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Friday, 23 October, 2026
होमदेशचीन से मुकाबले के लिए आईटीबीपी ने सीमा पर ड्रोन प्लाटून बनाईं, भूमिगत बंकर बना रही है: डीजी

चीन से मुकाबले के लिए आईटीबीपी ने सीमा पर ड्रोन प्लाटून बनाईं, भूमिगत बंकर बना रही है: डीजी

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नयी दिल्ली, 23 अक्टूबर (भाषा) भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) ने चीन से लगती सीमा पर अपनी सभी सीमा इकाइयों में ड्रोन प्लाटून गठित की हैं। इसके अलावा, गलवान जैसी झड़पों से निपटने के लिए ‘स्ट्राइक’ नाम से एक नया प्रशिक्षण पाठ्यक्रम तैयार किया गया है और आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मद्देनजर सीमा पर बड़े पैमाने पर भूमिगत ढांचे बनाए जा रहे हैं।

आईटीबीपी के महानिदेशक (डीजी) शत्रुजीत सिंह कपूर ने राजस्थान के अलवर स्थित बल के एक केंद्र में बृहस्पतिवार को जवानों को संबोधित करते हुए कहा कि चीन से पारंपरिक युद्ध तरीकों से मुकाबला करने का दौर बीत चुका है, इसलिए बल अपने जवानों, हथियारों, वाहनों और सीमा चौकियों के आधुनिकीकरण में निवेश कर रहा है।

वर्ष 1962 में गठित आईटीबीपी चीन के साथ 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की सुरक्षा करती है।

कपूर ने कहा कि रूस-यूक्रेन और ईरान-अमेरिका के बीच हालिया युद्धों ने ड्रोन और ड्रोन-रोधी तकनीक के महत्व को दिखाया है। इन तकनीकों की मदद से संघर्ष के दौरान कोई छोटा देश भी बड़े देश को कड़ी चुनौती दे सकता है।

आगामी 31 अक्टूबर को सेवानिवृत्त होने जा रहे कपूर ने 24 अक्टूबर को बल के 65वें स्थापना दिवस से पहले आयोजित अलंकरण समारोह में जवानों को संबोधित किया।

उन्होंने कहा कि चीन से लगी सीमा भारत की ‘‘सबसे कठिन’’ सीमा है और चीन एक ‘‘शक्तिशाली’’ पड़ोसी तथा भारत का ‘‘सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी’’ है। उससे मुकाबला करने के लिए बल की क्षमताओं को बढ़ाना जरूरी है।

कपूर ने कहा, ‘‘ड्रोन एक बड़ी चुनौती भी बन गए हैं और अवसर भी। पारंपरिक तरीकों से चीन का मुकाबला करना मुश्किल होगा। उसने अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) का आधुनिकीकरण किया है और उस पर भारी निवेश किया है। लेकिन ड्रोन ऐसी तकनीक हैं, जिनसे छोटा देश भी बड़े देश को कड़ी टक्कर दे सकता है।’’

उन्होंने दावा किया कि यूक्रेन के साथ युद्ध में रूस के हर महीने करीब 10,000 से 15,000 सैनिक मारे जा रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘यह उस देश के साथ हो रहा है जो बड़ा देश और महाशक्ति है। रूस को लगा था कि वह एक-दो महीने में यूक्रेन पर कब्जा कर लेगा, लेकिन यह युद्ध का चौथा साल है। हर महीने रूस के पास 10,000 से 15,000 सैनिकों के शव पहुंच रहे हैं।’’

कपूर ने कहा कि इससे रूस को ‘‘बहुत बड़ा नुकसान’’ हो रहा है और वह अपने एक फैसले के कारण इसकी कीमत चुका रहा है।

उन्होंने ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष का भी उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि ईरान ने बिना वायुसेना, नौसेना या थलसेना के दुनिया की महाशक्ति के साथ मुकाबला किया।

कपूर ने कहा, ‘‘ड्रोन आने के बाद पारंपरिक सेनाओं की भूमिका बदल गई है और हमें बड़े पैमाने पर ड्रोन तथा ड्रोन-रोधी प्रणालियां अपनानी होंगी।’’

