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Friday, 12 July, 2024
होममत-विमतमोदी सरकार बहाने न बनाए, वैश्विक भूख सूचकांकों में फिसलन की चेतावनी सुने और जागे

मोदी सरकार बहाने न बनाए, वैश्विक भूख सूचकांकों में फिसलन की चेतावनी सुने और जागे

दूसरी ओर गैरबराबरी लगातार बढ़ती जा रही है, जिसके चलते किसी गरीब देशवासी के विकल्प इतने सीमित हो गये हैं कि उसकी समस्या है कि वह खाये तो क्या खाये और किसी अमीर के पास इस सीमा तक सब कुछ भरा पड़ा है कि वह समझ नहीं पाता कि क्या-क्या खाये.

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शायद ही किसी ने सोचा हो कि नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा इस साल के वैश्विक भूख सूचकांकों में देश की भारी फिसलन की, जिसके बाद वह 116 देशों में पाकिस्तान, बंगलादेश और नेपाल समेत अपने प्रायः सारे पड़ोसियों से पिछडकर 101वें स्थान पर जा गिरा है, शर्म महसूस करने से इस तरह इनकार किया जायेगा!

भले ही गत फरवरी में ‘दि इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट’ के वैश्विक लोकतंत्र सूचकांकों में देश के लोकतंत्र को ‘लंगड़ा’ करार दिया गया तो भी वह नहीं ही शरमाई थी-उक्त यूनिट की ‘डेमोक्रेसी इन सिकनेस एंड इन हेल्थ’ शीर्षक रिपोर्ट के इस निष्कर्ष के बावजूद कि 2014 में वह सत्ता में आई, तो देश के लोकतंत्र की रैंकिंग 7.29 अंकों के साथ 27वीं थी, जो उसके ‘लोकतांत्रिक मूल्यों से पीछे हटने’ और ‘नागरिकों की स्वतंत्रता पर दमनात्मक कार्रवाई’ के चलते 6.61 अंकों के साथ 53वें पर लुढ़क गयी है. फिर अमेरिकी गैर-सरकारी संगठन ‘फ्रीडम हाउस’ ने अपनी वैश्विक स्वतंत्रता रिपोर्ट में देश के दर्जे को ‘स्वतंत्र’ से घटाकर ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ कर दिया तो भी इस सरकार ने उसकी शर्म से चटपट पल्ला झाड़ लिया था.

हम जानते हैं कि कतई कोई जिम्मेदारी स्वीकार न करने और इस सिलसिले में किसी भी सवाल का जवाब न देने की उसकी आदत अब सात साल पुरानी हो गई है. लेकिन जो भी सवाल उसे असुविधा में डालता हो, उसे पूछने वालों को देशद्रोही करार देने की अपनी पुरानी परम्परा में इस बार उसने एक नई कड़ी जोड़ी है- जो भी सूचकांक उसको शर्मसार करता हो, उसे जारी करने वाली एजेंसी पर उचित मेहनत न करने और उसकी रैंकिंग पद्धति को ‘अवैज्ञानिक’ बताने की.


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क्या आश्चर्य कि इस नई कड़ी को भी दो असुविधाजनक सवालों का सामना करने से इनकार है. पहला यह कि अगर ये सूचकांक तैयार करने की पद्धति अवैज्ञानिक है तो कौन-सी पद्धति वैज्ञानिक होती और दूसरा यह कि मोदी के आने से पहले इसी पद्धति से तैयार किये गये वैश्विक भूख सूचकांकों में देश भुखमरी के त्रास से निजात पाता क्यों दिखता था और अब वह उसके दलदल में गहरे और गहरे धंसता क्यों दिखाई देता है? क्या यह पद्धति 2014 के बाद अचानक अवैज्ञानिक हो गई है?

गौरतलब है कि इसी पद्धति से तैयार किये गये 2014 के वैश्विक भूख सूचकांकों में भारत को 76 देशों में 55वां स्थान प्राप्त हुआ था, जो निस्संदेह पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार के कामों का हासिल था. मोदी सरकार आई तो अगले ही साल 2015 में इन सूचकांकों में देश 80वें स्थान पर लुढ़क गया. फिर तो इस लुढ़कन ने जैसे थमने का नाम ही लेना बंद कर दिया और देश 2016 में 97वें, 2017 में 100वें और 2018 में 103वें स्थान पर जा पहुंचा.

अलबत्ता, 2019 में उसने एक अंक से अपनी स्थिति सुधारी और 2020 में आठ अंकों से. 2018 में उसे 102वां और 2020 में 94वां स्थान प्राप्त हुआ तो मोदी सरकार ने उसकी पद्धति की वैज्ञानिकता पर कोई सवाल नहीं उठाया. लेकिन अब देश के एक सौ सोलह देशों में 101वें स्थान पर पहुंचा देने यानी पुनर्मूषकोभव की गति प्राप्त करा देने के बाद कोई जवाब नहीं सूझ रहा तो सूचकांक तैयार करने वाली समूची पद्धति को ही संदिग्ध करार दे रही है. हालांकि उसे मालूम है कि वैश्विक भूख सूचकांकों की तैयारी में चार संकेतकों के आधार पर अंकों की गणना की जाती है-अल्पपोषण, बच्चों के कद के हिसाब से उनका कम वजन, वजन के हिसाब से कम कद और बाल मृत्यु दर. ऐसे में सफाई ही देनी थी तो कायदे से उसे बताना चाहिए था कि इन चारों में से किस संकेतक के आधार पर उसने देश के प्रदर्शन को बेहतर किया है? लेकिन वह ऐसा क्यों नहीं कर रही, समझना कठिन नहीं है.

