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Thursday, 9 July, 2026
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कसाब, कठुआ और अब अयोध्या: क्या आरोपियों का केस लड़ने से इनकार कर सकती है बार एसोसिएशन?

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे बहिष्कार संविधान में दिए गए निष्पक्ष सुनवाई (फ्री एंड फेयर ट्रायल) के अधिकार के खिलाफ हैं. साथ ही यह बार काउंसिल ऑफ इंडिया के वकीलों के कर्तव्यों से जुड़े नियमों का भी उल्लंघन करते हैं.

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नई दिल्ली: अगर कोई बार एसोसिएशन यह फैसला कर दे कि किसी आरोपी का कोई भी वकील केस नहीं लड़ेगा, तो क्या होता है?

पहले के कई मामलों से पता चलता है कि ऐसी स्थिति में अदालतें अक्सर ऐसे बहिष्कार को गैरकानूनी बताती हैं और आरोपियों के लिए लीगल एड (मुफ्त कानूनी सहायता) के तहत वकील नियुक्त करती हैं, लेकिन जो वकील ऐसे माहौल में आरोपी का केस लड़ने का फैसला करते हैं, उन्हें कई बार धमकियों और हमलों का सामना करना पड़ता है. कुछ मामलों में उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए अदालत का दरवाजा भी खटखटाना पड़ा.

अब इस तरह के मामलों में सबसे नया मामला अयोध्या बार एसोसिएशन का है. एसोसिएशन ने फैसला किया है कि राम मंदिर चंदा चोरी मामले के आरोपियों की ओर से कोई भी वकील पेश नहीं होगा. अगर कोई वकील उनका केस लेता है, तो उस पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा.

हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह का बहिष्कार संविधान में दिए गए निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के खिलाफ है. साथ ही यह बार काउंसिल ऑफ इंडिया के वकीलों के कर्तव्यों से जुड़े नियमों का भी उल्लंघन करता है.

सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड तल्हा अब्दुल रहमान ने कहा कि पहले भी कई बार बार एसोसिएशनों ने आरोपियों का केस नहीं लड़ने का फैसला किया है, खासकर आतंकवाद से जुड़े मामलों में.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “जनता के गुस्से के समय ऐसी प्रतिक्रिया समझ में आ सकती है, लेकिन यह वकालत पेशे की सबसे अच्छी परंपराओं के अनुरूप नहीं है. वकीलों का काम किसी आरोपी के कथित अपराध का समर्थन करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर व्यक्ति को संविधान के अनुसार निष्पक्ष सुनवाई मिले.”

रहमान ने कहा कि जिस आरोपी को लोग पसंद नहीं करते, उसका बचाव करना साहस का काम होता है.

उन्होंने कहा, “ऐसे समय में ही कानूनी व्यवस्था और वकालत पेशे के चरित्र की असली परीक्षा होती है. यही कानून के शासन (रूल ऑफ लॉ) की सबसे बड़ी कसौटी है.”

आरोपी का केस कौन लड़ता है

आरोपी का केस लड़ने से वकीलों के इनकार का सबसे चर्चित मामला 2008 के मुंबई आतंकी हमले के बाद सामने आया था. उस समय बार एसोसिएशनों ने प्रस्ताव पास कर कहा था कि हमले में गिरफ्तार किए गए इकलौते आतंकी अजमल कसाब का कोई भी वकील केस नहीं लड़ेगा.

जब कसाब को सुनाई गई फांसी की सज़ा की पुष्टि के लिए मामला बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा, तब अदालत की ओर से उसके बचाव के लिए नियुक्त किए गए आपराधिक मामलों के वकील अमीन सोलकर को 24 घंटे सुरक्षा देनी पड़ी.

खबरों के मुताबिक, कसाब का केस लड़ने पर उन्हें धमकी भरे संदेश मिले थे. इसके बाद एक पुलिसकर्मी ऑटोमैटिक कार्बाइन हथियार के साथ हर समय उनकी सुरक्षा में तैनात रहता था.

