूचियां तैयार कर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया था, ताकि संबंधित पीठ का ध्यान लंबित मामलों की ओर दिलाया जा सके। उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों या कार्यालय आदेश में इन सूचियों को सुरक्षित रखने या न्यायाधीश के अनुसार उनका संकलन करने की कोई अनिवार्यता नहीं थी।
कोर्ट मास्टर उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश की अदालत से जुड़ा एक अधिकारी होता है।
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि आरटीआई आवेदक द्वारा मांगी गई जानकारी जुटाने के लिए न्यायमूर्ति सीकरी द्वारा सुने गए सभी मामलों के रिकॉर्ड की जांच करनी पड़ती, जो असंभव होता और इससे लोक प्राधिकरण के संसाधनों पर असंगत बोझ पड़ता।
अदालत ने कहा कि जानकारी मांगे जाने की अवधि को दो साल तक सीमित करने से इस प्रक्रिया की प्रकृति में कोई बदलाव नहीं आता। उसने कहा कि सीआईसी का आदेश इस ”अनुमान” पर आधारित था कि मांगी गई जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए।
न्यायमूर्ति सीकरी 2019 में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त हुए थे।
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