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Monday, 2 November, 2026
होमफीचरभारती मुडी की फुटबॉल अकादमी: आदिवासी लड़कियों को नौकरी के मौके, बाल विवाह के खिलाफ लड़ने की ताकत

भारती मुडी की फुटबॉल अकादमी: आदिवासी लड़कियों को नौकरी के मौके, बाल विवाह के खिलाफ लड़ने की ताकत

50 साल की भारती मुदी ने बांकुरा में 35 आदिवासी लड़कियों को कोचिंग देने में 17 साल बिताए हैं. उन्होंने इन लड़कियों को स्कूल में बने रहने, बंगाल के लिए खेलने और सरकारी नौकरियां पाने में मदद की है.

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छतना, पश्चिम बंगाल: भारती मुडी अपनी शिफॉन की साड़ी को कमर में खोंसती हैं, जूतों के फीते बांधती हैं और सीटी चेक करने के बाद फुटबॉल मैदान की ओर निकल पड़ती हैं. वह बंगाल के एक छोटे से आदिवासी गांव में कंकड़-पत्थरों वाली संकरी सड़क से होकर मैदान तक जाती हैं. पिछले 17 साल से 50 साल की भारती का रोजाना का यही सफर है. वह गांव की ऊबड़-खाबड़ सड़कों और कीचड़ से भरे धान के खेतों के बीच से 1.5 किलोमीटर पैदल चलती हैं. दूसरी तरफ, बांकुड़ा जिले के दुमदुमी गांव में 35 आदिवासी लड़कियां अपनी कोच का इंतजार करती हैं.

पिछले महीने सोशल मीडिया पर साड़ी पहनकर लड़कियों को फुटबॉल सिखाते हुए उनका एक वीडियो वायरल हुआ था. इसके बाद भारती को बांकुड़ा और यहां तक कि पश्चिम बंगाल से बाहर भी पहचान मिलने लगी है. सालों तक बिना किसी प्रचार के आदिवासी लड़कियों को ट्रेनिंग देने वाली भारती की अकादमी में अब अचानक ज्यादा लोग आने लगे हैं.

लेकिन 2009 में जब भारती ने लड़कियों की टीम बनाने की शुरुआत की थी, तब दुमदुमी में लड़कियों के फुटबॉल खेलने के विचार को बिल्कुल पसंद नहीं किया गया था. गांव के लोगों को लगता था कि इस खेल से उनकी बेटियों की शादी में परेशानी आएगी. ऐसे में भारती को ऐसी लड़ाई लड़नी पड़ी, जिसका फुटबॉल से बहुत कम लेना-देना था.

मिट्टी के चूल्हे के नीचे कोयले की आग को पंखा करते हुए और मिट्टी के बर्तन में पक रही मसूर की दाल के बीच भारती ने दिप्रिंट से कहा, “पूरा गांव मेरे खिलाफ हो गया था. लोग मुझे तरह-तरह के नामों से बुलाने लगे और हमारा बहिष्कार करने लगे. उन्हें डर था कि अगर उनकी बेटियां फुटबॉल खेलते हुए कोई हड्डी तुड़वा लेंगी, तो उनसे शादी कौन करेगा?”

Bharati Mudi, who had spent much of her life away from the public eye, has now attracted attention from beyond Bankura and even West Bengal | Saptak Datta, ThePrint
भारती मुडी, जो अपनी जिंदगी का ज्यादातर समय लोगों की नजरों से दूर रही हैं, अब बांकुड़ा और पश्चिम बंगाल से बाहर भी चर्चा में हैं | सप्तक दत्ता, दिप्रिंट

भारती की शादी तब हुई थी, जब वह सिर्फ 16 साल की थीं. बचपन में उन्हें फुटबॉल से बहुत लगाव था और वह इस खेल में आगे बढ़ना चाहती थीं, लेकिन धीरे-धीरे शादीशुदा जिंदगी की जिम्मेदारियों के बीच उनका यह सपना पीछे छूट गया. कई साल बाद जब उनकी बेटी तानिया ने फुटबॉल खेलने की इच्छा जताई, तो भारती को लगा कि वह अपनी बेटी को वह सपना पूरा करने में मदद कर सकती हैं, जिसे वह खुद पूरा नहीं कर पाई थीं.

