नई दिल्ली: कोयला घोटाले के हिंदाल्को मामले में समन जारी होने के एक दशक से ज्यादा समय बाद और उनके निधन के दो साल बाद, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बुधवार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली. सुप्रीम कोर्ट ने CBI के मामले को बंद करने के फैसले को स्वीकार करते हुए उन्हें इस मामले में क्लीन चिट दे दी.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने मनमोहन सिंह की 11 साल पुरानी अपील मंजूर कर ली. यह अपील मार्च 2015 में ट्रायल कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ थी, जिसमें CBI की क्लोजर रिपोर्ट के बावजूद मनमोहन सिंह और पूर्व कोयला सचिव पी.सी. पारेख को मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी किया गया था.
उस समय CBI कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश भारत पाराशर, जो अब सुप्रीम कोर्ट के महासचिव हैं, ने 12 मार्च 2015 को समन जारी किया था. पारेख को भी मनमोहन सिंह के साथ 8 अप्रैल को ट्रायल कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया गया था. उस समय मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और उनके पास कोयला मंत्रालय भी था.
CBI ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में कहा था कि मनमोहन सिंह के खिलाफ मुकदमा चलाने लायक कोई सबूत नहीं है. लेकिन ट्रायल कोर्ट ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था.
ट्रायल कोर्ट के आदेश के करीब दो हफ्ते बाद मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में समन को चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने उस समन पर रोक लगा दी थी.
बुधवार को जब मुख्य न्यायाधीश की पीठ कोयला घोटाले से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी, तब मनमोहन सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री की अपील अभी भी लंबित है.
उन्होंने कहा कि मनमोहन सिंह के निधन को देखते हुए अदालत इस अपील का निपटारा कर दे और अपने आदेश में यह भी दर्ज करे कि ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियां अब प्रभावहीन मानी जाएं.
सिब्बल ने अदालत से कहा, “मैं नहीं चाहता कि ये टिप्पणियां रिकॉर्ड में बनी रहें.”
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के पास CBI की क्लोजर रिपोर्ट खारिज करने की कोई ठोस वजह नहीं थी.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “हम इस बात से संतुष्ट हैं कि सत्र न्यायाधीश के पास CBI की क्लोजर रिपोर्ट खारिज करने और मामले का संज्ञान लेने का कोई मजबूत आधार नहीं था. इसलिए हम विशेष अनुमति याचिका मंजूर करते हैं, विशेष न्यायाधीश के आदेश को रद्द करते हैं, CBI की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करते हैं और मामले को गुण-दोष के आधार पर बंद करते हैं.”
ट्रायल कोर्ट द्वारा समन जारी किए जाने से कुछ महीने पहले, नवंबर 2014 में उसी अदालत ने CBI को फटकार लगाई थी कि उसने मनमोहन सिंह से पूछताछ क्यों नहीं की. एक महीने बाद अदालत ने CBI को मनमोहन सिंह का बयान दर्ज करने का आदेश दिया था. एजेंसी को मामले की आगे जांच करने के लिए भी कहा गया था.
मार्च 2015 में ट्रायल कोर्ट द्वारा मनमोहन सिंह और पी.सी. पारेख को समन जारी किए जाने के बाद पारेख ने मांग की थी कि मनमोहन सिंह से पूछताछ होनी चाहिए. उन्होंने दावा किया था कि अगर मनमोहन सिंह अपने फैसले पर अड़े रहते, तो “कोलगेट” घोटाला नहीं होता. आखिरकार जनवरी 2015 में CBI की टीम मनमोहन सिंह के घर गई थी और उनका बयान दर्ज किया था.
यह मामला 2005 में ओडिशा के झारसुगुड़ा जिले में स्थित तालाबीरा-II और III कोयला ब्लॉकों के आवंटन से जुड़ा है. ये ब्लॉक हिंदाल्को इंडस्ट्रीज (आदित्य बिड़ला समूह की कंपनी) और दो अन्य कंपनियों को संयुक्त रूप से दिए गए थे.
CBI ने उस समय हिंदाल्को के गैर-कार्यकारी चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला, तत्कालीन कोयला सचिव पी.सी. पारेख और हिंदाल्को के अन्य अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक साजिश और सरकारी अधिकारियों द्वारा आपराधिक कदाचार समेत कई धाराओं में मामला दर्ज किया था.
जब सुप्रीम कोर्ट में मनमोहन सिंह की अपील पर सुनवाई हुई, तब उनकी ओर से कपिल सिब्बल ने दलील दी कि स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिश के खिलाफ हिंदाल्को को कोयला ब्लॉक आवंटित करने में पूर्व प्रधानमंत्री ने कोई गैरकानूनी काम नहीं किया था.
सिब्बल ने कहा कि मनमोहन सिंह ने सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला लिया था. किसी खास कंपनी को खदान आवंटित करना गैरकानूनी नहीं था, क्योंकि ऐसा करने पर कोई कानूनी रोक नहीं थी.
वरिष्ठ वकील ने इस बात पर भी कड़ी आपत्ति जताई कि CBI द्वारा दो बार क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने के बावजूद ट्रायल कोर्ट ने मनमोहन सिंह को समन जारी कर दिया था.
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