मुंबई: 2009 में जब फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर ने ऑस्कर अवॉर्ड्स में धूम मचाई थी, तब मुंबई की एक बस्ती गरीब नगर रातोंरात मशहूर हो गई थी. यहीं पर निर्देशक डैनी बॉयल ने शहरी भारत की झुग्गियों की जिंदगी दिखाने वाले कई दृश्य शूट किए थे. फिल्म के एक मुख्य किरदार का बाल कलाकार भी यहीं की झोपड़ियों से चुना गया था.
पिछले हफ्ते गरीब नगर लगभग मुंबई के नक्शे से मिट गया, जब वेस्टर्न रेलवे ने लगभग सभी ढांचों को तोड़ दिया और केवल करीब 100 संरचनाएं छोड़ीं, जिन्हें कानूनी माना गया. रेलवे ने बांद्रा स्टेशन के आसपास 5,200 वर्ग मीटर में फैली लगभग 500 संरचनाएं हटाईं.
यह जमीन हमेशा से वेस्टर्न रेलवे की थी और वह 1980 के दशक से यहां का अतिक्रमण हटाने की कोशिश कर रहा था. आखिरकार 29 अप्रैल 2026 के बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के बाद पिछले हफ्ते यह कार्रवाई संभव हो सकी. यह अब तक वेस्टर्न रेलवे की सबसे बड़ी तोड़फोड़ कार्रवाई थी.
मौजूदा सर्कल रेट के हिसाब से बांद्रा स्टेशन और टर्मिनस के बिल्कुल पास स्थित इस कीमती जमीन की कीमत कम से कम 6,000 करोड़ रुपये है.
वेस्टर्न रेलवे, जो रोजाना लाखों यात्रियों को सेवा देता है, इस जमीन का उपयोग एक बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड के लिए करना चाहता है. इसमें इंटीग्रेटेड रेलवे कॉम्प्लेक्स बनाने की योजना शामिल है. योजना के तहत बांद्रा रेलवे स्टेशन के पूर्वी हिस्से और बांद्रा टर्मिनस दोनों का विकास किया जाएगा.
गरीब नगर इन दोनों के बीच स्थित था, जिससे यात्रियों के लिए एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक जाना मुश्किल हो जाता था और पीक आवर्स में भारी ट्रैफिक जाम भी लगता था.

वेस्टर्न रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी विनीत अभिषेक ने दिप्रिंट को बताया, “खाली कराई गई जमीन को बांद्रा स्टेशन से जुड़े बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में शामिल किया जाएगा. इनमें उपनगरीय रेल क्षमता बढ़ाने और भविष्य में स्टेशन के पुनर्विकास से जुड़े काम शामिल हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “ऐसे प्रोजेक्ट भीड़ कम करने और मुंबई के सबसे व्यस्त ट्रांजिट केंद्रों में से एक में यात्रियों की आवाजाही बेहतर बनाने के लिए जरूरी हैं.”
अभिषेक ने बताया कि योजना के तहत पूर्वी निकास के बाहर भी पश्चिमी हिस्से की तरह ज्यादा यात्री सुविधाएं, वाहन लेन, पिक-अप और ड्रॉप पॉइंट तथा पार्किंग बनाई जाएगी. अपग्रेड के बाद बांद्रा टर्मिनस में अधिक पहुंच मार्ग, प्लेटफॉर्म, ट्रेन खड़ी करने की जगह और यात्रियों के लिए एलिवेटेड सड़कें भी होंगी.
लेकिन गरीब नगर के विस्थापित निवासियों के लिए, जबकि मानसून आने वाला है, अभी तक कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई है.
अभिषेक ने कहा, “हाई कोर्ट के फैसले में पुनर्वास की जिम्मेदारी के बारे में कुछ नहीं कहा गया है. अदालत के निर्देश के अनुसार हमने 100 झोपड़ियां बचाकर रखी हैं. हम उन्हें तभी हटाएंगे जब राज्य सरकार वहां रहने वालों के पुनर्वास के लिए उपयुक्त जमीन उपलब्ध कराएगी.”