भारती ने कहा, “जो लोग अपने सपने पूरे नहीं कर पाते, वे अक्सर दूसरों के सपने पूरे कराने के लिए बहुत मेहनत करते हैं.”

गांव के विरोध से भारती रुकी नहीं. उन्होंने लड़कियों को खेलने के लिए मनाया. जब टीम टूर्नामेंट जीतने लगी और ट्रॉफियां लेकर गांव लौटने लगी, तो लोगों का नजरिया भी बदलने लगा. कुछ खिलाड़ी पश्चिम बंगाल की टीम का हिस्सा बनीं, जबकि कुछ को खेल कोटे के तहत सरकारी नौकरी मिली. गरीब आदिवासी परिवारों की लड़कियों के लिए फुटबॉल ने ऐसे रास्ते खोल दिए, जिनके बारे में उन्होंने पहले कभी सोचा भी नहीं था. उन्हें पढ़ाई, कमाई और अपने भविष्य के फैसले खुद लेने का मौका मिला.

आदिवासी लड़कियों को अक्सर शिक्षा और रोजगार के बराबर मौके नहीं मिलते. ऐसे में भारती की अकादमी ने उन्हें स्कूल में बने रहने, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने और सिर्फ किसी की पत्नी के रूप में पहचाने जाने से आगे अपनी पहचान बनाने का मौका दिया है. अब जो गांववाले कभी अपनी बेटियों को फुटबॉल से दूर रखना चाहते थे, वे इसे कमाई का जरिया मानने लगे हैं. पाबंदियां कम हो गई हैं.

पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के छतना के दुमदुमी गांव में भारती मुडी की फुटबॉल अकादमी की जूनियर टीम | सप्तक दत्ता, दिप्रिंट

अब भारती दो टीमों को ट्रेनिंग देती हैं. इनमें एक सीनियर और दूसरी जूनियर टीम है. आसपास के गांवों की लड़कियां इस अकादमी का हिस्सा हैं.

भारती ने कहा, “हमारे इलाके के ज्यादातर परिवारों में लड़कियों को बोझ समझा जाता है. मेरी ज्यादातर छात्राएं बेहद गरीब परिवारों से आती हैं. इसलिए उनके माता-पिता उनकी शादी जल्दी करना चाहते हैं. लेकिन फुटबॉल इन लड़कियों को अपनी पहचान बनाने का मौका देता है. वे इस खेल में अपना करियर बना सकती हैं. कई लड़कियों को खेल कोटे के तहत सरकारी नौकरी मिली है, जबकि कुछ राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं.”

‘यह ऐसी जगह है, जहां मुझे सुकून मिलता है’

पश्चिम बंगाल का दुमदुमी गांव राज्य के पश्चिमी हिस्से के उस इलाके में है, जहां बड़ी संख्या में आदिवासी रहते हैं. धान के खेतों और टूटी सड़कों से घिरे इस गांव में जगह-जगह झाड़ियां और खेती की जमीन है. संकरी सड़कें और कीचड़ भरे रास्ते घरों को खेतों से जोड़ते हैं. यहां के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी इन्हीं रास्तों के इर्द-गिर्द चलती है.

