नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मेट्रो स्टेशन बंद करने, मेट्रो ट्रेन सेवाएं रोकने और विरोध प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट बंद करने के अपने आदेश को लेकर केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) की चेयरपर्सन डी. थारा के खिलाफ पहली नजर में अदालत की अवमानना का मामला पाया है. यह मामला सिविल अवमानना से जुड़ा है.
इस मामले में सुनवाई चल रही है.
सुप्रीम कोर्ट की तरफ से अवमानना का नोटिस मिलने के बाद इन तीनों ने अपने जवाब में बिना किसी शर्त के माफी मांगी है. उन्होंने अपने कदमों यानी सेवाओं पर लगाई गई रोक का बचाव करते हुए कहा कि ऐसा “कानून-व्यवस्था और लोगों की सुरक्षा बनाए रखने” के लिए किया गया था. उन्होंने अदालत से अवमानना की कार्रवाई खत्म करने की भी मांग की है.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट कितनी बार किसी व्यक्ति को उसके आदेशों की जानबूझकर अवहेलना करने के लिए सिविल अवमानना का दोषी ठहराता है? सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड से पता चलता है कि ज्यादातर मामलों में अदालत बिना किसी शर्त के मांगी गई माफी स्वीकार कर लेती है और कोई सजा नहीं सुनाती.
भारत में अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत दो तरह की अवमानना की कार्रवाई होती है. एक सिविल अवमानना और दूसरी आपराधिक अवमानना.
सिविल अवमानना के मामले में अदालत के किसी फैसले, डिक्री, निर्देश, आदेश, रिट या दूसरी कानूनी प्रक्रिया की जानबूझकर अवहेलना करने पर सीधे याचिका दायर की जा सकती है. अदालत को दिए गए किसी वादे को जानबूझकर तोड़ने पर भी ऐसी याचिका दायर की जा सकती है.
वहीं, आपराधिक अवमानना का मामला सिर्फ अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की लिखित सहमति से ही दायर किया जा सकता है. ऐसा तब होता है, जब किसी काम या बयान से “अदालत की छवि खराब करने या उसके अधिकार को कम करने” की कोशिश की जाती है. इसमें बोले गए या लिखे गए शब्द, इशारे, किसी चीज को दिखाने का तरीका या कोई ऐसा काम शामिल है, जिससे न्यायिक कार्यवाही प्रभावित हो सकती है या उसमें रुकावट आ सकती है. ऐसा काम न्याय देने की प्रक्रिया में भी दखल दे सकता है.
खास बात यह है कि अदालत की अवमानना का मतलब अदालत की सामान्य आलोचना करना या उसके बारे में कुछ भी बोल देना नहीं है. इसका संबंध जानबूझकर अदालत के काम में रुकावट डालने या उसके अधिकार को कम करने से है. सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम फैसलों में कहा है कि किसी जज के न्यायिक काम या अंतिम फैसलों की ईमानदारी से, संतुलित तरीके से और सम्मान के साथ आलोचना करना अभिव्यक्ति की आजादी के तहत आता है. खासकर तब, जब आलोचना फैसले के तर्क या कानून की व्याख्या पर आधारित हो. यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिलता है.
इस कानून की धारा 12 के तहत अदालत की अवमानना के लिए छह महीने तक की साधारण जेल, 2,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों सजाएं दी जा सकती हैं. लेकिन अदालत ने बहुत कम मामलों में ये सजाएं दी हैं.
यह भी जरूरी है कि सिविल अवमानना की कार्रवाई कथित उल्लंघन के एक साल के भीतर शुरू की जाए. इस समय सीमा के कारण कई याचिकाएं न्यायिक जांच में आगे नहीं बढ़ पाती हैं.