19 मई से शुरू हुई पांच दिन की यह तोड़फोड़ कार्रवाई जहां जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए जगह खाली कराने का कदम मानी जा रही है, वहीं इसे जिस तरीके से किया गया, उस पर कई तरफ से आलोचना भी हो रही है.
महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रवक्ता सचिन सावंत ने दिप्रिंट से कहा, “पूरे अभियान के दौरान उन्होंने उन लोगों को इंसान नहीं समझा. वे [बीजेपी] उन्हें सिर्फ धर्म और अवसरवादी राजनीति के चश्मे से देखते हैं.”

मुंबई नॉर्थ सेंट्रल से कांग्रेस सांसद और धारावी की चार बार की विधायक वर्षा गायकवाड़ ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिखकर गरीब नगर के विस्थापित झुग्गीवासियों के पुनर्वास की मांग की है.
22 मई 2026 के अपने पत्र में उन्होंने लिखा, “इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, रेलवे सुरक्षा और नागरिक कल्याण के बीच संतुलन बनाने के लिए मानवीय दृष्टिकोण जरूरी है.”
उन्होंने विस्थापित लोगों के पुनर्वास की योजना बनाने के लिए वेस्टर्न रेलवे, महाराष्ट्र सरकार और बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के अधिकारियों की एक “तत्काल संयुक्त समन्वय समिति” बनाने का अनुरोध भी किया.
Wrote to the Railway Minister @AshwiniVaishnaw ji and the Chief Minister @Dev_Fadnavis regarding the rehabilitation of Garib Nagar residents. While development of infrastructure is necessary, have asked for a humane approach and co-ordination among state and central agencies to… pic.twitter.com/kbgCYXPxNx
— Prof. Varsha Eknath Gaikwad (@VarshaEGaikwad) May 25, 2026
उन्होंने सरकार से यह भी कहा कि “पुनर्वास योजना सुनिश्चित की जाए और सभी प्रभावित व पात्र परिवारों को विस्थापन से पहले स्पष्ट, पारदर्शी और वैकल्पिक आवास की योजना दी जाए.”
गैर-लाभकारी संस्था अर्बन सेंटर मुंबई के प्रधान निदेशक पंकज जोशी ने कहा, “समस्या यह है कि इस झुग्गी को पहले भी कई बार आंशिक रूप से हटाया गया था और यह जगह हमेशा जटिल रही क्योंकि यहां कई बार आग लग चुकी है.”
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “हर बार आग लगने के बाद यह बस्ती और ज्यादा फैलती गई और ऊंची होती गई.”
जोशी ने कहा कि यह कदम रोजाना आने-जाने वाले यात्रियों और ट्रैफिक की सुविधा के लिए जरूरी था.
उन्होंने कहा, “बांद्रा ईस्ट से बाहर निकलते ही BKC का रास्ता शुरू हो जाता है, जो भारत का सबसे समृद्ध वित्तीय जिला है. स्टेशन के बाहर बहुत अव्यवस्था और भीड़ है और BKC तथा बांद्रा टर्मिनस तक पहुंचना बेहद मुश्किल है. यह कार्रवाई निश्चित रूप से जरूरी थी और काफी समय से लंबित थी. रेलवे स्टेशन परिसर की बेहतर योजना और यातायात समस्याओं का समाधान होना चाहिए.”
हालांकि उन्होंने यह भी माना कि प्रशासन को विस्थापित लोगों को पहले समझाना चाहिए था और इस बार की कार्रवाई की गंभीरता के बारे में पहले से बताना चाहिए था.

उन्होंने कहा, “समुदाय के लोग आमतौर पर सोचते हैं कि तोड़फोड़ का नोटिस सिर्फ धमकी है और उस पर कार्रवाई नहीं होगी. राजनीतिक नेता और झुग्गी माफिया उन्हें भरोसा दिलाते रहते थे कि कुछ नहीं होगा. प्रशासन को कार्रवाई से पहले उन्हें समझाना चाहिए था या यह साफ बता देना चाहिए था कि इस बार मामला गंभीर है. वे सिर्फ नोटिस देकर मामला लंबा नहीं खींच रहे हैं. मुझे लगता है कि लोगों को उम्मीद नहीं थी कि वास्तव में ऐसा होगा.”
