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Wednesday, 5 August, 2026
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23 साल में परीक्षा में गड़बड़ी का एक भी मामला ट्रायल तक नहीं पहुंचा, नई स्पेशल कोर्ट इसे बदल सकती है

एडमिशन और नौकरी से जुड़ी परीक्षाओं में गड़बड़ी से जुड़े CBI के 26 मामले दिल्ली की अदालतों में लंबित हैं.

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नई दिल्ली: पेपर लीक समेत एडमिशन और नौकरी से जुड़ी परीक्षाओं में गड़बड़ी से जुड़े केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के 26 मामले पिछले 23 साल से दिल्ली की अदालतों में लंबित हैं और इनमें से एक भी मामला अब तक ट्रायल तक नहीं पहुंचा है. दिप्रिंट को इस बारे में जानकारी मिली है

हालांकि, कुछ महीने पहले दर्ज किया गया नीट-यूजी 2026 पेपर लीक मामला दो दशक में ऐसा पहला मामला होगा, जिसकी सुनवाई देशभर में हुए आक्रोश के बाद बनाई गई स्पेशल कोर्ट में होगी. एजेंसी के सूत्रों ने बताया कि स्पेशल कोर्ट जब सीबीआई की चार्जशीट पर संज्ञान लेगी, उसके बाद आरोप तय किए जाएंगे. ट्रायल शुरू होने के लिए यह ज़रूरी कदम है. सीबीआई ने सभी 26 लंबित मामलों में चार्जशीट दाखिल कर दी है और अब वह इन मामलों को जल्द निपटारे के लिए स्पेशल कोर्ट में भेजने की मांग करेगी, कई सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है.

एजेंसी के एक सूत्र ने कहा, “ऐसी कोर्ट की ज़रूरत थी क्योंकि इनमें से कई मामले अदालत में लंबे समय से लंबित हैं. यह एक अच्छी शुरुआत है. 2026 नीट पेपर लीक मामले का ट्रायल शुरू होने के बाद हम इन मामलों की सुनवाई भी फास्ट-ट्रैक कोर्ट में कराने की कोशिश करेंगे.”

26 लंबित मामलों में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) पोस्ट-ग्रेजुएट (PG) एंट्रेंस एग्जामिनेशन (2010 और 2011), ऑल इंडिया प्री-वेटरिनरी टेस्ट (2011), ग्रेजुएट लेवल कंबाइंड कॉम्पिटिटिव एग्जामिनेशन (2013), बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस, पिलानी की एंट्रेंस परीक्षा (2019) और जॉइंट एंट्रेंस एग्जामिनेशन (2021) में कथित गड़बड़ियों से जुड़े मामले शामिल हैं. इनमें सबसे पुराना मामला 2003 की कॉमन एडमिशन टेस्ट परीक्षा से जुड़ा है, जो बाकी मामलों की तरह अभी तक ट्रायल तक नहीं पहुंचा है.

दिप्रिंट से बात करते हुए एक सूत्र ने कहा कि सीबीआई के लंबित 26 मामलों में सभी पेपर लीक से जुड़े नहीं हैं. इसके बजाय, इनमें परीक्षा में गड़बड़ी के कई तरह के मामले शामिल हैं, जिनमें एडमिशन में धोखाधड़ी, आंसर शीट से छेड़छाड़, रिजल्ट में बदलाव और नौकरी भर्ती से जुड़े घोटाले शामिल हैं.

सूत्र ने कहा, “उदाहरण के लिए एम्स पीजी एंट्रेंस एग्जामिनेशन 2010 का मामला आंसर शीट और परीक्षा के नतीजों में गड़बड़ी से जुड़े कथित एडमिशन रैकेट से जुड़ा था. इसी तरह, कई दूसरे मामलों में रिजल्ट में हेरफेर किया गया, जबकि कुछ मामलों में, जैसे CAT 2003 मामले में, खुद प्रश्नपत्र लीक हुआ था.”

दिल्ली हाई कोर्ट ने पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024 के तहत अपराधों की विशेष रूप से सुनवाई के लिए एक स्पेशल कोर्ट तय की है. वहीं, बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र के न्यायिक जिलों में इस कानून के तहत अपराधों की सुनवाई के लिए स्पेशल फास्ट-ट्रैक कोर्ट तय करने की अधिसूचनाएं जारी की हैं.

‘चुनौती’

पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024 में हालिया संशोधन का उद्देश्य स्पेशल कोर्ट के जरिए परीक्षा के पेपर लीक मामलों की जांच और ट्रायल को तेजी से पूरा करना है, लेकिन इसमें एक बड़ी सीमा है.

सूत्रों ने बताया कि कानून लागू होने से पहले हुए कथित पेपर लीक से जुड़े मामलों की सुनवाई इस कानून के तहत नहीं हो सकती. इसका मतलब है कि अभी चल रहा नीट-यूजी 2026 पेपर लीक मामला संभवत: पहला—और फिलहाल इकलौता—ऐसा मामला है, जिस पर तय की गई स्पेशल कोर्ट में मुकदमा चलाया जा सकता है.

एक कानूनी विशेषज्ञ ने बताया कि इस कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) या भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत दर्ज पुराने मामलों को इन अदालतों में ट्रांसफर किया जा सके.

कानूनी विशेषज्ञ ने कहा, “ऐसी धारा नहीं होने पर, पुराने पेपर लीक के मामले सामान्य अदालतों में ही चलते रहेंगे, जिससे जल्द ट्रायल के लिए स्पेशल कोर्ट बनाने का पूरा उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा.” विशेषज्ञ ने कहा, “इसके अलावा, ये पुराने मामले आईपीसी या बीएनएस के तहत दर्ज हैं, इस नए कानून के तहत नहीं. इसलिए ये फास्ट-ट्रैक कोर्ट में नहीं आएंगे.”

हालांकि, सीबीआई के एक दूसरे अधिकारी ने कहा कि इन पुराने मामलों को हाई कोर्ट की ओर से जारी प्रशासनिक अधिसूचना के जरिए स्पेशल कोर्ट में ट्रांसफर किया जा सकता है. अधिकारी ने कहा, “यह कहना कि इन पुराने मामलों की सुनवाई स्पेशल कोर्ट में नहीं हो सकती, तकनीकी रूप से सही हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि व्यवहार में भी ऐसा ही हो. हाई कोर्ट को इन मामलों को परीक्षा में गड़बड़ी से जुड़े मामलों के लिए बनाई गई फास्ट-ट्रैक कोर्ट में ट्रांसफर करने से कोई नहीं रोकता. यह एक प्रशासनिक प्रक्रिया है और ऐसा किया जा सकता है.”

हालांकि, दूसरे कानूनी विशेषज्ञ ने इससे असहमति जताई और कहा कि ऐसा करने के लिए कानून में संशोधन करना होगा. विशेषज्ञ ने कहा, “कानून में साफ तौर पर यह प्रावधान जोड़ना होगा कि संशोधन लागू होने से पहले दर्ज किए गए मामलों की सुनवाई भी तय की गई स्पेशल कोर्ट में हो सकती है. एक बार कानूनी स्थिति साफ हो जाने के बाद, लंबित मामलों को ट्रांसफर किया जा सकता है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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