Wednesday, 19 January, 2022
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पंजाब के दलित बदल रहे सूबे की सियासत, चर्चों में लगा रहे भीड़ और गा रहे चमार प्राइड

इस ग्राउंड रिपोर्ट में दिप्रिंट ने पंजाब में उभर रही दरारों पर रोशनी डालने के लिए, सूबे के 7 ज़िलों का दौरा किया और एक ऐसी क्रांति पर फोकस किया, जिसे अब पहचाना जाने लगा है.

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झालूर (संगरूर): एक बुज़ुर्ग लकवाग्रस्त महिला गुरदेव कौर, ख़ून में लथपथ पड़ी थी, क्योंकि जाटों की एक भीड़ ने उसका पैर काट दिया था. वो इसी पर नहीं रुके; उसके घर की छत पर खड़े होकर, उन्होंने पानी की पूरी टंकी उसके ऊपर ख़ाली कर दी, जब वो अपनी चारपाई पर पड़ी हुई थी. पानी के ज़ोर से वो ज़मीन पर गिर गई, और आंगन में भरे पानी ने उसे डुबा दिया. झलूर गांव के मज़हबी सिख बेबसी से खड़े देखते रहे- जाटों ने किसी को उसके पास नहीं जाने दिया.

ये घटना 5 अक्तूबर 2016 की है, और ये सिर्फ ज़मीन के एक टुकड़े पर हुई थी. आज वो एक शहीद हैं जिनका एक स्मारक है, और गांव के बीच में उनके नाम पर एक लाइब्रेरी बनी हुई है.

पांच साल बाद, दिल्ली के पास कथित रूप से निहंगों द्वारा एक दलित सिख की भयानक लिंचिंग, पंजाब में एक और आग भड़का रही है. पुलिस का कहना है कि निहंगों को शक था, कि उस दलित ने सरब्लो ग्रंथ (जिसे गुरु गोबिंद सिंह की कृति माना जाता है) को अपवित्र किया था, ऐसा दावा जिसकी अभी तक पुष्टि नहीं हुई है. ये वीभत्स काम सिंघू बॉर्डर पर अंजाम दिया गया- जो नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पारित तीन कृषि क़ानूनों के विरोध का केंद्र बना हुआ है- जिसमें मारने से पहले उस शख़्स का हाथ काट दिया गया, और उसके शरीर को एक बैरिकेड से बांध दिया गया.

पंजाब के संगरूर ज़िले में झालूर के जाटों ने, गांव के दलितों को घेर लिया था, जो एक तिहाई पंचायत भूमि पर अपना अधिकार जताने के लिए आंदोलन कर रहे थे, जो पंजाब विलेज कॉमन लैण्ड्स (रेगुलेशन) एक्ट 1961 के तहत, समुदाय के लिए आरक्षित थी. लेकिन ये जाट थे जो अपने नुमाइंदों के ज़रिए, उस ज़मीन पर नियंत्रण बनाए हुए थे.

कौर की 12 नवंबर 2016 को एक अस्पताल में मौत हुई, लेकिन उनका अंतिम संस्कार 27 नवंबर को हो पाया. उनके शव को सुरक्षित रखा गया था, ताकि आसपास के गांवों के मज़दूर जमा होकर उन्हें श्रद्धांजलि पेश कर सकें. सैकड़ों लोग जमा हो गए थे, और झालूर में पुरुषों और महिलाओं के बहुत से क़ाफिले पहुंच गए थे. कौर के शव को लाल कपड़े में लपेटकर महान सतलज के हवाले कर दिया गया- शायद वो मज़दूर आग का राख में बदलना वहन नहीं कर सकते थे, चूंकि वो चाहते थे कि वो हमेशा जलती रहे.

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बदलती राजनीतिक वास्तविकता

आज पंजाब की सियासत में दलितों की नुमाइंदगी बढ़ती नज़र आ रही है. अचानक सियासी पार्टियां आबादी के उस वर्ग को लुभाने की कोशिश कर रही हैं, जिसकी पहले उन्होंने कभी परवाह नहीं की. क़रीब 32 प्रतिशत अनुसूचित जाति वाले सूबे को, सितंबर में चरणजीत सिंह चन्नी के रूप में अपना पहला दलित मुख्यमंत्री मिला. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने वादा किया है, कि अगर वो सत्ता में आई तो किसी दलित को सीएम बनाएगी, जबकि शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) ने किसी दलित नेता के लिए, डिप्टी सीएम का पद आरक्षित कर लिया है.

सिर्फ ऊंचे राजनीतिक पद ही नहीं, पंजाब में दलित आज धार्मिक संगठनात्मक ढांचों में भी प्रमुख पदों पर बने हुए हैं. सिख धर्म की सर्वोच्च अस्थायी सीट अकाल तख़्त के मुख्य जत्थेदार, ज्ञानी हरप्रीत सिंह दलित समुदाय से आते हैं.

लेकिन झालूर के दलितों का संघर्ष सिर्फ प्रतिनिधित्व के साथ समाप्त नहीं हो जाता. उनपर चन्नी के सीए बनाए जाने से कोई फर्क़ नहीं पड़ा है. गुरदेव कौर के बेटे बलबीर सिंह कहते हैं, ‘अब अगर एक दलित मुख्यमंत्री है तो क्या हुआ, प्रशासन में बैठे लोग तो अभी भी ऊंची जातियों से हैं, और वो हमारे फायदे के लिए कुछ नहीं करेंगे. मुख्यमंत्री हर चीज़ की बारीकियों में नहीं पड़ सकता’.