गरीब नगर मुंबई में सार्वजनिक जमीन पर झुग्गियों के फैलाव का एक आदर्श उदाहरण है.
यह बस्ती 1960 के दशक में कुछ घरों से शुरू हुई थी और बाद में बहुमंजिला घरों, टीन की छतों, तिरपालों, संकरी सीढ़ियों और बेहद घनी आबादी वाले मकानों की बड़ी भूलभुलैया में बदल गई. कई बार घर एक-दूसरे के ऊपर तक बनाए गए थे.
राजनीतिक संरक्षण की वजह से यहां के लोगों को पानी, ड्रेनेज और स्ट्रीट लाइट जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलीं, लेकिन इसी राजनीतिक संरक्षण ने यह भी सुनिश्चित किया कि जिस सार्वजनिक जमीन पर यह बस्ती बनी थी, वह जनता के उपयोग के लिए उपलब्ध न हो सके, जबकि बस्ती लगातार फैलती रही.
गरीब नगर: एक बस्ती की शुरुआत
गरीब नगर के शुरुआती निवासी वे प्रवासी थे जो काम की तलाश में मुंबई आए थे.
उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र और दूसरे राज्यों के परिवार कई दशक पहले इस इलाके में बसने लगे थे. वे बांद्रा, खार, माहिम और बाद में तेजी से विकसित हुए बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) के आसपास रोजगार के अवसरों से आकर्षित होकर यहां आए थे.
“मेरे पिता 1970 के दशक में उत्तर प्रदेश से यहां आए थे. वे मजदूरी करते थे और धीरे-धीरे यह घर बनाया. मेरा जन्म यहीं हुआ, मेरे बच्चों का जन्म भी यहीं हुआ. अब वे हमें कह रहे हैं कि हम यहां के नहीं हैं. कि हम अवैध हैं,” आसिया बानो ने कहा, जिनका गरीब नगर का घर पांच दिन की तोड़फोड़ कार्रवाई में गिरा दिया गया.

उनके परिवार की तरह यहां के ज्यादातर लोग दिहाड़ी मजदूर, निर्माण मजदूर, ड्राइवर, घरेलू कामगार, फेरीवाले और छोटे व्यापारी के रूप में शुरुआत करने वाले लोग थे. उनकी अस्थायी झोपड़ियां धीरे-धीरे ईंट और सीमेंट के मकानों में बदल गईं.
1980 के दशक में कभी अभिनेता और पूर्व कांग्रेस सांसद सुनील दत्त, जिन्हें बांद्रा के नरगिस दत्त नगर, गरीब नगर, बेहरामपाड़ा और अन्य झुग्गी बस्तियों के लोगों का काफी समर्थन मिलता था, एक तोड़फोड़ अभियान रोकने की कोशिश में बुलडोजर के सामने लेट गए थे.
बानो ने दिप्रिंट से कहा, “हमने टीन की चादरों वाली एक झोपड़ी से शुरुआत की थी. हर कुछ साल बाद जब थोड़े पैसे बचते थे, तो हम उसे बेहतर बनाते थे. पहले ईंट की दीवार बनाई, फिर सीमेंट की छत, फिर बच्चों के लिए ऊपर एक और कमरा बनाया.”
उन्होंने कहा, “मुंबई में जो भी कमाया, सब इस घर पर लगा दिया.”
इस बस्ती का स्थान उसके अस्तित्व के लिए बेहद महत्वपूर्ण था. यह बांद्रा स्टेशन से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर थी और BKC, बड़े अस्पताल, स्कूल और व्यावसायिक केंद्र यहां से आसानी से पहुंच में थे.
गरीब नगर के निवासी और गरीब नगर रहिवासी वेलफेयर संघ सोसाइटी के महासचिव सलीम कुरैशी, जो तोड़फोड़ से प्रभावित लोगों की मदद कर रहे हैं, ने कहा, “अगर आप गरीब हैं, तो लोकेशन ही सब कुछ है.”
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “यहां ज्यादातर लोग पास में ही काम करते थे. कुछ लोग पैदल काम पर जाते थे. दूसरे लोग आने-जाने में सिर्फ कुछ रुपये खर्च करते थे. उन्हें दूर भेजने का मतलब उनकी रोजी-रोटी भी छीन लेना है.”
