21 अक्टूबर की शाम दिल्ली के बीकानेर हाउस में ‘No Idea Is Final’ (कोई भी विचार अंतिम नहीं होता) नाम की फोटोग्राफी प्रदर्शनी देखने पहुंचे लोगों को लाल रंग की खाली दीवारें मिलीं. दीवारों पर तस्वीरें टांगने के लिए कीलें अब भी लगी थीं, और वहां एक कैटलॉग रखा था, जिसमें उन तस्वीरों को दिखाया गया था, जिन्हें दीवारों पर होना चाहिए था. ये तस्वीरें 26 साल के रेहान वाड्रा ने खींची थीं. वह कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा के बेटे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के भांजे हैं. दिप्रिंट ने बताया कि उस दोपहर 105 में से 75 तस्वीरों को हटाने का आदेश दिया गया था. ऐसा न करने पर प्रदर्शनी रद्द कर दी जाती. इनमें से ज्यादातर तस्वीरें इस साल दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों की थीं. इनमें प्रदर्शनकारी, पुलिसकर्मी और हिरासत में लिए गए लोग दिखाई दे रहे थे. इनमें से दो तस्वीरें राष्ट्रीय ध्वज की थीं.
रेहान वाड्रा ने कहा है कि उन्हें लिखित नोटिस देकर तस्वीरें हटाने को कहा गया था. नोटिस में कहा गया था कि बीकानेर हाउस की बुकिंग नीति का पालन नहीं किया गया है. उन्हें यह भी बताया गया कि तस्वीरें “बहुत ज्यादा राजनीतिक” हैं. बीकानेर हाउस ने अभी तक इस मामले पर अपना पक्ष सार्वजनिक नहीं किया है. अगर उसने सचमुच कारण बताते हुए लिखित आदेश जारी किया था, तो उसे सार्वजनिक करना चाहिए.
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को बोलने और अपनी बात जाहिर करने की आजादी देता है. सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय से माना है कि इस अधिकार में फोटोग्राफी, पेंटिंग और सिनेमा भी शामिल हैं. संविधान के मुताबिक, कानून के तहत इस आजादी पर सिर्फ आठ आधारों पर रोक लगाई जा सकती है: भारत की संप्रभुता और अखंडता, देश की सुरक्षा, दूसरे देशों के साथ दोस्ताना संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता, अदालत की अवमानना, मानहानि और अपराध के लिए उकसाना.
संविधान बनाने वालों ने जानबूझकर इन आठ आधारों की सूची तय की थी. “बहुत ज्यादा राजनीतिक”, “गलत समय” और “प्रदर्शनी लगाने वाले का परिवार” इनमें शामिल नहीं हैं.
ऐसी सामग्री जो सचमुच खतरनाक है, उस पर पहले से ही आपराधिक कानून लागू होते हैं. समुदायों के बीच दुश्मनी बढ़ाना, जिसे पहले भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 153A में रखा गया था और अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 में शामिल किया गया है, जानबूझकर किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना और अश्लीलता, ये सभी अपराध हैं. पुलिस की भी कानूनी जिम्मेदारी है कि वह ऐसे संज्ञेय अपराधों को रोके, जिनमें कानून के तहत बिना वारंट गिरफ्तारी की जा सकती है.
अगर दीवार पर लगी किसी तस्वीर में भड़काऊ या अश्लील सामग्री होती, तो पुलिस लिखित आधार पर कार्रवाई कर सकती थी. ऐसी कार्रवाई को अदालत में चुनौती भी दी जा सकती थी. लेकिन इनमें से किसी भी कानून का हवाला नहीं दिया गया. किसी सार्वजनिक जगह पर विरोध प्रदर्शन कर रहे नागरिकों की तस्वीरें, जिनमें से कई पहले ही अखबारों में छप चुकी थीं, कोई अपराध नहीं हैं. सरकार किसी तस्वीर को गैलरी में प्रतिबंधित सामग्री नहीं मान सकती, जबकि वही तस्वीर अखबार के पहले पन्ने पर छापने की अनुमति देती है.
यह दीवार किसकी है?
