पश्चिम की “आसुरी ताकतें” भारत को अस्थिर करना चाहती हैं और यहां “अपने लोगों को सत्ता में बैठाना” चाहती हैं, ऐसा RSS प्रमुख मोहन भागवत ने इस हफ्ते दावा किया. हाल के विरोध प्रदर्शनों को बदनाम करने के लिए BJP ने ऐसी ही भाषा चुनी है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि देश के युवाओं को “नौजवानों को अराजकता की राजनीति का मोहरा बनाने” की कोशिश की जा रही है. पार्टी के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी विपक्ष पर आरोप लगाते हैं कि वह “विदेशी ताकतों के साथ मिलकर ‘रिजीम चेंज’ की भाषा बोल रहे हैं”. BJP अध्यक्ष नितिन नबीन राहुल गांधी को “विदेशी टूलकिट गिरोह के मोहरे” बताकर देश के हितों के खिलाफ काम करने वाला बता रहे हैं.
इस बात को भूल जाइए कि इन्हीं विदेशी ताकतों के नेताओं को नरेंद्र मोदी वैश्विक सम्मेलनों में गले लगाते नजर आते हैं. BJP-RSS इस तरह की बातें करके CJP, INDIA गठबंधन और छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ सरकार की लाठीचार्ज, आंसू गैस और बड़े पैमाने पर हिरासत में लेने की कार्रवाई को सही ठहराती है.
11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को एक विशेष सुनवाई की. कोर्ट ने आदेश दिया कि शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के हो रही सभा में शामिल किसी भी व्यक्ति को “कानून द्वारा तय प्रक्रिया के अनुसार ही” हिरासत में लिया जा सकता है. कोर्ट ने दिल्ली में मेट्रो, ट्रेनों और इंटरनेट सेवाओं को भी बहाल करने का आदेश दिया. और जब CJP के पहले के विरोध प्रदर्शनों में विदेशी फंडिंग के बारे में पूछा गया, तो विदेश मंत्रालय ने कहा कि उसके पास “साझा करने के लिए कोई जानकारी नहीं है”.
अब ज्यादातर लोगों को साफ दिखाई दे रहा है कि असली टूलकिट क्या है: हर जन आंदोलन पर “राष्ट्र-विरोधी” होने का ठप्पा लगा दो और उम्मीद करो कि लोग इस बात को सच मान लेंगे. BJP को शायद एहसास भी नहीं है कि उसकी बातें ब्रिटिश साम्राज्य की उन बातों से कितनी मिलती-जुलती हैं, जो वह कभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में कहता था.
भारत के ‘अराजकतावादी’ और ‘तोड़फोड़ करने वाले’
“हर चरण में श्री गांधी अपने वादों को पूरा करने में नाकाम रहे और उनकी साख गिरती गई. मैं उस व्यक्ति की बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि उनके उद्देश्यों और तरीकों की बात कर रहा हूं, जिन पर समझदार लोगों का भरोसा उठ गया था. अब उन्होंने ऐसे काम शुरू कर दिए हैं जो खतरनाक हैं, और उनके अराजक रवैये को देखते हुए भारत सरकार हर समझदार और वफादार भारतीय से समर्थन मांगने की हकदार है…”
यह किसी BJP प्रवक्ता की राहुल गांधी के बारे में कही गई बात नहीं है. यह भारत के तत्कालीन सचिव एडविन मॉन्टेग्यू (जिनके नाम पर मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार हुए थे) के शब्द हैं. उन्होंने फरवरी 1922 में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन के बारे में बोलते हुए ये बातें कही थीं.
मोदी सरकार ने अंग्रेजों के शासन वाली राज की भाषा को लगभग शब्द-दर-शब्द अपना लिया है. उस समय और आज, दोनों दौरों में सबसे ज्यादा दोहराया जाने वाला शब्द है “अराजकता”. 1919 के कुख्यात रॉलेट एक्ट का पूरा नाम था अराजक और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम. इस कानून के तहत सरकार भारतीयों को बिना मुकदमा चलाए दो साल तक जेल में रख सकती थी. इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में अंग्रेजों के बहुमत ने हर भारतीय सदस्य के विरोध के बावजूद इस कानून को जबरन पास करा दिया. जिन्ना, मालवीय और मजहर-उल-हक ने विरोध में एक ऐसी संस्था से इस्तीफा दे दिया, जिसमें निष्पक्षता की जगह मनमानी चलती थी. इसके बाद गांधी का पहला देशव्यापी सत्याग्रह शुरू हुआ. क्या यह सब जाना-पहचाना नहीं लगता?
करीब तीन दशकों तक आरोपों की सूची लगभग वही रही. नवंबर 1920 में भारत सरकार के एक प्रस्ताव में दावा किया गया कि असहयोग आंदोलन के कारण भारत “विदेशी हमले और देश के अंदर अराजकता” का शिकार हो सकता है. फरवरी 1922 में अपने भाषण में मॉन्टेग्यू ने कहा कि “बोल्शेविक प्रचार ने अशांति बढ़ाने में कुछ योगदान दिया है”. 1931 में बंगाल के पूर्व गवर्नर लॉर्ड ज़ेटलैंड ने हाउस ऑफ लॉर्ड्स में चेतावनी दी कि सविनय अवज्ञा आंदोलन से “पूरा देश अराजकता की स्थिति में पहुंच सकता है”.