पिछले दो दशकों में स्लमडॉग मिलियनेयर के अलावा गरीब नगर दो बार राष्ट्रीय खबरों में आया.
पहली बार 2011 में लगी आग के दौरान, जब ऑस्कर विजेता फिल्म में लतिका का किरदार निभाने वाली रुबीना अली ने सैकड़ों अन्य लोगों के साथ अपना घर खो दिया था. दूसरी बार 2017 में एक और आग लगी, जिसमें भी सैकड़ों झोपड़ियां जल गई थीं.
2011 की आग में 11 लोग घायल हुए थे और 3,000 से ज्यादा लोग प्रभावित हुए थे. लगभग 2,000 झोपड़ियां जलकर खाक हो गई थीं. उस समय निवासियों को संदेह था कि पुनर्विकास के दबाव और विवादों के बीच यह तोड़फोड़ की साजिश हो सकती है, लेकिन आग लगने का असली कारण कभी स्पष्ट नहीं हो पाया.
2017 की आग उस समय लगी थी जब BMC बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश पर संरक्षित तानसा पाइपलाइन कॉरिडोर के किनारे बने ढांचों को हटाने की कार्रवाई कर रही थी. जैसे ही तोड़फोड़ दल बस्ती में पहुंचा, आग लग गई और घनी आबादी वाली झुग्गी में तेजी से फैल गई.
निवासियों ने इसके लिए तोड़फोड़ अभियान को जिम्मेदार ठहराया, जबकि नगर निगम अधिकारियों ने आरोप लगाया कि कार्रवाई रोकने के लिए आग जानबूझकर लगाई गई हो सकती है. भारी नुकसान के बावजूद अधिकारियों ने कुछ समय बाद फिर से तोड़फोड़ शुरू कर दी, जिससे यह घटना गरीब नगर की बेदखली के खिलाफ लंबी लड़ाई के सबसे विवादित अध्यायों में से एक बन गई.
राजनीतिक संरक्षण
गरीब नगर वांद्रे ईस्ट (बांद्रा ईस्ट) विधानसभा क्षेत्र में आता है, जो दशकों तक अभिनेता से राजनेता बने सुनील दत्त, बाद में उनकी बेटी प्रिया दत्त और बाबा सिद्दीकी के राजनीतिक प्रभाव के कारण कांग्रेस से जुड़ा माना जाता था.
हालांकि गरीब नगर में मतदान अधिकारों के लिए किसी औपचारिक कांग्रेस-नेतृत्व वाले आंदोलन के बहुत कम सबूत हैं, लेकिन सलीम कुरैशी का कहना है कि सुनील दत्त जैसे नेताओं ने इस बस्ती को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने में अहम भूमिका निभाई.
उन्होंने कहा, “मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि यहां वोटर आईडी और राशन कार्ड कब मिलने लगे, लेकिन दत्त साहब का हमें पहचान दिलाने और नक्शे पर लाने में बहुत बड़ा योगदान था.”
कुरैशी ने कहा, “उन्होंने न केवल बांद्रा की एक बस्ती का नाम अपनी पत्नी के नाम पर नरगिस दत्त नगर रखा, बल्कि इस इलाके को गरीब नगर नाम भी उन्होंने ही दिया.”
शिवसेना प्रवक्ता कृष्णा हेगड़े, जो पहले विले पार्ले से कांग्रेस विधायक रह चुके हैं और सुनील व प्रिया दत्त के करीबी माने जाते हैं, ने कहा कि सुनील दत्त ने झुग्गियां नहीं बसाईं, लेकिन जब गरीब लोग उनके पास आते थे तो वे उनकी मदद करते थे और उनकी समस्याएं सुलझाते थे.
हेगड़े ने दिप्रिंट से कहा, “गरीबों का समर्थन करते हुए भी वे कभी अदालत के आदेशों के खिलाफ नहीं गए. एक निर्वाचित प्रतिनिधि होने के नाते वे अपने मतदाताओं के साथ खड़े रहे. और बांद्रा ईस्ट ही उनका एकमात्र क्षेत्र नहीं था. वे बांद्रा वेस्ट, सांताक्रूज, विले पार्ले और अंधेरी के लिए भी जिम्मेदार थे. वे यूं ही सद्भावना दूत नहीं कहलाते थे.”