सिविल अवमानना के मामलों का नतीजा क्या होता है
संसद से मिले आंकड़ों के मुताबिक, 20 मार्च 2025 तक सुप्रीम कोर्ट में अवमानना के 1,852 मामले लंबित थे. इनमें सिविल और आपराधिक, दोनों तरह के मामले शामिल हैं. केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने मार्च 2025 में लोकसभा में एक सवाल के जवाब में कहा था कि इन मामलों में अदालत के आदेशों का पालन नहीं किए जाने के कारणों का रिकॉर्ड सरकार नहीं रखती है.
The Professeer के कोर्ट्स डेटालैब के आंकड़ों के मुताबिक, यह भारतीय न्यायपालिका पर केंद्रित मुकदमों के आंकड़ों और बिजनेस इंटेलिजेंस से जुड़ा एक खास प्रोजेक्ट है. सुप्रीम कोर्ट में सिविल अवमानना के कुल 5,566 मामले लंबित हैं या उन पर कार्रवाई की जा चुकी है. इनमें पक्षों की तरफ से दायर 5,533 याचिकाएं और सुप्रीम कोर्ट की तरफ से खुद शुरू किए गए 33 मामले शामिल हैं.
इन 5,566 मामलों में से 1,647 मामले लंबित हैं, जबकि 3,901 मामलों यानी 70 प्रतिशत मामलों का निपटारा हो चुका है.
इन आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि किसी मामले का निपटारा होने में आम तौर पर 215 दिन लगते हैं. यानी करीब सात महीने. हालांकि, औसत समय इससे काफी ज्यादा, 545 दिन है. इसकी वजह यह है कि कुछ मामलों में कई साल लग जाते हैं.
एक चौथाई से ज्यादा मामलों का निपटारा तीन महीने के भीतर हो जाता है. लेकिन 296 मामले यानी 8 प्रतिशत मामले ऐसे हैं, जिनका निपटारा होने में पांच साल से ज्यादा समय लगता है.
The Professeer के आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के अपने मानकों के हिसाब से भी सिविल अवमानना के मामलों का निपटारा जल्दी नहीं होता. आम तौर पर अवमानना के एक मामले में सिविल स्पेशल लीव पिटीशन के मुकाबले करीब ढाई गुना और सिविल रिट याचिका के मुकाबले दोगुना समय लगता है.
सुप्रीम कोर्ट के अपने वर्गीकरण के मुताबिक, करीब 50 प्रतिशत मामलों को सिर्फ ‘निपटाया गया’ बताया गया है. वहीं, 31 प्रतिशत मामले खारिज किए गए और 0.1 प्रतिशत से भी कम मामलों में याचिका स्वीकार की गई.
निपटाए गए 3,901 मामलों में से 3,681 मामलों के आदेशों की पहचान की जा सकी. इन मामलों के आदेशों का पूरा टेक्स्ट उपलब्ध था, जिससे उनका ठीक से विश्लेषण किया जा सकता था.
इन आदेशों को पढ़ने से पता चलता है कि सिर्फ 0.5 प्रतिशत मामलों यानी 20 मामलों में अवमानना के दोषी व्यक्ति को वास्तव में जेल और/या जुर्माने की सजा दी गई.
0.2 प्रतिशत मामलों यानी 6 मामलों में व्यक्ति को दोषी तो ठहराया गया, लेकिन जेल की सजा नहीं दी गई.
1.5 प्रतिशत मामलों को अदालत की तरफ से माफी स्वीकार किए जाने के बाद बंद कर दिया गया. वहीं, 98 प्रतिशत मामले यानी 3,600 मामले ऐसे थे, जिनमें संबंधित व्यक्ति ने अदालत के आदेश का पालन कर लिया या मामले को खारिज कर दिया गया अथवा याचिका वापस ले ली गई.
यह ध्यान रखना जरूरी है कि यहां हर संख्या एक अलग नंबर वाली याचिका को दिखाती है. अदालत कभी-कभी आपस में जुड़े मामलों की सुनवाई एक साथ करती है. उदाहरण के लिए, जिन 20 याचिकाओं में सजा दी गई, वे अदालत में हुई 18 अलग-अलग घटनाओं से जुड़ी थीं.