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भारत के तत्कालीन सचिव लियोपोल्ड एमरी ने गांधी को “सबसे बड़ा तोड़फोड़ करने वाला” बताया और उस “अराजकता” का मजाक उड़ाया, जिसकी ओर उनके मुताबिक गांधी बड़ी बेफिक्री से बढ़ रहे थे. एक महीने बाद उन्होंने कांग्रेस पर “तोड़फोड़ की नीति” अपनाने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि यह नीति पूर्वी भारत के उस “महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र” पर केंद्रित थी, जो उस समय जापान के हमले के खतरे में था.
दशक-दर-दशक वही कहानी: अराजकता और विदेशी हाथ. लेकिन जब सबूत मांगे जाते थे, तो ब्रिटिश राज के पास अक्सर कुछ नहीं होता था. अक्टूबर 1942 में, भारत छोड़ो आंदोलन के चरम पर, भारत कार्यालय के अपने ही मंत्री ड्यूक ऑफ डेवोनशायर ने हाउस ऑफ लॉर्ड्स में स्वीकार किया कि भारत में “दुश्मन के राजनीतिक प्रभाव” का “कोई सीधा सबूत नहीं है. बिल्कुल भी नहीं”. चौरासी साल बाद, विदेश मंत्रालय के पास भी “साझा करने के लिए कोई जानकारी नहीं है”.
इन ठप्पों के गंभीर नतीजे हुए. 1919 में पंजाब के अधिकारियों ने खुद को यकीन दिला लिया था कि विरोध प्रदर्शन एक विद्रोह हैं. लेकिन बाद में राज की अपनी हंटर कमेटी को भी इस साजिश का कोई सबूत नहीं मिला. इसी सोच के कारण ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर ने जलियांवाला बाग में बैसाखी के मौके पर शांतिपूर्ण सभा कर रहे लोगों पर गोलियां चलाने का फैसला किया. उसका मकसद पूरे पंजाब में “नैतिक प्रभाव” पैदा करना था.
महात्मा गांधी, फिर मार्टिन लूथर किंग जूनियर
सत्याग्रह करने वाले सिर्फ भारतीय ही नहीं थे, जिन्हें इस तरह निशाना बनाया गया. मार्टिन लूथर किंग जूनियर को गैरकानूनी बहिष्कार का नेतृत्व करने के लिए दोषी ठहराया गया. उन्हें बाहरी व्यक्ति बताकर बदनाम किया गया, कम्युनिस्टों के औजार के तौर पर उनकी जांच की गई और उन पर विदेशी लोगों के इशारे पर चलने का आरोप लगाया गया. यह सब इसलिए हुआ क्योंकि वह समान अधिकारों की मांग कर रहे थे.
28 अगस्त 1963 को दिए गए उनके “मेरा एक सपना है” भाषण के सिर्फ दो दिन बाद, FBI के घरेलू खुफिया विभाग के प्रमुख विलियम सुलिवन ने लिखा कि ब्यूरो को किंग को “इस देश में भविष्य के सबसे खतरनाक अश्वेत व्यक्ति” के रूप में चिह्नित करना चाहिए, खासकर कम्युनिज्म, अश्वेत लोगों और राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से.
1976 में अमेरिकी सीनेट की एक समिति ने पाया कि FBI ने किंग को “निष्प्रभावी बनाने” की कोशिश की थी. समिति ने यह भी पाया कि FBI की अपनी फाइलों में इस आरोप का कोई सबूत नहीं था कि किंग के सबसे करीबी सलाहकार पर कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव था. आरोप हमेशा जोर-शोर से लगाए जाते हैं, लेकिन सबूत कभी सामने नहीं आते.
एक के बाद एक चुनावी तानाशाही
चाहे किसान हों, छात्र हों या वे नागरिक जिन्हें डर है कि मतदाता सूची से उनके नाम गायब हो गए हैं, जवाब हर बार एक जैसा होता है: लाठियां, बैरिकेड, प्रतिबंधात्मक आदेश, बड़े पैमाने पर हिरासत और अराजकता व विदेशी हाथ वाली भाषा.
बेशक, ब्रिटिश साम्राज्य अतीत की बात है. बेशक, हम आज के दौर में जी रहे हैं. और इन दोनों दौर की समानताएं महज इत्तेफाक हैं. ब्रिटिश राज एक चुनावी तानाशाही था. कम से कम भारत सरकार के अधिनियमों के बाद चुनाव तो होते थे, लेकिन उनसे कोई बड़ा बदलाव नहीं आता था. आज का स्वतंत्र भारत भी एक (नोट्स देखें) चुनावी तानाशाही है. आप वोट देते हैं, लेकिन चुनाव कराने वाले अंपायरों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. और पिछले साल से अब तक 13 करोड़ नाम मतदाता सूची से गायब हो चुके हैं.
ब्रिटिश राज को भी पूरा यकीन था कि उसके आलोचक विदेशी पैसों पर चलने वाले अराजकतावादी हैं. जब उनसे सबूत मांगे गए, तो उनके पास दिखाने के लिए कुछ नहीं था. FBI के पास भी नहीं. 2021 में उस सरकार के पास भी कोई सबूत नहीं था, जिसने किसानों को खालिस्तानी कहा और बाद में अपने कृषि कानून वापस ले लिए.
सत्यमेव जयते.
अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य हैं. वे @dubeyamitabh पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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