नयी दिल्ली, चार नवंबर (भाषा) रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बुधवार को कहा कि तनावपूर्ण सुरक्षा माहौल के बीच समान विचारधारा वाले देशों के बीच समुद्री क्षेत्र में परस्पर निर्भरता मजबूत करने के लिए आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाना और क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाना महत्वपूर्ण है।
‘हिंद-प्रशांत क्षेत्रीय संवाद’ में अपने संबोधन में सिंह ने किसी देश का नाम लिए बिना कहा कि कुछ ‘पक्ष’ और ‘देश’ अपने संकीर्ण एकतरफा हितों के लिए महासागरों के महत्व का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने समुद्री क्षेत्र की चुनौतियों से निपटने के लिए लचीलापन विकसित करने का आह्वान किया।
महासागरों को देशों के बीच बाधा के बजाय सेतु बताते हुए उन्होंने आजीविका बनाए रखने और वस्तुओं, ज्ञान एवं संस्कृति के आदान-प्रदान को सुगम बनाने में उनकी भूमिका को रेखांकित किया।
रक्षा मंत्री ने कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र का समुद्री भविष्य कोई एक देश अकेले तय नहीं कर सकता। उनकी यह टिप्पणी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की सैन्य शक्ति के प्रदर्शन को लेकर दुनियाभर में बढ़ती चिंताओं के बीच आई है।
उन्होंने कहा, ‘‘जानबूझकर व्यापार में बाधाएं पैदा किए जाने से वैश्विक समुद्री सुरक्षा का माहौल तनावपूर्ण है। हम नौवहन की स्वतंत्रता को खुली चुनौती दिए जाने और संकरे समुद्री मार्गों को हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने के गवाह बन रहे हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘समुद्री क्षेत्र में बढ़ती यह अस्थिरता व्यापक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर गहरा असर डाल रही है।’’
सिंह ने जोर देकर कहा कि परस्पर जुड़े विश्व की कमजोरियों का समाधान लचीलापन विकसित करने में निहित है। उन्होंने कहा कि हर व्यवधान के जवाब में वैश्वीकरण को छोड़ा नहीं जा सकता और न ही उन समुद्री क्षेत्रों को बंद किया जाना चाहिए जिन्होंने मानव प्रगति को संभव बनाया है।
उन्होंने जोर दिया कि लक्ष्य परस्पर निर्भरता को अधिक सुरक्षित बनाना होना चाहिए।
रक्षा मंत्री ने समुद्री सुरक्षा के बदलते स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनौतियां केवल पारंपरिक सैन्य गतिविधियों से ही नहीं, बल्कि समुद्री डकैती, मानव एवं अन्य वस्तुओं की अवैध तस्करी, अवैध रूप से मछली पकड़ना, साइबर हमलों और प्राकृतिक आपदाओं जैसे गैर-पारंपरिक खतरों से भी पैदा हो सकती हैं।
उन्होंने बदलते समुद्री परिदृश्य के अनुरूप समुद्री सुरक्षा व्यवस्था को विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा, ‘‘कृत्रिम मेधा (एआई) डेटा के प्रसंस्करण के तरीके को बदल रही है, जबकि स्वायत्त प्रणालियां निगरानी और अभियानों की संभावनाओं का विस्तार कर रही हैं।’’
सिंह ने कहा, ‘‘नए सेंसर महासागरों पर नजर रखने की हमारी क्षमता को बेहतर बना रहे हैं। सामग्री विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी और डेटा विश्लेषण के क्षेत्र में प्रगति अनुसंधान और उपयोग के नए रास्ते खोल रही है।’’
सिंह ने कहा कि इन बदलावों का समुद्री सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियों पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा है।
उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन केवल प्रौद्योगिकी ही इसका समाधान नहीं है। इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वास्तविक चुनौतियों से निपटने के लिए हम प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कैसे करते हैं।’’
सिंह ने इस बात पर भी जोर दिया कि प्रौद्योगिकी देशों के बीच असमानता का एक और स्रोत नहीं बननी चाहिए, क्योंकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अलग-अलग स्तर की तकनीकी और आर्थिक क्षमता वाले देश शामिल हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘कुछ देशों के पास उन्नत अनुसंधान बुनियादी ढांचा है। वहीं, कुछ अन्य देश इस बदलाव में पूरी तरह भाग लेने के लिए जरूरी संस्थागत और मानव संसाधन अभी विकसित कर रहे हैं। यदि तकनीकी प्रगति का लाभ केवल कुछ देशों तक सीमित रहा, तो हम अपने क्षेत्र के लिए जरूरी सामूहिक लचीलापन हासिल नहीं कर पाएंगे।’’
रक्षा मंत्री ने अनुसंधान, शिक्षा, नवाचार और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देने का आह्वान करते हुए कहा कि किसी एक देश की मजबूत वैज्ञानिक क्षमता पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और समृद्धि में योगदान दे सकती है।
उन्होंने इसे विशेष रूप से छोटे समुद्री देशों और विकासशील देशों के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि सबसे उपयोगी प्रौद्योगिकी जरूरी नहीं कि सबसे महंगी या अत्याधुनिक हो, बल्कि वह है जो किसी वास्तविक समस्या का समाधान करती है।
भाषा संतोष माधव
माधव
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