नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के उस निर्देश के खिलाफ दायर याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें राज्य बार काउंसिलों से नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ (NALSAR), हैदराबाद के ग्रेजुएट्स का एनरोलमेंट रोकने को कहा गया था. साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया है कि छात्रों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाए.
BCI भारत में कानूनी पेशे की सबसे बड़ी नियामक संस्था है. उसने बुधवार को अपनी सभी राज्य इकाइयों को NALSAR के ग्रेजुएट्स का एनरोलमेंट रोकने का निर्देश दिया था. यह रोक तब तक लगाई गई थी, जब तक उन छात्रों के अभियान की जांच पूरी नहीं हो जाती, जो यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की भागीदारी का विरोध कर रहे थे. इसके बाद हुए विरोध के कारण BCI ने उसी शाम अपना आदेश वापस ले लिया.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने शुक्रवार को सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर की ओर से BCI के आदेश के खिलाफ दायर याचिका का मौखिक रूप से जिक्र किए जाने पर कहा, “BCI बेवजह कार्रवाई कर रहा है. उन्हें विरोध करने का अधिकार है. हो सकता है छात्रों ने मुझे एक चिट्ठी लिखी हो. यह छात्रों और मेरे बीच बातचीत का मामला है. BCI कौन होता है बेवजह इस मुद्दे को उठाने वाला? यह पूरी तरह से बेवजह है. BCI का इससे कोई लेना-देना नहीं है?”
CJI ने कहा कि यह आदेश “बिल्कुल बेवजह” था और छात्रों के विरोध को रोका नहीं जा सकता. उन्होंने कहा, “कभी-कभी कम उम्र में कोई ऐसी बात कह देता है जो शायद गलत हो, तो उसे गलत होने दीजिए.”
उन्होंने कहा, “मैं खुद छात्र जीवन में छात्र गतिविधियों में शामिल रहा हूं. वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख रहे हैं, उन्हें ऐसा करने दिया जाना चाहिए. अगर वे गलत भी हैं, ऐसा मान भी लें, तब भी उन्हें विरोध करने का अधिकार है. उन्हें कौन रोक सकता है? जब तक वे कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठा रहे हैं, उनकी बात सुनी जानी चाहिए. बार काउंसिल या किसी और संस्था को इसमें दखल क्यों देना चाहिए?”
CJI ने कहा, “छात्रों से कहिए कि जल्द से जल्द अपना लाइसेंस लें. सुप्रीम कोर्ट बार में शामिल हों. हम उन्हें कानूनी सहायता के मामलों के लिए पैनल में शामिल करेंगे और उन्हें कानूनी सहायता का काम करने देंगे. यह उन सभी लोगों को दिया जाने वाला उचित जवाब होगा, जिन्होंने उनके करियर में रुकावट डालने की कोशिश की.”
याचिका का जिक्र करते हुए परमेश्वर ने कहा कि BCI का यूनिवर्सिटी में क्या हो रहा है, इससे कोई लेना-देना नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहीं NALSAR की 2007 बैच की पूर्व छात्रा मिहिरा सूद इस याचिका में पहली याचिकाकर्ता हैं. दूसरे याचिकाकर्ता अभिषेक तिवारी NALSAR के 2004 बैच के पूर्व छात्र हैं और दिल्ली में 22 साल से वकालत कर रहे हैं. उनकी याचिका में BCI के निर्देश के अधिकार क्षेत्र और मौलिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाया गया है और इसे “स्पष्ट रूप से मनमाना” बताया गया है.
याचिका में कहा गया है, “ये आदेश इसलिए भी जारी किए गए हैं, क्योंकि BCI के पास अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 24-A के अलावा एनरोलमेंट से पहले किसी को अयोग्य ठहराने की ऐसी शक्ति का कोई कानूनी आधार नहीं है. साथ ही, NALSAR यूनिवर्सिटी के आंतरिक मामलों से जुड़े संविधान के तहत अनुमति वाले कामों की व्यापक जांच करने का भी उसके पास कोई अधिकार नहीं है.”
आगे क्या हुआ
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन और भारतीय जनता पार्टी के सांसद मनन मिश्रा ने बुधवार को NALSAR हैदराबाद के 2026 बैच के ग्रेजुएट्स का एनरोलमेंट रोकने का छह पेज का आदेश जारी किया था. यह रोक उस जांच तक लगाई गई थी, जिसमें CJI सूर्यकांत के यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में शामिल होने का विरोध करने वाले कथित संगठित अभियान की जांच होनी थी. अब यह आदेश पूरी तरह वापस ले लिया गया है.