19 साल की रूपाली टुडू का सपना नौकरी पाने और अपने परिवार की आर्थिक मदद करने का है. वह कॉलेज से लौटती हैं, गायों को घर लाती हैं, पढ़ाई और घर के काम पूरे करती हैं और फिर दोपहर 3.30 बजे तक साइकिल से फुटबॉल मैदान पहुंच जाती हैं.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “यह मेरी रोज की दिनचर्या है. मैं शायद ही कभी प्रैक्टिस छोड़ती हूं. यह ऐसी जगह है, जहां मुझे सुकून मिलता है. तानिया दीदी ने गांव की सभी लड़कियों को प्रेरित किया है. उनकी फुटबॉल की काबिलियत के साथ-साथ इस बात ने भी हमें प्रेरित किया है कि उन्हें पहले ही नौकरी मिल चुकी है.”

भारती की जूनियर टीम की गोलकीपर रूपाली इतिहास ऑनर्स की प्रथम वर्ष की छात्रा हैं. वह अपने फूस की छत वाले घर की ओर इशारा करती हैं. उनका सपना एक दिन अपने परिवार के लिए पक्का घर बनाना और माता-पिता को बेहतर जिंदगी देना है.

उन्होंने कहा, “तब तक हमें मेहनत करते रहना है.”

रूपाली टुडू उन लड़कियों में से एक हैं, जिनकी जिंदगी भारती मुडी की फुटबॉल अकादमी से बदली है | सप्तक दत्ता, दिप्रिंट

16 साल की लक्ष्मी प्रिया पिछले महीने ही अकादमी से जुड़ी हैं. उनके लिए इस टीम से जुड़ने की प्रेरणा इसकी ट्रॉफियां, पहचान और एक छोटे से गांव की सफल टीम का हिस्सा बनने से मिलने वाले मौके थे.

उन्होंने कहा, “जब मैंने सीनियर टीम की खिलाड़ियों को देखा, तो मुझे भी खेलने की प्रेरणा मिली. गांव के सभी लोग उनकी बात कर रहे हैं. वे कैसे अपने विरोधियों को हराती हैं और हमारी कप्तान कैसे डिफेंडरों को चकमा देकर गोल करती हैं. मैं भी उनके जैसी बनना चाहती हूं.”

टीम में डिफेंडर और नौवीं कक्षा की छात्रा प्रिया चाहती हैं कि सीनियर पश्चिम बंगाल महिला टीम में अपनी किस्मत आजमाने से पहले वह ग्रेजुएशन पूरा कर लें.

उन्होंने कहा, “शायद तब मुझे भी नौकरी मिल जाए. मैंने अभी यह तय नहीं किया है कि आगे किस विषय में पढ़ाई करूंगी. लेकिन मैं अपनी पढ़ाई जरूर पूरी करूंगी और राज्य की टीम में जगह बनाने के लिए और मेहनत करूंगी. इतने बड़े स्तर पर अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करना सम्मान की बात होगी.” उन्होंने बताया कि उनके माता-पिता शुरू से उनका साथ देते आए हैं और भारती की अकादमी पर भरोसा करते हैं.

‘कई लड़कियां मेरी मां पर भरोसा करती हैं’

भारती के फुटबॉल टीम शुरू करने के फैसले से उनकी बेटी तानिया को वह मौका मिला, जो शायद उन्हें कभी नहीं मिल पाता.

तानिया को बचपन में अखबारों में फुटबॉल के बारे में पढ़ने के बाद इस खेल में दिलचस्पी हुई. उन्हें पता नहीं था कि उनकी मां भी कभी फुटबॉल की शौकीन रही थीं. उन्होंने हिम्मत जुटाकर भारती को अपनी इस इच्छा के बारे में बताया.

तानिया ने दिप्रिंट से कहा, “तब मेरी मां ने मुझसे कहा कि वह लड़कियों का एक समूह बनाकर फुटबॉल टीम जरूर बनाएंगी.”

Bharati Mudi started the team in 2009 in an attempt to fulfil her daughter’s wish to play football | Saptak Datta, ThePrint
भारती मुडी ने 2009 में अपनी बेटी की फुटबॉल खेलने की इच्छा पूरी करने के लिए टीम शुरू की थी | सप्तक दत्ता, दिप्रिंट

हालांकि, फुटबॉल की ट्रेनिंग के लिए कम से कम 20 से 25 खिलाड़ियों की जरूरत थी. इसलिए भारती ने अपनी बेटी से गांव की और लड़कियों को लाने के लिए कहा.