बलबीर का कहना है कि वो ज़मीन प्राप्ति संघर्ष समिति से जुड़े हैं, एक ऐसा आंदोलन जिसके ज़रिए, अपनी मां के सम्मान में वो दूसरे गांवों को, उनके भूमि अधिकार दिलाने की कोशिश कर रहे हैं.

पंजाब के संगरूर जिले के झालूर गांव में गुरदेव कौर का बेटा बलबीर सिंह, जिसका पोस्टर (पीछे-दाएं) भगत सिंह के फ्रेम के बगल में लटका हुआ है। | उर्जिता भारद्वाज | दिप्रिंट
पंजाब के संगरूर जिले के झालूर गांव में गुरदेव कौर का बेटा बलबीर सिंह, जिसका पोस्टर (पीछे-दाएं) भगत सिंह के फ्रेम के बगल में लटका हुआ है। | उर्जिता भारद्वाज | दिप्रिंट

बहुत से आंदोलनों ने पंजाब के दलितों में ऊपर की सामाजिक गतिशीलता को बढ़ाया है, जिससे ये समाज इतना सशक्त हो गया है, कि अब वो ऊंची जातियों के दबदबे वाली, दमनकारी प्रणालियों से मुक्ति की बातें करने लगा है. कौर की मौत ने झलूर को भूमि आधिकारों के लिए बग़ावत का ग्राउंड ज़ीरो बना दिया है, चूंकि वो पंजाब के उन गिने चुने गांवों में आ गया है, जहां एससी समुदाय कामयाबी के साथ बोली लगाकर, आरक्षित पंचायत भूमि पर खेती करता है.

दलित पहचान का ये प्रदर्शन हर चौक पर बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमाओं, और लगभग हर घर पर उनके छवि-चित्रण के रूप में नज़र आता है. ये दोआबा के गांवों में महलनुमा घरों में चमकता है, उनकी धार्मिक गतिविधियों के भजनों में महसूस होता है, और गर्वीले चमार गीतों में और ज़ोर से स्पष्ट होता है. ये एक जटिल कहानी है जो दो दशकों से कांशी राम की धरती पर पनप रही है, जिसे उस जागरूकता और ऊंचे सामाजिक स्तर से बल मिलता है, जिसे पंजाब के अनिवासी भारतीय यहां के निवासियों को वापस भेजते थे. चन्नी की नियुक्ति शायद पंजाब की अनुसूचित जातियों को देरी से मंज़ूरी है- अच्छा लगे या बुरा, अब हम यहां हैं और अब हम ख़ामोश नहीं रहेंगे, और ख़ामोश बहुमत बनकर नहीं रहेंगे.

लेकिन राजनीतिक पार्टियां अचानक दलित मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा क्यों कर रहीं हैं, और एससी वोटर को क्यों लुभा रही हैं, जबकि वो हमेशा सामाजिक, राजनीतिक, और आर्थिक रूप से ताक़तवर जाटों के ही पीछे लगे रहे हैं?

अमृतसर से संसद सदस्य गुरजीत सिंह औजला के अनुसार, ये सब तब शुरू हुआ जब जाट सिखों की अगुवाई में किसान आंदोलन से स्तब्ध रह गई बीजेपी ने, पंजाब में दलित सीएम बनाने की आवाज़ उठाई. इसके बाद अकाली दल की घोषणा आई, कि वो डिप्टी सीएम का पद किसी दलित के लिए आरक्षित करेंगे. वो कहते हैं, ‘बीजेपी हमेशा जातीय और सांप्रदायिक वोटों का सहारा ढूंढती है. वो नफरत की राजनीति करती है. इसलिए हर कोई अब बस दलितों की बात करता है. सिख धर्म में कोई जातिवाद नहीं है, आप लंगर में आकर देख सकते हैं’. औजला आगे कहते हैं, ‘मिस्टर चन्नी की योग्यताएं देखिए…उन्हें सीएम इसलिए बनाया गया कि वो अच्छे पढ़े-लिखे हैं, नम्र हैं, और एक अच्छे कार्यकर्त्ता हैं. दरअसल उनका चयन कोई आश्चर्य भी नहीं था, चूंकि वो कांग्रेस के नेता प्रतिक्ष के रूप में भी काम कर चुके हैं.


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प्रवास और सामाजिक गरिमा अर्जित की

बाहर जाने से पंजाब के एससी समुदाय में आर्थिक समृद्धि और सामाजिक गरिमा आई है, और स्थानीय राजनीति में उन्हें सत्ता की स्थितियां मिली हैं, ख़ासकर दोआबा के चमारों को. मिसाल के तौर पर, जलंधर ज़िले के तल्हां गांव के मदन की कहानी ले लीजिए.

क़रीब दो दशक पहले, मदन अपने गांव में ज़मींदारों के खेतों में मज़दूरी करता था. अब, चालीस से ऊपर के हो चुके मदन का, धूप से तपा चेहरा और उंगलियों के घिसे हुए नाख़ून, उसके अतीत की गवाही देते हैं. वो बहुत गर्व के साथ अपनी सबसे बड़ी संपत्ति- दो ट्रैक्टरों की बात करता है. वो कहता है, ‘एक समय था जब मैं पैदल किसी और की ज़मीन की जुताई करता था, अपनी कमर की ताक़त से बैलों को खींचता था, अपने ख़ून-पसीने से उनकी मिट्टी को सींचता था. और आज, मेरे पास दो ट्रेक्टर हैं, और उस ज़मीन पर काम करने के लिए मैं मज़दूरों को बुलाता हूं, जो मेरी है.

