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Thursday, 20 August, 2026
होमदेश4 अफसर, 20+ साल की नौकरी, 15 साल चली कानूनी लड़ाई—हरियाणा PWD में डेपुटेशन का मामला SC ने किया खत्म

4 अफसर, 20+ साल की नौकरी, 15 साल चली कानूनी लड़ाई—हरियाणा PWD में डेपुटेशन का मामला SC ने किया खत्म

सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें चार पंचायत विभाग के इंजीनियरों को उनका स्थायी रूप से PWD में जाना गैरकानूनी पाए जाने के बावजूद वहीं काम करते रहने की अनुमति दी गई थी.

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गुरुग्राम: मामला हरियाणा के विकास एवं पंचायत विभाग से चार इंजीनियरों के डेपुटेशन पर लोक निर्माण विभाग (PWD) जाने से शुरू हुआ था, लेकिन जो काम कुछ समय के लिए होना था, वह दो दशक से ज्यादा की नौकरी में बदल गया और बाद में चारों अधिकारियों को PWD में स्थायी रूप से शामिल कर लिया गया.

कई साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उनका PWD में शामिल किया जाना रद्द कर दिया और उन्हें वापस विकास एवं पंचायत विभाग में भेजने का आदेश दिया, जिसे उन्होंने 2005 में छोड़ा था.

जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने मार्च 2023 के पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया. हाई कोर्ट ने उनके PWD में शामिल होने को “कानून के खिलाफ” बताया था, लेकिन फिर भी प्रदीप अत्री, प्रवीण चौधरी, पंकज गौर और अरुण भाटिया को PWD की बिल्डिंग एंड रोड्स शाखा में असिस्टेंट इंजीनियर के तौर पर काम करते रहने की अनुमति दी थी.

हाई कोर्ट ने इसे “सहानुभूति वाला फैसला” बताया था. उसका कहना था कि चारों ने पहले ही 18 साल की सेवा पूरी कर ली थी, इसलिए अब विकास एवं पंचायत विभाग में उनके पदों पर उनका अधिकार (लियन) नहीं बचा था और उन्हें नौकरी से हटाने पर उन्हें परेशानी होगी.

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया.

बेंच ने कहा, “समय बीतने से गैरकानूनी काम को ठीक करके कानूनी और वैध नहीं बनाया जा सकता.” बेंच ने सरकारी नौकरी से जुड़े उमा देवी मामले में संविधान पीठ के फैसले का भी हवाला दिया.

बेंच ने आगे कहा, “गैरकानूनी काम, जो अनियमितता से अलग और अलग तरह का है, लंबे समय तक नौकरी में बने रहने के आधार पर सहानुभूति दिखाकर नियमित नहीं किया जा सकता.”

अब चारों अधिकारियों को विकास एवं पंचायत विभाग में वापस भेजने का आदेश दिया गया है. उन्हें सब-डिविजनल ऑफिसर (पंचायती राज) कैडर में वापस रखा जाएगा और उनके जाने के समय जो कर्मचारी उनसे जूनियर था, उसके ठीक ऊपर उन्हें जगह दी जाएगी.

कोर्ट ने इस मामले में राजनीतिक दखल की पूरी कहानी भी बताई.

कोर्ट ने कहा कि अत्री के पंचायत विभाग से बाहर जाने के प्रयास को हरियाणा के राजस्व मंत्री का समर्थन मिला था. उन्होंने अत्री की ओर से PWD मंत्री को पत्र लिखा था और इसके बाद PWD मंत्री ने अत्री को PWD में शामिल करने का समर्थन किया.

चौधरी के मामले को राजस्व मंत्री और परिवहन मंत्री, दोनों ने आगे बढ़ाया. कोर्ट ने कहा कि इन दोनों मंत्रियों का “न तो पंचायत विभाग से और न ही PW(B&R) विभाग से कोई लेना-देना था.” इसके बाद मामला मुख्यमंत्री के पास पहुंचा, जिन्होंने 2007 में खुद इसे मंजूरी दी.

एक समय बहादुरगढ़ विधानसभा क्षेत्र के स्थानीय विधायक ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर चौधरी को सीधे भर्ती वाली खाली सीट पर PWD में शामिल करने की मांग की थी. इसके लिए अत्री के मामले को उदाहरण के तौर पर बताया गया था.

यह कैसे हुआ शुरू

यह विवाद 2005 तक जाता है, जब उस समय पंचायत विभाग में इंजीनियर प्रदीप अत्री ने PWD की बिल्डिंग एंड रोड्स शाखा में डेपुटेशन पर भेजे जाने के लिए कोशिश शुरू की. उन्होंने पहले फाइल में नोटिंग के जरिए अपनी बात रखी और फिर राज्य के राजस्व मंत्री के जरिए भी कोशिश की. उन्होंने वहां इंजीनियरों की कमी का हवाला दिया.

