नयी दिल्ली, पांच अगस्त (भाषा) केंद्र ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि देशभर में पुलिस बलों के आधुनिकीकरण के लिए एक समग्र योजना को सैद्धांतिक मंजूरी के वास्ते एक प्रस्ताव वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग को भेजा गया है।
केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल राजकुमार भास्कर ठाकरे ने न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ को बताया कि यह प्रस्ताव आठ जुलाई को भेजा गया था और फिलहाल विचाराधीन है।
शीर्ष अदालत पुलिस थानों में काम नहीं कर रहे सीसीटीवी कैमरों के मुद्दे से संबंधित स्वत: संज्ञान मामले सहित विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
विधि अधिकारी ने कहा, ‘‘आठ जुलाई को पुलिस बलों के आधुनिकीकरण के लिए समग्र योजना को सैद्धांतिक मंजूरी दिलाने के वास्ते वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग को एक प्रस्ताव भेजा गया है। यह विचाराधीन है।’’
उन्होंने कहा कि पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए मौजूदा वित्तपोषण योजना की अवधि 31 मार्च, 2027 तक बढ़ा दी गई है।
पीठ ने ठाकरे से समग्र योजना का प्रस्ताव अदालत के समक्ष पेश करने को कहा।
पीठ ने केंद्र को अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया और मामले की अगली सुनवाई एक सितंबर के लिए निर्धारित कर दी।
शीर्ष अदालत ने 22 जुलाई को कहा था कि देशभर के पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के मामले में स्थिति बेहतर दिशा में आगे बढ़ रही है और सकारात्मक प्रगति हुई है।
उस समय अदालत के न्यायमित्र के रूप में सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने पीठ को बताया था कि इस संबंध में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।
शीर्ष अदालत ने दो मुद्दे उठाए थे— पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए वित्तपोषण योजना की अवधि बढ़ाना तथा लगाए गए कैमरों का रखरखाव सुनिश्चित करना।
इससे पहले 13 मई को न्यायमित्र ने पीठ को बताया था कि अधिकांश राज्य सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के संबंध में काफी काम किया गया है।
इससे पहले सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए उपलब्ध कराई गई धनराशि के राज्यों द्वारा उपयोग का मुद्दा भी शीर्ष अदालत के समक्ष उठाया गया था।
पीठ को बताया गया था कि केंद्र, केंद्रशासित प्रदेशों में 100 प्रतिशत और पर्वतीय राज्यों में 90 प्रतिशत धनराशि उपलब्ध कराता है। उसे यह भी बताया गया था कि अन्य राज्यों में केंद्र 60 प्रतिशत धनराशि देता है, जबकि शेष 40 प्रतिशत संबंधित राज्य सरकार वहन करती है।
शीर्ष अदालत ने इससे पहले मीडिया की एक खबर का संज्ञान लेते हुए पुलिस थानों में कार्यशील सीसीटीवी कैमरों की कमी के मुद्दे पर स्वत: संज्ञान मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था।
उच्चतम न्यायालय ने 2018 में मानवाधिकार उल्लंघन पर रोक लगाने के उद्देश्य से सभी पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश दिया था।
दिसंबर 2020 में शीर्ष अदालत ने केंद्र को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) सहित जांच एजेंसियों के कार्यालयों में भी सीसीटीवी कैमरे और रिकॉर्डिंग उपकरण लगाने का निर्देश दिया था।
अदालत ने कहा था कि राज्य और केंद्रशासित प्रदेश यह सुनिश्चित करें कि प्रत्येक पुलिस थाने, सभी प्रवेश और निकास द्वार, मुख्य द्वार, लॉकअप, गलियारों, लॉबी, स्वागत कक्ष तथा लॉकअप कक्षों के बाहर भी सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं ताकि कोई भी हिस्सा निगरानी से बाहर न रहे।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि सीसीटीवी प्रणाली में ‘नाइट विजन’ की सुविधा हो तथा उसमें ऑडियो और वीडियो, दोनों की रिकॉर्डिंग हो।
अदालत ने केंद्र, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए ऐसी प्रणाली खरीदना अनिवार्य किया था, जिसमें कम से कम एक वर्ष तक का डेटा सुरक्षित रखने की क्षमता हो।
भाषा अमित सिम्मी
सिम्मी
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