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Thursday, 9 July, 2026
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ZEE5 से हटाई गई, लाउडस्पीकर से ऐलान: पंजाब में गुरुद्वारे कैसे ‘सतलुज’ को दे रहे हैं नई जिंदगी

पंजाब के गांवों में दिलजीत-स्टारर सतलुज की स्क्रीनिंग के लिए एक भी आयोजक नहीं है. कुछ गांवों में, स्पोर्ट्स क्लब ने एलईडी दीवारों और साउंड सिस्टम की व्यवस्था करने के लिए संसाधन जुटाए हैं.

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चंडीगढ़: जैसे-जैसे पंजाब के गांवों में शाम ढलती है, स्थानीय गुरुद्वारे के लाउडस्पीकर से एक ऐलान होता है. लेकिन यह घोषणा किसी धार्मिक सभा या गांव की बैठक के लिए नहीं, बल्कि एक फिल्म दिखाने के लिए होती है. शाम 7 बजे तक लोग आने लगते हैं. वे अपने जूते बाहर उतारते हैं, गुरुद्वारे के अंदर जाने से पहले सिर ढकते हैं या गांव के कम्युनिटी एरिया में अपनी जगह पर बैठ जाते हैं.

बच्चे आगे की कतारों में बैठते हैं. बुजुर्ग पुरुष पीछे रखी प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठते हैं. महिलाएं समूह बनाकर बैठ जाती हैं. वहीं, स्वयंसेवक लोगों को घूम-घूमकर रूह अफजा के गिलास पिलाते हैं. गर्मी से राहत देने के लिए बड़े इंडस्ट्रियल कूलर लगाए जाते हैं. बड़ी LED स्क्रीन पर मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की जिंदगी पर बनी दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ दिखाई जा रही होती है.

चार साल के इंतजार के बाद OTT प्लेटफॉर्म Zee5 पर रिलीज हुई और रिलीज के दो दिन के भीतर हटा दी गई यह फिल्म अब पंजाब के गांवों में नई जिंदगी पा चुकी है.

मोगा, संगरूर, पटियाला, होशियारपुर, राजपुरा, गुरदासपुर, बरनाला, बठिंडा, अमृतसर, लुधियाना और पंजाब के कई दूसरे जिलों से दर्जनों स्क्रीनिंग की खबरें सामने आई हैं. जानकारी के मुताबिक, स्वयंसेवक, स्पोर्ट्स क्लब, गुरुद्वारा कमेटियां, स्थानीय लोग और विदेशों में बसे पंजाबी मिलकर LED वॉल, प्रोजेक्टर, साउंड सिस्टम और लोगों के लिए जलपान का खर्च जुटा रहे हैं.

इसकी शुरुआत राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले की अनूपगढ़ तहसील के गांव 6H पतरोड़ा में हुई एक सामूहिक स्क्रीनिंग से हुई थी. यहां तक कि दिलजीत दोसांझ ने भी इस पर ध्यान दिया था. अब यह चलन पंजाब के गांवों तक फैल चुका है.

पिछले कुछ दिनों में पंजाब के कई गांवों में फिल्म दिखाई गई है. इनमें राजपुरा का सराय माजरा, बरनाला का बलियां, जलालाबाद का चक सराइन, पट्टी का मेहराज, लुधियाना का रजोआना, गुरदासपुर का खेहरा सुल्तान, लुधियाना का हथूर, अमृतसर का नांगली, मोगा का मनावां, पटियाला का किशनपुर (बख्शीवाला), संगरूर का लेहल कलां, मोगा का वारेह, होशियारपुर का भरोवाल, संगरूर का संघेरी, मोगा का स्मालसर और बरनाला का ठिकरीवाला शामिल हैं.

मोगा शहर में तो फिल्म की स्क्रीनिंग मुख्य बाजार में भी की गई.

लेकिन इन स्क्रीनिंग का कोई एक आयोजक नहीं है. कुछ गांवों में स्पोर्ट्स क्लब ने मिलकर LED वॉल और साउंड सिस्टम का इंतिजाम किया. दूसरी जगहों पर स्थानीय गुरुद्वारों से जुड़े स्वयंसेवकों ने स्क्रीनिंग का आयोजन किया. कई जगह लोगों का कहना है कि पूरा खर्च किसी स्थानीय परिवार या विदेश में बसे पंजाबियों ने उठाया, जो चाहते थे कि OTT से हटाए जाने के बाद भी लोग यह फिल्म देख सकें.

बलियां में अपने बैंक्वेट हॉल में गांव वालों के कहने पर फिल्म की स्क्रीनिंग कराने में मदद करने वाले प्रभ देओल ने कहा, “फिल्म की सामूहिक स्क्रीनिंग को लोगों का जबरदस्त समर्थन मिल रहा है.”