उन्हें नवंबर 2005 में डेपुटेशन पर भेज दिया गया. अगले साल प्रवीण चौधरी ने भी इसी तरह की कोशिश की. दो मंत्रियों ने उनके मामले को आगे बढ़ाया, जबकि कोर्ट ने कहा कि उनका “दोनों विभागों के कामकाज से कोई लेना-देना नहीं था”.

पंकज गौर और अरुण भाटिया को भी इसी समय के आसपास अलग-अलग डेपुटेशन पर भेजा गया.

इसके बाद चारों को PWD में असिस्टेंट इंजीनियर (सिविल) के तौर पर स्थायी रूप से शामिल कर लिया गया. विभाग में सीधे भर्ती हुए कर्मचारियों ने तुरंत ही इस फैसले को चुनौती दी.

उनका कहना था कि यह पंजाब सर्विस ऑफ इंजीनियर्स (बिल्डिंग्स एंड रोड्स ब्रांच) रूल्स, 1965 का उल्लंघन है. इन नियमों के मुताबिक कैडर में आने के केवल दो तरीके हैं—सीधी भर्ती और प्रमोशन. दोनों के लिए 50-50 प्रतिशत पद तय हैं. सीधे भर्ती हुए कर्मचारियों ने कहा कि ट्रांसफर के जरिए किसी को शामिल करने की इस व्यवस्था में कोई जगह नहीं है.

अगले करीब एक दशक में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में नौ रिट याचिकाएं दाखिल हुईं. इनमें कुछ याचिकाएं सीधे भर्ती हुए कर्मचारियों ने चारों अधिकारियों को वापस उनके विभाग में भेजने की मांग को लेकर दायर की थीं, जबकि कुछ याचिकाएं खुद इन अधिकारियों ने अपनी पोस्टिंग का बचाव करते हुए दायर की थीं.

हाई कोर्ट के 2023 के फैसले में इन अधिकारियों को PWD में शामिल करने को सिद्धांत रूप से गैरकानूनी बताया गया था, लेकिन उन्हें नौकरी पर बने रहने दिया गया. हालांकि, उन्हें 2007 और 2009 में नियुक्त सीधे भर्ती हुए कर्मचारियों से वरिष्ठता देने से मना कर दिया गया था.

अब सुप्रीम कोर्ट ने इस समझौते को खत्म कर दिया है.

‘गैरकानूनी’ बनाम ‘अनियमित’

इस फैसले में हाई कोर्ट के मुकाबले ज्यादा साफ तरीके से दोनों के बीच अंतर बताया गया है.

बेंच की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि अत्री और चौधरी का डेपुटेशन पूरी तरह “गैरकानूनी” था. कोर्ट ने बताया कि उनके ट्रांसफर किसी असली विभागीय जरूरत के कारण नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव और इंजीनियरों की कमी और खाली पदों के गलत दावे के जरिए करवाए गए थे.

कोर्ट ने यह भी कहा कि अत्री को सीधे भर्ती होने वाले कर्मचारियों के लिए आरक्षित खाली पद पर भी PWD में शामिल किया गया था, जिसकी अनुमति 1965 के नियम नहीं देते.

इसके उलट, गौर और भाटिया का डेपुटेशन सिर्फ “अनियमित” माना गया, गैरकानूनी नहीं, लेकिन यह अंतर भी उनकी PWD में स्थायी नियुक्ति को नहीं बचा सका. कोर्ट ने चारों अधिकारियों के लिए इस स्थायी नियुक्ति को “गैरकानूनी, अस्तित्वहीन और अमान्य” घोषित किया.

इन स्थायी नियुक्तियों को रद्द करने के बाद कोर्ट ने कहा कि अब उसे इस अलग सवाल पर जाने की जरूरत नहीं है कि 1965 के नियमों के नियम 12(5) के तहत उनकी वरिष्ठता कैसे तय होनी चाहिए थी. यही वह सवाल था जिस पर हाई कोर्ट ने 2023 के अपने फैसले में काफी विचार किया था.

अब क्या हुआ

सुप्रीम कोर्ट में दायर अपीलों में सीधे भर्ती हुए कर्मचारियों, चारों अधिकारियों और हरियाणा सरकार की अलग-अलग याचिकाएं शामिल थीं. इसके अलावा, हाई कोर्ट के फैसले के बाद सीधे भर्ती हुए कर्मचारियों की ओर से दाखिल अवमानना याचिका से जुड़ी एक अलग अपील भी थी. हाई कोर्ट ने इस याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है.

सोमवार के आदेश के साथ ये सभी अपीलें एक ही नतीजे पर पहुंचीं: चारों अधिकारी पंचायत विभाग में वापस जाएंगे और PWD के असिस्टेंट इंजीनियर कैडर की पुरानी व्यवस्था फिर से लागू होगी. इस तरह उन डेपुटेशन को खत्म कर दिया गया, जिनकी वजह से 15 साल तक कानूनी लड़ाई चली.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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