शुक्रवार तड़के ट्वीट करते हुए मिश्रा ने कहा कि BCI ने “पूरी कार्यवाही को ही बंद करने का फैसला किया है. अब आगे किसी कार्रवाई की जरूरत नहीं है.” उन्होंने NALSAR के आधिकारिक हैंडल को भी टैग किया.
मिश्रा ने कहा कि वरिष्ठ वकीलों, बार के सदस्यों, कानून के छात्रों और समाज के जागरूक नागरिकों की ओर से मिली प्रतिक्रियाओं और आपत्तियों पर विचार करने के बाद उन्होंने अपना फैसला बदला. उन्होंने कहा कि उन्हें यह संतुष्टि हुई कि NALSAR, हैदराबाद के 2026 बैच के छात्रों की किसी भी तरह की परेशानी या आंदोलन में कोई भूमिका नहीं थी.
उन्होंने छात्रों को उनके करियर के लिए शुभकामनाएं देते हुए एक सलाह भी दी. उन्होंने कहा, “हमें अपने कानूनी संस्थानों पर बहुत गर्व है और जिस दिन आप एनरोल होते हैं, आप इन संस्थानों के प्रहरी बन जाते हैं. अपनी राय खुलकर रखें, लेकिन सम्मान और संस्थागत मर्यादा के साथ.”
उन्होंने आगे कहा, “सबसे ऊंचा न्यायिक पद हम सभी का गर्व है. लोकतंत्र में असहमति का स्वागत है, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं का सार्वजनिक रूप से मजाक उड़ाना अक्सर उल्टा असर डालता है.”
BCI के सूत्रों ने बताया कि एनरोलमेंट रोकने के पहले पत्र पर वरिष्ठ सदस्यों ने आपत्ति जताई थी. BCI के उपाध्यक्ष वेद प्रकाश शर्मा और केरल के प्रतिनिधि एन. मनोज कुमार का मानना था कि NALSAR का विरोध एक अनुशासन से जुड़ा मामला है, जिसकी जांच सिर्फ यूनिवर्सिटी कर सकती है. उनका कहना था कि नियामक संस्था के तौर पर BCI को यूनिवर्सिटी के कामकाज में दखल देने का अधिकार नहीं है. एनरोलमेंट को लेकर सदस्यों ने कहा कि BCI का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है और एक सुपर-रेगुलेटर के रूप में उसकी भूमिका एनरोलमेंट की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही शुरू होती है.
इसके बाद काउंसिल ने चेयरमैन के आदेश में “बदलाव” किया और कहा कि जांच रिपोर्ट आने तक सभी छात्रों का एनरोलमेंट किया जाएगा. हालांकि अब न तो एनरोलमेंट पर रोक है और न ही जांच रिपोर्ट का इंतिजार किया जा रहा है.
मिश्रा के जांच वापस लेने वाले ट्वीट से पहले NALSAR के वाइस चांसलर श्रीकृष्ण देव राव ने एक प्रेस रिलीज जारी की थी. इसमें कहा गया था कि अनुरोध की प्रकृति को देखते हुए यूनिवर्सिटी को यह विचार करना होगा कि ऐसी जांच करना उसके अधिकारों के तहत “संवैधानिक रूप से सही” है या नहीं.
प्रेस रिलीज में कहा गया, “यूनिवर्सिटी की मदद करने और यह तय करने के लिए कि ऐसी जांच करना संविधान और यूनिवर्सिटी के नियमों के तहत सही और संभव है या नहीं, इस मामले को यूनिवर्सिटी की एग्जीक्यूटिव काउंसिल के सामने रखा जाएगा. एग्जीक्यूटिव काउंसिल यूनिवर्सिटी की सबसे बड़ी निर्णय लेने वाली संस्था है, जो यूनिवर्सिटी बनाने वाले कानून के तहत बनाई गई है.” इसमें कहा गया कि एग्जीक्यूटिव काउंसिल से विचार-विमर्श की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसकी जानकारी BCI को दी जाएगी.
पहला आदेश तब जारी किया गया था, जब नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (NALSAR) के करीब 450 अंतिम वर्ष के छात्रों के बारे में बताया गया कि उन्होंने वाइस चांसलर को ईमेल भेजकर अनुरोध किया था कि CJI को उनके दीक्षांत समारोह में आमंत्रित न किया जाए.
छात्रों का विरोध CJI के उस फैसले से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने 20 जुलाई को दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की ओर से निकाले गए विरोध मार्च के दौरान कथित पुलिस ज्यादती की जांच की मांग वाली याचिका पर जल्द सुनवाई देने से इनकार कर दिया था.
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