नयी दिल्ली, दो नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कथित ठग सुकेश चंद्रशेखर की उस याचिका पर सुनवाई करने से सोमवार को इनकार कर दिया, जिसमें उसने एक आपराधिक मामले में अपनी दोषसिद्धि पर रोक लगाने का अनुरोध किया है।
दिल्ली की एक अदालत ने 2017 के भ्रष्टाचार के एक मामले में जमानत दिलाने के लिए विशेष न्यायाधीश को प्रभावित करने के इरादे से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश का रूप धारण करने के आरोप में चंद्रशेखर को 20 अगस्त को दोषी ठहराया था। अदालत ने 29 अगस्त को इस मामले में उसे आठ साल की जेल की सजा सुनाई थी।
इसके बाद चंद्रशेखर ने दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया और निचली अदालत द्वारा उसकी उस अर्जी को खारिज किए जाने को चुनौती दी, जिसमें अपील का निपटारा होने तक अपनी दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया था।
उच्च न्यायालय ने 16 अक्टूबर को उसकी याचिका का निपटारा करते हुए कहा था कि दोषसिद्धि के आदेश पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं बनता।
उच्च न्यायालय ने कहा था, ‘‘दलीलों पर विचार करने के बाद इस अदालत का मानना है कि दोषसिद्धि के फैसले के खिलाफ अपील पहले से ही लंबित है। ऐसे में उसमें दर्ज निष्कर्षों पर याचिकाकर्ता की आपत्तियों, जिनमें निचली अदालत की ओर से की गई प्रतिकूल टिप्पणियां और इस्तेमाल किए गए शब्द भी शामिल हैं, पर अपीलीय अदालत को विचार करना चाहिए।”
उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता को अपीलीय अदालत के समक्ष अपनी सभी दलीलें रखने की छूट दी थी।
उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली चंद्रशेखर की याचिका पर सोमवार को उच्चतम न्यायालय में सुनवाई हुई।
न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
दिल्ली की अदालत ने चंद्रशेखर को न्यायाधीश का रूप धारण करने के मामले में आठ साल की जेल की सजा सुनाई थी और उसके इस कृत्य को “संस्थागत पवित्रता का घोर उल्लंघन” करार दिया था।
अदालत ने लोक सेवक का रूप धारण करने और लोक सेवक को डराने-धमकाने के अपराधों के लिए उसे दो-दो साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी तथा गुमनाम माध्यम से आपराधिक धमकी देने के लिए चार साल की सजा सुनाई थी।
अदालत ने निर्देश दिया था कि सभी सजाएं एक के बाद एक चलेंगी, जिससे कुल सजा आठ साल हो गई।
यह मामला 28 अप्रैल, 2017 को किए गए एक फोन से जुड़ा है। उस समय चंद्रशेखर भ्रष्टाचार के एक मामले में पुलिस हिरासत में था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, उसने एक पुलिस कांस्टेबल का मोबाइल फोन हासिल किया और उसका इस्तेमाल कर तत्कालीन विशेष न्यायाधीश पूनम चौधरी के आधिकारिक लैंडलाइन और मोबाइल फोन पर संपर्क किया। पूनम चौधरी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई कर रही थीं।
निचली अदालत ने कहा था कि चंद्रशेखर ने पहले उच्चतम न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश का निजी सचिव और बाद में स्वयं न्यायाधीश बनकर बात की थी।
अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष ने संदेह से परे यह साबित कर दिया था कि चंद्रशेखर ने न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने के इरादे से जानबूझकर खुद को उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बताया था।
भाषा गोला मनीषा
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