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Thursday, 16 July, 2026
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जाट किसान की मौत के 47 साल बाद लिव-इन पार्टनर को मिली जमीन, हाईकोर्ट ने वसीयत को माना वैध

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने भतीजों का केस खारिज कर दिया और कहा कि बिना बच्चों वाला व्यक्ति अपनी पैतृक ज़मीन उस महिला के नाम वसीयत कर सकता है जो उसके साथ रहती थी और उसकी सेवा करती थी, भले ही उनकी शादी कभी औपचारिक रूप से साबित न हुई हो.

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गुरुग्राम: हरियाणा के यमुनानगर के संखेड़ा गांव के रहने वाले बिशन सिंह की मौत 1979 में हुई थी. उसी साल शुरू हुआ उनकी जमीन का विवाद अब 47 साल बाद खत्म हुआ है. पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने उस महिला के पक्ष में फैसला दिया है, जिसके साथ बिशन सिंह ने अपनी जिंदगी के आखिरी साल बिताए थे.

बिशन सिंह एक जाट किसान थे और उनके पास करीब 24 बीघा पुश्तैनी जमीन थी. उनकी कोई संतान नहीं थी और उनके भतीजों के मुताबिक उन्होंने कभी शादी भी नहीं की थी. लेकिन बिशन सिंह ने अपनी वसीयत में सारी संपत्ति स्म्त. देबो के नाम कर दी थी, जिनके साथ वह कई सालों तक रहे थे.

बिशन सिंह के भाई बेली राम के बेटों ने इस वसीयत को अदालत में चुनौती दी. उनका कहना था कि देबो कभी बिशन सिंह की कानूनी पत्नी नहीं थीं. वह दूसरी जाति की थीं और जाटों के रिवाज के मुताबिक कोई व्यक्ति अपनी पुश्तैनी जमीन वसीयत के जरिए किसी और को नहीं दे सकता.

भतीजे 1987 में ट्रायल कोर्ट में केस हार गए. 1991 में पहली अपील भी हार गए. इसके बाद 6 जुलाई को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के जस्टिस हरकेश मनुजा ने उनकी आखिरी अपील भी खारिज कर दी. इसके साथ ही 47 साल पुरानी कानूनी लड़ाई खत्म हो गई, जो इस मामले से जुड़े कई मूल पक्षकारों से भी ज्यादा लंबी चली.

‘उन्होंने उनकी सेवा की, उन्होंने उनका सहारा दिया’

अदालत में देबो ने कहा कि बिशन सिंह की मौत से करीब पांच साल पहले दोनों ने करेवा किया था. हरियाणा और पंजाब में करेवा एक ऐसी परंपरा है, जिसमें किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसका भाई या रिश्तेदार उसकी विधवा की जिम्मेदारी एक साधारण रस्म के जरिए अपने ऊपर ले लेता है.

हालांकि, भतीजों का सबसे बड़ा तर्क यह था कि देबो और बिशन सिंह का करेवा वैध नहीं हो सकता था. उनका कहना था कि बिशन सिंह जाट थे और देबो राजपूत थीं. वहीं, रिवाज के मुताबिक करेवा सिर्फ मृत पति के रिश्तेदार और उसकी विधवा के बीच ही हो सकता है.

भतीजों ने हाई कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें इसी तरह के अंतरजातीय करेवा के दावे को खारिज किया गया था.

लेकिन अदालत ने इस सवाल पर फैसला देना जरूरी नहीं समझा. कोर्ट ने कहा कि 1978 में बिशन सिंह ने खुद एक अदालत के आदेश में देबो को अपनी पत्नी माना था. उसी आदेश के तहत उन्होंने अपनी आधी जमीन देबो के नाम कर दी थी. उन्होंने अपनी मौत तक इस आदेश को कभी चुनौती नहीं दी. इसलिए अब कई दशक बाद उनके भतीजे इस मुद्दे को दोबारा नहीं उठा सकते.

इससे भी ज्यादा अहम बात यह रही कि अदालत ने कहा कि अगर शादी साबित भी न हो, तब भी वसीयत अमान्य नहीं हो जाती.

कोर्ट ने 2022 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जिस व्यक्ति की कोई संतान नहीं है, वह अपनी आखिरी जिंदगी में उसकी देखभाल और सेवा करने वाले किसी भी व्यक्ति को अपनी संपत्ति दे सकता है. इससे फर्क नहीं पड़ता कि वह व्यक्ति कानूनी तौर पर उसका जीवनसाथी था या नहीं.

सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में कहा था, “वह अपनी संपत्ति किसे देता है, इससे किसी और का कोई लेना-देना नहीं है.” हाई कोर्ट ने कहा कि यही बात बिशन सिंह के मामले पर भी पूरी तरह लागू होती है.

अदालत ने अंग्रेजों के दौर के रिकॉर्ड को भी देखा

जाटों की परंपरा वाले तर्क पर अदालत ने माना कि आम तौर पर जाट समाज में पुश्तैनी जमीन वसीयत के जरिए देने को सही नहीं माना जाता.

वादियों का कहना था कि बिशन सिंह जाट थे और जमींदारों की परंपराओं के तहत चलते थे. इसलिए उन्हें पुश्तैनी जमीन की वसीयत या उसका हस्तांतरण करने का अधिकार नहीं था.

इस दावे की जांच के लिए अदालत ने अंग्रेजों के दौर के एक रिकॉर्ड का सहारा लिया. यह अंबाला जिले का रिवाज-ए-आम (Riwaj-e-am) था. 19वीं सदी में ब्रिटिश अधिकारियों ने स्थानीय परंपराओं को दर्ज करने के लिए यह दस्तावेज तैयार किया था, ताकि राजस्व और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में उसका इस्तेमाल किया जा सके.

इस दस्तावेज के प्रश्न संख्या 69 में दर्ज है कि हिंदू समुदायों, जिनमें जाट भी शामिल हैं, में पुश्तैनी अचल संपत्ति के मामले में वसीयत जैसी कानूनी व्यवस्था लगभग नहीं थी.

रिकॉर्ड में यह भी लिखा है कि उस समय परिवारों में जिसे “वसीयत” कहा जाता था, वह वास्तव में जीवनकाल में दिया गया खुला उपहार होता था. यह रिश्तेदारों की जानकारी और सहमति से दिया जाता था, न कि मौत के बाद सामने आने वाला कोई गुप्त दस्तावेज.

अदालत ने इस व्याख्या को अपने ही 1981 के फैसले नत्थू राम बनाम जुग लाल के आधार पर माना, जिसमें इसी रिवाज-ए-आम की विस्तार से व्याख्या की गई थी.

उस फैसले में कहा गया था कि सामान्य परंपरा के मुताबिक जाट अपनी पुश्तैनी जमीन वसीयत या उपहार में नहीं दे सकता. लेकिन यह नियम पूरी तरह से लागू नहीं होता.

फैसले में एक अपवाद भी बताया गया था. अगर किसी व्यक्ति की संतान नहीं है, तो वह अपनी पुश्तैनी जमीन किसी करीबी रिश्तेदार या ऐसे व्यक्ति को दे सकता है जिसने उसकी व्यक्तिगत सेवा की हो. कानून में ऐसे हस्तांतरण को वसीयत नहीं बल्कि उपहार माना जाएगा.

अदालत ने कहा कि बिशन सिंह की कोई संतान नहीं थी, इसलिए उनका मामला इसी अपवाद में आता है. रिकॉर्ड से भी यह साबित हुआ कि देबो उनके साथ रहती थीं और उनकी सेवा करती थीं.

भतीजों ने तकनीकी आधार पर भी वसीयत को चुनौती दी. उनका कहना था कि वसीयत पर गवाही देने वाले गवाहों में से एक बिशन सिंह के गांव का रहने वाला नहीं था. उन्होंने यह भी कहा कि दस्तावेज पर साइन के समय देबो खुद वहां मौजूद थीं.

अदालत ने दोनों दलीलों को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि कोई गवाह पड़ोसी गांव का है या वसीयत का लाभ पाने वाला व्यक्ति दस्तावेज पर साइन के समय मौजूद था, इससे यह साबित नहीं होता कि उस पर कोई दबाव डाला गया था.

अदालत ने कहा कि वसीयत विधिवत रजिस्टर्ड थी और उस पर साइन करने वाले गवाह की गवाही से भी इसकी पुष्टि हुई है. इसलिए कानून के मुताबिक वसीयत पूरी तरह साबित हो चुकी है.

इसके साथ ही हाई कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों को पूरी तरह सही माना और भतीजों की अपील खारिज कर दी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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