नई दिल्ली: 33 साल की उम्र में नीरज उधवानी की जिंदगी पूरी तरह से सेट थी और नंबरों की सटीक दुनिया के आसपास घूमती थी. वहीं दूसरी तरफ 16 साल का सुमित परमार था, जिसकी आंखों में सपने थे. वह नेशनल कैडेट कोर (NCC) का कैडेट था और भारतीय सेना में जाना चाहता था.
इन दोनों की जिंदगी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी. लेकिन 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम की शांत वादियों में इनकी कहानी अचानक खत्म हो गई. दोनों को आतंकियों ने गोली मार दी, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे गलत समय पर गलत जगह पर थे.
उधवानी पहलगाम इसलिए गए थे क्योंकि उनकी मां ने कहा था. परमार परिवार ने कश्मीर में अपनी पहली फैमिली ट्रिप प्लान की थी. दोनों परिवारों को लगा था कि कश्मीर सुरक्षित है और वे वहां से सिर्फ यादें और तस्वीरें लेकर लौटेंगे.
बाइसारन घाटी में हुए इस नरसंहार को एक साल हो चुका है. लेकिन 26 पीड़ितों के परिवारों के लिए यह दर्द खत्म नहीं हुआ है. जब भी पुलिस या सरकार कोई बयान देती है, सोशल मीडिया पर वीडियो आते हैं, या ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र होता है, वे फिर उसी दर्द को जीते हैं.
22 अप्रैल 2025 को आतंकियों ने पहलगाम के बाइसारन मैदान में 25 भारतीयों—24 पर्यटक और एक कश्मीरी स्थानीय—और एक नेपाली पर्यटक की हत्या कर दी और फरार हो गए. चश्मदीदों के मुताबिक लोगों को उनके धर्म के आधार पर चुना गया और उनके परिवारों के सामने करीब से गोली मारी गई.
हमले के समय प्रधानमंत्री मोदी सऊदी अरब के दौरे पर थे और अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस भारत आए हुए थे. लश्कर-ए-तैयबा के एक संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने पहले हमले की जिम्मेदारी ली, फिर बाद में उसे वापस ले लिया.
हमले के अगले दिन प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक हुई. बयान में कहा गया कि इस हमले के पाकिस्तान से जुड़े होने के संकेत मिले हैं.
टूटे हुए सपने
नीरज उधवानी की जिंदगी बहुत व्यवस्थित और शानदार थी. 33 साल के नीरज दुबई में चार्टर्ड अकाउंटेंट थे. उन्हें ब्रांडेड कपड़े, 50 सूट, 50 जोड़ी जूते और महंगी घड़ियों का शौक था. वे यूके की एजुकेशन कंपनी कॉग्निटा स्कूल्स में फाइनेंस मैनेजर थे.
उनके चाचा के अनुसार, नीरज ने ज्यादातर जिंदगी दुबई में बिताई. वे जयपुर में पैदा हुए थे, लेकिन बचपन में ही यूएई चले गए थे, जहां उनके पिता कपड़े का व्यापार करते थे. उन्होंने दुबई के इंडियन हाई स्कूल से पढ़ाई की और फिर राजस्थान यूनिवर्सिटी से बीकॉम किया.
“कॉलेज के बाद वह फिर दुबई लौट गया,” उनके चाचा ने बताया. “उसने वहीं से चार्टर्ड अकाउंटेंसी भी पूरी की.”
लिंक्डइन प्रोफाइल के अनुसार, उन्होंने ACCA से अकाउंटेंसी की डिग्री ली और दुबई में कई फाइनेंस से जुड़े काम किए. उनके पिता की 10 साल पहले मृत्यु हो गई थी. इसके बाद उनकी मां जयपुर में बड़े बेटे किशोर के साथ रहने लगीं.
नीरज ने विदेश में अच्छा करियर बनाया, लेकिन अपने जयपुर के परिवार से जुड़े रहे. उनके भाई भी अच्छे पदों पर हैं, जिनमें एक इनकम टैक्स ऑफिसर है.