एक कच्चे घर में रहने से लेकर अपने सर के ऊपर सीमेंट की छत तक, मदन की ज़िंदगी ने 360 डिग्री का मोड़ देखा है- ‘एक बेहद ग़रीब परिवार से, जिसके पास खाने को मुश्किल से होता था, और जिसकी समाज में कोई हैसियत नहीं थी, हम कामयाबी की एक दास्तान बन गए हैं. और, क्या आप जानते हैं कि मैं यहां पंचायत का सदस्य हूं? आपको पता है कि एक मज़दूर के नाते, मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि एक दिन मैं पंचायत का सदस्य बन जाउंगा’.

बहुत सी अंतर्राष्ट्रीय आंबेडकरवादी संस्थाओं ने ऐसे सुविधाहीन लोगों को वित्तीय सहायता दी है, जिनमें प्रतिभा तो है लेकिन बाहर जाने के लिए साधन नहीं हैं. जलंधर में आंबेडकर भवन के संस्थापक और राज्य में आंबेडकर मिशन के मार्ग दर्शक, 92 वर्षीय एलआर बाले कहते हैं: ‘आंबेडकरवादियों ने विदेशों में बहुत काम किया है. मैं आपको तीन मिसालें दूंगा: उन्होंने साउथ हॉल इंग्लैण्ड में आंबेडकर सेंटर बनाया है; बरमिंघम में उन्होंने बुद्ध विहार, आंबेडकर भवन तथा लाइब्रेरी, और एक आंबेडकर म्यूज़ियम बनाया है. प्रवासी भारतीयों ने अपने वतन में चमार समुदाय के सामाजिक आंदोलन, स्वास्थ्य, तथा शिक्षा में बहुत योगदान दिया है, और बेहतर जीवन के लिए विदेश जाने में दूसरे सदस्यों की सहायता की है.

एल.आर. बाली, जालंधर में अम्बेडकर भवन के संस्थापक और पंजाब में अम्बेडकर मिशन के अग्रदूत। | उर्जिता भारद्वाज/दिप्रिंट
एल.आर. बाली, जालंधर में अम्बेडकर भवन के संस्थापक और पंजाब में अम्बेडकर मिशन के अग्रदूत। | उर्जिता भारद्वाज /दिप्रिंट


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धार्मिक दावा

उनकी नई हासिल हुई ख़ुशहाली और अपना हक़ जताने की भाषा के साथ ही आते हैं आस्था के बारे में कठोर सवाल- ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका में अफ्रीकी-अमेरिकी चर्च होते हैं. किसी भी औसत गांव के क्षितिज पर गुरुद्वारे का सुनहरा गुंबद होता है, जो यहां के सभी निवासियों के लिए होता है. लेकिन ये सिर्फ सिद्धांत में होता है. सबसे अधिक संभावना यही होती है, कि ये गांव की ऊंची जातियों का होता है. उस नानक के द्वार पर, जिसने अपनी गुरबानी में वर्ण व्यवस्था को ख़ारिज कर दिया था, जातिवाद अभी भी व्याप्त है.

सूबे के ज़्यादातर गांवों में तीन-चार गुरुद्वारे ऐसे होते हैं, जो रविदासियों, मज़हबियों, या एससी समुदाय के किसी और वर्ग के होते हैं. ऊंची और नीची जातियों के गुरुद्वारों में अंतर, सबसे ज़्यादा माझा और मालवा के गांवों में नज़र आता है. इन गांवों के गुरुद्वारे ज़्यादा बड़े, फैले हुए, और भव्य होते हैं, जो जाट सिखों के होते हैं. इसके बिल्कुल विपरीत एक कमरे के बिल्कुल सादे भाई जीवन सिंह गुरुद्वारे, या वाल्मीकि मंदिर होते हैं जिन्हें देखकर लगता है कि इन्हें मरम्मत की ज़रूरत है- ये वाल्मीकियों और मज़हबियों के लिए होते हैं.

ऊंची और नीची जातियों के लोग जिस तरह से दुनिया छोड़ते हैं, उसमें भी बहुत अंतर होता है.

पटियाला ज़िले के हरियाऊ गांव में, जाटों के पास अपने मृतकों के दाह-संस्कार के लिए तीन एकड़ ज़मीन है, और श्मशान घरों के रास्ते गुलाब के फूलों से सजे होते हैं. तीन मज़हबी लगातार उनकी देखरेख में लगे रहते हैं. एससी समुदायों के श्मशान घर के रास्ते पर मोटर भी नहीं जा सकती, और उसके आसपास सूखे पेड़ों के कंकाल पड़े हैं, मुर्दा चूहों की दुर्गंध भरी है, और कुत्ते इधर-उधर घूम रहे हैं.

पटियाला जिले के हरयाउ गांव में, जाटों के पास अपने मृतकों का अंतिम संस्कार करने के लिए तीन एकड़ जमीन है। | उर्जिता भारद्वाज | दिप्रिंट
पटियाला जिले के हरयाउ गांव में, जाटों के पास अपने मृतकों का अंतिम संस्कार करने के लिए तीन एकड़ जमीन है। | उर्जिता भारद्वाज | दिप्रिंट

हरयाउ गांव के दलितों के लिए बने श्मशान घाट में चलने लायक सड़क भी नहीं है. | उर्जिता भारद्वाज | दिप्रिंट
हरयाउ गांव के दलितों के लिए बने श्मशान घाट में चलने लायक सड़क भी नहीं है. | उर्जिता भारद्वाज | दिप्रिंट

चन्नी के पंजाब सीएम बनने के बाद, फेसबुक में जातिवादी टिप्पणियां भरी हुईं थीं, जिनमें उन्हें निशाना बनाया गया था. लेकिन, औजला के अनुसार वो फेसबुक टिप्पणियां ऑर्गेनिक नहीं हैं, क्योंकि ‘सिख धर्म में कोई जातिवाद नहीं है, और वो फेसबुक टिप्पणियां ज़मीनी हक़ीक़त नहीं हैं. गांवों में जाकर देखिए, गुरुद्वारों में पाबंदी जैसी कोई चीज़ नहीं है’.