दिप्रिंट ने प्रिया दत्त से संदेश के जरिए प्रतिक्रिया मांगी, लेकिन खबर प्रकाशित होने तक कोई जवाब नहीं मिला. जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.
47 वर्षीय कुरैशी ने कहा कि सुनील दत्त ने मुंबई के इस हिस्से में झुग्गीवासियों के हितों की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास किया.

उन्होंने कहा, “1980 और 1990 के दशक में दत्त साहब ने कई बार हमें जमीन खोने से बचाया. 1980 के दशक में जब प्रशासन ने इस इलाके को खाली कराया था, तब दत्त साहब भूख हड़ताल पर बैठ गए थे और सुनिश्चित किया था कि हमें हमारे घर वापस मिलें.”
कुरैशी ने यह भी कहा कि 1990 के दशक में वेस्टर्न रेलवे की एक और तोड़फोड़ कार्रवाई के दौरान, “दत्त साहब वास्तव में एक JCB के सामने लेट गए थे ताकि तोड़फोड़ रोकी जा सके.”
उन्होंने कहा, “यह हमारे वोटों के लिए नहीं था. यह इसलिए था क्योंकि वे समझते थे कि यहां रहने वाले लोगों के पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं है. यह इंसानियत थी.”
हालांकि दत्त की राजनीतिक सक्रियता ने कांग्रेस को यहां वोट बैंक बनाने में मदद की हो सकती है, लेकिन पार्टी नेताओं का कहना है कि ऐसी बस्तियों के फैलाव के लिए केवल राजनीतिक संरक्षण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
महाराष्ट्र कांग्रेस के महासचिव धनंजय शिंदे ने दिप्रिंट से कहा, “सुनील दत्त साहब का निधन 2005 में हो गया था. बीजेपी 2014 में सत्ता में आई और अब उसके पास ट्रिपल इंजन सरकार है. सुनील दत्त के निधन के बाद 25 वर्षों में अतिक्रमण बढ़ा होगा. इसके लिए पार्टी को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? उन्होंने जो किया, वह अपने क्षेत्र के लोगों के लिए और अपने अच्छे दिल की वजह से किया. बीजेपी का अब इसे राजनीतिक रंग देना गलत है.”
हेगड़े ने भी यही बात दोहराई और कहा कि सुनील दत्त का निधन 2005 में हुआ था.
उन्होंने कहा, “आप देख सकते हैं कि 2005 से 2025-26 के बीच झुग्गियां बढ़ी होंगी. तो क्या इसके लिए दत्त साहब जिम्मेदार थे? क्या पिछले 20 वर्षों में कोई प्रशासन नहीं था? उन्होंने आंखें क्यों मूंद लीं?”
दूसरी ओर, निवासियों का कहना है कि लंबे समय तक उनका समर्थन कांग्रेस के साथ रहा, लेकिन अब इसमें बदलाव आ सकता है.
कुरैशी ने कहा, “ज्यादातर सांसद और विधायक जिन्हें हमने वोट दिया, वे कांग्रेस से थे. हाल के वर्षों में शिवसेना और अजित दादा की NCP के उम्मीदवारों को भी यहां समर्थन मिला है. इसलिए यहां अलग-अलग विचारों के लोग हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों ने कांग्रेस को ही वोट दिया है.”
एक दशक लंबी कानूनी लड़ाई
हालिया मामले में, तोड़फोड़ अभियान के दूसरे दिन (20 मई) विरोध और बढ़ गया, जब अधिकारियों ने ‘फैसाने मुस्तफा गरीब नवास’ मस्जिद और ‘मस्जिद-ए-इनाम’ को भी गिरा दिया. इसके बाद प्रदर्शन शुरू हो गए.
प्रदर्शनकारियों द्वारा पत्थरबाजी किए जाने और पुलिस द्वारा जवाबी लाठीचार्ज के कारण बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात करना पड़ा. कम से कम 10 लोग घायल हुए, जिनमें प्रदर्शनकारी, दो RPF कर्मी और एक मुंबई पुलिस कांस्टेबल शामिल थे.