भारती ने कहा, “मैंने उससे कहा कि अगर वह खेलना चाहती है, तो हमें और खिलाड़ियों की जरूरत होगी. उसी दिन दोपहर के खाने के समय तक तानिया अपनी सहेलियों को ले आई. इस तरह मेरी टीम की पहली खिलाड़ी मिल गईं.” इसके बाद अगली चुनौती ऐसी जगह ढूंढने की थी, जहां लड़कियां नियमित रूप से प्रैक्टिस कर सकें.

उन्होंने कहा, “मैं ऐसी कोई भी खुली जगह ढूंढती थी, जहां जमीन को समतल किया जा सके. फिर लड़कियों को वहां प्रैक्टिस के लिए ले जाती थी. इसी तरह हमने शुरुआत की थी. 17 साल बाद अब मेरी अलमारी में ट्रॉफियां रखने की जगह भी नहीं बची है.”

आखिरकार, टीम ने अपनी खिलाड़ियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का रास्ता दिया. 2019 में लड़कियों ने जिले के स्तर पर होने वाला सैकत कप टूर्नामेंट जीता. इस जीत के बाद तानिया समेत टीम की 15 लड़कियों को सिविक वॉलंटियर की नौकरी मिली.

तानिया ने कहा कि इन नौकरियों को पाने में खेल कोटे की अहम भूमिका थी.

उन्होंने कहा, “खेल कोटे ने इसमें अहम भूमिका निभाई. इसके बिना ये नौकरियां मिलना संभव नहीं होता.”

Bharati Mudi's journey came with social barriers | Saptak Datta, ThePrint
भारती मुडी के सफर में सामाजिक बाधाएं भी आईं | सप्तक दत्ता, दिप्रिंट

नौकरी शुरू करने से पहले तानिया ने एक महीने की ट्रेनिंग ली. फिलहाल उन्हें हर महीने 12,000 रुपये मिलते हैं.

तानिया को नौकरी मिलने पर भारती को बहुत गर्व हुआ, लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा खुशी इस बात से हुई कि टीम की दूसरी लड़कियों को भी नौकरी मिल गई. भारती ने बताया कि उनके ट्रेनिंग देने के बाद 25 से 30 लड़कियों को नौकरी मिल चुकी है, जबकि कई अन्य लड़कियां पश्चिम बंगाल की महिला फुटबॉल टीम का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं.

तानिया ने कहा, “जब मुझे नौकरी मिली, तो मेरी मां बहुत खुश थीं. लेकिन उन्हें इससे भी ज्यादा खुशी इस बात की थी कि टीम की दूसरी लड़कियों को भी नौकरी मिल गई. इससे उन्हें और ज्यादा खुशी हुई.”

हालांकि, वीडियो वायरल होने के बाद मिली पहचान से भारती की रोजमर्रा की जिंदगी में ज्यादा बदलाव नहीं आया है.

उन्होंने कहा, “अब ज्यादा लोग मुझसे और मेरी अकादमी से मिलने आते हैं. बस इतना ही.” उनके दिन पहले की तरह ही गुजरते हैं.

‘हमें मैदान से भगा दिया जाता था’

आज अकादमी को जो पहचान मिल रही है, वह उस समय से बिल्कुल अलग है, जब भारती और लड़कियों को मैदान में उतरने पर विरोध का सामना करना पड़ता था. तानिया और दूसरी लड़कियों को अक्सर शॉर्ट्स पहनकर फुटबॉल खेलने और पारंपरिक रूप से लड़कों से जुड़े इस खेल को अपनाने के लिए ताने सुनने पड़ते थे.

तानिया ने कहा, “हमें कहा जाता था कि अगर खेलते हुए हमारे हाथ या पैर टूट गए, तो हमसे शादी कोई नहीं करेगा.”