कथित रूप से एक पवित्र ग्रंथ को अपवित्र करने के आरोप में, सिंघू बॉर्डर पर 35 वर्षीय व्यक्ति की हत्या, सामाजिक दरारों की एक अलग ही कहानी कहती है, जो औजला के दावों से बिल्कुल अलग है.

झालूर, हरायू और नारली के निवासी भी छुआछूत की श्रेणियों का आरोप लगाते हैं, जिनका वो गुरुद्वारों में सामना करते हैं. गांव वासियों का आरोप है कि घर में किसी जश्न या मौत की स्थिति में, उन्हें गुरु ग्रंथ साहिब को घर ले जाने की अनुमति नहीं है. अगर कोई दलित बच्चा अनजाने में ऊंची जातियों के गुरुद्वारे में चला जाए, तो उसे अकसर किसी अलग बरतन में प्रसाद दिया जाता है, जिसे फौरन ही धो लिया जाता है. उनका कहना है कि गांव में किसी भी जश्न के बाद, लंगर पर पहला दावा ऊंची जाति के सदस्यों का होता है, और दलितों की प्लेट तक भोजन तभी पहुंचता है, जब ज़मीदार भरपेट खा चुके होते हैं.

ऊंची जातियां, और दलित समुदाय में से भी कुछ वर्ग, ज़ोर देकर कहते हैं कि जातिवाद अब एक बीती हुई बात हो गया है. आदमपुर ज़िले के डिंगरियां गांव के एक जाट निवासी गुरजिंदर सिंह ने पूछा: ‘देखिए, सिख धर्म में कोई जातिवाद नहीं है. ये सब बकवास है. क्या आपने नहीं देखा कि लॉकडाउन के दौरान सिखों ने कितनी मेहनत से काम किया? गुरु का लंगर देने से पहले, हमने किसी से उसकी जात नहीं पूछी. तो फिर हम अपने ही गांवों को ग़रीबों को इससे वंचित क्यों करेंगे’. वो आगे कहते हैं, ‘गांव में तीन गुरुद्वारे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि हम रविदासिया गुरुद्वारे नहीं जाते, या उन्हें किसी दूसरे गुरुद्वारे जाने से रोकते हैं. ये सब सामुदायिक स्थल हैं, और ये सबके हैं’.

लेकिन, फिर ऐसा क्यों है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग हिंदू और सिख धर्मों से अलग होना चाहते हैं? 2010 में रविदासियों ने काशी में ऐलान किया, जो संत रविदास की जन्मस्थली है, कि वो एक अलग धर्म हैं. इस मांग को उन्होंने 2020 में भी दोहराया.

एससी समुदाय डेरों की ओर भी आकर्षित हैं, जैसे डेरा सच्चा सौदा, राधा स्वामी सत्संग ब्यास तथा निरंकारी, और पंजाब में सैकड़ों दूसरे डेरे हैं. बहुत से लोग धर्मांतरण करके ईसाई भी बन रहे हैं.

डेरों का एक राजनीतिक वज़न होता है, और ये मतदाताओं को प्रभावित करते हैं. राजनीतिक पार्टियां हमेशा इन पंथ संगठनों के संतों को लुभाने के लिए तत्पर रहती हैं. डेरा सचखंड बल्लां जिसे रविदासियों की सीट माना जाता है, सबसे ताक़तवर डेरों में शुमार होता है. इसी साल, जब इसके मौजूदा प्रमुख निरंजन दास बीमार पड़े, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तुरंत कॉल करके उनकी ख़ैरियत पूछी. मुख्यमंत्री बनने के बाद चन्नी, जो एक रामदासिया सिख हैं, स्वर्ण मंदिर का दौरा करने के बाद सीधे डेरा सच्चा बल्लां गए. उन्होंने ये भी वादा किया है कि 101 एकड़ ज़मीन पर, गुरु रविदास के लिए एक चेयर स्थापित की जाएगी.

डेरा बल्लां पर दिप्रिंट ने एक वॉलंटियर से बात की, जो अपना नाम नहीं बताना चाहता था. उसका कहना है: ‘देखो जी, सिख धर्म में कोई समानता नहीं है, सब बेकार की बातें हैं. मुझे यहां शांति और सुकून मिलता है. गुरुजी ने यहां मुझे गले लगा लिया है, मुझे इज़्ज़त दी है. मैंने अपना जीवन उन्हें समर्पित कर दिया है. लेकिन ये कहना बकवास है कि गुरु जी हमसे कहते हैं, कि किसे वोट देना है’.

लेकिन कुछ मतदाता संशय में हैं. जलंधर के तल्हां गांव के सरपंच बलविंदरजीत कहते हैं, ‘किसी डेरे से जुड़े लोग आमतौर से एक साथ मिलकर वोट देते हैं. निश्चित रूप से उनसे खुलकर नहीं कहा जाता कि क्या करना है, लेकिन प्रचार काफी होता है’.


