शिलांग, दो नवंबर (भाषा) देश में प्राप्त होने वाले 22,000 करोड़ रुपये के विदेशी अंशदान में से महज छह प्रतिशत हिस्सा गिरजाघरों और अन्य धार्मिक संगठनों को मिलता है। विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक पर बनी संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के अध्यक्ष संजय जायसवाल ने यह कहा।
समिति की यहां हुई बैठक के बाद जायसवाल ने पत्रकारों को बताया कि जेपीसी प्रस्तावित एफसीआरए संशोधनों को लेकर हितधारकों द्वारा उठाई गई व्यावहारिक चिंताओं की पड़ताल कर रही थी।
विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि एफसीआरए संशोधन विधेयक के कुछ प्रावधान ईसाई गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) तथा अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित सामाजिक कल्याण और शैक्षणिक संस्थानों के वैध विदेशी वित्तपोषण को प्रभावित कर सकते हैं।
हालांकि, सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून किसी धर्म विशेष को ध्यान में रखकर नहीं बनाया गया है, बल्कि इसका उद्देश्य विदेशी अंशदान को विनियमित करना है।
जायसवाल ने कहा, ”हम व्यावहारिक समस्याओं के व्यावहारिक समाधान तलाशना चाहते हैं। हमारा हित राष्ट्रीय हित है और हम किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी संबंधित हितधारकों की बात सुन रहे हैं।”
इस बैठक में कम से कम 20 संगठनों ने हिस्सा लिया। इनमें ज्यादातर विभिन्न गिरजाघरों से जुड़े संगठन थे। इसके अलावा ईसाई बहुल राज्य में हिंदू और आदिवासी समुदायों से जुड़े समूहों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए।
जायसवाल ने कहा कि समिति विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 में प्रस्तावित संशोधनों के प्रभावों को समझने के लिए विभिन्न वर्गों से सुझाव जुटा रही है।
उन्होंने कहा, ”देश में विदेशी अंशदान के रूप में आने वाले 22,000 करोड़ रुपये में से करीब छह प्रतिशत ही गिरजाघरों और अन्य धार्मिक संगठनों को मिलता है। शेष राशि एनजीओ और अन्य संगठनों को जाती है।”
भाषा
शुभम दिलीप
दिलीप
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