अधिकारियों का कहना था कि दोनों धार्मिक ढांचे रेलवे की जमीन पर बने थे और अवैध भी थे.
मस्जिद-ए-इनाम के ठीक बगल में रहने वाली आसिया बानो ने कहा, “मैं यहां 40 साल से रह रही हूं. गरीब नवास मस्जिद यहां करीब 70-80 साल से है, जबकि इनाम मस्जिद मेरे आने से पहले से यहां थी. इन मस्जिदों को तोड़फोड़ अभियान का हिस्सा नहीं बनाया जाना था.”

उन्होंने कहा, “इसे सिर्फ एक धार्मिक इमारत की तरह मत देखिए, यह हमारी इबादत की जगह है. जाहिर है, लोगों को इन्हें टूटते देखकर भावुकता होगी.”
हालांकि यह तोड़फोड़ अभियान अचानक उनके दरवाजे तक नहीं पहुंचा था.
गरीब नगर से अतिक्रमण हटाने की वेस्टर्न रेलवे की कोशिशें कई साल पुरानी हैं और बांद्रा कॉरिडोर के बड़े विस्तार योजनाओं से जुड़ी रही हैं.
रेलवे अधिकारियों का लगातार कहना रहा है कि यह बस्ती रेलवे की जमीन पर बनी है और रेलवे ट्रैक तथा प्रस्तावित इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के पास होने के कारण परिचालन और सुरक्षा संबंधी चिंताएं पैदा करती है.
बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2009 में BMC को तानसा जल पाइपलाइन कॉरिडोर के किनारे बने अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया था. यह कॉरिडोर गरीब नगर से भी गुजरता था. पाइपलाइन के ऊपर बनी बस्तियां निवासियों और जल आपूर्ति नेटवर्क दोनों के लिए खतरा मानी गई थीं.
26 अक्टूबर 2017 की आग उसी समय लगी थी जब BMC हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई कर रही थी.
जो आग शुरुआत में छोटे स्तर की थी, वह कुछ ही घंटों में लेवल-IV (मेजर) आग में बदल गई.
इसके बाद वेस्टर्न रेलवे ने 27 नवंबर 2017 को गरीब नगर रहवाशी संघ और एकता वेलफेयर सोसाइटी जैसे निवासी समूहों को खाली करने के नोटिस जारी किए.
निवासियों ने इस कार्रवाई को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी. दिसंबर 2017 में अदालत ने उन्हें अंतरिम राहत दी, जिससे बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ की कार्रवाई कई वर्षों तक रुक गई.
पुनर्वास, जमीन के स्वामित्व और सर्वेक्षण प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग दावों के कारण मामला लंबे समय तक अदालतों में उलझा रहा.
अगस्त 2021 में एक बड़ा घटनाक्रम हुआ, जब रेलवे अधिकारियों और इंफ्रास्ट्रक्चर एजेंसियों ने प्रस्तावित छठी रेलवे लाइन और उससे जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए संयुक्त सर्वेक्षण किया.
इसमें उन संरचनाओं की पहचान की गई जो पुनर्वास के लिए पात्र हो सकती थीं और उन संरचनाओं की भी जो रेलवे के सुरक्षा क्षेत्र में आती थीं. बाद में यही निष्कर्ष अदालत की कार्यवाही का अहम हिस्सा बने.
इस साल स्थिति तब बदली जब बॉम्बे हाई कोर्ट ने वेस्टर्न रेलवे को अवैध संरचनाएं हटाने की अनुमति दी, लेकिन साथ ही निर्देश दिया कि 2021 के सर्वेक्षण में पात्र पाए गए निवासियों के हितों की रक्षा की जाए.
अदालत के आदेश में कहा गया, “जहां तक रेलवे द्वारा सभी अनधिकृत और अवैध संरचनाओं को हटाने की कार्रवाई का सवाल है, हम रेलवे अधिकारियों को इसे जारी रखने की अनुमति देते हैं. हालांकि 10 अगस्त 2021 और 11 अगस्त 2021 के सर्वेक्षणों में पात्र पाए गए झुग्गीवासियों के हितों की पर्याप्त सुरक्षा की जानी चाहिए.”