कोई निजी गैलरी अपनी मर्जी से जो चाहे तस्वीर लगा सकती है या लगाने से मना कर सकती है. लेकिन बीकानेर हाउस राजस्थान सरकार का है. इसलिए संविधान के हिसाब से इसे भी “राज्य” माना जाता है. जब सरकार किसी सांस्कृतिक जगह को आम लोगों के लिए खोलती है, तो वह किसी के विचारों के आधार पर यह तय नहीं कर सकती कि वहां किसकी प्रदर्शनी लगेगी.
संविधान का अनुच्छेद 14 सरकार को एक प्रदर्शनी लगाने वाले पर ऐसा नियम लागू करने से रोकता है, जिसे उसने किसी दूसरे के मामले में लागू नहीं किया था. कलाकार का कहना है कि पिछले साल सितंबर में इसी जगह पर एक राजनीतिक इंस्टॉलेशन यानी कलाकृति प्रदर्शित की गई थी.
1989 के मामले एस. रंगराजन बनाम पी. जगजीवन राम में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ इसलिए किसी की अभिव्यक्ति को दबाया नहीं जा सकता कि कोई परेशानी या हिंसा करने की धमकी दे रहा है. खतरा बिल्कुल नजदीक होना चाहिए, “जैसे बारूद के ढेर में चिंगारी”. सरकार यह बहाना भी नहीं बना सकती कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखने में असमर्थ है.
2019 के मामले इंडिबिलिटी क्रिएटिव बनाम पश्चिम बंगाल सरकार में राजनीतिक व्यंग्य वाली फिल्म ‘भोबिष्यतेर भूत’ को अधिकारियों के अनौपचारिक दबाव के कारण सिनेमाघरों से हटा दिया गया था. तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकार फोन करके वह काम नहीं कर सकती, जिसे वह कानूनी आदेश जारी करके नहीं कर सकती. कोर्ट ने इस मामले में जुर्माना भी लगाया था.
दोनों तिरंगे वाली तस्वीरों को सबसे आखिर में हटाया गया. 2004 के मामले भारत संघ बनाम नवीन जिंदल में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान के साथ प्रदर्शित करना भी अभिव्यक्ति की आजादी के तहत आता है. अगर कोई अधिकारी तिरंगे की तस्वीर को “राजनीतिक सामग्री” बताता है, तो वह राष्ट्रीय ध्वज को किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति की तरह मान रहा है.
फोन पर मिली मंजूरी
रेहान वाड्रा की प्रदर्शनी के प्रस्ताव को कई महीने पहले मंजूरी मिल गई थी. प्रदर्शनी शुरू होने से एक हफ्ते पहले उसका पूरा लेआउट भी अधिकारियों के साथ साझा किया गया था और तब किसी ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी.
कलाकार के मुताबिक, पहला फोन मंगलवार, 20 अक्टूबर को शाम करीब 6 बजे आया. उन्होंने बताया कि अगले दिन दोपहर को प्रधान रेजिडेंट कमिश्नर ने प्रदर्शनी के कमरों का निरीक्षण किया. इसके बाद उन्होंने राजस्थान के मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी को फोन किया. फिर दोपहर 3:30 बजे शाम 5 बजे तक तस्वीरें हटाने का आदेश दिया गया. बाद में तस्वीरों की जगह लगाए गए खाली फ्रेम भी हटाने पड़े.
मैंने 1989 से 1996 के बीच बटाला में जिला मजिस्ट्रेट और अमृतसर में डिप्टी कमिश्नर के तौर पर काम किया था. उस दौरान सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने से जुड़े फैसले लेना मेरे रोजमर्रा के काम का हिस्सा था. कानून-व्यवस्था से जुड़े किसी भी फैसले का आकलन लिखित रूप में होता है. उसमें कारण बताए जाते हैं और जिम्मेदार अधिकारी के हस्ताक्षर होते हैं.
लेकिन अगर कोई फैसला फोन पर लिया जाए, ऊपर के अधिकारियों तक पहुंचाया जाए और प्रदर्शनी शुरू होने से सिर्फ चार घंटे पहले लागू कर दिया जाए, तो यह किसी खतरे का सही आकलन नहीं है. यह सिर्फ जिम्मेदारी से बचने का तरीका है.