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ईसाइयत में धर्मांतरण

माझा और मालवा क्षेत्रों में एससी लोग, भारी संख्या में ईसाई धर्म अपना रहे हैं. आपको आसानी से मंदीप कौर या कुलदीप सिंह नाम से कोई मिल सकता है, जिसके गले में जपमाला पड़ी होगी. उत्पीड़न के डर से बचने के लिए, धर्मांतरण के बाद उन्होंने अपने नाम बदलने बंद कर दिए हैं.

तरन तारन में एक पादरी दिप्रिंट को बताते हैं, कि पिछले 5-7 वर्षों में ज़िले में क़रीब 27-28 प्रोटेस्टेंट चर्च खड़े हो गए हैं. एक कैथलिक पादरी कहते हैं कि ज़िले में आठ बड़े कैथलिक चर्च हैं, जबकि वो गिनती भूल गए हैं कि गांवों में कितने हैं.

दक्षिण पंथी तत्वों के हाथों उत्पीड़न के डर से, जो धर्मांतरण को लेकर मिशनरियों से नाराज़ हैं, दोनों में कोई भी खुलकर नहीं बोला. जब दिप्रिंट तरन तारन में एक पादरी का इंटरव्यू करने पहुंचा, तो उसके सहायकों ने इसकी अनुमति नहीं दी. पत्रकारों के तौर पर अपनी सत्यता स्थापित करने के लिए, हमारी टीम के अपने प्रेस कार्ड्स, विज़िटिंग कार्ड्स, और यूट्यूब वीडियोज़ दिखाने के बाद भी, वो संतुष्ट नहीं हुए और हम पर आरोप लगाया, कि हम बीजेपी कार्यकर्त्ता हैं जो उन्हें प्रोफाइल करने की कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन आख़िरकार, धर्मांतरण भी फायदेमंद साबित नहीं हो रहा है.

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति गठबंधन के अध्यक्ष परमजीत सिंह कैंथ का कहना है, ‘जो लोग धर्मांतरण करते हैं वो आरक्षण का लाभ खो देते हैं. इसलिए अब ऐसे बहुत से लोग अपने नाम नहीं बदल रहे हैं, ताकि न सिर्फ ईसाई होने के नाते क्वालिटी शिक्षा का फायदा ले सकें, बल्कि अनुसूचित जाति से होने की बदौलत, आरक्षण जैसी सुविधा का भी लाभ उठा सकें’.

सिख और हिंदू दोनों अपने अपने धर्मों से इस बड़े पैमाने पर पलायन को लेकर असहज हैं.घर वापसी को मुमकिन बनाने के लिए, उन्होंने अपने ख़ुद के मिशन शुरू कर दिए हैं. अमृतसर के प्रीत बाज़ार में हमने ऐसे ही एक प्रयास के स्वयंसेवकों- विश्व सतसंग सभा के सदस्यों से मुलाक़ात की. प्रीत बाज़ार में ही वो चार काम-चलाऊ स्कूल और धर्मशालाएं चला रहे हैं, जहां बच्चों को सिख और हिंदू धर्मों के बारे में बताया जाता है, पढ़ाया जाता है, और स्नैक्स दिए जाते हैं. लुधियाना, पटियाला, जलंधर और नई दिल्ली में भी, वो इसी तरह केघर वापसी कार्यक्रम चला रहे हैं.

भूपिंदर कौर जो एक टीचर हैं और विश्व सतसंग सभा की सदस्य हैं, कहती हैं: ‘हमने अपने धर्म में निचली जातियों को कभी पूरी तरह गले नहीं लगाया था. अगर हमने उनकी छोटी-छोटी ज़रूरतों पर ध्यान दिया होता, उनका ख़याल रखा होता, तो उन्होंने ईसाई धर्म न अपनाया होता. अगर हम उनके सुख और उनके दुख का हिस्सा बन जाएं, और उन्हें अपने में मिला लें, तभी हम कुछ कर पाएंगे’. एक दूसरा वॉलंटियर प्रीतपाल सिंह भी उनके सुर में सुर मिलाता है: ‘जहां तक जातिवाद का सवाल है, ईसाइयों में भी जातियों को माना जाता है, और उनके यहां कैथलिक्स और प्रोटेस्टेंट्स के लिए अलग अलग चर्च होते हैं. तो क्या वहां उनसे बराबरी का बर्ताव होता है?’

विश्व सत्संग सभा के स्वयंसेवक जो अमृतसर में धर्मांतरित सिख दलितों को वापस लाने के लिए 'घर वापसी' में लगे हुए हैं। | उर्जिता भारद्वाज | दिप्रिंट
विश्व सत्संग सभा के स्वयंसेवक जो अमृतसर में धर्मांतरित सिख दलितों को वापस लाने के लिए ‘घर वापसी’ में लगे हुए हैं। | उर्जिता भारद्वाज | दिप्रिंट

पंजाब के गुरदासपुर में, ईसाइयों का एक महत्वपूर्ण वोट बैंक है, जो लोकसभा चुनावक्षेत्र में लगभग 20 प्रतिशत है- पूरे राज्य के अंदर इस क्षेत्र में सबसे अधिक अल्पसंख्यक आबादी है.

पंजाब के प्रमुख ईसाई नेताओं में एक हैं सोनू जाफर, जो क्रिस्चियंस फ्रंट के अध्यक्ष हैं, और सूबे के मालवा क्षेत्र में एक जाना पहचाना चेहरा हैं. इसी साल वो कांग्रेस छोड़कर आप में शामिल हो गए.