भारती पर लड़कियों का इस्तेमाल करके ‘कारोबार’ चलाने का आरोप भी लगाया गया था. एक बार तो उन्हें फुटबॉल मैदान से भगा दिया गया था.

तानिया ने कहा, “परिवार के भीतर से कोई विरोध नहीं था, लेकिन उन्हें समाज की ओर से कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा. लोग उन पर आरोप लगाते थे कि वह लड़कियों का इस्तेमाल करके किसी तरह का कारोबार शुरू कर रही हैं. कुछ लोग बेहद दुख पहुंचाने वाली और आपत्तिजनक बातें कहते थे. ऐसी बातें सुनना किसी के लिए भी बहुत मुश्किल होता है.”

Football gave the tribal girls of Dumdumi an identity and ambitions of their own | Saptak Datta, ThePrint
फुटबॉल ने दुमदुमी की आदिवासी लड़कियों को अपनी पहचान और अपने सपने दिए | सप्तक दत्ता, दिप्रिंट

फुटबॉल ने लड़कियों को अपनी पहचान और सपने दिए, वहीं भारती ने उन लड़कियों की भी मदद की, जिन्होंने स्कूल छोड़ दिया था. उन्होंने ऐसी लड़कियों को दोबारा पढ़ाई शुरू करने में मदद की और जिन परिवारों के पास किताबें खरीदने के पैसे नहीं थे, उनके लिए किताबें खरीदीं. कुछ लड़कियों की कम उम्र में शादी होने वाली थी, लेकिन उन्हें पढ़ाई जारी रखने और अपना भविष्य अलग तरीके से बनाने का मौका मिला.

तानिया ने कहा, “मेरी मां के संपर्क में आने के बाद कई लड़कियों की जिंदगी बदल गई है. उन्होंने स्कूल छोड़ चुकी कई लड़कियों का दोबारा दाखिला कराया. कुछ लड़कियां आर्थिक तंगी के कारण अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पा रही थीं. मेरी मां ने उनके लिए किताबें खरीदीं और उन्हें फिर से पढ़ाई शुरू करने में मदद की.”

इनमें से कुछ लड़कियां अब सिविक वॉलंटियर के तौर पर काम कर रही हैं, जबकि कुछ फुटबॉल में पश्चिम बंगाल का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं. तानिया का कहना है कि अगर उनकी मां ने दखल नहीं दिया होता, तो इनमें से कई लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर दी गई होती. वहीं, जिन लड़कियों में खेल की प्रतिभा थी, उन्हें उसे निखारने का मौका और संसाधन कभी नहीं मिलते.

उन्होंने कहा, “गांव में रहते हुए फुटबॉल खेलने का मौका मिलना मुश्किल है. लड़कियों को खेलने का मौका मिलना और स्कूल छोड़ चुकी कुछ लड़कियों का फिर से पढ़ाई शुरू करना बहुत अहम है. कुछ लड़कियां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी बनी हैं.”

Most of the girls at Bharati Mudi's academy comes from very poor families | Saptak Datta, ThePrint
भारती मुडी की अकादमी में ज्यादातर लड़कियां बेहद गरीब परिवारों से आती हैं | सप्तक दत्ता, दिप्रिंट

तानिया चाहती हैं कि टीम की और लड़कियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलें. उनका कहना है कि फुटबॉल उन्हें आत्मनिर्भर बना सकता है.

उन्होंने कहा, “अगर वे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचती हैं, तो हर लड़की को खेल के जरिए अपनी पहचान बनाने और आत्मनिर्भर बनने का मौका मिलेगा. वे अपने दम पर जिंदगी जी सकेंगी और अपने फैसले खुद ले सकेंगी.”