दिल्ली के वकील निपुण सक्सेना ने बताया कि अवमानना की बड़ी संख्या में दायर याचिकाओं के बावजूद सजा के मामले कम क्यों होते हैं. उन्होंने कहा कि अक्सर इन कार्यवाहियों का इस्तेमाल अदालत के आदेश का पालन करवाने के लिए किया जाता है. जब आदेश का काफी हद तक पालन हो जाता है, तो मामला बंद किया जा सकता है.
उन्होंने कहा, “लोग अपने आदेशों को लागू करवाने के लिए ट्रायल कोर्ट नहीं जाना चाहते. इसीलिए, अगर सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट कोई आदेश देता है, तो लोग उसे लागू करवाने के लिए अवमानना की याचिका दायर करना पसंद करते हैं. परंपरागत रूप से भी यह माना जाता रहा है कि अगर किसी भी समय आदेश का काफी हद तक पालन कर दिया जाता है, तो अवमानना की कार्रवाई तुरंत बंद कर दी जाती है. यही वजह है कि इतनी सारी अवमानना याचिकाएं दायर होने के बावजूद बहुत कम मामलों में किसी को सजा देने का आदेश दिया जाता है.”
अवमानना की याचिका दायर करने के मकसद के बारे में उन्होंने कहा, “व्यावहारिक तौर पर अवमानना की याचिकाएं आमतौर पर वे पक्ष दायर करते हैं, जो अदालत के आदेश को जल्दी और प्रभावी तरीके से लागू करवाना चाहते हैं.”
सक्सेना ने कहा, “अदालतों में मामलों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है और कोई भी नया मामला नहीं चाहता. इसलिए मैंने अदालतों को बहुत ज्यादा संयम बरतते देखा है. सिर्फ संयम ही नहीं, बल्कि अदालतें काफी उदारता भी दिखाती हैं. वे पक्षों को अपनी गलती सुधारने और अवमानना की स्थिति खत्म करने के कई मौके देती हैं. मैंने अदालतों को अवमानना की कार्रवाई शुरू करते हुए आखिरी विकल्प के तौर पर ही देखा है. कम से कम सुप्रीम कोर्ट में तो ऐसा ही है.”
दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अवमानना के ऐसे मामलों में गलती सुधारने के पहलू पर भी बात की. उन्होंने बताया कि अवमानना के मामलों में पहले ही हो चुकी गलती को पीछे जाकर ठीक नहीं किया जा सकता और न ही उससे हुए नुकसान की भरपाई की जा सकती है. इसलिए, संबंधित पक्षों के पास गलती सुधारकर अवमानना खत्म करने का विकल्प वास्तव में उपलब्ध नहीं होता. उन्होंने ऐसी स्थितियों को “ऐसे मामले बताया, जिनमें नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती, क्योंकि नुकसान पहले ही हो चुका होता है.”
अवमानना के कुछ चर्चित मामले, जिनमें सजा सुनाई गई
24 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने शाजी ऑगस्टीन को सिविल अवमानना का दोषी ठहराया. उन्होंने एक रिजॉर्ट के तौर पर इस्तेमाल होने वाले प्रॉपर्टी कॉम्प्लेक्स के इस्तेमाल और कब्जे के शुल्क के हर महीने के बकाया 28.60 लाख रुपये जानबूझकर नहीं चुकाए थे. अदालत ने उन्हें अपने आदेश का जानबूझकर पालन नहीं करने के लिए तीन महीने की साधारण जेल और 20,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई.
नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेशों की जानबूझकर अवहेलना करने से जुड़े एक मामले में छह महीने की साधारण जेल और 12.5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था. अदालत ने भारतीय मूल के केन्या के एक नागरिक को सिविल और आपराधिक, दोनों तरह की अवमानना का दोषी पाया.