इस कार्रवाई को रोकने की कोशिशें अंततः असफल रहीं.
21 मई को सुप्रीम कोर्ट ने तोड़फोड़ अभियान के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज कर दी, जिससे अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई जारी रखने का रास्ता साफ हो गया.
वेस्टर्न रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी अभिषेक ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को “इस बात की पुष्टि” बताया कि अभियान कानूनी रूप से वैध था.
उन्होंने कहा, “जमीन हमेशा रेलवे की थी. शुरुआत में यहां कुछ छोटी झोपड़ियां थीं जो हमारे काम में बाधा नहीं बनती थीं, लेकिन बाद में यहां 600 से ज्यादा झोपड़ियां बन गईं. यह रेलवे की जमीन पर पूरी तरह अवैध और अनधिकृत अतिक्रमण था.”

अदालती समर्थन मिलने के बाद वेस्टर्न रेलवे ने सैकड़ों पुलिस और RPF कर्मियों की तैनाती के साथ पांच दिन का तोड़फोड़ अभियान शुरू किया.
अभियान के अंत तक अधिकारियों ने कहा कि लगभग 500 संरचनाएं हटा दी गईं और दोबारा अतिक्रमण रोकने के लिए खाली कराई गई जमीन को तुरंत बाड़बंदी और कंक्रीट कार्य के जरिए सुरक्षित किया जाएगा.
25 मई को, गरीब नगर अभियान समाप्त होने के एक दिन बाद, वेस्टर्न रेलवे ने गोरेगांव और मालाड स्टेशनों के बीच लगभग 1,500 वर्ग मीटर रेलवे भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया.
मालाड ईस्ट के चिंचोली फाटक, हाजी बापू रोड, धोबी घाट और गोविंद नगर के पास कॉरिडोर के पूर्वी हिस्से में बनी 36 स्थायी और 24 अस्थायी संरचनाएं गिराई गईं.
यह कार्रवाई 26 फरवरी 2026 के बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के बाद की गई, जिसमें अदालत ने निवासियों को राहत देने से इनकार कर दिया था. अदालत ने कहा था कि वे रेलवे जमीन पर स्वामित्व, किरायेदारी या किसी कानूनी अधिकार को साबित नहीं कर सके और अधिकारियों को कार्रवाई जारी रखने की अनुमति दी थी.
वापस गरीब नगर में, सलीम कुरैशी ने कहा कि फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती विस्थापित परिवारों को आश्रय और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना है.

उन्होंने कहा, “हम हर संभव तरीके से लोगों की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं. कई परिवारों ने अचानक अपने घर और सामान खो दिए हैं. फिलहाल उन्हें भोजन, दस्तावेज, अस्थायी आश्रय और सहायता की जरूरत है.”
कुरैशी का एक कपड़ों का व्यवसाय है, जो गरीब नगर की उन 100 झोपड़ियों में शामिल है जिन्हें सर्वेक्षण में सुरक्षित माना गया था.
वह खुद भी यहीं रहते थे, लेकिन उनका घर गिरा दिया गया और अब वे अपने परिवार के साथ पास के इलाके में किराए के मकान में रह रहे हैं.
कुरैशी के पिता 1970 के दशक में मुंबई आए थे और गरीब नगर में बस गए थे. कुरैशी का जन्म 1979 में यहीं हुआ. उनकी मां का जन्म भी यहीं हुआ था और उनके नाना-नानी ने पूरी जिंदगी गरीब नगर में बिताई.
उन्होंने कहा, “उस समय यहां इतनी बड़ी बस्ती नहीं थी, लेकिन पूरे देश से लोग ‘सपनों के शहर’ में काम की तलाश में आते थे. मेरे पिता भी उन्हीं में से थे.”
कुरैशी मस्जिद-ए-इनाम के बगल में रहते थे.
उन्होंने कहा, “तोड़फोड़ के समय मैं अतिक्रमण विरोधी अभियान के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दूसरी अपील की तैयारी कर रहा था, जिसे अब हम जानते हैं कि खारिज कर दिया गया. अब हमारे पास कोई और कानूनी रास्ता नहीं बचा है.”