शायद इसी को कहते हैं- नाच न जाने आंगन टेढ़ा, जबकि बेहतर होता कि इस सूचकांक के आइने में अपनी विफलताओं का चेहरा देखकर वह उन्हें जन्म देने वाली अपनी गलतियां दूर करने में लगती. लेकिन बेहतरी का यह रास्ता देश को विश्वगुरू और अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर वाली बनाने के थोथी दर्पोक्तियों से परे जाकर जमीनी हालात सुधारने व सारे देशवासियों को भर पेट भोजन नसीब कराने से गुजरता है और सरकार है कि उसको उस पर चलना अच्छा नहीं लगता.

शायद इसीलिए पिछले 10 महीनों से वह भुखमरी से कम और देश के अन्नदाताओं यानी किसानों से लड़ती ज्यादा दिखाई दे रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह तो बार-बार कहते हैं कि वे कठिन कोरोना काल के फौरन बाद से 80 करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन इसीलिए दे पा रहे हैं क्योंकि किसानों की कड़ी मेहनत से देश के अनाज गोदाम भरे हुए हैं. लेकिन न किसानों की कड़ी मेहनत के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देने को तैयार हैं, न इस स्थिति से विचलित होने को कि कोरोना का झटका लगते ही देश में 80 करोड़ लोग इतने गरीब और मोहताज हो गये हैं कि सरकार को उनकी भूख मिटाने की भी फिक्र करनी पड़ रही है- कपड़े और मकान की तो बात भी कौन करे. उनकी सरकार इस सवाल के सामने भी नहीं ही जाती कि ऐसा क्यों है कि एक ओर अनाज के गोदाम उफनाये पड़ रहे हैं और दूसरी ओर अस्सी करोड़ लोग भुखमरी या कुपोषण की जद में हैं?

नि:स्संदेह, सरकारी मुफ्त राशन के इन 80 करोड़ गरीबों तक पहुंचने की फूलप्रूफ व्यवस्था की गई होती तो उनका पेट भर रहा होता और वैश्विक भूख सूचकांक में हमारा हाल थोड़ा बेहतर दिखता. लेकिन ‘एक देश, एक राशन कार्ड’ जैसी लोकलुभावन योजनाओं के ऐलान और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को नई तकनीक के हवाले करके मान लिया गया है कि वह पूरी तरह पवित्र हो गई है और उसमें कोई खामी या भ्रष्टाचार नहीं रहा. गया.

ऐसा इसलिए है क्योंकि जिन गरीबों को मुफ्त राशन मिल जाता है, वे उसके थैलों पर प्रधानमंत्री की तस्वीर देखने के बावजूद उन्हें उस तरह धन्यवाद नहीं देते, जिस तरह मुफ्त कोरोना टीकों के लिए राज्य सरकारों द्वारा उन्हें दिया जा रहा है. जिन गरीबों को राशन नहीं मिल पाता उनकी आवाज तो प्रधानमंत्री तक वैसे भी नहीं पहुंचती.

प्रसंगवश, 1997 से 2002 तक राष्ट्रपति रहे केआर नारायणन अपने कार्यकाल में ही समझ गये थे कि खाद्यान्नों की इतनी प्रचुर उपलब्धता के बावजूद कोई देशवासी भूखा सोता है तो इसका अर्थ यह है कि उसके पास उन्हें खरीदने भर को क्रय शक्ति नहीं है, लेकिन वैश्विक भूख सूचकांकों में फिसलन के इस दौर में भी प्रधानमंत्री और उनकी सरकार इसे समझने को तैयार नहीं हैं. दूसरी ओर गैरबराबरी लगातार बढ़ती जा रही है, जिसके चलते किसी गरीब देशवासी के विकल्प इतने सीमित हो गये हैं कि उसकी समस्या है कि वह खाये तो क्या खाये और किसी अमीर के पास इस सीमा तक सब कुछ भरा पड़ा है कि वह समझ नहीं पाता कि क्या-क्या खाये.

बहरहाल, गनीमत ही समझा जाना चाहिए कि सरकार की ओर से अभी तक किसी ने ताजा वैश्विक भूख सूचकांक के पीछे कोई विदेशी साजिश होने का आरोप नहीं लगाया. शायद इसलिए कि देशवासी धीरे-धीरे इस चालाकी को समझने लगे हैं, जिसके चलते विदेश में कहीं सरकार या प्रधानमंत्री की जयजयकार हो तो उसकी सदाशयता को असंदिग्ध और आलोचना हो तो उसके पीछे एक नहीं कई-कई साजिशों का प्रचार किया जाने लगता है. जैसे-जैसे देशवासियों की यह समझ बढ़ रही है सरकार के वे दिन हवा हुए जा रहे हैं, जब उसका पसीना भी गुलाब था. अब तो वह इत्र भी मले तो वो खुशबू नहीं आती. शायद वह समय आ गया है जब अपने भविष्य की रक्षा के लिए उसे अपनी पुरानी रीति-नीति पर पुनर्विचार कर उसे बदलना चाहिए.


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(लेखक जनमोर्चा अख़बार के स्थानीय संपादक हैं, यह लेख उनका निजी विचार है)

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