कसाब के बचाव में अमीन सोलकर की मदद कर रहीं फरहाना शाह को भी ऐसी ही धमकियां मिली थीं. उनके बहनोई के डेंटल क्लीनिक पर पत्थर भी फेंके गए थे.

इसी तरह, उदयपुर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष गिरिजा शंकर मेहता ने ऐलान किया था कि 2022 में उदयपुर के दर्जी कन्हैया लाल की हत्या के आरोपियों का कोई भी वकील केस नहीं लड़ेगा.

हालांकि, बाद में इस मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंप दी गई. मुकदमे की सुनवाई भी जयपुर की विशेष NIA अदालत में हुई. इसी वजह से जयपुर के वकील सैयद सआदत अली ने इस मामले में आरोपियों की ओर से पैरवी की.

अली ने दिप्रिंट से कहा, “यह प्रस्ताव उदयपुर बार एसोसिएशन ने पास किया था, इसलिए यह मुझ पर लागू नहीं होता था.”

हालांकि, यह पहली बार नहीं था जब उन्होंने ऐसा मामला लड़ा हो.

उन्होंने बताया कि 2008 के जयपुर बम धमाका मामले में भी बार एसोसिएशन ने ऐसा ही प्रस्ताव पास किया था. उस समय अदालत ने वरिष्ठ वकील पाकेर फारूक को आरोपियों की ओर से अदालत का मित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त किया था और अली भी उनकी टीम का हिस्सा थे.

अली ने कहा, “जब इस तरह के मामले आते हैं, तो आरोपियों का केस लड़ने वाले वकीलों पर दबाव बनाया जाता है, लेकिन हमने दबाव में काम नहीं किया. हम हमेशा टीम के साथ चलते थे. अदालत में भी हम हमेशा समूह में ही प्रवेश करते थे.”

जिन वकीलों को कोर्ट जाना पड़ा

कोर्ट ने भी कई बार ऐसे प्रस्तावों में दखल दिया है. उदाहरण के लिए, 2019 में, कोटद्वार बार एसोसिएशन ने एक प्रस्ताव पास किया जिसमें एसोसिएशन के सभी वकीलों को एडवोकेट सुशील रघुवंश की हत्या के आरोपियों का केस न लड़ने का निर्देश दिया गया था.

एडवोकेट कुलदीप अग्रवाल, जो आरोपियों का केस लड़ना चाहते थे, उन्हें खुद उत्तराखंड हाई कोर्ट जाना पड़ा.

एसोसिएशन ने तो यह भी कहा था कि आरोपियों का केस लड़ने वाले किसी भी वकील की मेंबरशिप खत्म हो जाएगी, लेकिन बाद में यह चेतावनी वापस ले ली गई.

अग्रवाल ने कोर्ट को बताया कि निकालने की ऐसी गैर-कानूनी धमकियां बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों का उल्लंघन करती हैं. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें आरोपियों की तरफ से पेश होने से रोकने और अपनी ड्यूटी करने से रोकने के लिए बोलकर धमकाया जा रहा था.

जवाब में, हाई कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 22(1) पर ज़ोर देते हुए कहा कि हर आरोपी को अपनी पसंद के लीगल प्रैक्टिशनर से बचाव पाने का फंडामेंटल अधिकार है. इसने फैसला सुनाया कि बार एसोसिएशन का पास किया गया प्रस्ताव “संविधान, कानून और प्रोफेशनल एथिक्स के सभी नियमों के खिलाफ” था.

कोर्ट ने आगे कहा: “यह बार की महान परंपराओं के खिलाफ है, जो हमेशा किसी जुर्म के आरोपी लोगों का बचाव करता रहा है. बार एसोसिएशन का ऐसा प्रस्ताव रद्द और अमान्य है, और सही सोच वाले वकीलों को ऐसे प्रस्ताव को नज़रअंदाज़ करना चाहिए और उसका विरोध करना चाहिए अगर वे चाहते हैं कि इस देश में लोकतंत्र और कानून का राज बना रहे.”

मध्य प्रदेश के वकील नूर मोहम्मद ने 2008 में People’s Tribunal on the atrocities committed against the minorities in the name of fighting terrorism’ (आतंकवाद से लड़ने के नाम पर अल्पसंख्यकों पर किए गए अत्याचारों पर पीपुल्स ट्रिब्यूनल) की एक रिपोर्ट में ऐसी ही एक घटना को याद किया.

