नई दिल्ली: महाराष्ट्र में कुश्ती का संचालन कौन करेगा, इस कानूनी लड़ाई में इस सप्ताह बड़ा मोड़ आया, जब बॉम्बे हाई कोर्ट ने रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (WFI) के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें शरद पवार के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र रेसलिंग एसोसिएशन (MWA) की मान्यता समाप्त कर दी गई थी. कोर्ट ने भाजपा के नेतृत्व वाले महाराष्ट्र राज्य कुश्तीगीर संघ को भी WFI की मान्यता प्राप्त राज्य इकाई के रूप में मान्य कर दिया.
इस फैसले के बाद पूर्व महाराष्ट्र मुख्यमंत्री और राज्यसभा सदस्य शरद पवार, जो MWA के अध्यक्ष भी थे, राज्य में कुश्ती के प्रशासनिक नियंत्रण से बाहर हो गए हैं. दूसरी ओर महाराष्ट्र राज्य कुश्तीगीर संघ का नेतृत्व भाजपा सांसद रामदास तड़स कर रहे हैं.
जस्टिस भारती डांगरे और मंजुषा देशपांडे की बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि पवार के नेतृत्व वाली MWA की मान्यता सही तरीके से समाप्त की गई थी क्योंकि उसके खिलाफ गबन और प्रशासनिक विफलताओं सहित “गंभीर” कदाचार के पर्याप्त सबूत मिले थे. इसके साथ ही महासंघ में उनके गुट का लंबे समय से चला आ रहा कार्यकाल समाप्त हो गया.
विवाद कैसे शुरू हुआ
तनाव जून 2022 में शुरू हुआ, जब उस समय भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के नेतृत्व वाली WFI कार्यकारी समिति ने सर्वसम्मति से MWA को भंग करने का फैसला किया. हालांकि हाई कोर्ट ने नवंबर 2022 में इस फैसले को रद्द कर दिया और MWA को अपना कार्यकाल पूरा करने का अधिकार वापस दे दिया, लेकिन असली परेशानी तभी शुरू हुई.
उस जीत के कुछ ही दिनों बाद WFI ने MWA के खिलाफ नई जांच शुरू कर दी. इसमें प्रशासनिक और वित्तीय गड़बड़ियों के गंभीर आरोप लगाए गए, जिनमें 2015 के बाद चुनाव न कराना, ऑडिट किए गए खाते जमा न करना और मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय चैंपियनशिप की जगह “कमर्शियल लीग” को प्राथमिकता देना शामिल था.
स्थिति तब बदली जब जनवरी 2023 में केंद्रीय युवा कार्यक्रम और खेल मंत्रालय ने WFI की “चल रही गतिविधियों” को निलंबित कर दिया और WFI नेतृत्व पर यौन उत्पीड़न तथा वित्तीय गड़बड़ियों के आरोपों के बाद एक निगरानी समिति नियुक्त की. यह कदम नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर शीर्ष भारतीय खिलाड़ियों, जिनमें विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पुनिया शामिल थे, के धरने के बाद उठाया गया था.
इस केंद्रीय हस्तक्षेप के बावजूद, WFI की अनुशासन समिति ने अप्रैल 2023 में MWA की मान्यता समाप्त करने की सिफारिश की, जिसे बाद में WFI की जनरल काउंसिल ने मंजूरी दे दी.
MWA ने तर्क दिया कि पूरी प्रक्रिया “राजनीतिक बदले की भावना और साजिश” का परिणाम थी, जिसका उद्देश्य उनके कामकाज को रोकना था. उसने यह भी कहा कि जनवरी 2023 में मंत्रालय द्वारा WFI की सभी गतिविधियां निलंबित किए जाने के बाद फेडरेशन और उसकी अनुशासन समिति के पास कोई आदेश जारी करने का कानूनी अधिकार नहीं था.
इसके अलावा MWA ने कहा कि उसकी मान्यता समाप्त करना WFI के संविधान का उल्लंघन था, क्योंकि इसमें ऐसी कार्रवाई केवल तीन आधारों पर की जा सकती है. निर्देशों का पालन न करना, चुनाव न कराना या खाते जमा न करना. उनका कहना था कि उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित मौका नहीं दिया गया और आदेश “मनमाना और बिना किसी कारण” के था.
कोर्ट ने MWA के खिलाफ फैसला क्यों दिया
अपने 61 पन्नों के विस्तृत फैसले में कोर्ट ने पहले स्पष्ट किया कि भले ही WFI संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत “राज्य” नहीं है, लेकिन यह राष्ट्रीय महत्व के सार्वजनिक कार्य करती है, जैसे ओलंपिक के लिए टीमों का चयन करना. इसलिए इसके खिलाफ रिट याचिका दायर की जा सकती है.
हालांकि कोर्ट ने MWA के इस तर्क को खारिज कर दिया कि 2023 के निलंबन के दौरान WFI “अस्तित्वहीन” संस्था बन गई थी. न्यायाधीशों ने कहा कि निलंबन केवल “चल रही गतिविधियों” और कार्यकारी समिति के रोजमर्रा के प्रबंधन पर लागू था. जनरल काउंसिल, जिसे कोर्ट ने फेडरेशन की “सर्वोच्च संस्था” बताया, कभी निलंबित नहीं हुई थी और उसके पास सदस्य इकाइयों की मान्यता समाप्त करने का संवैधानिक अधिकार बना रहा.
कोर्ट ने पाया कि अनुशासन समिति की रिपोर्ट में MWA के खिलाफ गंभीर निष्कर्ष थे, जिनमें वित्तीय गबन और पर्यवेक्षकों की नियुक्ति से जुड़े दस्तावेजों में कथित हेरफेर के सबूत शामिल थे. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि कोर्ट ने कहा कि MWA के महासचिव बी.एस. लांडगे ने जांच में हिस्सा लिया था और जवाब भी दिए थे. इसलिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ.
अंत में कोर्ट ने यह भी कहा कि दिसंबर 2023 में नव निर्वाचित WFI जनरल काउंसिल ने इस मान्यता समाप्ति को मंजूरी दी थी, और MWA ने इस फैसले को कानूनी रूप से चुनौती भी नहीं दी.
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