जयपुर, 29 जुलाई (भाषा) सोशल मीडिया पर मिलने वाले ‘लाइक्स’, ‘व्यूज’ और ‘कमेंट’ अब जेनरेशन-जेड के लिए केवल डिजिटल प्रतिक्रिया नहीं रह गए हैं, बल्कि वे खुशी, लोकप्रियता और आत्म-मूल्यांकन का पैमाना बनते जा रहे हैं। एक समाजशास्त्रीय अध्ययन में सामने आया है कि कई युवा महिलाएं अपनी पोस्ट पर अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर चिंता, अस्वीकृति की भावना और अकेलेपन का अनुभव करती हैं।
कोटा के राजकीय कला कन्या महाविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग की प्रोफेसर डॉ. ज्योति सिडाना के नेतृत्व में किए गए 25 दिवसीय अध्ययन में यह तथ्य सामने आए हैं।
अध्ययन में विभिन्न महाविद्यालयों की 141 स्नातक और स्नातकोत्तर छात्राओं को शामिल किया गया। इसका उद्देश्य डिजिटल निर्भरता के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभावों को समझना था।
अध्ययन के अनुसार, 82.9 प्रतिशत छात्राओं ने कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट पर मिलने वाले लाइक्स और कमेंट की संख्या सीधे तौर पर उनके मूड को प्रभावित करती है। वहीं, 9.8 प्रतिशत ने माना कि यह प्रभाव कुछ हद तक होता है, जबकि केवल 7.3 प्रतिशत छात्राओं ने कहा कि ऑनलाइन प्रतिक्रिया का उनकी भावनात्मक स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ता।
डॉ. सिडाना ने कहा, ‘‘आज की पीढ़ी के लिए लाइक्स और व्यूज केवल संख्या नहीं रह गए हैं। वे लोकप्रियता, पहचान और सामाजिक स्वीकार्यता का पैमाना बन चुके हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘जब किसी पोस्ट को अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलती तो कई युवा खुद को दूसरों की तुलना में कम स्वीकार्य या कम महत्वपूर्ण महसूस करने लगते हैं। दूसरों की सफल पोस्ट से लगातार तुलना करने की प्रवृत्ति हीन भावना, चिंता और निराशा को बढ़ा सकती है।’’
अध्ययन में यह भी सामने आया कि 61 प्रतिशत छात्राओं ने कहा कि सोशल मीडिया पर हजारों फॉलोअर्स होने के बावजूद वे वास्तविक जीवन में अकेलापन महसूस करती हैं।
छात्राओं का कहना था कि ऑनलाइन संबंधों में अक्सर भावनात्मक गहराई की कमी होती है और वे भरोसे, अपनापन तथा भावनात्मक सहयोग पर आधारित आमने-सामने के रिश्तों का स्थान नहीं ले सकते।
डॉ. सिडाना ने कहा कि कई युवा यह महसूस करते हैं कि वास्तविक जीवन में लोगों के साथ बातचीत से मिलने वाली संतुष्टि अधिक स्थायी होती है, जबकि आभासी रिश्ते उतना भावनात्मक सहारा नहीं दे पाते।
उन्होंने कहा, ‘‘सोशल मीडिया थोड़े समय के लिए खुशी दे सकता है, लेकिन ऑनलाइन बने रिश्ते मुश्किल समय में साथ नहीं खड़े हो सकते और न ही वास्तविक समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। यही कारण है कि डिजिटल रूप से जुड़े होने के बावजूद कई लोग अकेलापन महसूस करते हैं।’’
अध्ययन में पाया गया कि 48.2 प्रतिशत छात्राएं नोटिफिकेशन मिलते ही तुरंत अपना फोन देखती हैं, जबकि 43.9 प्रतिशत ने कहा कि उनके फोन देखने का कोई निश्चित समय नहीं है। इससे दिनभर बार-बार मोबाइल फोन इस्तेमाल करने की आदत का संकेत मिलता है।
करीब 70 प्रतिशत छात्राओं ने माना कि वे मोबाइल फोन और सोशल मीडिया का उपयोग कम करने या कुछ समय के लिए पूरी तरह बंद करने के लिए डिजिटल डिटॉक्स करना चाहती हैं, लेकिन ऐसा कर पाने में वे असमर्थ हैं।
अध्ययन के अनुसार, 43.9 प्रतिशत छात्राओं का मानना है कि सोशल मीडिया ने दिखावे की संस्कृति को बढ़ावा दिया है, जबकि 41.5 प्रतिशत ने कहा कि इसका असर उनकी वास्तविक पहचान पर पड़ा है। वहीं, 14.6 प्रतिशत ने माना कि सोशल मीडिया अनावश्यक खर्च को बढ़ावा देता है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि ऑनलाइन ‘परफेक्ट छवि’ बनाए रखने का दबाव युवाओं के आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।
करीब 61 प्रतिशत छात्राओं ने कहा कि सोशल मीडिया पर नकारात्मक टिप्पणियों या ट्रोलिंग से वे तनाव या परेशानी महसूस करती हैं, जबकि 39 प्रतिशत ने कहा कि ऐसी टिप्पणियों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
डॉ. सिडाना ने कहा कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के साथ बड़ी हुई पहली ‘डिजिटल नेटिव’ पीढ़ी यानी जेनरेशन-जेड को तकनीक ने कई अवसर दिए हैं, लेकिन इसके साथ चिंता, सामाजिक तुलना, अकेलापन और डिजिटल निर्भरता जैसी चुनौतियां भी बढ़ी हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘यदि समय रहते डिजिटल संतुलन स्थापित नहीं किया गया तो इसका प्रभाव मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक संबंधों पर और गहरा हो सकता है।’’
अध्ययन में नियमित डिजिटल डिटॉक्स, परिवार और मित्रों के साथ अधिक प्रत्यक्ष संवाद, लाइक्स और फॉलोअर्स के आधार पर आत्म-मूल्य तय न करने तथा डिजिटल और वास्तविक जीवन के बीच बेहतर संतुलन बनाए रखने की सलाह दी गई है।
डॉ. सिडाना ने कहा, ‘‘भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए वास्तविक रिश्ते और सामाजिक जुड़ाव सबसे मजबूत आधार हैं। आमने-सामने की बातचीत ही लंबे समय तक भावनात्मक सहयोग प्रदान करती है, आभासी संवाद नहीं।’’
भाषा
बाकोलिया रवि कांत
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