घर पर तानिया एक बेटी थीं, लेकिन मैदान पर वह अपनी मां के निर्देशन में खेलने वाली खिलाड़ी भी थीं. भारती का कहना है कि इन दोनों भूमिकाओं के बीच कभी पूरी तरह फर्क नहीं रहा.

उन्होंने कहा, “मैं घर पर सिर्फ मां नहीं थी, बल्कि उसकी टीचर भी थी. मुझे मां के तौर पर अपनी बेटी का ख्याल रखना था, लेकिन जब फुटबॉल की बात आती थी, तो मैं उसके साथ अलग व्यवहार नहीं कर सकती थी. कई बार मैंने उसे मैच के बीच से बाहर बैठाया, ताकि आखिर में मेरी टीम जीत सके.”

परिवार का साथ

64 साल के शक्तिपद मुडी, भारती के पति, हर दिन दाल और चने से भरी एक बाल्टी और केले का एक बैग लेकर फुटबॉल मैदान पहुंचते हैं. वह मैदान के किनारे बैठकर लड़कियों को प्रैक्टिस करते देखते हैं और कभी-कभी उन्हें मैदान पर अपना संयम बनाए रखने की सलाह भी देते हैं.

जब भारती दिन की ट्रेनिंग खत्म होने की सीटी बजाती हैं, तो शक्तिपद मैदान के पास खाना रख देते हैं. लड़कियां अपनी-अपनी हिस्सेदारी लेने के लिए कतार में लग जाती हैं.

शक्तिपद भी अपने युवा दिनों में पेशेवर फुटबॉल खेल चुके हैं. उन्होंने भारती की टीम को आर्थिक रूप से चलाने में अहम भूमिका निभाई है. जब वह केंद्र सरकार में नौकरी करते थे, तब अपनी कमाई से टीम की मदद करने लगे थे.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “मैं अपने जिले के एक सरकारी अस्पताल में कुष्ठ रोग विभाग में काम करता था. मुझे अच्छी तनख्वाह मिलती थी और मुझे हमेशा लगता था कि मुझे लड़कियों के लिए कुछ योगदान देना चाहिए. इसलिए जब भी संभव होता था, मैं अकादमी को पैसे देने लगा.”

भारती मुडी के पति शक्तिपद मुडी ने हमेशा इस पहल का साथ दिया है और 2009 से अकादमी की मदद करते आए हैं | सप्तक दत्ता, दिप्रिंट

धीरे-धीरे इस कपल ने खेती की जमीन के दो टुकड़े खरीदे, ताकि खिलाड़ियों की बढ़ती संख्या के लिए खाने का इंतजाम किया जा सके. इनमें से एक जमीन पर चावल उगाया जाता है, जबकि दूसरी पर सब्जियां उगाई जाती हैं. अकादमी की लड़कियां भी खेतों में काम करती हैं. इससे इस कपल को खाने का इंतजाम खुद करने में मदद मिलती है.

उन्होंने कहा, “जब उनके खाने का खर्च बढ़ने लगा, तो हमने जमीन के ये दो टुकड़े खरीदने का फैसला किया. इससे उनकी खाने की जरूरतें पूरी करने में मदद मिलती है. मांसाहारी खाना आमतौर पर बाहर से खरीदा जाता है और हफ्ते में करीब तीन बार मिलता है. हम जल्द ही उनके खाने में मांसाहारी भोजन की मात्रा बढ़ाने की योजना बना रहे हैं.”

टीम टूर्नामेंट में मिलने वाली इनामी राशि का इस्तेमाल अपनी गतिविधियों और लड़कियों की मदद के लिए करती है. शक्तिपद ने बताया कि जब टीम बर्धमान, पुरुलिया या कोलकाता जैसे शहरों में टूर्नामेंट खेलने जाती है, तो शील्ड या कप नहीं जीतने पर भी उसे इनामी राशि मिलती है. इस पैसे को लड़कियों की पढ़ाई, शादी से जुड़े खर्चों और टीम की जरूरतों के लिए अलग-अलग हिस्सों में बांटा जाता है.