अकाल तख़्त के हेड ग्रंथी ज्ञानी हरप्रीत सिंह कहते हैं, ‘ईसाई मिशनरियां सीमावर्त्ती राज्य में जबरन धर्मांतरण अभियान चला रही हैं. ऐसे धर्मांतरण को रोकने के लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने, उपदेशकों की 150 टीमें पंजाब के गांवों में भेजी हैं, और वो ‘घर घर अंदर धरमसाल’ के नाम से एक अभियान चला रही है, जिसमें वो बच्चों को सिख धर्म के बारे में पढ़ाते हैं. एसजीपीसी ‘इक नगरी, इक गुरुद्वारा’ अभियान भी चला रही है, लेकिन ऐसा लगता है कि वो अभियान ज़मीनी स्तर पर, बुरी तरह फेल हो गया है.

दिप्रिंट ने एसजीपीसी अध्यक्ष से उनके पीए के ज़रिए दफ्तर में संपर्क करना चाहा, उनके निजी नंबर पर कॉल्स और मैसेज छोड़े, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

चमार प्राइड पॉप संस्कृति

आज हर ओर चमार प्राइड गीतों की धूम है- गिन्नी माही का डेंजर चमार, रिम्पी ग्रेवाल का बब्बर शेर चमार, बब्बू चंदर का प्राउड टु बी चमार. लेकिन चलिए वहां चलते हैं, जहां से ये सब शुरू हुआ.

साल 1986 था जब एक अच्छा ख़ासा लोकप्रिय देश भक्ति गायक रूप लाल धीर, जो नवांनगर ज़िले के गढ़ी अजीत सिंह गांव के एक मज़दूर का बेटा था, कांशीराम और आंबेडकर से प्रेरित हो गया, और उसने नौ गीतों का एक कैसेट निकालने का फैसला किया- पांच संत रविदास पर और चार आंबेडकर पर. उन दिनों कोई ऐसे गीत रिकॉर्ड करने को तैयार नहीं था, जो दलित आईकॉन्स की सराहना करते हों, उनकी बात तो दूर रही जिनके बोलों में गांधी की आलोचना हो. धीर और उसके सहकर्मी सरताज ने अपना पैसा- 2,000 रुपए लगाकर गीत रिकॉर्ड कराए- और किसी तरह उन्हें स्टोर्स तक पहुंचाने में कामयाब हो गए.

रिलीज़ के कुछ ही समय बाद उसे मौत की धमकियों, उसकी बेटी और पत्नी के रेप की धमकियों ने अभिभूत कर दिया. लेकिन इससे धीर के उत्साह में कमी नहीं आई, और वो ज़्यादा से ज़्यादा मज़बूत होता चला गया. वो अपने संगीत को विदेशों में ले गया, और ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका और इटली में अपने प्रदर्शन किए. 90 के दशक में उसके चाहने वालों ने उसे एक ऑल्टो कार भेंट की, और धीर अपने गांव में कार रखने वाला पहला दलित बन गया. ‘मुझे अकसर फोन आते थे जिनमें लोग चुनिंदा गालियां देते थे, और अकसर वो सब एक ही बात कहते थे- ‘तुम चूढ़े चमार, तुम्हारी इतनी हिम्मत कि हमारी जैसी गाड़ियों में बैठोगे?’

एक मज़दूर के बेटे से, जिसे महीनों तक स्कूल छोड़ना पड़ा क्योंकि उसके पास वर्दी ख़रीदने के पैसे नहीं थे, अब एक पॉपस्टार तक जिसके पास गाड़ी, बंगला, बैंक बैलेंस है, धीर की ज़िंदगी ने 360 डिग्री मोड़ ले लिया है. धीर का कहना है, ‘मुझे ख़ुशी है कि मेरे गीत अब चमार समुदाय में लोकगीत बन गए हैं. लेकिन मैं वो समय नहीं भूल सकता, जब मैं अपने भाईयों के साथ ख़ाली पेट बैठकर इंतज़ार किया करता था, कि मेरे पिता ज़मींदार के घर से आएंगे, और उसकी बची-कुची रोटियां हमारे लिए लाएंगे.

आज, चमार समुदाय के युवा साहस के साथ सामाजिक क्रांति और परिवर्तन के गीत गाते हैं, और इन गीतों की अपील राष्ट्रव्यापी है- यूट्यूब पर इन्हें लाखों व्यूज़ मिलते हैं. अपने गीतों में वो अपना ग़ुस्सा व्यक्त करते हैं, और आक्रामकता के साथ अपनी चमार पहचान को आगे रखते हैं. ज़रा बब्बू चंदर का ये गीत देखिए:

रख दे दुनलियां नूं लोड करके

फिर दे आ पट्ट मौत नूं व्यां नूं

चमारां दे पुत्त पूरी रखदे हैं ठक

जिगरा चाहिदा सानूं हाथ पा नूं

(हम, चमारों के पुत्र इतने साहसी हैं, कि हमसे टकराने के लिए हिम्मत चाहिए. हम अपने हथियार हमेशा तैयार रखते हैं, और हर समय मौत से गले मिलने को तैयार रहते हैं.)