यह मामला बच्चे की कस्टडी यानी उसकी देखभाल और अभिरक्षा से जुड़ा था. बच्चे के पिता ने अपने बेटे को केन्या ले जाने के लिए एक विदेशी अदालत के ऐसे फर्जी “मिरर ऑर्डर” यानी भारत की अदालत के आदेश जैसे ही आदेश पेश किए. इसके बाद उन्होंने बच्चे को वापस लाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करने से इनकार कर दिया.
किसी पद पर रहते हुए काम कर रहे जज को आपराधिक अवमानना का दोषी सिर्फ एक बार ठहराया गया है.
कलकत्ता हाई कोर्ट के मौजूदा जज जस्टिस सी. एस. कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई जजों पर खुले तौर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह यहीं नहीं रुके, बल्कि उन्होंने बिना कोई सबूत दिए सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ “आदेश” जारी करने की कोशिश भी की.
सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने उनके कामों को “अदालत की अवमानना के सबसे गंभीर और बेहद गंभीर कृत्य” बताया. उन्हें दोषी ठहराते हुए छह महीने की जेल की सजा सुनाई गई. इसके साथ ही वह भारतीय इतिहास में जेल भेजे जाने वाले हाई कोर्ट के पहले मौजूदा जज बन गए.
2002 में मशहूर लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति रॉय ने एक पुराने मामले के जवाब में हलफनामा दायर किया था. इसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर दुर्भावनापूर्ण इरादे रखने का आरोप लगाया था. उन्होंने दावा किया था कि अदालत असहमति की आवाज को दबाने और सार्वजनिक आलोचना को रोकने की कोशिश कर रही थी.
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि उनके बयान निष्पक्ष आलोचना की सीमा पार कर गए थे और उन्होंने अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाई थी. अदालत की आपराधिक अवमानना के लिए उन्हें दोषी ठहराया गया और एक दिन की साधारण जेल तथा 2,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई.
2020 में वकील प्रशांत भूषण ने सोशल मीडिया पर दो ट्वीट किए थे. इनमें से एक में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और भारत के पिछले चार मुख्य न्यायाधीशों की भूमिका की आलोचना करते हुए उन पर “लोकतंत्र को बर्बाद करने” का आरोप लगाया था. दूसरे ट्वीट में उन्होंने महामारी के दौरान लॉकडाउन के समय मुख्य न्यायाधीश के एक महंगी मोटरसाइकिल चलाने पर टिप्पणी की थी. उस समय अदालतें लोगों के लिए बंद थीं और वहां व्यक्तिगत रूप से सुनवाई नहीं हो रही थी.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन ट्वीट्स ने न्यायपालिका की बुनियाद को कमजोर किया और न्याय देने की व्यवस्था में जनता के भरोसे को हिलाया. भूषण को दोषी ठहराते हुए 1 रुपये के सांकेतिक जुर्माने की सजा सुनाई गई. साथ ही कहा गया कि अगर वह जुर्माना नहीं भरते हैं, तो उन्हें तीन महीने की जेल होगी और तीन साल तक वकालत करने से रोक दिया जाएगा.
1991 में गुजरात के नडियाद में पुलिस अधिकारियों ने एक मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को गिरफ्तार किया था, उन्हें हथकड़ी लगाई थी, उनके साथ मारपीट की थी और सार्वजनिक रूप से घुमाया था. ऐसा स्थानीय पुलिस प्रशासन के खिलाफ उनके न्यायिक फैसलों का बदला लेने के लिए किया गया था.
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया. अदालत ने फैसला दिया कि किसी जज पर हमला करना न्यायपालिका की पूरी स्वतंत्रता पर हमला करने के बराबर है.
इस मामले में शामिल कई पुलिस अधिकारियों को आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया गया और उन्हें कुछ महीनों से लेकर एक साल तक की जेल की सजा सुनाई गई.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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