उन्होंने यह भी कहा कि सर्वेक्षण में 100 झोपड़ियों को कानूनी माना गया था और उन्हें बचाया जाना था, लेकिन उनमें से 30-35 झोपड़ियां भी गिरा दी गईं.
अब वहां के निवासी बांद्रा के निर्मल नगर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराने की योजना बना रहे हैं.
‘जिंदगी आसान नहीं थी, लेकिन वह हमारा घर था’
दिप्रिंट से बात करने वाले निवासियों ने माना कि गरीब नगर में जिंदगी आसान नहीं थी.
अक्सर पूरा परिवार एक ही कमरे में रहता था. साझा शौचालयों का इस्तेमाल दर्जनों परिवार करते थे. पानी केवल तय समय पर आता था और हर मानसून में बाढ़ तथा छत टपकने का डर बना रहता था.
आसिया बानो ने कहा, “सात लोगों के लिए हमारे पास सिर्फ एक कमरा था. शौचालय साझा थे, पानी केवल कुछ घंटों के लिए आता था और हर मानसून में बाढ़ का डर रहता था. लेकिन फिर भी यह हमारा घर था.”
उनके जैसे कई लोगों के लिए यह बस्ती मुंबई में तेजी से दुर्लभ होती जा रही एक चीज देती थी—पीढ़ियों से बना एक सामाजिक सहारा.
संकरी गलियों में किराना दुकानें, सिलाई इकाइयां, चाय की दुकानें और छोटे भोजनालय थे. पड़ोसी एक-दूसरे को कर्ज देते थे, बच्चों की देखभाल करते थे, नौकरी दिलाने में मदद करते थे और आपात स्थिति में साथ खड़े होते थे.
निवासियों ने कहा कि वे त्योहार और शादियां साथ मनाते थे और कोविड महामारी के दौरान ये रिश्ते और भी महत्वपूर्ण हो गए थे.
65 वर्षीय अब्दुल रशीद ने कहा, “हमारे बच्चे साथ बड़े हुए. हमने ईद और शादियां साथ मनाईं और कोविड के दौरान एक-दूसरे की मदद की.”
उन्होंने कहा, “बाहर के लोग एक झुग्गी देखते थे. हम एक मोहल्ला देखते थे.”
19 मई को जब पहली बार तोड़फोड़ दल पहुंचा, तो स्थायित्व का यह एहसास टूट गया.
निवासियों का कहना है कि घरों के नुकसान के अलावा इस कार्रवाई ने उन सामाजिक रिश्तों को भी तोड़ दिया जिन्हें बनाने में दशकों लग गए थे.
रशीद ने कहा, “उन्होंने हमारे घर छीन लिए. लेकिन इससे ज्यादा दुख इस बात का है कि उन्होंने उस मोहल्ले को तोड़ दिया जिसे बनाने में पीढ़ियां लग गई थीं.”
35 वर्षीय नाजनीन अंसारी, जिनके पति वसीम एक फर्नीचर दुकान में मजदूर हैं, ने कहा कि विस्थापित परिवारों को अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि आगे उन्हें कहां जाना है.

वह अब अपने पति के साथ उसी सड़क पर रह रही हैं, जहां सामने तोड़फोड़ के बाद मलबा पड़ा हुआ है.
दिव्यांग नाजनीन ने कहा कि घर खाली कराने और सामान हटाने का पूरा काम उनके पति को अकेले करना पड़ा.
उन्होंने कहा, “हमारे पास जाने के लिए कोई दूसरी जगह नहीं है. शहर में कोई परिवार भी नहीं है. हमें अपना घर छोड़कर सामने वाली सड़क पर रहने के लिए मजबूर होना पड़ा. अब हमें नहीं पता कि आगे कहां जाएं.”
आसिया की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है.
वह अब अपने बच्चों के साथ रेलवे के फुटओवर ब्रिज के नीचे रह रही हैं.
उन्होंने कहा, “हम बारी-बारी से सोते हैं ताकि अपने सामान पर नजर रख सकें. अपनी बेटियों को खुले आसमान के नीचे बिना किसी छत के सोते हुए देखकर मेरा दिल टूट जाता है. फिलहाल मैं और कर भी क्या सकती हूं?”
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