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बहिष्करण आंदोलन

अपने गीतों में धीर बे-गमपुरा की तलाश करता है- एक ऐसी दुनिया जिसमें कोई तकलीफ न हो, कोई भेदभाव न हो, जिसका उल्लेख संत रविदास के लेखों में किया गया है. एक हालिया रचना में धीर कहता है, ‘ज़ालिमां ने ज़ुल्मां दि अत्त कित्ती मित्रों. राजबाग लैन लई मैदां विच मित्रों. बे-गमपुरे दा, बे-गमपुरे दा, बे-गमपुरे दा पंथ केड़े वेले विच सजना,जी हुण भी न जागे तो फिर कतो जगना. ओ जागो, जागों दा वेला’. इसका ढीला सा अनुवाद है: ‘ज़ालिम ज़ुल्म की हद तक पहुंच गया है. अब समय है कि हम बे-गमपुरा को हासिल करें, अगर आप अब आकर बे-गमपुरा के लिए नहीं खड़े हुए, तो फिर कब होंगे?’

लेकिन ऐसा लगता है कि बे-गमपुरा के इस आदर्श लोक में, वाल्मीकियों और मज़हबियों के लिए कोई जगह नहीं है.

जो गीत एससी समुदाय में लोकप्रिय हो रहे हैं, वो चमार प्राइड गीत हैं दलित प्राइड गीत नहीं. धीर का कहना है कि वो इसे बदलने पर काम कर रहे हैं. झालूर गांव का एक मज़हबी कुलदीप, जो फिलहाल संगीत की पढ़ाई कर रहा है, कहता है कि पैसे के अभाव के कारण ही, ये नवजागरण उसके समाज तक नहीं पहुंच पा रहा है. वो कहता है: ‘मज़हबी लोग संगीत तैयार करने में आगे नहीं आ रहे हैं, क्योंकि उनके पास आर्थिक पूंजी नहीं है. एक म्यूज़िक वीडियो बनाने में 35,000 रुपए लगते हैं. दोआबा इलाक़े में चमार समुदाय के पास एनआरआई समुदाय की वित्तीय सहायता रहती है. मज़हबी लोग शिक्षा का ख़र्च भी मुश्किल से वहन कर पाते हैं, म्यूज़िक वीडियो की तो बात ही छोड़िए’.

सीमावर्त्ती इलाक़े

पंजाब के दलितों में क्रांति की अवधारणा से कोई इतना नावाक़िफ नहीं है, जितना सूबे के सीमावर्त्ती क्षेत्रों के वाल्मीकि और मज़हबी लोग हैं, जो बेसहारों का जीवन जी रहे हैं, बिनी किसी मोहलत के सदियों से शोषण को झेलते चले आ रहे हैं.

कोई सिलिंडर नहीं, कोई शौचालय नहीं, सीमेंट की छत तक नहीं- पाकिस्तान सीमा से महज़ 300 मीटर दूर, तरन तारन के नारली गांव के मज़हबी और वाल्मीकि लोग तारों की छांव में सोते हैं, चाहे कितनी भी सर्दी या गर्मी हो जाए. अधिकतर मकान कच्चे हैं, और कुछ में तो बिजली भी नहीं है. सामाजिक कार्यकर्त्ता परमजीत कौर जिन्होंने सीमावर्त्ती क्षेत्रों में काम किया है, कहती हैं कि यहां के बेरोज़गार लोग, ज़्यादातर पाकिस्तान से आने वाली नशीली दवाओं की तस्करी के जाल में फंस जाते हैं, और अकसर ड्रग्स के दुरुपयोग में भी लिप्त हो जाते हैं.

एक और सामाजिक कार्यकर्त्ता जो जाटों के हाथों उत्पीड़न के डर से अपना नाम नहीं बताना चाहते, कहते हैं, ‘अगर महिलाएं शौच के लिए ज़मींदारों के खेतों, या काम के लिए उनके घरों में जाती हैं, तो उनके सामने ज़मींदारों के हाथों यौन शोषण का ख़तरा बना रहता है. गांवों में एक कहावत है- ‘वास्तव में शादी होने से पहले किसी एससी महिला के साथ अभ्यास कीजिए’. जब वो खेतों में शौच के लिए जाती हैं तो उनका शोषण होता है, ख़ासकर उन पर तब ख़तरा रहता है, जब वो ज़मींदार के घर पर काम करती हैं’.

गांव वालों के पास कोई संसाधन नहीं हैं. ज़्यादातर बच्चे स्कूल जाने में असमर्थ हैं. नारली गांव की एक खेतिहर मज़दूर पलविंदर कौर कहती है, ‘डिपो मालिक कहता है कि सरकार गेहूं नहीं भेजती, लेकिन मुझे लगता है कि जाट हमें गांव का हिस्सा नहीं समझते, इसलिए वो गेहूं रेक लेता है. वो हमें कुछ नहीं देता. मुझे 15 सालों में कभी अनाज नहीं मिला. सभी ज़मींदारों को गेहूं मिलता है. सरकार की ओर से भेजे गए कोई लाभ हम तक नहीं पहुंचते’. एक और मज़दूर ज़मीदारों पर गेहूं रोकने का आरोप लगाता है. 32 वर्षीय बूटा सिंह कहता है, ‘मैं कहता हूं हमें उस जगह का पता दीजिए, जहां गेहूं रोका गया है. हम वहां जाएंगे और साड्डा हक लेंगे. हमारा गेहूं ज़मींदारों के पास जा रहा है’.

जब दिप्रिंट ने नारली के डिपो होल्डर देवेंद्र सिंह से बात की, तो उसने कहा कि वो इस बारे में कुछ नहीं कर सकता. वो कहता है, ‘सरकार गोदामों में सड़ रहा पुराना गेहूं मुफ्त उपभोग के लिए देती है. अगर वो खाने लायक़ नहीं है तो इसमें मेरा क्या दोष है? हमारे गांव में कोई ग़रीब नहीं है. इन दलितों को देखिए, इनके पास मोटरबाइक्स और कारें हैं, और ये अच्छे-ख़ासे घरों में रहते हैं, लेकिन फिर भी इन्हें मुफ्त चीज़ें चाहिएं’.

