नयी दिल्ली, पांच अगस्त (भाषा) कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने कहा कि किसी सरकार को कई बार ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं जिन्हें ‘रणनीतिक संयम’ कहा जाता है, लेकिन बाद में पीछे मुड़कर देखने पर ही समझ आता है कि वे शायद गलतियां थीं।
खुर्शीद ने वकील-लेखक जावेद गया की पुस्तक ‘हार्टलैंड राइजिंग: द मेकिंग ऑफ मेजॉरिटेरियन इंडिया’ के लोकार्पण समारोह में यह बात कही। इस दौरान संचालक मालविका राजकोटिया ने उनसे पूछा कि 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय नरसिम्हा राव सरकार ने ‘रणनीतिक संयम’ क्यों बरता।
पूर्व कानून मंत्री ने बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना को देश के लिए पीड़ादायी बताते हुए कहा कि अगर किसी एक ही घटना के बारे में सोचते रहें तो वह बहुत बड़ी प्रतीत हो सकती है, लेकिन अगर अतीत की बातों को भुलाकर हम आगे बढ़ें तो यह हमारे लिए अधिक बेहतर होगा।
उन्होंने कहा, ‘‘बाद में पीछे मुड़कर देखने से निश्चित रूप से उन गलतियों को समझने में मदद मिलती है जो शायद हुई होंगी। लेकिन यदि आप इन चीजों को अलग-थलग देखते हैं तो वे बहुत बड़ी लगती हैं। यह शरीर पर निकले फोड़े की तरह है। यदि आप केवल फोड़े पर ध्यान देंगे तो वह बेहद भयानक, बदसूरत और पीड़ादायक लगेगा। लेकिन यह भी सर्वविदित है कि अंततः आप उससे उबर जाएंगे।’’
खुर्शीद ने कहा कि चाहे बाबरी मस्जिद विध्वंस हो या 2002 के गुजरात दंगे, हर घटना के अपने ‘स्पष्टीकरण, विफलताएं और परिणाम’ हो सकते हैं, जिन पर विचार किया जा सकता है।
उन्होंने कहा, ‘‘ये सच है और आपने भी ‘रणनीतिक संयम’ शब्द का इस्तेमाल किया है। निश्चित रूप से कुछ लोगों का मानना था कि रणनीतिक संयम का मार्ग ही उचित है, क्योंकि यदि रणनीतिक संयम नहीं बरता गया होता तो हो सकता है कि यह किसी बड़ी पाशविक शक्ति को न्योता दे सकता था जो बड़ा संकट पैदा कर सकता था और जिससे निपटना मुश्किल होता। लेकिन यह भी संभव है कि उसी रणनीतिक संयम से उस ताकत को खुलकर सामने आने का अवसर मिला हो।’’
एक अन्य प्रश्न के उत्तर में खुर्शीद ने कहा कि ‘‘आज भी जवाहरलाल नेहरू को देश के विभाजन के लिए दोषी ठहराया जाता है। यह भी पूछा जा सकता है कि हमने विभाजन क्यों स्वीकार किया? हम यह भी कह सकते थे कि विभाजन नहीं होगा, चाहे गृहयुद्ध ही क्यों न हो जाए।’’
उन्होंने कहा, ‘‘जैसा मैंने कहा, इन सवालों के जवाब बाद में पीछे मुड़कर देखने पर मिलते हैं। लेकिन जब आप सत्ता में होते हैं और घटनाएं घट रही होती हैं, तब आपको वही करना पड़ता है जिसे संचालक ने ‘रणनीतिक संयम’ कहा है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘उस समय की परिस्थितियों में आप यह सोचकर निर्णय लेते हैं कि यही सबसे अच्छा विकल्प है। बाद में देखने पर यह लग सकता है कि वह सर्वोत्तम निर्णय नहीं था और कुछ अधिक किया जाना चाहिए था।’’
देश के राजनीतिक और लोकतांत्रिक भविष्य में उत्तर प्रदेश की भूमिका पर खुर्शीद ने कहा कि राज्य को भारत के लिए ‘निर्णायक परिवर्तन बिंदु’ के रूप में देखा जा रहा है।
उन्होंने कहा, ‘‘यदि भारत को फिर से उन व्यवस्थाओं की ओर लौटना है जिन्हें हमने अपने अतीत में देखा था जब हम बड़े हो रहे थे और जिनके स्थायी स्वरूप की हमारे नेताओं ने कल्पना की थी, तो इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश से ही करनी होगी। क्या यह संभव है? कुछ लोग कहते हैं कि नहीं, कुछ कहते हैं कि हां। कुछ का मानना है कि यह बदलाव भारतीय जनता पार्टी के भीतर से आएगा, जबकि कुछ का कहना है कि उत्तर प्रदेश यह दिखाएगा कि गठबंधन युग और गठबंधन की राजनीति कितनी सफल हो सकती है।’’
समारोह में स्तंभकार और शिक्षाविद् अपूर्वानंद ने स्वतंत्रता के बाद की कांग्रेस सरकारों पर सवाल उठाए और कहा कि विपक्षी दलों (समाजवादी और वामपंथियों) की ‘लोकतांत्रिक महत्वाकांक्षा’ उन्हें जनसंघ के साथ गठबंधन करने की ओर ले गई।
उन्होंने कहा, ‘‘विपक्ष में लोकतांत्रिक प्रलोभन था। इसी वजह से उन्हें लगा कि अगर वे लोकतांत्रिक काम करना चाहते हैं, यानी सरकार बदलना चाहते हैं, तो बहुमत पाने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं।’’
अपूर्वानंद ने कहा, ‘‘राम मनोहर लोहिया ने दीनदयाल उपाध्याय के साथ हाथ मिलाया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बैठकों और अभियानों में जाने लगे। 1960 के दशक में कांग्रेस छह राज्यों में चुनाव हार गई। समाजवादियों और वामपंथियों को जनसंघ के साथ गठबंधन करने में कोई समस्या नहीं थी।’’
उन्होंने कहा कि भारत के मुसलमानों को भरोसा दिलाना होगा कि वे भी देश के समान अधिकार वाले नागरिक हैं और इस बात से कोई ‘समझौता’ नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं अक्सर पूछता हूं कि अच्छे लोगों ने यह क्यों नहीं सोचा कि उनके कदमों का भारत के मुसलमानों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा।’’
इस पर खुर्शीद ने कहा कि यह समझ से परे है कि जो नेता सांप्रदायिक नहीं थे, वे लोकतांत्रिक व्यवस्था को नियंत्रित करने की कोशिश में इस पहलू से आंखें कैसे मूंद सकते थे।
कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘उनके जीवन के कई पहलू सांप्रदायिकता के विरोध में थे। यह समझ में नहीं आता कि उन्होंने अपनी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इस मुद्दे को क्यों नजरअंदाज किया। आपने जो कहा वह सही है, यह सब कुछ हुआ। यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र पर बहुत बड़ा प्रश्न है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। वे छोटे लोग नहीं थे। यह निश्चित रूप से एक बड़ा सवाल है।’’
पुस्तक के प्रकाशक ‘वेस्टलैंड बुक्स’ के अनुसार, जावेद गया की यह पुस्तक बताती है कि किस प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन और उसके बाद हिंदी भाषी क्षेत्र के उभार ने भारत की सामाजिक और आर्थिक दिशा को प्रभावित किया तथा जातीय और सांप्रदायिक विभाजनों को गहरा करते हुए बहुलतावाद के लिए उपलब्ध स्थान को सीमित किया।
भाषा शोभना सुरभि वैभव
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