नयी दिल्ली, एक अप्रैल (भाषा) एक सर्वेक्षण में जानकारी सामने आई है कि सीसीटीवी कैमरों के जरिये तथा कुछ अन्य तरह की सरकारी निगरानी का ‘‘बड़े पैमाने’’ पर लोग समर्थन करते हैं। वहीं, सर्वेक्षण के मुताबिक गरीब, दलित व मुस्लिम जैसे समूहों का पुलिस के प्रति भरोसा ‘न्यूनतम’ है।
यह सर्वेक्षण गैर सरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज’ और ‘लोकनीति प्रोग्राम ऑफ द सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज’ ने मिलकर किया है।
इस सर्वेक्षण के नतीजे 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 9,779 लोगों की राय पर आधारित हैं, जिसे शुक्रवार को राष्ट्रीय राजधानी में ‘‘भारत में पुलिसिंग की स्थिति रिपोर्ट 2023 : निगरानी और निजता के सवाल’’ शीर्षक से जारी किया गया।
यहां जारी बयान में कहा गया, ‘‘अध्ययन के दौरान संबंधित मामलों के विशेषज्ञों से चर्चा की गई, सेवारत पुलिस अधिकारियों का विस्तृत साक्षात्कार लिया गया और निगरानी संबंधी मुद्दों पर मीडिया के कवरेज का विश्लेषण किया गया।’’
बयान के मुताबिक, सर्वेक्षण में संकेत मिले की सरकारी निगरानी के कुछ स्वरूपों को जनता का ‘‘बड़े पैमाने’’ पर समर्थन प्राप्त है, लेकिन पेगासस जासूसी कांड और पुट्टुस्वामी मामले जैसे अहम मुद्दों को लेकर जागरूकता की कमी है।
गौरतलब है कि पेगासस मामला सैन्य श्रेणी के जासूसी ऐप से जुड़ा है जबकि पुट्टुस्वामी मामले में अदालत ने निजता के अधिकार को मूल अधिकार माना है।
सर्वेक्षण के मुताबिक, निगरानी के किसी स्वरूप का समर्थन प्रतिभागियों के सामाजिक आर्थिक स्थिति के सीधे अनुपातिक है, उदाहरण के लिए अमीर प्रतिभागियों ने निगरानी का समर्थन किया जबकि गरीबों, आदिवासियों, दलितों और मुस्लिमों ने पुलिस के प्रति सबसे कम भरोसा जताया।
सर्वेक्षण में शामिल ‘‘चार प्रतिभागियों में से केवल एक ही ने माना कि सीसीटीवी कैमरे से बड़े पैमाने पर निगरानी का खतरा है जबकि चार में से तीन का मानना है कि सीसीटीवी कैमरों से निगरानी करने और अपराधों में कमी लाने में मदद मिलेगी।’’
प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, सर्वेक्षण में शामिल आधे प्रतिभागियों ने संदिग्ध की बायोमेट्रिक जानकारी एकत्रित करने का समर्थन किया जबकि आदिवासी और मुस्लिम समुदाय के लोगों ने पुलिस द्वारा संदिग्ध की बायोमेट्रिक जानकारी एकत्रित करने की ‘‘सबसे अधिक आलोचना की।’’
सर्वेक्षण के मुताबिक, दो में एक प्रतिभागी ने सैन्य बलों, पुलिस और सरकार द्वारा ड्रोन के इस्तेमाल का समर्थन किया।
सर्वेक्षण के मुताबिक, अध्ययन में शामिल दो में से एक प्रतिभागी ने चेहरा पहचान करने संबंधी प्रौद्योगिकी का सरकार और पुलिस द्वारा इस्तेमाल का समर्थन किया। निजी एजेंसियों द्वारा इस प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने का समर्थन करने वालों के मुकाबले सरकारी एजेंसियों द्वारा इसके इस्तेमाल का समर्थन करने वालों की संख्या चार गुना रही।
इसके मुताबिक, तीन में से दो प्रतिभागियों का मानना था कि राजनीतिक पार्टियां चुनावी फायदे के लिए लोगों की निगरानी करवाती हैं।
भाषा धीरज शफीक
शफीक
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