एक ग्रामीण पंजाब में सरकार से प्राप्त होने वाले पत्थरों के साथ मिश्रित अनाज दिखाता है। | उर्जिता भारद्वाज | दिप्रिंट
एक ग्रामीण पंजाब में सरकार से प्राप्त होने वाले पत्थरों के साथ मिश्रित अनाज दिखाता है। | उर्जिता भारद्वाज | दिप्रिंट

मज़दूरों का किसानों के आंदोलन को लेकर भी नकारात्मक रुख़ है, जिसे दिल्ली की सीमाओं पर चलते हुए एक साल से अधिक हो गया है. पंजाब किसान यूनियन का एक सदस्य, जो सिंघू बॉर्डर होकर भी आया है, कहता है ‘वहां पर कोई मज़दूरों के मुद्दों पर बात नहीं करता. हमें वहां कभी मंच नहीं दिया जाता, वो मीडिया के साथ हमारी बातचीत को भी सीमित रखते हैं. किसान यूनियन एकता केवल कागज़ पर है. ऐसा नहीं है कि हम कंपनियों का स्वागत करते हैं, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि किसान हमारे साथ मेहरबान हैं’.


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उन्नतिशीलता में अंतर

चमार समुदाय, जो सामाजिक सीढ़ी पर ख़ुद को मज़हबी और वाल्मीकि जातियों से ऊपर मानता है, ऐतिहासिक तौर पर चमड़ा उद्योग में काम करता रहा है. इसके सदस्यों को पढ़ा-लिखा माना जाता है, और वो ऐतिहासिक आंदोलनों का हिस्सा रहे हैं.

हरीश माहे, जो अद-धर्म आंदोलन के एक संस्थापक सदस्य सेठ सुंदरलाल के पोते हैं, हमें बताते हैं कि उनका समाज मुख्य रूप से मुसलमानों के लिए मज़दूरी करता था, या बटवारे से पहले बहुत छोटे व्यवसाय करता था. बटवारे के बाद कामगार चमारों को उन मुसलमानों के फलते-फूलते व्यवसाय मिल गए, जो पाकिस्तान चले गए. माहे कहते हैं, ‘बटवारे के बाद, जब कारोबारी लोग अपने व्यवसाय छोड़कर पाकिस्तान गए, तो वो काम चमार समुदाय के पास आ गया. दूसरे विश्व युद्ध के बाद ख़ासकर चमड़े की मांग बहुत ज़्यादा थी. वो बहुत ख़ुशहाली का समय था, और यहां के लोगों के लिए पैसा कमाने का बहुत अच्छा अवसर था. 70 के दशक तक कारोबार बहुत अच्छा था’.

बूटा मंडी को अभी भी बहुत से सामाजिक आंदोलनों का ग्राउंड ज़ीरो माना जाता है, जिनके नतीजे में चमारों का उत्थान हुआ है.

चमार पंजाब के दोआबा क्षेत्र में भी केंद्रित हैं, जो सबसे समृद्ध इलाक़ा है जिसने आद धर्म जैसे सामाजिक आंदोलन, और रविदासिया तथा आंबेडकरवादी संघर्ष देखे हैं. शहीद भगत सिंह और कांशीराम का ताल्लुक़ इसी क्षेत्र से था. यहां लोग राजनीतिक रूप से ज़्यादा जागरूक हैं, और उन्हें आंबेडकर की शिक्षा कंठस्थ रहती है. आंबेडकर यहां हर जगह पाए जा सकते हैं- मंदिरों में, गुरुद्वारों में, लिविंग रूम्स में, स्टडी रूम्स में, लाइब्रेरियों में, गलियों के नामों में, और चौक पर मूर्तियों में. मालवा और माझा इलाक़ों में ऐसा नहीं है.

पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रोंकी राम कहते हैं, ‘ये याद रखना ज़रूरी है कि एससी समुदाय कोई सजातीय समूह नहीं है. जातियों के भीतर भी जातियों का बटवारा है. जुलाहा समाज अपने आपको मज़हबियों से एक पायदान ऊपर समझता है. पंजाब आगे नहीं बढ़ पा रहा है क्योंकि कोई भी, एकजुट होकर आगे नहीं बढ़ रहा है’.

चन्नी की नियुक्ति को हालांकि संशय के साथ देखा जा रहा है, लेकिन बहुजन समाज ने इसका स्वागत किया है, जिन्हें ख़ुशी है कि ‘उनकी बिरादरी’ का कोई व्यक्ति, अब राज्य में सबसे ऊंचे पद पर बैठा है. एससी समुदायों के फायदे के लिए उन्होंने बहुत सारी घोषणाएं की हैं, जो एक अतिरिक्त लाभ है- अपने चुनाव क्षेत्र चमकौर साहिब में क़र्ज़ माफी, पानी के सस्ते बिल, और पावर सब्सीडी के उनके वायदे, एससी वोट बैंक को ख़ुश कर सकते हैं.

लेकिन ज़मीनी स्तर पर, नारली ग्रामवासियों जैसे बहुत से लोग, अभी भी अपने हिस्से के भोजन, पानी, और बिजली के इंतज़ार में हैं. और उनका इंतज़ार जितना लंबा होगा, उतना ही उन्हें यक़ीन हो जाएगा, कि उनके अपने समाज का सीएम भी वो बदलाव नहीं ला सका, जिसका दशकों से वादा किया जाता रहा है.

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