कई पंजाबी ब्लॉगर भी फेसबुक और इंस्टाग्राम पर इन स्क्रीनिंग का प्रचार कर रहे हैं. हर शाम अलग-अलग गांवों से नई स्क्रीनिंग की जानकारी वाले सोशल मीडिया पोस्ट सामने आते हैं. वहीं, इंटरनेट पर शेयर किए गए वीडियो में बड़ी संख्या में लोग फिल्म देखते नजर आते हैं.

लुधियाना के उधोवाल कलां गांव में फिटनेस अकादमी चलाने वाले सुल्तानदीप सिंह ने अपने गांव में फिल्म की स्क्रीनिंग की घोषणा करवाई.

लुधियाना के रायकोट के रहने वाले अमन, जो LCD वॉल और साउंड सिस्टम किराए पर देते हैं, ने बताया कि अगले कई दिनों तक पंजाब के कई गांवों में फिल्म दिखाने के लिए उनकी बुकिंग हो चुकी है. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “हमें आसपास के कुछ गांवों में फिल्म दिखाने के लिए बुलाया गया है. लेकिन हर दिन इसकी मांग बढ़ती जा रही है. हम सिर्फ स्क्रीन और साउंड सिस्टम को लाने-ले जाने और मजदूरी का जितना खर्च है, उतना ही पैसा ले रहे हैं.”

इसके अलावा पूरी फिल्म कई फेसबुक पेजों पर उपलब्ध है और इंस्टाग्राम पर इसके कुछ हिस्से मौजूद हैं. जब ‘सतलुज’ थोड़े समय के लिए ऑनलाइन उपलब्ध थी, तब डाउनलोड की गई उसकी कॉपियां लोगों के बीच निजी तौर पर साझा की गईं और अब उन्हीं का इस्तेमाल सामूहिक स्क्रीनिंग में किया जा रहा है.

फिल्म को OTT प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के कुछ घंटों बाद ही दिलजीत दोसांझ ने खुद अपने प्रशंसकों से कहा था कि वे डाउनलोड किए गए लिंक से फिल्म देखें.

जिन गांवों में स्क्रीनिंग हो रही है, वहां अक्सर स्थानीय गुरुद्वारे के लाउडस्पीकर से इसकी घोषणा की जाती है. आमतौर पर स्क्रीनिंग शाम 6 बजे के बाद शुरू होती है, जब गांव के लोग खेतों या अपनी दुकानों से काम खत्म करके लौट आते हैं.

जिन गांवों में गुरुद्वारे के परिसर के अंदर फिल्म दिखाई जाती है, वहां लोग अंदर जाने से पहले अपने जूते उतारते हैं और सिर ढकते हैं.

जलालाबाद के पास चक सराई में आयोजकों ने लोगों को रूह अफजा पिलाया. दूसरी जगहों पर गांव वालों ने जलपान या पीने के पानी का इंतजाम किया, जबकि स्वयंसेवकों ने कुर्सियां, ऑडियो उपकरण और कूलर लगाने में मदद की. परिवार एक साथ फिल्म देखने पहुंचे, जिससे जो अनुभव आमतौर पर अकेले OTT पर फिल्म देखने का होता, वह एक सामूहिक सार्वजनिक कार्यक्रम में बदल गया.

लोगों की यह असाधारण प्रतिक्रिया उस फिल्म के लंबे और मुश्किल सफर का एक और अध्याय है, जो हाल ही में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के साथ चार साल तक चली लंबी लड़ाई के बाद लोगों तक पहुंच सकी.

CBFC के साथ लंबी लड़ाई

हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी और जसवंत सिंह खालड़ा के किरदार में दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी दिखाती है. खालड़ा ने पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान सिख युवाओं के कथित गैरकानूनी अंतिम संस्कार और लापता होने के मामलों का रिकॉर्ड तैयार किया था.

सितंबर 1995 में खालड़ा का अमृतसर स्थित उनके घर के बाहर से अपहरण कर लिया गया था और बाद में उनकी हत्या कर दी गई. कई साल बाद उनके अपहरण और हत्या के मामले में पंजाब पुलिस के छह कर्मचारियों को दोषी ठहराया गया.

त्रेहान ने कहा है कि फिल्म पर काम कई साल पहले शुरू हुआ था और इसकी शूटिंग 2022 में शुरू हुई. उनके मुताबिक, उनकी टीम ने उसी साल के आखिर तक फिल्म पूरी कर ली थी, लेकिन सर्टिफिकेशन से जुड़ी दिक्कतों की वजह से फिल्म अटक गई. फिल्म बनाने वालों का कहना है कि CBFC ने कई बड़े बदलाव मांगे थे. इनमें फिल्म के टाइटल और यहां तक कि खालड़ा के नाम में बदलाव भी शामिल था. वे इन बदलावों को मानने के लिए तैयार नहीं थे, जिसकी वजह से फिल्म की रिलीज में लंबी देरी हुई.