नूर 2008 में इंदौर से गिरफ्तार किए गए 13 लोगों में से दो का केस लड़ रहे थे, जिन पर बैन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) के एक्टिविस्ट होने का आरोप था. उस समय धार बार एसोसिएशन ने ऐलान किया था कि कोई भी वकील गिरफ्तार लोगों का केस नहीं लड़ेगा. उन्होंने याद किया कि आरोपियों का बचाव करने पर कोर्ट परिसर में कई बार वकीलों ने नहीं, बल्कि बाहरी लोगों ने उनके साथ मारपीट की थी.

उनका आरोप है कि आरोपियों के लिए सुरक्षा और केस को इंदौर ट्रांसफर करने की मांग वाली अर्जी लिखते समय मजिस्ट्रेट कोर्ट में उन पर जूतों से हमला किया गया था.

उन्होंने याद करते हुए कहा, “उन्होंने मजिस्ट्रेट के ऑर्डर पर भी ध्यान नहीं दिया, जिन्होंने उन्हें कोर्ट से बाहर जाने को कहा था. ऐसा लगता है कि उन्हें कोर्ट की पवित्रता की कोई इज्ज़त नहीं थी.”

‘कैब-रैंक’ नियम

अदालतें कई बार कह चुकी हैं कि इस तरह के प्रस्ताव किसी आरोपी के अपनी पसंद के वकील से बचाव करवाने के अधिकार पर सीधा हमला करते हैं.

संविधान के अनुच्छेद 22(1) में साफ कहा गया है कि गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को “अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने और अपने बचाव का अधिकार नहीं छीना जा सकता.”

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों में भी वकीलों के अपने मुवक्किल (क्लाइंट) के प्रति कर्तव्यों का जिक्र है. इन नियमों के मुताबिक, एक वकील “केस स्वीकार करने के लिए बाध्य है.”

नियम में कहा गया है, “एक वकील जिस अदालत, ट्रिब्यूनल या किसी अन्य प्राधिकरण में प्रैक्टिस करता है, वहां आने वाला कोई भी केस स्वीकार करने के लिए बाध्य है. उसे अपनी फीस भी उसी स्तर की रखनी चाहिए, जितनी उसी स्तर के दूसरे वकील और उसी तरह के मामलों में लेते हैं. हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में वह किसी खास केस को लेने से इनकार कर सकता है.”

दिल्ली के वकील अभिनव सेखरी भी ‘कैब-रैंक नियम’ का ज़िक्र करते हैं. इस नियम के मुताबिक, अगर कोई मामला किसी वकील की विशेषज्ञता के दायरे में है, वह उपलब्ध है और उसे उसकी सामान्य फीस दी जा रही है, तो नैतिक रूप से उसे वह केस स्वीकार करना चाहिए.

यह नियम उस सिद्धांत से जुड़ा है कि जैसे टैक्सी चालक को पहला यात्री, जो उसे रोककर किसी जगह चलने को कहे और किराया देने को तैयार हो, उसे ले जाना चाहिए.

सेखरी ने कहा, “इस बात पर काफी चर्चा होती रही है कि क्या किसी आरोपी का बचाव करने या न करने का विकल्प वकील के पास होता है, खासकर आपराधिक मामलों में, जब कोई व्यक्ति खुद आपके पास कानूनी मदद मांगने आता है. इसका जवाब काफी साफ है.”

राजनीति से जुड़े संगठन

बार एसोसिएशन ऐसे प्रस्ताव क्यों पास करती हैं?

दिल्ली के वकील अभिनव सेखरी का कहना है कि यह एक “बहुत जटिल नैतिक सवाल” है, जबकि दूसरी तरफ राज्य की भी जिम्मेदारी है कि किसी भी आरोपी को बिना वकील के न छोड़ा जाए.

उन्होंने कहा, “इसमें कोई शक नहीं है कि ऐसे प्रस्तावों का कानून में कोई आधार नहीं है, लेकिन इसके पीछे नैतिक सोच ज़रूर होती है.”