हालांकि, सिर्फ खाने का खर्च ही नहीं बढ़ा है. अकादमी के लिए बांकुड़ा से खरीदे जाने वाले खेल के सामान का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है.

भारती ने कहा, “पहले एक खिलाड़ी की पूरी किट पर 500 रुपये खर्च होते थे. अब इसका खर्च बढ़कर 1,000 से 1,200 रुपये हो गया है.” उन्होंने कहा, “मेरे पति हमेशा एक चट्टान की तरह मेरे साथ खड़े रहे और मेरा साथ दिया. उनके बिना यह सब संभव नहीं होता.”

There are 35 players currently training under Bharati Mudi | Saptak Datta, ThePrint
फिलहाल भारती मुडी के साथ 35 खिलाड़ी ट्रेनिंग ले रही हैं | सप्तक दत्ता, दिप्रिंट

इस पहल ने इस कपल को बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई में भी शामिल कर दिया है. शक्तिपद ने 14 साल की एक लड़की का मामला याद किया, जिसकी शादी होने वाली थी. उन्होंने बताया कि उन्होंने स्थानीय पुलिस थाने को इसकी जानकारी दी और शादी रुकवाने की अपील की.

उन्होंने कहा, “हम अपने इलाके में बाल विवाह को काफी हद तक कम करने में सफल रहे हैं. एक मामला 14 साल की लड़की का था, जिसकी शादी होने वाली थी. जब मुझे इसकी जानकारी मिली, तो मैंने पुलिस से संपर्क किया और उन्हें बताया कि 14 साल की लड़की की शादी कराई जा रही है. जब भी हमें ऐसे मामलों की जानकारी मिलती है, हम दखल देने की कोशिश करते हैं.”

तीन साल पहले एक और 16 साल की लड़की घर से भागकर मुडी कपल के पास पहुंची थी. उसका परिवार गरीबी के कारण उसकी शादी करना चाहता था.

भारती ने कहा, “वह रोती हुई हमारे पास आई थी. वह पढ़ाई में बहुत अच्छी थी.” उन्होंने बताया, “लड़की के परिवार ने उसकी शादी तय कर दी थी. उसके माता-पिता उसकी बात नहीं सुन रहे थे. उनका कहना था कि उन्हें एक अच्छा लड़का मिल गया है और वे उसकी शादी करना चाहते हैं.”

भारती ने परिवार से लड़की की कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने तक इंतजार करने को कहा.

उन्होंने कहा, “मैंने उनसे कहा कि लड़की को अपनी पढ़ाई जारी रखने का मौका दिया जाना चाहिए और शादी बाद में भी हो सकती है. जब मामला गंभीर हो गया, तो मैंने पुलिस की मदद ली. शादी रोकने के लिए मैंने जो भी कर सकती थी, किया. लेकिन अफसोस, मेरे खिलाफ ही एक जवाबी मामला दर्ज कर दिया गया और परिवार ने उसकी शादी कर दी.” यह बताते हुए उनकी आंखों में आंसू आ गए.

टीम को एक साथ बनाए रखने और अकादमी चलाने के लिए किए जाने वाले काम का कोई तय समय नहीं है. भारती ट्रेनिंग की जिम्मेदारी संभालती हैं, जबकि शक्तिपद पैसे और खाने का इंतजाम करने के साथ खिलाड़ियों की जरूरतें पूरी करने में मदद करते हैं. वहीं, लड़कियां प्रैक्टिस के साथ स्कूल, कॉलेज और घर की जिम्मेदारियां भी निभाती हैं. मुडी कपल की मेहनत अब रंग लाने लगी है, लेकिन अभी उन्हें लंबा रास्ता तय करना है.

इस कपल ने कहा, “अपनी बेटियों को जीने दो, उन्हें खेलने दो. उन्हें पढ़ाओ. उन्हें बोझ समझकर उनकी शादी मत करो.”

 

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