“नीरज एक दोस्त की शादी के लिए शिमला आया था. उनकी मां ने कहा कि कश्मीर भी घूम आओ, तो वह अपनी पत्नी आयुषी के साथ वहां चले गए,” उनके चाचा प्रकाश गेऱ्यानी ने बताया.
उनकी मां ने कहा था, “वहां बहुत सुंदर है.” नीरज को नई जगह घूमना पसंद था.
वे लोग 23 अप्रैल को दुबई लौटने वाले थे. लेकिन उससे एक दिन पहले सब खत्म हो गया.
जयपुर में परिवार को खबर सीधे नहीं मिली. किसी ने कहा, “एक उधवानी की मौत हो गई है.”
फिर उनके चाचा ने खोजबीन शुरू की और एक लिस्ट में उनका नाम देखा. “हमने पता लगाने की कोशिश की कि कौन मरा है… फिर पता चला कि उन्हें गोली मारी गई थी…”
नीरज पांच साल बाद भारत लौटकर अपना बिजनेस शुरू करना चाहते थे. लेकिन अब परिवार इस सच्चाई को स्वीकार करने की कोशिश कर रहा है.
उनकी 70 साल की मां, जिन्होंने उन्हें कश्मीर जाने को कहा था, अब जयपुर के घर में रहती हैं. परिवार अब उस दिन की बातें नहीं करना चाहता. “हम मीडिया से बात नहीं करते. हम उस दिन को याद नहीं करना चाहते. हम नीरज को अपनी प्रार्थनाओं में याद करते हैं,” उनके चाचा कहते हैं.
परिवार के लिए जिंदगी अब बस आगे बढ़ने का नाम है. उनके कपड़े, जूते, घड़ियां सब वैसे ही पड़े हैं, जैसे समय रुक गया हो.
एक परिवार जो टूट गया
गुजरात के भावनगर में परमार परिवार पहले 12 लोगों का बड़ा संयुक्त परिवार था. लेकिन एक दोपहर ने सब बदल दिया.
वे हमेशा साथ में छुट्टियां मनाते थे.
पिछले साल यतेश परमार ने कश्मीर ट्रिप प्लान की. उनके भाई अमित माता-पिता की देखभाल के लिए नहीं जा सके. बाकी परिवार चला गया. घर वाले उनके लौटने का इंतजार कर रहे थे.
22 अप्रैल की दोपहर सब खत्म हो गया.
अमित अपनी सैलून में थे जब फोन आया. उन्हें लगा कोई छोटा हादसा हुआ होगा. उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि यह आतंकी हमला होगा.
इंस्टाग्राम पर स्क्रॉल करते हुए उन्होंने एक वीडियो देखा. “लोग पहलगाम में किसी हादसे की बात कर रहे थे. फिर मैंने एक वीडियो देखा जिसमें सुमित था… उसके सिर में 3-4 गोलियां लगी थीं. मैं सांस नहीं ले पाया… समझ नहीं आया क्या हो रहा है… मैं सुन्न हो गया.”
उन्होंने तुरंत लोगों को फोन करना शुरू किया.
उन्होंने सिर्फ अपने भतीजे को नहीं खोया, बल्कि अपने भाई को भी खो दिया, जिसके साथ उन्होंने 10वीं के बाद मिलकर सैलून शुरू किया था.
घर लौटकर उन्हें सिर्फ सुमित के NCC मेडल याद आए. “सुमित 11वीं में था. वह सेना में जाना चाहता था. देश की रक्षा करना चाहता था. उन्होंने उसे मार दिया… उसके सपनों को मार दिया…”
भावनगर में जिंदगी बदल गई है. अमित कहते हैं कि उनकी भाभी उस घटना को अपनी आंखों से देखने के बाद गहरे सदमे में हैं. परिवार अब कहीं घूमने नहीं जाता. जोखिम नहीं लेता. सैलून अब भी चल रहा है.
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