प्रदर्शनी लगाने वाला व्यक्ति कांग्रेस के एक महासचिव का बेटा और विपक्ष के नेता का भांजा है. जयपुर में BJP की सरकार है. ऐसा लगता है कि दिल्ली में कोई अधिकारी वह व्यक्ति नहीं बनना चाहता था, जिसकी अनुमति से ये तस्वीरें दीवारों पर लगी रहतीं. लेकिन सरकार की कार्रवाई करने की यह आदत अब भी बनी हुई है, और ऐसी हर कार्रवाई की तरह इसे भी अनुच्छेद 19 के तहत जवाब देना होगा.
तब भी खाली जगहें थीं, आज भी हैं
28 जून 1975 को, आपातकाल की घोषणा के तीन दिन बाद, द इंडियन एक्सप्रेस अखबार के पहले पन्ने पर संपादकीय का मुख्य कॉलम खाली था. द स्टेट्समैन ने भी ऐसा ही किया. 29 जून को सेंसर अधिकारियों ने नए निर्देश जारी किए, जिनमें खाली जगह छोड़ने पर भी रोक लगा दी गई. उस गर्मी में मैं पटियाला में स्कूल का छात्र था.
बीकानेर हाउस में कलाकार ने तस्वीरों की जगह खाली फ्रेम लगा दिए. अधिकारियों ने उन्हें भी हटाने का आदेश दे दिया.
बेशक, दोनों घटनाओं की तुलना पूरी तरह नहीं की जा सकती. किसी को जेल नहीं हुई है और किसी अखबार की बिजली नहीं काटी गई है. 1975 में सेंसर अधिकारियों ने आपातकाल की घोषणा के तहत कार्रवाई की थी, जिसमें अनुच्छेद 19 को निलंबित कर दिया गया था. आज ऐसी कोई घोषणा नहीं है और अनुच्छेद 19 पूरी तरह लागू है. 1975 के सेंसर अधिकारियों के पास कानूनी आदेश था, जबकि 2026 के अधिकारी के पास सिर्फ एक फोन था.
विडंबना यह है कि तस्वीरों को हटाने की इस कार्रवाई ने प्रदर्शनी को और ज्यादा लोगों तक पहुंचा दिया है.
लुटियंस दिल्ली की किसी ऐतिहासिक इमारत में पांच दिन चलने वाली फोटोग्राफी प्रदर्शनी देखने शायद कुछ सौ लोग ही आते. लेकिन खाली दीवारों की वजह से उद्घाटन की रात ही इसे राष्ट्रीय स्तर पर खबरों में जगह मिल गई. हटाई गई तस्वीरें अब भी कैटलॉग में मौजूद हैं, जिसे हर दर्शक अपने साथ ले जा सकता है. ये तस्वीरें ऑनलाइन भी अच्छी क्वालिटी में फैलेंगी. दिसंबर में ये तस्वीरें बेंगलुरु की एक गैलरी में प्रदर्शित की जाएंगी. वहां इन्हें देखने के लिए ऐसा दर्शक वर्ग तैयार हो चुका होगा, जिसे बनाने में अधिकारियों की कार्रवाई का ही योगदान है.
जब कोई आंदोलन चल रहा हो, तो सरकारी जगह पर निष्पक्षता बनाए रखने की जरूरत हो सकती है. लेकिन इसके लिए बुकिंग के समय नियम तय किए जाने चाहिए. ये नियम सार्वजनिक होने चाहिए और हर प्रदर्शनी लगाने वाले पर समान रूप से लागू होने चाहिए. ऐसी प्रदर्शनी शुरू होने से सिर्फ चार घंटे पहले नहीं की जानी चाहिए.
पंजाब समेत हर राज्य की दिल्ली में एक भवन (भवन) है, जहां कमरे किराए पर दिए जाते हैं. हर राज्य को अपने सांस्कृतिक स्थलों के लिए एक छोटी और स्पष्ट नीति सार्वजनिक करनी चाहिए. यह नीति संविधान के अनुच्छेद 19(2) में बताए गए आठ आधारों के दायरे में होनी चाहिए. राजस्थान इसकी शुरुआत बुधवार के आदेश को सार्वजनिक करके कर सकता है, अगर ऐसा कोई आदेश जारी किया गया था.
केबीएस सिद्धू, IAS (रिटायर्ड), 2021 में पंजाब सरकार के स्पेशल चीफ सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए. वे केबीएस क्रॉनिकल (kbssidhu.substack.com) के फाउंडर-एडिटर और शिरोमणि पंजाब फोरम के कंवीनर हैं. विचार निजी हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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