उन्होंने आगे कहा, “जो लोग ऐसे प्रस्ताव लाते हैं, उनके मन में यह नैतिक सोच होती है कि कुछ आरोपी इतने गलत और घृणित हैं कि उनका बचाव करने का सवाल ही नहीं उठता.”

सेखरी ने कहा कि अगर इस बहस में नैतिकता को शामिल किया जाए तो मामला थोड़ा मुश्किल हो सकता है, लेकिन एडवोकेट्स एक्ट को देखा जाए, तो यह सवाल मुश्किल नहीं रह जाता.

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा, “ज़िंदगी सिर्फ काले और सफेद रंग जैसी नहीं होती, इसमें बहुत सारे धूसर (ग्रे) हिस्से भी होते हैं.”

उनके मुताबिक, बार एसोसिएशन काफी हद तक राजनीतिक संगठन होती हैं.

उन्होंने कहा, “ये बहुत ज्यादा राजनीतिक संगठन हैं और हड़ताल या बहिष्कार के ज्यादातर फैसलों में उनकी राजनीतिक सोच दिखाई देती है. हां, कुछ हड़तालें पेशे से जुड़े मुद्दों पर भी होती हैं, जैसे अदालतों में किसी समस्या के खिलाफ. वह भी एक तरह का बहिष्कार ही है, क्योंकि उसमें वकील काम नहीं करते और सभी मुकदमे लड़ने वाले लोग प्रभावित होते हैं. इसी तरह जब किसी आरोपी का बहिष्कार किया जाता है, तब भी एक मुकदमे से जुड़ा व्यक्ति नुकसान उठाता है.”

मुंबई के वकील आदित्य मिते का भी मानना है कि ऐसे प्रस्ताव आम तौर पर वकीलों के एक समूह की भावनाओं को दिखाते हैं.

उन्होंने कहा, “आखिर में ऐसे प्रस्ताव बेअसर हो जाते हैं, क्योंकि ज्यादातर मामलों में आरोपी को आखिरकार कोई न कोई वकील मिल ही जाता है. इसलिए ऐसे प्रस्ताव आमतौर पर सिर्फ एक संदेश देने के लिए लाए जाते हैं. यह गुस्सा और नाराजगी जताने का तरीका होता है. ऐसा अक्सर उन बड़े मामलों में होता है, जिनसे लोगों की भावनाएं जुड़ी होती हैं.”

मामलों का ट्रांसफर

सिर्फ इस वजह से कि किसी बार एसोसिएशन ने आरोपी का बहिष्कार कर दिया, किसी केस का दूसरी जगह ट्रांसफर होना आम बात नहीं है. आमतौर पर ऐसे फैसले के पीछे कई कारण होते हैं.

वकील अभिनव सेखरी ने कहा कि कई मामलों में केस एक राज्य से दूसरे राज्य या एक जिले से दूसरे जिले में ट्रांसफर किए गए हैं, क्योंकि वहां कोई भी वकील आरोपी का केस लड़ने के लिए तैयार नहीं था.

उन्होंने कहा, “इसलिए ऐसे बहिष्कार का काफी बड़ा असर पड़ सकता है.”

ऐसा ही एक बड़ा मामला कठुआ रेप और हत्या केस का था. सात मई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए इस मामले की सुनवाई जम्मू-कश्मीर से पंजाब के पठानकोट जिला एवं सत्र न्यायालय में ट्रांसफर करने का आदेश दिया था.

केस ट्रांसफर होने के पीछे एक अहम वजह यह थी कि कठुआ के वकीलों पर आरोप था कि उन्होंने पुलिस को आठ आरोपियों के खिलाफ मजिस्ट्रेट की अदालत में चार्जशीट दाखिल करने से रोक दिया था.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इन घटनाओं का विस्तार से जिक्र नहीं किया. लेकिन कोर्ट ने कहा कि कठुआ बार एसोसिएशन, संबंधित इलाके और कई अन्य समूहों से जुड़ी कुछ अनुचित घटनाएं हुई थीं.