कपूर ने कहा कि करीब 95,000 कर्मियों वाले और पर्वतीय युद्ध में प्रशिक्षित आईटीबीपी को सरकार से 400 करोड़ रुपये की धनराशि मिली है। इसमें से 70 प्रतिशत राशि बल की ड्रोन युद्ध क्षमता बढ़ाने पर खर्च की जाएगी।

उन्होंने कहा, ‘‘अब सीमा की सुरक्षा करने वाली प्रत्येक बटालियन में एक ड्रोन प्लाटून है। हम ड्रोन पायलटों को प्रशिक्षण दे रहे हैं और ड्रोन भी बना रहे हैं।’’

कपूर ने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 4,000 करोड़ रुपये की एक बड़ी आधुनिकीकरण योजना को भी सैद्धांतिक मंजूरी दी है। इसमें से 1,000 करोड़ रुपये ड्रोन और ड्रोन-रोधी प्रणालियों के लिए निर्धारित किए जाएंगे।

उन्होंने जवानों को बताया कि आईटीबीपी कर्मियों को प्रशिक्षण देने के लिए ‘स्ट्राइक’ नामक एक नया पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। इससे गलवान जैसी परिस्थितियों का सामना करने की उनकी क्षमता बढ़ेगी। वर्ष 2027 के अंत तक पूरे बल को यह प्रशिक्षण दिया जाएगा।

जून 2020 में लद्दाख के गलवान में एलएसी पर भारतीय सैनिकों पर हमले के दौरान चीनी सैनिकों ने पत्थरों, कील लगे डंडों, लोहे की छड़ों और लाठियों का इस्तेमाल किया था। इस घटना में भारत के 20 सैनिक मारे गए थे, जबकि चीन ने काफी दिन बाद अपने चार सैनिकों की मौत की बात स्वीकार की थी। कई रिपोर्ट में चीनी पक्ष के हताहतों की संख्या इससे कहीं अधिक बताई गई थी।

आईटीबीपी प्रमुख ने बताया कि ‘शौर्य कमांडो’ नाम से एक नई लड़ाकू टीम भी गठित की गई है। इस टीम ने अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों पर चीनी पीएलए सैनिकों के साथ जारी गतिरोध के दौरान अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया है।

उन्होंने कहा कि इन कमांडो को हर सीमा बटालियन में तैनात किया जाएगा, जिससे बल को एक विशिष्ट पहचान मिलेगी।

कपूर ने कहा कि आधुनिक युद्ध से मिले सबक के आधार पर आईटीबीपी सीमा पर बड़े पैमाने पर भूमिगत आश्रय स्थल (बंकर) बना रही है। उन्होंने संकेत दिया कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद पाकिस्तान के साथ पैदा हुई संघर्ष की स्थिति ने भी ऐसी तैयारियों की जरूरत को रेखांकित किया है।

उन्होंने बताया कि बल ने जवानों के आराम और अभियान संबंधी तैयारियों को बेहतर बनाने के लिए भी कदम उठाए हैं। शून्य से नीचे तापमान वाले क्षेत्रों में स्थित 383 बैरकों में से 342 में ऊष्मारोधी (इंसुलेटिंग) व्यवस्था की गई है। दूरदराज के इलाकों में तैनात जवानों को बिजली उपलब्ध कराने के लिए 141 जनरेटर खरीदे गए हैं और कई स्थानों पर सौर जल हीटर लगाए गए हैं।

उन्होंने बताया कि आईटीबीपी अपने हथियारों का भी आधुनिकीकरण कर रही है। इनमें से कुछ हथियार करीब 50 साल पुराने हैं। इसके अलावा, सभी प्रकार के भूभाग पर चलने वाले नए वाहनों, अन्य जमीनी वाहनों और त्वरित प्रतिक्रिया वाहनों की खरीद के जरिए बल की आवाजाही क्षमता बढ़ाई जा रही है।

कपूर ने कहा, ‘‘इन सभी उपायों के जरिए हमने ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में लड़ाई के लिए एक विशेष बल के रूप में विकसित होने की योजना तैयार की है।’’

भाषा मनीषा वैभव

वैभव

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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