शुरुआत में इस फिल्म का नाम ‘पंजाब 95’ रखा गया था. यह नाम उस साल की तरफ इशारा करता था, जिस साल खालड़ा का अपहरण हुआ था और उनकी हत्या की गई थी. बाद में यह फिल्म ‘सतलुज’ नाम से दर्शकों तक पहुंची. हालांकि सोशल मीडिया पर इसके कई समर्थक अब भी इसे ‘पंजाब 95’ के नाम से ही बुलाते हैं.

पूरी देरी के दौरान दिलजीत दोसांझ लगातार इस फिल्म के बारे में खुलकर बात करते रहे. वह अक्सर कहते थे कि यह ऐसी कहानी है जो लोगों तक पहुंचनी चाहिए. त्रेहान ने बताया कि स्क्रिप्ट पढ़ने के तुरंत बाद ही दिलजीत इस फिल्म का हिस्सा बनने के लिए तैयार हो गए थे और कई सालों तक चले अनिश्चित दौर में भी इसके साथ खड़े रहे. फिल्म रिलीज होने के बाद दिए गए इंटरव्यू में त्रेहान ने कहा कि लंबे सर्टिफिकेशन विवाद के बावजूद फिल्म बनाने वाले कहानी की मूल भावना को बनाए रखने पर अड़े रहे.

जब इस महीने की शुरुआत में फिल्म आखिरकार ZEE5 पर रिलीज हुई, तो यह बिना किसी शोर-शराबे के आई. आमतौर पर बड़ी फिल्मों की रिलीज के समय जैसा प्रचार होता है, वैसा कुछ नहीं हुआ. लेकिन सिर्फ दो दिन बाद ही यह भारत में स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध नहीं रही. प्लेटफॉर्म ने कहा कि उसने “मौजूदा हालात को देखते हुए” यह फैसला लिया है और कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहा है.

इस फैसले के बाद पंजाब में उग्रवाद के सबसे कठिन दौर के दौरान पंजाब पुलिस की भूमिका को लेकर बहस छिड़ गई. एक पक्ष ने उन पुलिस कर्मचारियों की क्षमता और बहादुरी पर जोर दिया, जिन्होंने कई दशकों तक चले आतंकवाद और हिंसा को खत्म किया. उनका कहना था कि फिल्म ने हालात को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया है. वहीं दूसरे पक्ष का कहना था कि उस दौर में हुई “25,000” कथित फर्जी मुठभेड़ों और अदालत के बाहर की गई हत्याओं की कहानी भी लोगों के सामने आनी चाहिए.

अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं, सिख संगठनों, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और फिल्म जगत के लोगों ने उस फिल्म को हटाने के फैसले पर सवाल उठाए, जिसे पहले ही CBFC का सर्टिफिकेट मिल चुका था. कई लोगों ने कहा कि दर्शकों को फिल्म देखने और अपनी राय खुद बनाने का मौका मिलना चाहिए था.

सबसे कड़ी प्रतिक्रियाओं में से एक श्री अकाल तख्त साहिब के सचिवालय की ओर से आई.

सोमवार को जारी एक बयान में जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने और लोगों तक सच पहुंचने से रोकने की कोशिश बताया. पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान कथित फर्जी मुठभेड़ों और गैरकानूनी अंतिम संस्कार के मामलों का रिकॉर्ड जुटाने में खालड़ा के काम का जिक्र करते हुए गर्गज ने कहा कि खालड़ा ने बहुत मेहनत से ऐसे रिकॉर्ड इकट्ठा किए थे, जिन्होंने उस दौर में हुए सबसे गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों में से एक को सामने लाया. उन्होंने कहा कि दुनिया भर के लोकतंत्र अभिव्यक्ति की आजादी और मानवाधिकारों की रक्षा पर जोर देते हैं, लेकिन इस कहानी को लोगों तक पहुंचने से रोकना “असंवैधानिक और अन्यायपूर्ण” है.

इस विवाद के बाद केंद्र सरकार ने भी मामले की नए सिरे से समीक्षा शुरू कर दी है. पंजाब बीजेपी के नेताओं, जिनमें प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों भी शामिल हैं, की ओर से दिए गए ज्ञापन के बाद केंद्र सरकार ने तीन सदस्यों की एक समिति बनाई है. यह समिति फिल्म को स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म से हटाए जाने की परिस्थितियों की जांच करेगी.

इस मामले की जांच सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के प्रावधानों के तहत भी अलग से की जा रही है. इससे इस फैसले पर दोबारा विचार किए जाने की संभावना बनी हुई है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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