सुप्रीम कोर्ट ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश की रिपोर्ट का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि कठुआ बार एसोसिएशन की ओर से कुछ रुकावटें पैदा की गई थीं.

इसी तरह, 2017 में रेयान इंटरनेशनल स्कूल के नॉर्दर्न ज़ोन प्रमुख फ्रांसिस थॉमस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सात साल के बच्चे की हत्या के मामले की सुनवाई गुरुग्राम से दिल्ली ट्रांसफर करने की मांग की थी.

कोर्ट को बताया गया था कि गुरुग्राम जिला बार एसोसिएशन ने प्रस्ताव पास कर आरोपी का केस नहीं लड़ने का फैसला किया था. बाद में बार एसोसिएशन ने यह प्रस्ताव वापस ले लिया.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि किसी भी आरोपी को, चाहे उस पर कितना भी गंभीर अपराध क्यों न लगा हो, अपनी पसंद के वकील से अपना बचाव करवाने का मूल (इनहेरेंट) अधिकार है.

कोर्ट ने कहा, “वकालत की परंपरा और न्याय तक पहुंच के मूल सिद्धांत किसी भी बार एसोसिएशन को इस तरह का प्रस्ताव पास करने की इजाजत नहीं देते.”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बार एसोसिएशन द्वारा अपना प्रस्ताव वापस लेना “सुधारात्मक कदम” था.

साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपी की ओर से पेश होने वाले किसी भी वकील के अदालत में आने-जाने में कोई भी वकील किसी तरह की रुकावट पैदा नहीं करेगा.

‘बुरे’ से ‘बुरे’ आरोपी को भी वकील मिलने का अधिकार है

इस मुद्दे पर 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया था. कोर्ट ने कहा था कि इस तरह के बहिष्कार (बॉयकॉट) के प्रस्ताव पूरी तरह गैरकानूनी हैं, बार की परंपराओं के खिलाफ हैं और पेशेवर नैतिकता के भी खिलाफ हैं.

यह फैसला कोयंबटूर बार एसोसिएशन के उस प्रस्ताव के जवाब में आया था, जिसमें कहा गया था कि पुलिस और वकीलों के बीच हुई झड़पों से जुड़े मामलों में कोई भी वकील आरोपी पुलिसकर्मियों का केस नहीं लड़ेगा.

जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा और मार्कंडेय काटजू की पीठ ने ऐसे प्रस्तावों को “पूरी तरह गैरकानूनी, बार की सभी परंपराओं के खिलाफ और पेशेवर नैतिकता के खिलाफ” बताया.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हर व्यक्ति को, चाहे समाज उसे कितना भी बुरा, गिरा हुआ, घिनौना, भ्रष्ट, विकृत, नफरत के लायक या बेहद खराब क्यों न मानता हो, अदालत में अपना बचाव करवाने का अधिकार है. और उसी तरह, वकील का भी यह कर्तव्य है कि वह उसका बचाव करे.”

इस मामले में एक सवाल बार एसोसिएशन के सदस्यों के रूप में वकीलों की स्वतंत्रता का भी उठता है.

अभिनव सेखरी ने कहा कि जब कोई बार एसोसिएशन किसी आरोपी का बहिष्कार करने का फैसला लेती है, तो वह अपने सभी सदस्य वकीलों से उनकी पसंद का अधिकार भी छीन लेती है.

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि ज्यादातर वकीलों के लिए किसी न किसी बार एसोसिएशन का सदस्य होना एक व्यावहारिक जरूरत है.

उन्होंने कहा, “हममें से ज्यादातर लोग किसी न किसी बार एसोसिएशन के सदस्य होते हैं. और जब किसी वजह से हड़ताल होती है, तो खासकर सदस्य होने के कारण आपको उसका पालन करना पड़ता है, क्योंकि इसे सामूहिक बातचीत (कलेक्टिव बार्गेनिंग) की प्रक्रिया माना जाता है.”

उन्होंने आगे कहा, “जब आप किसी मुश्किल में होते हैं, तो बार एसोसिएशन आपके साथ खड़ी होती है. जैसे अगर पुलिस किसी वकील के साथ मारपीट करे.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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